विश्वविद्यालयों में ऑनलाइन परीक्षाओं को लेकर क्यों मचा है हंगामा

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    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

विश्वविद्यालयों में होने वाली ऑनलाइन परीक्षाओं को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है. एक तरफ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने अंतिम वर्ष की ऑनलाइन परीक्षाएं आयोजित कराने के दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं तो दूसरी तरफ स्टूडेंट्स इसका विरोध कर रहे हैं.

स्टूडेंट्स का कहना है कि पिछले सालों के प्रदर्शन, असाइनमेंट और प्रोजेक्ट के आधार पर अंतिम वर्ष या समेस्टर का मूल्यांकन करना चाहिए ताकि कोरोना महामारी के दौरान उन पर परीक्षा का दबाव ना पड़े.

यूजीसी ने जुलाई में विश्वविद्यालयों में परीक्षाएं कराने को लेकर दिशानिर्देश जारी किए थे. इनके मुताबिक़-

  • सितंबर, 2020 तक परीक्षाएं आयोजित करानी ज़रूरी है.
  • परीक्षाएं ऑनलाइन या ऑफ़लाइन (पेन+पेपर) या मिश्रित (ऑनलाइन+ऑफ़लाइन) तरीकों से कराई जाएंगी. मिश्रित तरीके का मतलब है कि जो बच्चे ऑनलाइन परीक्षा के नतीजों से संतुष्ट ना हों तो विश्वविद्यालय उनके लिए ऑफलाइन परीक्षा आयोजित कर सकता है.
  • जो विद्यार्थी किसी वजह से परीक्षा नहीं दे पाता है उसे विश्वविद्यालय अपनी सुविधानुसार विशेष परीक्षा देने का मौका दे सकता है.
  • जिन विद्यार्थियों की बैकलॉग है यानी पहले के कुछ पेपर वो पास नहीं कर पाए हैं उनकी भी ऑनलाइन या ऑफ़लाइन या मिश्रित तरीके से परीक्षा ली जाएगी.

कुछ विश्वविद्यालयों में ऑनलाइन परीक्षाएं आयोजित कराने का तरीका ये होगा कि स्टूडेंट्स को ऑनलाइन प्रश्न पत्र डाउनलोड करना है. प्रश्नों के जवाब लिखकर उत्तर पुस्तिका को अपलोड करके सब्मिट कर देना है. परीक्षा कुल तीन घंटे की होगी. जिसमें एक घंटे का समय डाउनलोड और अपलोड करने के लिए मिलेगा. हालांकि, विश्वविद्यालय दूसरा तरीका भी अपना सकते हैं.

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़ देश भर में 366 विश्वविद्यालय यूजीसी के दिशानिर्देशों के मुताबिक परीक्षाओं का आयोजन करेंगे.

एक स्टूडेंट

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राज्यों का विरोध

दिल्ली, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत कई राज्यों ने यूजीसी के दिशानिर्देशों का विरोध किया है. कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को इस संबंध में पत्र भी लिखा है.

महाराष्ट्र में शिवसेना की यूथ विंग युवा सेना ने अंतिम वर्ष की परीक्षाएं कराने के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. दिल्ली सरकार ने राज्य विश्वविद्यालयों मे अंतिम वर्ष की परीक्षाएं रद्द कर दी हैं और कहा है कि पुराने सेमिस्टर के प्रदर्शन, इंटरनल असेस्मेंट या अन्य प्रगतिशील तरीकों से स्टूडेंट्स का मूल्यांकन किया जाएगा.

यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष समेत 27 अन्य शिक्षाविदों ने यूजीसी को पत्र लिखकर परीक्षाएं आयोजित ना करने की अपील की है. इस पत्र में लिखा है कि जो लोग ये तर्क दे रहे हैं कि परीक्षा रद्द करने से डिग्रियों का मूल्य कम हो जाएगा उन लोगों को ये भी बताना चाहिए कि वर्चुअल एग्जाम से उनका कैसे मूल्य बढ़ेगा.

क्या कहते हैं एचआरडी मंत्री

इससे पहले मानव संसाधान विकास (एचआरडी) मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कई ट्वीट करके परीक्षा के महत्व पर ज़ोर दिया था.

