अररिया गैंग रेप केसः सवालों के कटघरे में रेप सर्वाइवर ही क्यों?

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- Author, विभुराज
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पचास साल पहले महाराष्ट्र के चंद्रपुर शहर में पुलिस थाने में रेप का शिकार हुई आदिवासी महिला मथुरा के अभियुक्तों को अदालतों ने इस आधार पर बरी कर दिया था कि मथुरा को 'सेक्स की आदत' थी और उसके शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे.
पचास साल बाद चंद्रपुर से लगभग डेढ़ हज़ार किलोमीटर दूर बिहार के अररिया शहर की एक अदालत एक गैंगरेप सर्वाइवर को मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराने के बाद न्यायिक हिरासत में भेज देती है.
मथुरा के मामले में ये कहा गया था कि उसने विरोध या किसी तरह का शोर नहीं किया था.
जबकि अररिया गैंग रेप केस में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत की तरफ़ से दर्ज़ कराई गई शिकायत में ये कहा गया कि "रेप सर्वाइवर ने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दिए बयान पर दस्तखत करने से मना किया और न्यायिक कार्य में बाधा डाली."
हालांकि ये कहा जा सकता है कि मथुरा और अररिया रेप केस अलग-अलग मामले थे पर भले ही बीते 50 सालों में देश, काल और परिस्थिति बदलती रही हो, कई क़ानूनी सुधार भी हुए हैं लेकिन चंद्रपुर से लेकर अररिया तक और 1972 से लेकर 2020 तक रेप के मामलों में अक्सर रेप सर्वाइवर ही सवालों के कटघरे में खड़ी होती रही. अररिया मामले में सर्वाइवर की मदद कर रही उनकी दो दोस्त भी कटघरे में हैं.
अररिया गैंग रेप केस
जो लड़की गैंग रेप का शिकार होती है, वो जेल नहीं जाती है. लेकिन अररिया ज़िले के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट कोर्ट में 10 जुलाई को यही हुआ था.
छह जुलाई को हुए इस गैंगरेप की रिपोर्ट रेप सर्वाइवर ने अररिया महिला थाना में 7 जुलाई को दर्ज कराई थी. 7 और 8 जुलाई को रेप सर्वाइवर की मेडिकल जाँच हुई.
जिसके बाद 10 जुलाई को बयान दर्ज कराने के लिए रेप सर्वाइवर को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के कोर्ट में ले जाया गया. ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के कोर्ट में रेप सर्वाइवर का बयान दर्ज किया गया.
रेप सर्वाइवर को जज द्वारा पढ़ा गया बयान समझ में नहीं आया तो उसने आग्रह किया कि बयान उसकी दोस्त और जन जागरण शक्ति संगठन की कल्याणी बडोला उसे पढ़कर सुनाए. कल्याणी बडोला ने भी रेप सर्वाइवर को बयान पढ़कर सुनाए जाने की बात की है.
जिसके बाद वहाँ हालात तल्ख होते चले गए. तकरीबन शाम 5 बजे कल्याणी बडोला, तन्मय निवेदिता और रेप सर्वाइवर को हिरासत में लिया गया और 11 जुलाई को जेल भेज दिया गया.
हालांकि छह दिन बाद 17 जुलाई को रेप सर्वाइवर को बेल पर छोड़ दिया गया पर जन जागरण शक्ति संगठन की दोनों कार्यकर्ता तन्मय निवेदिता और कल्याणी बडोला अभी भी हिरासत में हैं.

