उमर अब्दुल्लाह 370 हटाए जाने के बाद पहली बार खुलकर बोले, याद की पीएम मोदी से वो मुलाक़ात

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नेशनल कॉन्फ़्रेंस के उपाध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने कहा है कि जब तक जम्मू-कश्मीर को दोबारा राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता है, वो विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे.
उमर अब्दुल्लाह ने अंग्रेज़ी के अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में सोमवार (27 जुलाई) को एक लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने कई अहम बातों का ज़िक्र किया है.
उमर ने लिखा, "जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं बिल्कुल स्पष्ट हूँ कि जब तक जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश रहेगा, मैं विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ूँगा. इस धरती के सबसे शक्तिशाली विधानसभा का छह सालों तक सदस्य रहने और वो भी उसके नेता रहने के बाद मैं उस सदन का सदस्य नहीं रह सकता जिसके अधिकारों को इस तरह से छीन लिया गया हो."
पिछले साल (2019) पाँच अगस्त को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने न केवल जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35A को हटा दिया था, बल्कि जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा ख़त्म कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया था.
केंद्र सरकार के इस फ़ैसले के कुछ ही घंटे पहले उमर अब्दुल्लाह, उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्लाह, राज्य की एक और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती समेत सैकड़ों नेताओं को नज़रबंद या गिरफ़्तार कर लिया गया था.
पहले बिना किसी आरोप के उन लोगों को गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन फ़रवरी 2020 में उमर अब्दुल्लाह, महबूबा मुफ़्ती समेत कुछ और नेताओं पर पब्लिक सेफ़्टी एक्ट लगा दिया गया था.
लेकिन सात महीनों के बाद 24 मार्च को उमर अब्दुल्लाह को रिहा कर दिया गया था. उसके एक हफ़्ते पहले उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्लाह को भी रिहा कर दिया गया था.
लेकिन महबूबा मुफ़्ती अब तक हिरासत में हैं और मई में उन पर दोबारा पीएसए लगाया गया था.
मार्च में रिहा होने के बाद उमर अब्दुल्लाह ट्विटर पर तो सक्रिय रहे हैं लेकिन पहली बार उन्होंने किसी अख़बार में इतना लंबा लेख लिखा है.

मोदी से मुलाक़ात
उमर के अनुसार 2019 में नरेंद्र मोदी के दोबारा जीत कर सत्ता में आने के बाद उन्हें और उनकी पार्टी को इस बात का तो अंदाज़ा था कि केंद्र सरकार अनुच्छेद 370 और 35A को ख़त्म कर सकती है लेकिन उन्हें इसका क़त्तई अंदेशा नहीं था कि राज्य को विभाजित कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील कर दिया जाएगा.
इस बारे में उमर लिखते हैं, "मैंने अपनी पार्टी के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ पाँच अगस्त से कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की थी. उस मीटिंग को मैं इतनी जल्दी नहीं भूलूँगा. एक दिन मैं उसके बारे में लिखूँगा. फ़िलहाल मैं सिर्फ़ इतना ही कह सकता हूं कि उस बैठक के बाद हमें बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं हुआ था कि अगले 72 घंटों में क्या होने वाला है."
उमर आगे लिखते हैं, "जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा जो कि जम्मू-कश्मीर के भारत के संघ में शामिल होने का सबसे महत्वपूर्ण और शायद अनिवार्य हिस्सा था, उसे ख़त्म कर दिया गया. सच कहूँ तो, बीजेपी ऐसा करेगी, ये शायद उतना अचंभित करने वाला नहीं था, ये दशकों से बीजेपी का चुनावी एजेंडा था. जिसने हमलोगों को चकित किया, वो था, राज्य का दर्जा ख़त्म कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँटकर हम लोगों को अपमानित किया जाना. पिछले सात दशकों में केंद्र शासित प्रदेशों को बढ़ाकर राज्य का दर्जा दिया गया है, लेकिन यह पहली बार हुआ था कि एक राज्य का दर्जा घटाकर उसे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया."

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'लोगों को सज़ा देने और अपमानित करने के लिए हटाया गया अनुच्छेद 370'
उमर ने लिखा है कि वह आज तक यह बात नहीं समझ सके हैं कि आख़िर इसकी ज़रूरत क्या थी, सिवाए जम्मू-कश्मीर के लोगों को सज़ा देने और अपमानित करने के.
वो लिखते हैं, "अगर लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने के पीछे ये तर्क था कि वहाँ की बौद्ध आबादी लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने की माँग कर रही थी, तो जम्मू के लोगों के लिए एक अलग राज्य की माँग तो बहुत पुरानी थी. अगर ये धर्म पर आधारित था तो इसने इस तथ्य को बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर दिया कि लद्दाख के दो ज़िले लेह और कारगिल मुस्लिम बहुल हैं और कारगिल के लोग जम्मू-कश्मीर से अलग होने के विचार के बिल्कुल ख़िलाफ़ हैं."

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'जम्मू-कश्मीर गुजरात से बेहतर'
उमर ने लिखा है कि जब भारतीय संसद में अनुच्छेद 370 हटाने के लिए मंज़ूरी दी जा रही थी तो इसे ख़त्म करने के कई कारण बताए गए थे लेकिन कोई भी तर्क बुनियादी कसौटी पर भी खरा नहीं उतरता.
उमर के अनुसार ये आरोप लगाया गया था कि 370 के कारण राज्य में अलगाववादी सोच और चरमपंथी हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है और इसे हटा देने से राज्य में 'आतंकवाद' ख़त्म हो जाएगा.
उमर सवाल करते हैं, "अगर ऐसी बात है तो फिर 370 हटाने के क़रीब एक साल बाद उसी केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में क्यों कहने पर विवश होना पड़ा कि राज्य में हिंसा बढ़ रही है."
उन्होंने कहा कि राज्य में ग़रीबी और निवेश की बात भी बेबुनियाद है. उन्होंने कहा कि देश के कई राज्यों की तुलना में जम्मू-कश्मीर में ग़रीबी बहुत कम है. उन्होंने कहा कि मानव विकास सूचकांक के मामले में भी जम्मू-कश्मीर गुजरात से बहुत बेहतर है.
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