उन्होंने लिखा था, “ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि किसी भी शिक्षा प्रणाली में विद्यार्थियों का मूल्यांकन महत्वपूर्ण होता है. परीक्षाओं में प्रदर्शन विद्यार्थियों को आत्मविश्वास और संतुष्टि देता है.”

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वहीं, अग्रेज़ी वेबसाइट आउटलुक को दिए एक साक्षात्कार में यूजीसी के उपाध्यक्ष भूषण पटवर्धन ने कहा था, "बिना परीक्षाओं के विद्यार्थी अपना मूल्य खो देंगे. “कोरोना डिग्रियों” को जीवन भर ऐसे ही जाना जाएगा और नौकरी के दौरान उनका महत्व कम होगा."

हालांकि, विरोध के बीच ऐसे विद्यार्थी भी हैं जो परीक्षाएं देना चाहते हैं. वो पुराने प्रदर्शन के आधार पर नहीं बल्कि परीक्षा देकर पास होना चाहते हैं.

इस मसले पर सबके अपने तर्क हैं. इसलिए हमने इस पूरे मामले में सभी पक्षों को जानने की कोशिश की.

इंटरनेट कनेक्टिविटी और सिलेबस

परीक्षाओं के संबंध में जो सबसे बड़ी समस्याएं सामने आईं, वो हैं इंटरनेट कनेक्टिविटी और सिलेबस का पूरा ना होना. दिल्ली से लेकर अन्य राज्यों तक के स्टूडेंट्स इससे जूझ रहे हैं.

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ राजस्थान में एमएससी के स्टूडेंट बालकृष्ण कुमावत कहते हैं, “हम चाहते हैं कि पिछले साल या समेस्टर में प्रदर्शन के आधार पर अंतिम वर्ष के नतीजे दे दिए जाएं. क्योंकि सभी स्टूडेंट्स के पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है. कई स्टूडेंट्स को इसके लिए साइबर कैफे या किसी दोस्त के पास जाकर परीक्षा देनी होगी. कोरोना वायरस के दौर में ऐसा करने में अपने ही तरह का ख़तरा है.“

वो कहते हैं कि यूनिवर्सिटी में 15 जुलाई को परीक्षा का सर्कुलर निकाला गया था. लेकिन, स्टूडेंट्स ने उसका बहुत विरोध किया इसलिए परीक्षाओं को आगे सितंबर तक बढ़ा दिया गया है.

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दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में भी कुछ इसी तरह की स्थितियां हैं. यहां बीकॉम ऑनर्स के अंतिम वर्ष के छात्र कबीर सचदेवा ने परीक्षाओं के ख़िलाफ़ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं. एक याचिका डीयू में अंतिम वर्ष की परीक्षाओं के ख़िलाफ़ है और दूसरी में यूजीसी के दिशानिर्देशों को चुनौती दी गई है.

वकील ध्रुव पांडे और रणदीप सचदेवा ने उनकी तरफ से याचिकाएं दायर की हैं. इस मसले पर वकील ध्रुव पांडे ने बताया, “डीयू का कहना है कि वो यूजीसी के दिशानिर्देशों का पालन कर रहा है. लेकिन विश्वविद्यालयों के लिए यूजीसी के नियम मानने अनिवार्य हैं न कि दिशानिर्देश. ऐसे में विश्वविद्यालय के पास परीक्षाएं ना कराने का विकल्प मौजूद है.”

ध्रुव पांडे कहते हैं कि "मार्च के बाद जब परीक्षाएं टाली गईं तब देश में कोरोना संक्रमण के कम मामले थे और जुलाई में मामले बढ़ने पर परीक्षाएं अनिवार्य की जा रही हैं. इस वक़्त सभी बच्चों के पास समान संसाधन और स्थितियां नहीं हैं. मान लीजिए कि परीक्षा के दौरान किसी स्टूडेंट के घर पर बिजली चली जाती है और वहीं, कोई दूसरा स्टूडेंट घर में ऐसी में बैठकर पेपर देता है, तो परीक्षण में बराबरी कैसे होगी?"

कबीर सचदेवा के अलावा 31 और स्टूडेंट्स ने परीक्षाओं के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है जिनमें एक स्टूडेंट कोविड-19 के मरीज़ भी हैं.

