'दुश्मन ना देखे, इसलिए ऑनलाइन नहीं की गईं सीएजी डिफ़ेंस रिपोर्ट' - प्रेस रिव्यू

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द इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पूर्व नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) राजीव महर्षि ने शुक्रवार को अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद कहा कि "उन्होंने डिफ़ेंस ऑडिट की रिपोर्टों को ऑनलाइन उपलब्ध नहीं कराया क्योंकि अमरीका, चीन और पाकिस्तान में भी इन रिपोर्टों को कोई देख रहा होगा."

उन्होंने कहा कि "इसके पीछे विचार सिर्फ़ यह था कि रिपोर्टें आसानी से उपलब्ध ना हों क्योंकि इसकी ज़रूरत नहीं है."

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि "ये कोई सरकारी निर्णय नहीं था, बल्कि उनके द्वारा लिया गया फ़ैसला था."

पूर्व केंद्रीय गृह सचिव राजीव महर्षि को सितंबर 2017 में सीएजी नियुक्त किया गया था.

अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, महर्षि ने यह भी कहा कि "संसद को हम रिपोर्ट दे रहे हैं. पीएसी को हम रिपोर्ट दे रहे हैं. वास्तव में ये कोई रहस्य नहीं है. कम से कम हम इसे एक बटन के क्लिक पर उपलब्ध नहीं करा सकते. विदेशों में बैठा कोई भी आदमी इन्हें ना देख सके. बाकी हमारी रिपोर्ट आयेगी तो उसमें हम कमियाँ बतायेंगे, पर उन्हें वेबसाइट पर जारी कर देने का कोई मतलब नहीं बनता. अगर डिफ़ेंस ऑडिट में कुछ कमियाँ सामने आती भी हैं तो वो सिर्फ़ हमें पता होनी चाहिए, हमारे दुश्मनों को नहीं."

इस रिपोर्ट के अनुसार, सीएजी की वेबसाइट पर आख़िरी बार डिफ़ेंस ऑडिट रिपोर्ट, परफ़ॉर्मेंस ऑडिट डिफ़ेंस ऑफ़ पेंशन (2017) उनके कार्यभार संभालने से कुछ दिनों पहले अपलोड की गई थी और वो रिपोर्ट 28 जुलाई 2017 को संसद के पटल पर पेश की गई थी.

अख़बार लिखता है कि राजीव महर्षि के कार्यकाल के दौरान सीएजी ने संसद में आठ डिफ़ेंस ऑडिट रिपोर्ट पेश कीं, मगर सीएजी की वेबसाइट पर इन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया.

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जियो के बाद गूगल की नज़र इस भारतीय कंपनी पर

द इकोनॉमिक टाइम्स अख़बार की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमरीकी टेकनोलॉजी कंपनी गूगल मुकेश अंबानी की कंपनी जियो में 4.5 अरब डॉलर का निवेश करने के बाद एक और भारतीय कंपनी में निवेश की तैयारी में है.

अख़बार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि गूगल सॉफ़्टबैंक के समर्थन वाले ऑनलाइन इंश्योरेंस प्लेटफ़ॉर्म पॉलिसीबाज़ार में माइनॉरिटी स्टेक ले सकती है. कंपनी पॉलिसीबाज़ार में 10 फ़ीसद की हिस्सेदारी लेने की इच्छुक है और इसके लिए क़रीब 15 करोड़ डॉलर निवेश कर सकती है. वहीं सॉफ़्टबैंक जिसकी पॉलिसीबाज़ार में 15 फ़ीसद हिस्सेदारी है, वह अपना हिस्सा कुछ कम कर सकती है.

अल्फ़ाबेट इंक के स्वामित्व वाली कंपनी गूगल ने पिछले महीने ही भारत में अपनी निवेश योजनाओं के बारे में बताया था.

कंपनी के सीईओ सुंदर पिचाई ने कहा था कि गूगल भारत में सभी साइज़ की कंपनियों के साथ काम करने को तैयार है.

रिपोर्ट के मुताबिक़ गूगल ने अगले 5 से 7 साल में भारत में 10 अरब डॉलर निवेश करने का लक्ष्य रखा है.

गूगल ने हाल ही में जियो कंपनी में 4.5 अरब डॉलर का निवेश करने की घोषणा की थी. सूत्रों के मुताबिक़ कंपनी भारत में और चार या पांच टेक्नॉलोजी स्टार्टअप कंपनियों में निवेश करना चाहती है.

वीडियो कैप्शन, भारत-चीन सीमा: लद्दाख में चीनी और भारतीय सैनिक अब कहां-कहां पर हैं आमने-सामने?

भारत और चीन में कमांडर लेवल की बातचीत

पूर्वी लद्दाख में दौलत बेग़ ओल्डी और डेपसांग समेत एलएसी पर गतिरोध वाले अन्य इलाक़ों से सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए शनिवार को भारत और चीन के वरिष्ठ सैन्य कमांडरों की बातचीत हुई.

हिन्दुस्तान टाइम्स अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, मेजर जनरल स्तर की यह बातचीत एलएसी के चीनी क्षेत्र की ओर दौलत बेग़ ओल्डी (डीबीओ) इलाक़े में सीमा सैनिकों के बैठक स्थल पर हुई जो सुबह 11 बजे शुरू होकर शाम साढ़े 7 बजे तक चली.

इस बातचीत को लेकर सेना की ओर से अभी कोई आधिकारिक बयान तो नहीं आया लेकिन माना जा रहा है कि भारत तब तक तैनाती नहीं घटाएगा जब तक चीनी सैनिक इलाक़े को पूरी तरह खाली नहीं कर देते.

रिपोर्ट के अनुसार, इस बैठक का मुख्य एजेंडा 'डेपसांग के मैदानी इलाक़ों की स्थिति से निपटना' रहा.

भारतीय सेना की डेपसांग के मैदानों में अच्छी पैठ रही है, जबकि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी इसके पूर्वी छोर पर है जहाँ उसने 1500 से ज़्यादा सैनिक तैनात कर रखे हैं.

रिपोर्ट में एक सैन्य अफ़सर के हवाले से लिखा है कि 'डेपसांग में चीन की बढ़ती मौजूदगी से भारत के कई पेट्रोलिंग रूट बाधित हुए हैं, लेकिन भारत को विश्वास है कि वो बातचीत के ज़रिये इसका कोई हल निकाल सकेगा.'

हाल ही में भारत और चीन के बीच पाँचवें दौर की लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बैठक हुई थी, जो लगभग 10 घंटे तक चली थी, लेकिन यह बैठक बेनतीजा ही रही. इस बैठक में भारत ने चीन पर पीछे हटने का दबाव बनाया तो चीन भी भारत से पेंगोंग त्सो से पीछे हटने को कहने लगा जिसका भारत ने पुरज़ोर विरोध किया और चीन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

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