चीन से टक्कर लेने के लिए क्या भारत अमरीका के पाले में जाएगा

इमेज स्रोत, AFP/Getty Images
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बीते कुछ महीनों में अमरीका और चीन के आपसी रिश्ते बद से बदतर हुए हैं. दोनों देश कई मुद्दों पर एक दूसरे के सामने आ चुके हैं.
अमरीकी सरकार ने टेक्सस प्रांत के ह्यूस्टन शहर में मौजूद चीन के वाणिज्यिक दूतावास को बंद करने का आदेश दे दिया है.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो कई मौक़ों पर हॉन्गकॉन्ग में लाए गए नए सुरक्षा क़ानून, शिनजियांग प्रांत में वीगर मुसलमानों के उत्पीड़न और दक्षिण चीन सागर पर चीनी दावे और तिब्बत के मुद्दे पर चीन को घेरते दिखे हैं.
लेकिन बीते मंगलवार पॉम्पियो ने कहा कि वह उम्मीद करते हैं कि एक ऐसा गठबंधन बनाया जा सके, जो चीन के ख़तरे को समझ सके.
इसके बाद से ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत चीन के ख़िलाफ़ ऐसे किसी गठबंधन का हिस्सा बन सकता है.
अगर भारत इस ओर क़दम उठाता है तो उसके सामने किस तरह की चुनौतियाँ आएँगी. और अगर भारत ऐसे किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनता है तो बदलती दुनिया में उसके सामने क्या अलग तरह की चुनौतियाँ होंगी.
आख़िर क्यों उठ रहे हैं ये सवाल?

इमेज स्रोत, AFP
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने हाल ही में ब्रितानी विदेश मंत्री डॉमिनिक राब के साथ मुलाक़ात की है.
इस दौरान पत्रकारों के सवालों के जवाब देते उन्होंने कहा, “हमें लगता है कि पूरी दुनिया को साथ मिलकर काम करने की ज़रूरत है ताकि चीन समेत सभी देश वे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और नियमों के मुताबिक़ व्यवहार करें. आप उन समुद्री क्षेत्रों पर दावा नहीं कर सकते, जिन पर आपका क़ानूनी अधिकार नहीं है. आप देशों को धमकाते हुए हिमालय में अपने पैर नहीं फैला सकते.”
“हम चाहते हैं कि हर वो देश, जो आज़ादी और लोकतंत्र को समझता है और लोकतांत्रिक मूल्यों को अहमियत देता है और जानता है कि यह उनके लोगों और उनके संप्रभु देश के सफल होने के लिए ज़रूरी है कि वे उस ख़तरे को समझें जो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सामने ला रही है. वे स्वयं और सामूहिक रूप से काम करें ताकि हमें वो सब मिल सके जिस पर हमारा अधिकार है.”
पॉम्पियो ने इस बयान में ये भी कहा, “हम एक ऐसा गठबंधन बना सकें जो इस ख़तरे को समझे और साथ मिलकर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को ये समझा सके कि इस तरह से व्यवहार करना उनके हित में नहीं है.”
पॉम्पियो के इस बयान में हिमालय और लोकतांत्रिक शब्द आने के बाद से ये सवाल उठ रहा है कि क्या भारत जैसे लोकतांत्रिक देश इस तरह के गठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं.
क्या कहता है इतिहास?

इमेज स्रोत, BJP
इतिहास देखें तो पता चलता है कि भारत कभी भी किसी औपचारिक गठबंधन का हिस्सा नहीं बना है और गुटनिरपेक्षता भारतीय विदेश नीति का एक अहम हिस्सा रही है.
हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ये कहा था कि भारत कभी किसी गुट का हिस्सा नहीं बनेगा. जयशंकर ने अमरीका को भी बदलते वैश्विक परिवेश में 'गठबंधन' से आगे सोचने और 'बहुध्रुवीय दुनिया' में काम करने की नसीहत दी थी.
लेकिन तेज़ी से बदलते अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए गुटनिरपेक्षता की नीति के औचित्य पर सवाल उठाए जा रहे हैं.
कांग्रेस पार्टी के नेता शशि थरूर ने अंग्रेजी अख़बार में जवाहरलाल नेहरू के दौर की गुट निरपेक्षता नीति को वर्तमान चुनौतियों के सामने अनुपयोगी बताया है.
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि नेहरू भी उन नियमों का पालन नहीं करेंगे, जो उन्होंने उस दौर में बनाए थे जो आज के समय से काफ़ी अलग था. ऐसे में स्पष्ट है कि भारतीय विदेश नीति में समय के साथ विकास की आवश्यकता है. चीन एक महाशक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है. वे इस शताब्दी का आधा समय गुज़रने से पहले अमरीका को पीछे छोड़ सकते हैं. ऐसे में नेहरू के ज़माने की ‘नीति’ यहाँ काम नहीं करेगी.”
भारत के सामने क्या हैं चुनौतियाँ?