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पूरा नहीं हुआ सिलेबस

स्टूडेंट्स की एक चिंता सिलेबस का पूरा ना होना भी है. जनवरी से आख़िरी सेमिस्टर शुरू हुआ था और मार्च में कॉलेज बंद कर दिए. अमूमन अंतिम वर्ष की परीक्षाएं मई और जून में होती हैं लेकिन कोरोना वायरस के चलते परीक्षाओं को टाल दिया गया.

इस बीच स्टूडेंट्स का कोर्स अधूरा रह गया. उन्हें सिलेबस की भी ठीक से जानकारी नहीं मिली. ऑनलाइन क्लासेस तो दी गईं लेकिन सभी स्टूडेंट्स तक उनकी पहुंच संभव नहीं हो सकी.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष सवाल करती हैं कि जब चार महीने से क्लासेस ही नहीं हुई हैं तो सरकार परीक्षाएं क्यों कराना चाहती है?

वह कहती हैं, “हज़ारों स्टूडेंट्स ऐसे हैं जिनके पास फ़ोन नहीं है, इंटरनेट की सुविधा नहीं है वो कैसे ऑनलाइन परीक्षा देंगे? इससे स्टूडेंट्स और उनके माता-पिता पर बहुत दबाव पड़ेगा. अगर ऑफ़लाइन परीक्षा भी होती है, तो 14-15 लाख स्टूडेंट्स के बाहर निकलने से कोविड का संक्रमण बढ़ सकता है. ऐसे में क्या सरकार ये आश्वासन दे सकती है कि उन बच्चों के घरवालों और पड़ोसियों को सुरक्षित किया जाएगा."

आइशी कहती हैं, “एक सेमिस्टर किसी की शैक्षणिक गुणवत्ता का फै़सला नहीं कर सकता. हम इस हालात के लिए किसी को दोष नहीं दे रहे हैं, न ये कह रहे हैं कि ऐसे ही सभी को पास कर दिया जाए. बस पिछली परीक्षाओं के आधार पर औसत निकालकर इस साल के नतीजे दे दिए जाएं.”

आइशी घोष

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जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्विविद्यालय में कनवर्जन जर्नलिज़म में मास्टर की पढ़ाई कर रहीं शैली स्टडी मटीरियल ना होने की समस्या बताती हैं.

उन्होंने कहा, “इस वक़्त परीक्षाएं कराना ठीक नहीं हैं. जैसे कि मैं अभी छत्तीसगढ़ में रह रही हूं और मैं इतने लंबे समय तक घर पर रहने की तैयारी के साथ नहीं आई थी. इसलिए मेरे पास पूरा स्टडी मटीरियल नहीं है. मैं दिल्ली जाकर अपना सामान नहीं ला सकती क्योंकि इसमें संक्रमण का ख़तरा है. मेरे लिए अपनी डिग्री लेना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही ज़रूरी है कि मैं उसके लिए ज़िंदा रहूं.”

शैली ने बताया कि जामिया में अनौपचारिक तरीके से कहा गया है कि 15 अगस्त के बाद ही पता चलेगा कि आगे क्या होगा.

बालकृष्ण कुमावत बताते हैं कि यूनिवर्सिटी में ऑनलाइन क्लास देने की बात हुई थी लेकिन वो ठीक से हुई ही नहीं. कुछ शिक्षकों ने क्लास ली तो कुछ ने नहीं. इसके अलावा वो व्हाट्सऐप पर बता देते हैं कि स्लेबस में कौन-सी किताब लेनी हैं. इससे हम पेपर की तैयारी कैसे कर पाएंगे?

जम्मू-कश्मीर के स्टूडेंट्स

कोरोना की मार और प्रतिबंधों के बीच जम्मू-कश्मीर में हालात और मुश्किल हैं.

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ जम्मू के डीन, स्टूडेंट्स वेलफेयर प्रोफेसर रसाल सिंह ने बताया, “यहां पर कश्मीर से भी काफ़ी बच्चे पढ़ते हैं और वहां कोरोना के मामले काफी ज़्यादा हैं. कश्मीर, यूपी, राजस्थान और केरल आदि राज्यों से आने वाले बच्चे अपने घर गए हुए हैं. वो यहां पर वापस नहीं आ सकते. ऐसे में ऑफलाइन मोड में विश्वविद्यालय में स्टूडेंट्स को बुलाकर परीक्षा करा पाना संभव नहीं है.”

