बच्चों को दिन में कितने घंटे स्मार्टफोन इस्तेमाल करना चाहिए

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मेरे बच्चे को एंटी ग्लेयर चश्मा लगाना चाहिए या नहीं?
मेरे बच्चे की आंखों में लालपन और जलन रहती है.
बच्चे को आजकल सिरदर्द रहने लगा है.
येकुछ ऐसे सवाल हैं जिनका सामना आजकल ज़्यादातर माँ-बाप कर रहे हैं. बच्चों की ऑनलाइन क्लासेज़ होने से मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल बढ़ गया है और बच्चे स्क्रीन पर ज़्यादा वक़्त बिताने लगे हैं. इसका असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है.
दिल्ली की रहने वालीं शर्मिला की बेटी आयूषी छठी क्लास में पढ़ती है.
ऑनलाइन क्लास शुरू होने के बाद उनकी बेटी सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक लैपटॉप के सामने ही बैठी रहती थी. इससे आयूषी को कंधे, पीठ और आंखों में दर्द होने लगा है.
शर्मिला कहती हैं, “जिस फोन और लैपटॉप के लिए हम बच्चों को रोकते थे. अब वो खुद बच्चों को देने पड़ते हैं. मेरी बेटी की तीन या चार क्लास होती हैं. क्लास के समय वो कुर्सी पर बैठती. उसके बाद पलंग पर लेटकर या बैठकर लैपटॉप चलाती है. क्लास ख़त्म होने पर रिलेक्स होने के लिए भी लैपटॉप पर ही कुछ देखती है. इससे जून में मेरी बेटी को पीठ, कंधों, आंखों में दर्द और थकान होने लगी थी. फिर मुझे उसके रूटीन में बदलाव करना पड़ा.”
सरकार भी हुई गंभीर?
मानव विकास संसाधन मंत्रालय ने बच्चों पर डिज़िटल पढ़ाई के शारीरिक और मानसिक प्रभावों को देखते हुए “प्रज्ञाता” नाम से डिजिटल शिक्षा संबंधी दिशानिर्देश ज़ारी किए हैं.
इसमें ऑनलाइन क्लासेज़ की संख्या और समय को सीमित करने के लिए सुझाव दिए गए हैं.

प्री प्राइमेरी- माता-पिता से बातचीत और उनके मार्गदर्शन के लिए 30 मिनट का सेशन.
पहली से आठवीं - हर रोज़ 30 से 45 मिनट की दो क्लासेज़.
नौंवी से बारहवीं - हर रोज़ 30 से 45 मिनट की चार क्लासेज़.

इसमें बच्चों के लिए फिज़िकल एक्टिविटी और इंटरनेट के इस्तेमाल से जुड़ी सलाह भी दी गई है. साथ ही माता-पिता के लिए इन नई स्थितियों में सामंजस्य बैठाने के तरीक़े भी सुझाए गए हैं.
इसमें समय-समय पर ब्रेक लेने, ऑफलाइन खेल खेलने और माता-पिता की निगरानी में क्लास लेने की सलाह दी गई है.
बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ने को लेकर पहले से चिंता जाहिर की जाती रही है.
अब मंत्रालय की ओर से दिशानिर्देश आने से इस पर चर्चा और बढ़ गई है.
ऐसे में जानते हैं कि स्क्रीन टाइम को सीमित करना क्यों ज़रूरी है और ऑनलाइन क्लासेस के दौरान दूसरी किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए.

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क्या होता है स्क्रीन टाइम
स्क्रीन टाइम का मतलब होता है कि बच्चा 24 घंटों में कितने घंटे मोबाइल, टीवी, लैपटॉप और टैबलेट जैसे गैज़ेट के इस्तेमाल में बिताता है.
अमेरिकन अकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्सने बच्चों के स्क्रीन टाइम के संबंध में कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनके मुताबिक़-
- 18 महीने से कम उम्र के बच्चे स्क्रीन का इस्तेमाल ना करें.
- 18 से 24 महीने के बच्चे को माता-पिता उच्च गुणवत्ता वाले प्रोग्राम ही दिखाएं.
- 2 से 5 साल के बच्चे एक घंटे से ज़्यादा स्क्रीन का इस्तेमाल ना करें.
- छह साल और उससे ज़्यादा उम्र के बच्चों के स्क्रीन देखने का समय सीमित हो. सुनिश्चित करें बच्चे के पास सोने, फिजिकल एक्टिविटी और अन्य ज़रूरी कामों के लिए पर्याप्त समय हो.
लेकिन, फिलहाल स्थितियां अलग हैं. बच्चे क्लास के अलावा असाइनमेंट, रिसर्च और मनोरंजन के लिए भी मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे उनका स्क्रीन टाइम कहीं ज़्यादा बढ़ गया है.