रेप सर्वाइवर पर एफ़आईआर
अररिया कोर्ट में रेप सर्वाइवर और उनके दो सहयोगियों पर आईपीसी की धारा 353, 228, 188, 180 और 120 (बी) के तहत मामला दर्ज किया गया है.
धारा 353 सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालने के इरादे से उस पर हमला करने या उस पर ताक़त का इस्तेमाल करने के मामलों में लागू होती है और इसमें जुर्माने के साथ अधिकतम दो साल तक की सज़ा का प्रावधान है.
धारा 228 न्यायिक कार्यवाही में शामिल सरकारी कर्मचारी का जानबूझकर अपमान या उसके काम में बाधा डालने पर लागू होती है और इसमें जुर्माने के साथ ज़्यादा से ज़्यादा छह महीने की सज़ा हो सकती है.
धारा 188 सरकारी कर्मचारी का वैध आदेश न मानने पर लागू होती है और इसमें जुर्माने के साथ अधिकतम एक महीने की सज़ा का प्रावधान है.
जब कोई व्यक्ति अपने बयान पर दस्तखत करने से इनकार कर दे और सरकारी कर्मचारी को उसके दस्तख़त की ज़रूरत हो तो इन हालात में धारा 180 लागू होती है और इस अपराध में तीन महीने तक की सज़ा का प्रावधान है.
और धारा 120 (बी) आपराधिक साज़िश के मामलों में लागू होती है. अगर साज़िश ऐसे अपराध के लिए की गई हो जिसमें मौत या उम्र क़ैद की सज़ा का प्रावधान हो तो 120 (बी) के तहत दो या इससे ज़्यादा सालों के लिए सज़ा हो सकती है और ये ग़ैरज़मानती अपराध हो जाता है. लेकिन इसी धारा में ये भी प्रावधान है कि साज़िश किसी अन्य किस्म के अपराध के लिए किया गया हो तो ये ज़मानती अपराध होगा और अभियुक्त को छह महीने तक की सज़ा हो सकती है.

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अररिया कोर्ट का नज़रिया
ये मामला अब तक अररिया की दो अदालतों में जा चुका है.
तीनों अभियुक्तों को न्यायिक हिरासत में भेजने के सात दिन बाद 17 जुलाई को अररिया के चीफ़ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत ने गैंग रेप सर्वाइवर को जमानत पर रिहा करने का फ़ैसला सुनाते हुए कहा, "चूंकि वो कथित गैंग रेप और क्रूर यौन हमले की पीड़ित है, उसकी अस्थिर शारीरिक और मानसिक अवस्था को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है."
"कथित गैंग रेप की घटना के कारण पीड़िता के दुख और तकलीफ़ को देखते हुए उसके प्रति उदार रवैया रखा जाना चाहिए. इस कोर्ट को पीड़िता के साथ पूरी हमदर्दी है और अदालत ये मानती है कि उसे जेल में रखा जाना वाजिब नहीं है क्योंकि इससे उसके दुख और तकलीफ़ में और इजाफा होगा."
चीफ़ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के इस आदेश से ये सवाल पैदा होता है कि क्या जज मोहम्मद मुस्तफा शाही की अदालत ने रेप सर्वाइवर के लिए हमदर्दी नहीं दिखाई? क्या रेप सर्वाइवर की अस्थिर शारीरिक और मानसिक अवस्था को नज़रअंदाज़ कर दिया गया?
इन सवालों के जवाब फिलहाल शायद ही कोई देना चाहे लेकिन अररिया की सीजेएम कोर्ट ने पीड़िता को जमानत देने के फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट के जिन दिशानिर्देशों का हवाला दिया, उन्हें जानना भी ज़रूरी है.
सुप्रीम कोर्ट की ये राय है, "रेप सर्वाइवर के साथ सहानुभूति और हमदर्दी भरा बर्ताव किया जाना चाहिए क्योंकि वो मानसिक सदमे की स्थिति से गुज़र रही होती है. उसे फौरन काउंसिलिंग, क़ानूनी मदद, मेडिकल, सामाजिक और कुछ मामलों में आर्थिक मदद की ज़रूरत होती है."
अररिया गैंग रेप के मामले में भी पीड़िता कल्याणी और तन्मय के घर काम करती थी और इन्हें क़रीब से जानने वाले लोगों का कहना है कि ये लोग इसी हमदर्दी के रिश्ते से मजिस्ट्रेट के सामने उसका बयान दर्ज कराने के लिए कोर्ट गए थे.
क़ानून मामलों के जानकर पत्रकार और लेखक मनोज मिट्टा एफ़आईआर और बेल ऑर्डर में दी गई वजहों में विरोधाभास देखते हैं.
वे कहते हैं, "रेप सर्वाइवर को उसकी मानसिक स्थिति के आधार पर ज़मानत दी गई है. इसी मानसिक स्थिति में उसने कथित तौर पर कोर्ट में बुरा बर्ताव किया था. इससे तो एफ़आईआर की पूरी बुनियाद ही हिल गई है जिसमें दावा किया गया है कि रेप सर्वाइवर ने अपने दो सहयोगियों के साथ अदालत में ख़राब माहौल पैदा करने की साज़िश की थी."
मनोज मिट्टा बताते हैं, "चूंकि सेक्शन 164 के तहत दर्ज किया जाने वाला बयान रेप सर्वाइवर के हित में होता है, इस लिहाज से एफ़आईआर इन आरोपों के पक्ष में कोई पुख्ता दलील देने में नाकाम रही है कि अभियुक्तों ने न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने और इसके ज़रिये पुलिस जांच में दखल देने की साज़िश रची थी."

