मैथमैटिक्स में आख़िर आगे क्यों नहीं बढ़ पातीं लड़कियां

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"जब मैं पीएचडी के लिए इंडियन स्टैटस्टिकल इंस्टिट्यूट में गई थी तो मैं वहां बस अकेली महिला थी. अभी मैं जिस बैच को पढ़ा रही हूं उसमें भी एक ही लड़की है. ऐसा कह सकते हैं कि लड़कियों को ज़रूरी प्रोत्साहन या प्रशिक्षण नहीं मिलता. लड़कियों पर शादी के बाद दूसरी ज़िम्मेदारियां भी आ जाती हैं और वो पढ़ाई को किनारे रख देती हैं."
मैथमैटिक्स के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या पर बात करते हुए इंडियन स्टैटस्टिकल इंस्टिट्यूट (आईएसआई) में प्रोफेसर नीना गुप्ता ज़मीनी हक़ीक़त की एक झलक दिखाती हैं.
मैथमैटिशियन (गणितज्ञ) नीना गुप्ता को साल 2019 में शांति स्वरूप भटनागर अवॉर्ड से नवाज़ा गया था. उन्होंने एलजेब्रा की एक 70 साल पुरानी समस्या को हल कर दिया था. ये विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत का सबसे उच्च सम्मान है.
वह बताती हैं कि पूरे विज्ञान के क्षेत्र में ही महिलाएं कम हैं लेकिन मैथ में स्थिति और ज़्यादा ख़राब है. समान क़ाबिलियत और मेहनत के बावजूद भी महिलाएं इस क्षेत्र में आगे नहीं आ पातीं.
आँकड़ों की बात करें तो अमरीकी एजेंसी नेशनल साइंस फाउंडेशन के मुताबिक़ अमरीका में साल 2016 में हज़ार में से क़रीब 40 प्रतिशत महिलाओं ने ही मैथमैटिक्स और स्टैटस्टिक्स में बैचलर और मास्टर डिग्री ली है. वहीं, पीएचडी में केवल 30 प्रतिशत महिलाएं ही पहुंची हैं.
पिछले दो दशकों में मैथमैटिक्स और स्टैटस्टिक्स में बैचलर डिग्री लेने वाली महिलाओं की संख्या भी कम हुई है. साल 1997 में ये संख्या 46.3 प्रतिशत, 2006 में 44.9 प्रतिशत और 2016 में 42.4 प्रतिशत थी.

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जब महाशक्ति कहलाने वाले अमरीका में लड़कियों की संख्या मैथमैटिक्स में कम है तो विकासशील देशों के हाल का अंदाज़ा हम लगा सकते हैं.
जानकार मानते हैं कि महिलाओं के लिए कभी भी मैथमैटिक्स और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में राह आसान नहीं रही. सामाजिक बाधाओं और क्षमता पर सवाल उठाती धारणाएं उन्हें हमेशा पीछे खिंचती रही हैं.
लेकिन, फिर भी कई महिलाएं इन बाधाओं को पार कर ना ही सिर्फ़ मैथमैटिक्स के क्षेत्र में आगे आईं बल्कि अपने योगदान की अमिट छाप भी छोड़ी.
ऐसी ही एक मैथमैटिशियन के जीवन पर आधारित है विद्या बालन की नई फ़िल्म शकुंतला देवी.
मैथमैटिशियन शकुंतला देवी की गणना की शक्ति इतनी तेज़ थी कि उन्हें मानव कंप्यूटर का नाम तक दे दिया गया. इस फ़िल्म के साथ ही मैथमैटिक्स में महिलाओं को लेकर चर्चा शुरू हो गई है.
ऐसे में आपको बताते हैं कि भारत सहित दुनियाभर में ऐसी कई महिला मैथमैटिशियन हैं जिन्होंने इस क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया है.