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स्क्रीन टाइम का बच्चों पर असर
गुड़गांव के फोर्टिस अस्पताल में नेत्र विज्ञान विभाग की डायरेक्टर डॉ. अनीता सेठी बताती हैं कि आजकल कई माता-पिता उनसे एंटी ग्लेयर चश्मे और आंखों की परेशानियों को लेकर सलाह ले रहे हैं.
ऐसे में स्क्रीन टाइम कम करना अच्छा फैसला है. ज़्यादा स्क्रीन देखने से बच्चों में कई परेशानियां हो जाती हैं, जैसे-
- कभी-कभी सिर में दर्द
- टीवी या लैपटॉप की स्क्रीन पास जाकर या आंखों को छोटी करके देखना.
- आंखों में लालपन आना
- आंखों को सूखेपन के कारण मसलना
- आंखों में जलन होना
- नज़र कमज़ोर हो सकती है. पहले से जिन्हें चश्मा लगा है उनका नंबर बढ़ सकता है.
लेकिन, डॉक्टर अनीता के मुताबिक कुछ और बातों का भी ध्यान रखना ज़रूरी है तभी स्क्रीन टाइम कम करने से फायदा होगा. ये बातें हैं-
बैठने की पोजिशन – लैपटॉप या फोन लेटकर ना देखें, कुर्सी और टेबल का इस्तेमाल करें. लैपटॉप या फोन आपकी आंखों के स्तर पर होना चाहिए. स्क्रीन को 33 सेमी. तक की दूरी पर रखें. मोबाइल और लैपटॉप की स्क्रीन के असर में कोई खास अंतर नहीं है. दोनों को एक स्टैंड पर रखें जिससे आई लेवल बना रहे.
रोशनी – कई बार बच्चे अंधेरे कमरे में सिर्फ़ लैपटॉप या फोन की रोशनी में ही पढ़ने लगते हैं. लेकिन, ये ध्यान रखें कि कमरे में पर्याप्त रोशनी हो.
ब्रेक लेते रहें – बड़े बच्चों को क्लास के अलावा भी पढ़ने के लिए मोबाइल और लैपटॉप की ज़रूरत होती है. ऐसे में छोटे और बड़े सभी बच्चे बीच-बीच में ब्रेक लेते हैं. पलकों को झपकाएं और कोई दूर की चीज़ देखें. इससे आंखों की मांस-पेशियां को आराम मिलता है.
एंटी ग्लेयर चश्मा – जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम ज़्यादा है वो एंटी ग्लेयर चश्मे का इस्तेमाल करें. लेकिन, ये बिलकुल भी ना सोचें कि इस चश्मे के इस्तेमाल के बाद जितना चाहें उतनी स्क्रीन देख सकते हैं. ये सुरक्षा का एक तरीक़ा है लेकिन सीमित स्क्रीन टाइम के साथ है.
डॉक्टर अनीता कहती हैं कि अगर आप बैठने के तरीके पर गौर नहीं करते तो पीठ, गर्दन और कंधे में दर्द हो सकता है. फिजिकल एक्टिविटी ना होने से वज़न बढ़ सकता है और शिथिलता आ सकती है.

बच्चों पर मानसिक प्रभाव
स्क्रीन टाइम बढ़ने के मानसिक प्रभाव पर सफ़दरजंग अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ डॉक्टर पंकज कुमार कहते हैं, “कुछ स्टडीज़ के मुताबिक़ अगर बच्चे या किशोर छह या सात घंटे से ज़्यादा स्क्रीन पर रहते हैं तो उन पर मनोवैज्ञानिक असर हो सकता. इससे उनमें आत्मसंयम की कमी, जिज्ञासा में कमी, भावनात्मक स्थिरता ना होना, ध्यान केंद्रित ना कर पाना, आसानी से दोस्त नहीं बना पाना, जैसी समस्याएं हो सकती हैं.”
“हालांकि, ये इस पर भी निर्भर करता है कि वो स्क्रीन पर क्या देख रहे हैं, फ़िल्म, वीडियो, गेम, सोशल मीडिया देख रहे हैं या कुछ पढ़ रहे हैं. इनका असर बच्चे के अनुसार अलग-अलग हो सकता है.”
मोबाइल और लैपटॉप के ज़्यादा इस्तेमाल से बच्चों की आदत में भी बदलाव आ रहा है. शैक्षणिक वीडियो और व्हटासऐप में बातचीत को लेकर उनकी सक्रियता बढ़ गई है.
शर्मिला बताती हैं, “उनकी बेटी ने बिना बताए बच्चों के कई यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब कर लिए और वीडियोज़ देखने लगी. उसने ईयरफोन लगाने की ज़िद भी की जिससे उसे तेज़ सुनने की आदत हो गई. लेकिन, फिर मैंने उसे स्पीकर पर सुनने के लिए ज़ोर दिया. उसका रुटीन बदला और योगा व साइकिल के लिए ले जाने लगी. साथ ही मैंने स्कूल में कम व्हाट्सऐप ग्रुप बनाने के लिए अनुरोध किया था. इस सब से आयूषी को काफी फायदा हुआ.”
फोन और लैपटॉप की आदत पर डॉ. पंकज कुमार कहते हैं कि आगे चलकर ये आदत बड़ी समस्या बन सकती है. जब स्कूल शुरू हो जाएंगे तो बच्चों की आदत बदलने में मशक्कत करनी पड़ सकती है. अमूमन बच्चे और खासतौर पर डिप्रेशन, सोशल एंग्ज़ाइटी या हाइपरएक्टिव डिसऑर्डर से ग्रस्त बच्चे, स्क्रीन को लेकर ज़्यादा आकर्षित होते हैं. जिन बच्चों में सोशल एंग्ज़ाइटी होती है, उन्हें सोशल मीडिया पर लोगों से जुड़ाना ज़्यादा पसंद आता है क्योंकि वहां कोई आपको देख नहीं सकता.
इन बातों का रखेंध्यान -
- कंप्यूटर ऐसी जगह पर रखें जहां से माता-पिता देख सकें कि बच्चा क्या कर रहा है. कोशिश करें कि बच्चा ईयरफोन की जगह स्पीकर का इस्तेमाल करे.
- बच्चे स्पष्ट निर्देशों को ज़्यादा समझते हैं, जैसे कब और कितने समय के लिए उन्हें लैपटॉप या मोबाइल मिलेगा. स्कूल के काम के अलावा लैपटॉप या मोबाइल देखने के क्या नियम होंगे, ये पहले तय कर लें.
- बच्चों को फिजिकल एक्टिविटी जैसे कसरत, साइकिल चलाना या चलने-दौड़ने वाले खेल खिलाएं.
- कई ऐप बताते हैं कि मोबाइल में किस ऐप पर कितना समय बिताया गया है. इससे आप देख सकते हैं कि बच्चे ज़्यादातर क्या देख रहा है.