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क़ानूनी प्रक्रिया क्या है?
सीआरपीसी (दंड प्रक्रिया संहिता) की जिस धारा 164 के तहत रेप सर्वाइवर की गवाही दर्ज की गई, उसमें दो तरह के मामले शामिल होते हैं. पहली कैटेगरी में वो मामले आते हैं जब अभियुक्त का कन्फेशन (इकबालिया बयान) दर्ज होता है. इसमें अभियुक्तों को अपना वकील रखने की इजाज़त होती है.
दूसरी कैटेगरी में उन लोगों के बयान शामिल होते हैं जो अभियुक्त नहीं होते. इस कैटेगरी के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि जज ये कहें कि गवाह को अपने बयान पर दस्तखत करने ही होंगे.
सीआरपीसी की धारा 278 में ये प्रावधान है कि अगर गवाह को अपने बयान के किसी हिस्से पर कोई एतराज हो तो जज अपनी टिप्पणी अलग से दर्ज करा सकते हैं. इस सूरत में जज का ये मेमो अधूरे बयान के साथ केस फ़ाइल में दर्ज किया जाएगा. इसके बाद की धारा 180 में ये व्यवस्था दी गई है कि जज गवाह के आचरण पर अपनी टिप्पणी रिकॉर्ड कर सकते हैं.
लेकिन दिल्ली गैंग रेप वाली घटना के बाद आई जेएस वर्मा कमिटी की रिपोर्ट के बाद सीआरपीसी के सेक्शन 164 में उपधारा (5A) जोड़ी गई थी. इसमें यौन हिंसा के पीड़ितों के लिए अलग से प्रावधान किया गया था. अगर जज को ये लगे कि पीड़िता अस्थाई या स्थाई रूप से शारीरिक या मानसिक रूप से अस्वस्थ है तो इसमें उनकी मदद के लिए इंटरप्रेटर का प्रावधान है.
जानकारों का कहना है कि ऐसा लगता है कि अररिया कोर्ट की कार्यवाही में सीआरपीसी सेक्शन 164 (5A) के प्रावधान को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है.
अररिया वाले मामले में पीड़िता भी यही कह रही थी कि उसे जज की बात समझ में नहीं आ रही है और कल्याणी दीदी को बुला दीजिए. सीजेएम कोर्ट ने भी ये बात मानी है कि रेप सर्वाइवर की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी.
सुप्रीम कोर्ट के ये दिशानिर्देश हैं कि 164 के तहत पीड़िता का बयान लेते वक़्त महिला मजिस्ट्रेट की मदद ली जानी चाहिए. हालांकि अररिया में किसी महिला मजिस्ट्रेट की ग़ैरमौजूदगी में ये बयान पुरुष मजिस्ट्रेट ही दर्ज कर रहे थे.

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बड़े सवाल और भी हैं...
अररिया में जिस तरह से रेप सर्वाइवर और उसकी मदद के लिए आई दो सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया है, उससे कई हलकों में ये सवाल उठने लगे हैं कि भारत में यौन हिंसा के मामलों में एक तो महिलाएं शिकायत लेकर कम ही सामने आती हैं और अररिया जैसी घटनाएं भविष्य में उन्हें आगे आने से हतोत्साहित करेंगी.
महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता खदीजा फ़ारूखी कहती हैं, "पहली बात तो ये है कि हमारा समाज महिलाओं को आगे आकर इन मुद्दों पर बात करने की इजाज़त नहीं देता है. ख़ासकर यौन हिंसा के मामलों में महिलाओं को तो बात करने की बिलकुल इजाजत ही नहीं है. अगर वो बात करती है तो सिस्टम हमेशा ही औरतों को चुप कराने के लिए काम करता है. मथुरा रेप केस से लेकर आज तक हालात बदले नहीं हैं. उस वक्त नारी आंदोलन में ये मांग की गई थी कि सिस्टम को पीड़िता का साथ देना चाहिए."
तो हालात कैसे बेहतर होंगे? खदीजा फ़ारूखी कहती हैं, "पीड़िता को एक सकारात्मक माहौल देना चाहिए. जिससे पीड़िता न्याय की प्रक्रिया में अच्छी तरह से शामिल हो सकेऔर इस तरह के अपराध रुकें. अररिया में जो हुआ, उससे तो ये लगता है कि सिस्टम आज भी वहीं खड़ा है. निर्भया केस के बाद ये मांग उठी थी कि सिस्टम महिलाओं के साथ नहीं है. उन्हें कानूनी दांव-पेंच में फंसा दिया जाता है. एक तो समाज महिलाओं को पढ़ने नहीं देता है. समाज औरतों को लोगों के साथ मिलने-जुलने नहीं देता है. और अचानक एक दिन उससे कहा जाता है कि जाकर मजिस्ट्रेट से बात करो. अपने साथ हुई बलात्कार की घटना के बारे में एक पुरुष को बताओ. ये कितना कठिन काम है. अगर पुरुष संवेदनशील नहीं है, समझदारी से औरत के साथ बर्ताव नहीं करता है तो किसी रेप पीड़िता के लिए ये बहुत मुश्किल हो जाता है."
खुद रेप सर्वाइवर ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में ये बात कहा कि अगर कोर्ट में कोई महिला जज होती तो उनके लिए अपनी बात कहना ज़्यादा आसान होता.