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इतिहास रचने वालीं महिला मैथमैटिशियन
वैश्विक स्तर पर बात करें तो ईरान की रहने वालीं मरयम मिर्ज़ाखान फील्ड मेडल्स से सम्मानित की जाने वालीं पहली महिला बनीं थीं. ये उच्च स्तर का अंतरराष्ट्रीय सम्मान माना जाता है.
अमरीका की कैथरीन जॉनसन, जिनके योगदान को अमरीका के स्पेस प्रोग्राम की सफलता के लिए महत्वपूर्ण माना गया और उन्हें प्रेज़िडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम से भी नवाज़ा गया.
सोफी जर्मेन एक फ्रांसिसि मैथमैटिशियन थीं जिन्हें इलास्टिसिटी थ्योरी के अगुआओं में से एक माना जाता है. वह पेरिस एकेडमी ऑफ साइंसेज से श्रेष्ठ पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला बनी थीं.
भारत की बात करें तो केरल की रहने वालीं टी.ए. सरस्वती अम्मा को ज्योमेट्री ऑफ एनसिएंट एंड मेडिवल इंडिया पर काम के लिए जाना जाता है.
आंध्र प्रदेश की वनाजा अयंगर 'आंध्र महिला सभा स्कूल ऑफ इनफॉर्मेटिक्स' की संस्थापक रही हैं. उन्हें 1987 में पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया है.
ऐसी और भी कई शख्सियतें हैं जिन्होंने मैथमैटिक्स में अपनी सफलता का परचम लहराया है.
लेकिन, आज भी महिलाएं मैथमैटिक्स के क्षेत्र में बहुत कम जाती हैं. जितनी लड़कियां स्कूल में मैथ पढ़ती हैं उतनी उच्च शिक्षा में नहीं पहुंच पातीं. यहां तक कि उन्हें इस विषय के लिए अयोग्य भी माना जाता है.
मैथमैटिक्स से क्यों है दूरी
जानकारों का मानना है कि भारत में लड़कियों के मैथमैटिक्स के क्षेत्र में ना जाने के दो कारण हैं पहला सामाजिक और दूसरा उन्हें लेकर धारणा कि वो मैथ और विज्ञान जैसे मुश्किल विषय नहीं कर सकतीं.
कमला नेहरू कॉलेज की पूर्व प्रिंसिपल और मैथमैटिशियन रीता मल्होत्रा कहती हैं, "मैथमैटिक्स में लड़कियां दो स्तरों पर छंटती चली जाती हैं. स्कूल में 10वीं कक्षा तक लड़का और लड़की सभी मैथ पढ़ते हैं. उसके बाद उन्हें कॉमर्स, साइंस और आर्ट्स में से एक चुनना पड़ता है. सबसे पहले यहां पर लड़कियां कम हो जाती हैं. उसके बाद उच्च शिक्षा में भी लड़कियां मैथमैटिक्स को करियर के तौर पर कम चुनती हैं जिसके कई सामाजिक कारण होते हैं."
"मैथमैटिक्स एक ऐसा विषय है जो आमतौर पर लोग कठिन मानते हैं. ये बहुत प्रचारित भी नहीं है. साथ ही इसमें बहुत मेहनत और समय की मांग होती है. अगर आप मैथमैटिक्स में रिसर्च में जाएं तो उसे बहुत वक़्त देना पड़ता है. लेकिन, हमारा सामाजिक ढांचा ऐसा है जो लड़कियों की पढ़ाई पर खर्च कम करता है और उसे मेहनत के लिए समय नहीं देना चाहता."
रीता मल्होत्रा कहती हैं कि हमें ये देखना होगा कि हमारे समाज में महिलाओं की भूमिका क्या है. उनके लिए बहु बनना और मां बनना ज़्यादा ज़रूरी माना जाता है. ये भूमिकाएं गलत नहीं हैं लेकिन पुरुषों के लिए करियर और पहचान बनाना ज़्यादा ज़रूरी माना जाता है. यहीं से तय हो जाता है कि लड़कियां कितना पढ़ेंगी, उनकी पढ़ाई पर कितना खर्च होगा और वो करियर बनाएंगी भी की नहीं. मैथमैटिक्स और विज्ञान जिन चीजों की मांग रखते हैं महिलाओं की परंपरागत ज़िम्मेदारियां उसमें फिट नहीं बैठतीं.
कहीं पर संसाधन भी एक बड़ा मसला बनते हैं. विज्ञान और कॉमर्स की पढ़ाई में ज़्यादा खर्च करने की ज़रूरत होती है. ऐसे में 12वीं के बाद लड़कियों को आर्ट्स दिला दी जाती है.
प्रिसिंपल रहते हुए रीता मल्होत्रा को लड़कियां अक्सर बताती भी थीं कि उनके घर में भेदभाव होता है. उन्हें मैथमैटिक्स को आगे करियर के तौर पर नहीं अपनाने दिया जाएगा. उनकी शादी हो जाएगी या सोशल साइंस और पॉलिटिकल साइंस में चली जाएंगी.