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बच्चों का स्वास्थ्य और स्लेबस
इस समय स्कूलों के सामने दोहरी चुनौती है. एक तरफ उन्हें बच्चों को पढ़ाना भी है और दूसरी तरफ उनके स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना है. ऐसे में स्कूल इन दिशानिर्देशों को काफी फायदेमंद मान रहे हैं.
दिल्ली के जहांगीरपुर में ‘के ब्लॉक’ स्थित गवर्नमेंट गर्ल्स सीनियर सैकेंडरी स्कूल की प्रमुख बेला जैन कहती हैं, “स्क्रीन टाइम कम करने की ज़रूरत दो-तीन कारणों से थी.”
“पहला, उनके पास अभिभावकों के फोन आ रहे थे कि बच्चे फोन और लैपटॉप का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. उनका घर में घुलना-मिलना बहुत कम हो गया है. दूसरा, कई बच्चे ऐसे हैं जिनके भाई-बहन भी स्कूल में पढ़ते हैं लेकिन उनके घर में एक ही मोबाइल है. अब क्लासेस कम होने से सभी बच्चों को क्लास करने के ज़्यादा मौके मिल जाएंगे.”
बेला जैन कहती हैं कि इससे शिक्षकों को भी फायदा होगा क्योंकि उनका भी स्क्रीन टाइम और व्यस्तता बढ़ गई है. वो कम क्लास देंगे तो क्लास को बेहतर बनाने पर सोच पाएंगे.
ग्रेटर नोएडा वेस्ट में स्थित सर्वोत्तम इंटरनेशनल स्कूल की डायरेक्टर प्रिसिंपल डॉ. प्रियंका मेहता का कहना है कि इन दिशानिर्देशों से स्पष्टता आई है. इससे पहले सबकुछ करने की कोशिश में ज़रूरत से ज़्यादा या कम काम हो पा रहा था.
लेकिन, स्लेबस पूरा करने की चुनौती से स्कूल कैसे निपटेंगे, इस पर डॉ. प्रियंका कहती हैं, “सभी को ये समझना होगा कि इस मुश्किल समय में शिक्षा को ज़ारी रखने की कोशिश की जा रही है ताकि ज़रूरी चीजें ना छूट जाएं. हम घर से स्कूल नहीं चला रहे हैं. हमें देखना है कि किस उम्र के बच्चे को हमें क्या पढ़ाना है और घर में माता-पिता के पास कितनी सुविधाएं हैं.”
उन्होंने बताया, “सीबीएसई स्कूल में पांचवी क्लास तक का स्लेबस निजी स्कूल निर्धारित कर सकते हैं. इसके अलावा वैकल्पिक कैलेंडर भी फोलो करने को बोला जा रहा है. नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क में बताया गया है कि किस स्तर पर बच्चे को कितना पता होना चाहिए. ज़रूरी नहीं है कि किसी टॉपिक के लिए 10-12 पन्नों को पढ़ाया जाए. टीचर उसे छोटा करके टॉपिक समझा सकता है. टीचर ऐसा करने की कोशिश भी कर रही हैं.”

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