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भारत में रेप
साल 2017 में जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में हर रोज़ औसतन 90 से अधिक रेप के मामले दर्ज किए जाते हैं. हालांकि इनमें से बहुत ही कम रेप पीड़िता अपने साथ दुष्कर्म करने वाले दोषियों को सज़ा पाते हुए देख पाती हैं. इस बीच हर साल रेप की घटनाओं के दर्ज होने का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है.
निर्भया गैंग रेप के बाद भारत में महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न की तरफ सभी का ध्यान जाने लगा. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस घटना के बाद बहुत अधिक संख्या में पुलिस के पास रेप के मामले दर्ज होने लगे. साल 2012 में जहां रेप के 25 हज़ार से कम मामले रिपोर्ट हुए तो वहीं साल 2016 में इनकी संख्या बढ़कर 38 हज़ार हो गई.
साल 2017 के आंकड़ों के अनुसार, उससे पिछले साल रेप के कुल 32,559 मामले पुलिस में दर्ज हुए. एक तरफ जहां पुलिस के रजिस्टर में रेप के मामलों के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं वहीं देश की अदालतों में इन सभी मामलों का फ़ैसला करने का काम भी बढ़ रहा है. साल 2017 के अंत तक अदालत में 1 लाख 27 हज़ार 800 से अधिक मामले लंबित पड़े थे.
उस साल सिर्फ 18 हज़ार 300 मामलों पर ही अदालतें फ़ैसला सुना सकी थीं. अगर साल 2012 में देखें तो अदालतों में 20 हज़ार 660 मामलों का निपटारा किया था जबकि उस साल के अंत तक 1 लाख 13 हज़ार मामले लंबित रह गए थे.

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कितनी जल्दी मिलता है न्याय?
अगर अदालतों में न्याय मिलने की दर देखी जाए तो साल 2002 से 2011 के बीच सभी मामलों में यह लगभग 26 प्रतिशत तक रही थी. हालांकि, साल 2012 के बाद अदालतों में फ़ैसले मिलने की दर में कुछ सुधार देखने को ज़रूर मिला लेकिन इसके बाद साल 2016 में यह दर दोबारा गिरकर 25 प्रतिशत पर आ गई.
साल 2017 में यह दर 32 प्रतिशत से कुछ ऊपर रही. जिस तरह से अदालतों में मामले साल-दर-साल आगे बढ़ते जाते हैं उससे कई बार पीड़ित और चश्मदीदों को धमकाने और लालच देकर बयान बदलने की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं.
यह बात तब और ज़्यादा होती है जब किसी मामले में उच्च पद पर बैठे शख़्स पर या उनके क़रीबियों पर आरोप लगे हों. उदाहरण के लिए स्वघोषित धार्मिक गुरु आसाराम बापू को साल 2018 में अपनी आश्रम की एक युवती के साथ यौन दुर्व्यवहार का दोषी पाया गया था. इससे पहले इस मामले से जुड़े कम से कम नौ चश्मदीदों पर हमले हो चुके थे.
साल 2018 में ही सरकार ने कहा था कि वह एक हज़ार अतिरिक्त फ़ास्ट ट्रैक अदालतों का गठन करेगी जिससे लंबित पड़े रेप के मामलों को जल्दी निपटाया जा सकेगा.
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