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महिलाओं की क्षमता पर सवाल
महिलाओं में मैथ करने की योग्यता नहीं होती, इस बात को रीता मल्होत्रा बिल्कुल ही गलत मानती हैं.
उनका कहना है कि दिमाग़ी क़ाबिलियत व्यक्ति के हिसाब से तो बदल सकती है लेकिन जेंडर के हिसाब से नहीं. यहां बचपन से ही लोग भेदभाव शुरू कर देते हैं. लड़के के लिए ब्लॉक बिल्डिंग, थ्री डायमेशनल विजुअलाइजेशन जैसे खिलौने मिलते हैं और लड़कियों के लिए रसोई का सामान. आप पहले से ही मानकर चलते हो कि वो टेक्निकल काम नहीं कर पाएगी.
मैथमैटिशियन और यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलम्बिया में प्रोफेसर सुजाता रामदोरई इसे कुछ ऐसे देखती हैं कि पहले एक व्यक्ति को किसी काम से दूर रखो और फिर कह दो कि तुम वो कर ही नहीं सकते. महिलाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ.
उन्हें शिक्षा से वंचित रखा गया और फिर हर क्षेत्र पर पुरुषों का वर्चस्व हो गया. अब जब लड़कियों के सामने रोल मॉडल ही नहीं होंगी तो वो कैसे मानेंगी कि वो ख़ुद भी ये काम कर सकती हैं.
वह कहती हैं कि आज से 20 साल पहले अगर आंखों का ऑपरेशन महिला डॉक्टर करती थी तो लोग डर जाते थे. लेकिन, बच्चे की डिलीवरी में नहीं डरते थे. उन्हें लगता ही नहीं था कि महिलाएं भी स्त्री रोग के अलावा कोई और इलाज़ कर सकती हैं. इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा लड़कियों को मैथमैटिक्स के क्षेत्र में लाना होगा. जिन्हें देखकर दूसरी लड़कियां प्रेरणा ले सकेंगी.

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क्या मैथ कठिन है
आमतौर पर माना जाता है कि मैथ एक कठिन विषय है और बच्चे इससे दूर भागते हैं.
इस पर सुजाता मुस्कुराते हुए कहती हैं कि जैसे किसी के लिए मैथ मुश्किल हो सकती है तो दूसरे के लिए लिटरेचर मुश्किल हो सकता है. कोई विषय सीखने पर निर्भर करता है कि आपके लिए वो मुश्किल है या नहीं.
लेकिन, होता है ये कि बच्चे के मैथ में अच्छा प्रदर्शन ना कर पाने पर लोग सोच लेते हैं कि कठिन विषय है कोई बात नहीं. इससे बच्चे के मन में भी ये धारणा बन जाती है कि मैथ मुश्किल है. फिर यही सोच आगे चलती रहती है.

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कैसे आगे बढ़ें महिलाएं
महिलाओं को कैसे हर कदम पर इस विषय के लिए अनुपयुक्त होने का अहसास कराया जाता है इसे लेकर रीता मल्होत्रा एक वाक्या बताती हैं.
उन्होंने बताया, "एक बार दिल्ली विश्वविद्यालय में रीडरशिप की पोस्ट के लिए इंटरव्यू पैनल में वाइस चांसलर भी मौजूद थे. उन्होंने मुझसे पूछा कि आपकी पीएचडी थीसिस का टॉपिक क्या है. मैंने कहा, एलोकेशन प्रॉबल्मस, पैराडाइम्स... पूरा बोलने से पहले ही उन्होंने पूछा, ये पैराडाइम क्या होता है. मैंने कहा कि ये एक तरह का पैर्टन होता है. इस पर उन्होंने कहा कि अच्छा मेरे स्वेटर पर जो बना हुआ है, ये पैटर्न? उन्होंने बार-बार मुझसे विषय से इतर हल्के-फुल्के सवाल पूछे जैसे मैं मैथमैटिक्स के बारे में बात करने लायक ही नहीं."
रीता मल्होत्रा कहती हैं कि उच्च पदों पर बैठने वाले लोगों में ऐसी सोच आज भी ज़िंदा है. कुछ बदलाव आया है लेकिन इस बदलाव को तेज़ करने के लिए ज़रूरी है कि उच्च पदों पर महिलाओं की नियुक्ति हो ताकि वो महिलाओं की चुनौतियों को बेहतर समझ सकें.
सुजाता रामदोरई भी उच्च पदों पर महिलाओं की नियुक्ति को एक समाधान के तौर पर देखती हैं. वह कहती हैं कि महिला वैज्ञानिकों को अवॉर्ड तो मिलते हैं लेकिन महिलाएं उच्च पदों पर कम मिलती हैं. यूरोप की बात करें तो वहां पर साइंस मिनिस्टर या फंडिंग एजेंसी की लीडर महिलाएं हैं. पिछले कई सालों में ऐसा जानबूझकर किया गया है. भारत में भी ऐसा किए जाने की ज़रूरत है.
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