इमेज स्रोत, AFP
भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ये ज़रूर कहा है कि भारत आने वाले समय में भी किसी गठबंधन का सदस्य नहीं बनेगा.
लेकिन बदलती परिस्थितियों में भारत के सामने ईरान से लेकर बांग्लादेश तक चीनी दबाव के चलते नई चुनौतियाँ पैदा होती दिख रही हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि भारत कब तक किसी गठबंधन में शामिल होने के विकल्प को दरकिनार कर सकता है. और किस क़ीमत पर?
अमरीका में भारत के राजदूत रहे विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी नवतेज सरना मानते हैं कि किसी भी गठबंधन में शामिल होना भारत के हित में नहीं है.
वे कहते हैं, “ये सच है कि आने वाला समय चुनौतीपूर्ण है. दुनिया में दो बड़े देशों के बीच एक व्यापक शक्ति संघर्ष का दौर आ रहा है. लोकतांत्रिक और अंतरराष्ट्रीय नियम-क़ायदों को मानने वाले देशों में कई समानताएँ होती हैं. और इन देशों को अपने समान मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए. उदाहरण के लिए, दक्षिण चीन सागर की बात करें तो वहाँ भारत ने भी कहा है कि हम अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन चाहते हैं क्योंकि दक्षिण चीन सागर, हिंद महासागर, और इंडो-पैसिफ़िक में फ़्रीडम ऑफ़ नेविगेशन और फ़्रीडम ऑफ़ एयरस्पेस हमारे लिए बेहद ज़रूरी हैं. ऐसे में इन मुद्दों पर हम साथ हैं.”
“लेकिन जब आप एलायंस शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो वह एक औपचारिक गठबंधन सा बन जाता है. और ऐसे औपचारिक गठबंधनों में भारत कभी गया नहीं और शायद कभी जाएगा भी नहीं.”
क्या डिप्लोमेसी एक रास्ता है?

इमेज स्रोत, Getty Images
भारत ने बीते 70 सालों में रूस से लेकर अमरीका के साथ अपने संबंध बनाए रखे. इस समय भी भारत और रूस के बीच संबंध काफ़ी बेहतर हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत डिप्लोमेसी के रास्ते पर चलना जारी रखेगा या अपनी विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव लेकर आएगा. और मौजूदा दौर में भारत के सामने किस तरह की चुनौतियाँ हैं.
आने वाले समय की चुनौतियों पर सरना कहते हैं, “जब दो बड़ी शक्तियों के बीच संघर्ष होता है तो चुनौतियाँ भी ज़्यादा बड़ी हो जाती हैं. लेकिन जब सोवियत संघ और अमरीका के दो ब्लॉक हुआ करते थ, उस समय भी बहुत बड़ा संघर्ष था. लेकिन भारत ने फिर भी अपनी जगह बनाई. अभी भी हमें अपना राष्ट्रीय हित ध्यान में रखते हुए अपनी जगह बनानी होगी. और हमें देखना पड़ेगा कि हम डिप्लोमेसी के सहारे इस स्थिति को कैसे संभाल सकते हैं.”
आपदा में अवसर?
लेकिन एक सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या डिप्लोमेसी के रास्ते पर चलते हुए भारत को कुछ हासिल हो सकता है?
कुछ विशेषज्ञ अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते समीकरणों को भारत जैसे देशों के लिए एक अवसर के रूप में देख रहे हैं.
नवतेज सरना भी इस विचार से सहमत नज़र आते हैं.
वे कहते हैं, “इस दौर में भारत को बेहद फूँक फूँक कर क़दम आगे बढ़ाने होंगे. क्योंकि हम किसी भी बड़ी शक्ति के साथ दुश्मनी का माहौल बनाकर नहीं रख सकते हैं. और न ही हम किसी को काटकर दूसरे की ओर जा सकते हैं. हमें अंतरराष्ट्रीय समर्थन चाहिए. हमें इस सारे माहौल में अवसर की तलाश करनी होगी.”
“उदाहरण के लिए अमरीका अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका से पीछे हट रहा है. चीन का रुतबा अलग तरह का है. उनके लिए वैश्विक नेता का दर्जा लेना मुश्किल है क्योंकि उनका एक ट्रस्ट फ़ैक्टर नहीं आता है. रूस की अपनी कई समस्याएँ हैं. ऐसे में जो मध्यम दर्जे की शक्तियाँ, जैसे भारत और जापान को अवसर मिल रहे हैं. ऐसे में हमें देखना होगा कि हम इस अवसर को कितनी तेज़ी से पकड़ सकते हैं और इसका लाभ ले सकते हैं.”
आने वाले समय में भी अमरीका और चीन के बीच रह रहकर बयानबाज़ी जारी रह सकती है.
लेकिन भारत को धीरे धीरे उस जगह पहुँचना होगा, जहाँ भारत के हितों की रक्षा की जा सके.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