वहीं, ऑनलाइन परीक्षा को लेकर प्रोफेसर रसाल कहते हैं, “यहां पर एक छोटी से छोटी फाइल भी डाउनलोड या अपलोड करने में कई बार फेल होती है. मैं ये समझता हूं कि पिछले समेस्टर्स के नतीजे, सबसे सामान्य स्थिति में किया गया बच्चों का मूल्यांकन या परीक्षण है. इसके आधार पर उनका रिजल्ट बनना चाहिए. उसके अलावा अगर हम किसी भी रूप में परीक्षाएं कराने की कोशिश करेंगे तो वो बच्चों के एक बड़े हिस्से के साथ भेदभाव या अन्याय होगा.”

हालांकि, जम्मू यूनिवर्सिटी में 17 से 31 अगस्त के बीच ऑनलाइन परीक्षाएं होंगी. जो बच्चे इसमें परीक्षा नहीं दे पाएंगे वो बाद में ऑफलाइन परीक्षा दे सकते हैं.

कोरोना काल में शिक्षा

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क्या परीक्षाएं ज़रूरी हैं?

इन बाधाओं के बावजूद कई स्टूडेंट्स और टीचर ऐसे हैं जो परीक्षाएं कराना चाहते हैं. उनका मानना है कि ऐसा ना होने से उन स्टूडेंट्स को नुक़सान होगा जिनकी बैकलॉग आई थी.

डीयू के सिस्टर निवेदिता कॉलेज में पॉल साइंस ऑनर्स के अंतिम वर्ष की छात्रा शुब्रा शर्मा इससे सहमति जताती हैं. वह कहती हैं, “मुझे लगता है कि परीक्षाएं होनी चाहिए. अगर परीक्षाएं नहीं हुईं तो जिन बच्चों के पिछले पेपर रह गए हैं उनके साथ गलत होगा. स्टूडेंट्स को पिछले प्रदर्शन के आधार पर नंबर दे दिए जाएंगे तो बैकलॉग वाले स्टूडेंट्स को तो अगले साल पेपर देने का इंतज़ार करना होगा.”

हालांकि, शुब्रा का ये भी मानना है कि परीक्षाएं लेने से पहले तकनीकी पक्ष को मज़बूत करना होगा. डीयू में हाल ही में ऑनलाइन परीक्षाओं को लेकर एक मॉक टेस्ट हुआ था. इसमें स्टूडेंट्स के पास गलत प्रश्न पत्र पहुंच गए और कई बच्चों की आंसर शीट सब्मिट ही नहीं हो पाई.

मॉक टेस्ट के संबंध में डीयू के भास्कराचार्य कॉलेज ऑफ़ अप्लाइड साइंसेज में फैकल्टी डॉ. अवनीश मित्तल बताते हैं कि उस मॉक टेस्ट का मकसद सिर्फ़ इतना सीखाना था कि बच्चों के पास प्रश्न पत्र पहुंच जाएं और वो उसे डाउनलोड और अपलोड कर सकें. लेकिन, बच्चों को लगा कि ये असली परीक्षा जैसा होगा. इस संबंध में स्पष्टता होनी चाहिए थी.

लेकिन, अवनीश मित्तल शैक्षणिक गुणवत्ता के लिए परीक्षाएं होना ज़रूरी मानते हैं. वह कहते हैं, “ऑनलाइन क्लास के ज़रिए स्लेबस पूरा कराया गया है. स्टूडेंट्स से स्टडी मटीरियल शेयर भी किया गया है और पेपर में सवाल भी पहले के मुक़ाबले कम आएंगे. यह सही है कि सभी स्टूडेंट्स ऑनलाइन क्लास नहीं ले पाए लेकिन क्लास रूम में भी 100 प्रतिशत अटेंडेंस नहीं होती.“

“स्टूडेंट्स की चिंताएं अपनी जगह सही हैं. उनके निदान की कोशिश की जा रही है लेकिन हम शैक्षणिक गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहते.”

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