वरवर राव जैसे कार्यकर्ताओं के केस की ना सुनवाई, ना ज़मानत

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
''महाराष्ट्र के जाने-माने समाजिक कार्यकर्ता सुधीर धावले को उनके माओवादियों से कथित संबंधों के आरोप में नागपुर की सेंट्रल जेल से साल 2014 में रिहा किया गया. कोर्ट ने उन्हें आरोपों से बरी किया था लेकिन रिहाई तक वे 40 महीने जेल में काट चुके थे. उनके साथ उनके आठ साथियों को भी ऐसे आरोपों से बरी कर दिया गया था. इसी तरह साल 2005 में दलित कवि शांतनु कांबले को ऐसे ही आरोपों में गिरफ्तार किया गया. जेल में डालने से पहले उन्हें कई दिनों तक प्रताड़ित किया गया लेकिन बाद में कोर्ट ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया.''
देश के जाने-माने स्कॉलर आनंद तेलतुंबड़े ने अपनी क़िताब 'रिपब्लिक ऑफ़ कास्ट' के चैप्टर - 'मैन्युफ़ैक्चरिंग माओइस्टः डिसेंट इन द एज ऑफ़ नियोलिब्रलिज़्म' में ये बातें लिखी हैं.
आज आनंद तेलतुंबड़े, वरवर राव, गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज और रोना विल्सन जैसे कई लोगों की ज़िंदगी उसी मोड़ पर पहुँच गई है.
देश के ये 11 सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक और पत्रकार बीते दो साल से एल्गार परिषद केस में जेल में बंद हैं.

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उन पर 'अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट' यानी यूएपीए जैसा कठोर क़ानून लगाया गया है.
इन बुद्धिजीवियों में से एक, 80 साल के कवि वरवर राव की सेहत लगातार जेल में बिगड़ती गई. ये बात बीते सप्ताह तब सामने आई जब उनकी पत्नी से उन्हें रूटीन कॉल किया और राव बात तक नहीं कर पा रहे थे.
इसके बाद बीते शुक्रवार को राव कोरोना पॉज़िटिव पाये गए. उन्हें अस्पताल भेजने की गुहार के बाद अब नानावटी अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

ज़मानत पर रिहाई की माँग
सामाजिक कार्यकर्ता और सीपीआईएमएल की नेता कविता कृष्णन ने वरवर राव जैसे राजनैतिक बंदियों को रिहा करने की माँग की है.
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पूर्व आईएएस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने भी राव को तत्काल रिहा करने की माँग की है.
उन्होंने लिखा, ''राव की उम्र 80 से ज़्यादा है. उन्हें कोरोना का ख़तरा ज्यादा है. सामान्य समय में भी उन्हें जेल में नहीं डालना चाहिए, फिर ये तो कोविड-19 महामारी का समय है. अगर उन्हें रिहा नहीं किया गया तो ये कवि की जान को ख़तरे में डालने का अपराध होगा.''
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कई दशकों तक 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' चलाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने भी महाराष्ट्र सरकार से वरवर राव को बेहतर इलाज देने और उन्हें रिहा करने की माँग की है.
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2000 से अधिक लोगों ने एक पिटीशन पर दस्तख़त करके महाराष्ट्र सरकार से अपील की है कि राव को बेहतर इलाज जल्द से जल्द दिया जाये.

कहानी शुरू कहाँ से हुई?
6 जून 2018 की सुबह पुणे पुलिस ने दलित कार्यकर्ता सुरेंद्र गडलिंग, बंदी अधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन, मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधीर धावले, महेश राउत और प्रोफ़ेसर शोमा सेन को गिरफ्तार किया.
पुलिस ने दावा किया उन्हें इन पाँच लोगों के पास से एक चिट्ठी मिली है जिसमें 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश' रची गई है.
साथ ही इन पाँच लोगों ने माओवादियों की मदद से 'एल्गार परिषद' के कार्यक्रम का खर्चा उठाया.

28 अगस्त 2019 को इसी मामले में वरवर राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फ़रेरा, वरनॉन गोंजाल्विस, गौतम नौलखा की गिरफ्तारी हुई.
पुलिस ने आनंद तेलतुंबड़े के गोवा स्थित आवास पर छापा भी मारा लेकिन उस वक़्त वे मुंबई में थे, इसलिए उनकी गिरफ़्तारी नहीं हो सकी.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए घर में ही नज़रबंद रखने के आदेश दिए थे.
इसके बाद गौतम नवलखा को छोड़कर सभी आरोपियों के हाउस अरेस्ट को गिरफ़्तारी में बदलने का आदेश दे दिया गया.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम ज़मानत ना मिलने के कारण 14 अप्रैल 2020 को आनंद तेलतुंबड़े और गौतम नवलखा ने एनआईए के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें हिरासत में भेज दिया गया. इस वक़्त वे मुंबई की तलोजा जेल में हैं.

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इलाज के लिए भी अंतरिम ज़मानत नहीं
जब 16 मार्च को आनंद तेलतुंबड़े और गौतम नवलखा के वकील ने कोर्ट में कोरोना महामारी को वजह बताते हुए अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी दी थी तो सरकार की तरफ़ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा था, ''ऐसे समय में (कोरोना महामारी) जेल सबसे सुरक्षित जगह है.''
26 जून को वरवर राव ने स्पेशल एनआईए कोर्ट में अपनी लगातार बिगड़ती सेहत और कोविड-19 होने की आशंका जताते हुए अंतरिम ज़मानत की याचिका दायर की थी.
लेकिन जज डीई कोठालिकर ने इसे ख़ारिज कर दिया.
जबकि 13 जून को ही तलोजा जेल में दो कैदी कोरोना पॉज़िटिव पाए गए थे. राव उम्र के उस पड़ाव में हैं जहाँ कोरोना के जानलेवा होने का ख़तरा काफ़ी ज्यादा होता है, लेकिन इसके बावजूद उनकी दलीलों को दककिनार करते हुए ज़मानत नहीं दी गई.
4 जुलाई को शोमा सेन की भी स्वास्थ के आधार पर दायर की गई अंतरिम ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी गई.

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इससे पहले 29 मई को भायखला जेल में बंद सुधा भारद्वाज की भी अंतरिम ज़मानत याचिका ख़ारिज की जा चुकी है. भायखला जेल में एक कैदी कोरोना पॉजिटिव पाया गया था.
सुधा भारद्वाज की अपील में कहा गया था कि उन्हें डायबटीज़ और हाई बल्ड प्रेशर है ऐसे में कोरोना उनके लिए काफ़ी ख़तरनाक साबित हो सकता है.
लेकिन एनआईए स्पेशल कोर्ट ने उनकी याचिका ख़ारिज कर दी.
इन लोगों ने स्पेशल कोर्ट इस फ़ैसले के खिलाफ़ बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील दायर की है जिस पर सुनवाई अभी बाकी है.
एनआईए की तरफ़ से इस केस की पैरवी कर रहे वकील प्रकाश शेट्टी का कहना है कि कोविड को देखते हुए कैदियों की ज़मानत या परोल पर फ़ैसला लेने वाली उच्च स्तरीय कमेटी ने तय किया है कि यूएपीए एक्ट के तहत गिरफ़्तार क़ैदियों को इसका फ़ायदा नहीं मिलेगा.
यूएपीए एक्ट जिन पर भी लगा है उन्हें उनकी उम्र के आधार पर ज़मानत नहीं मिलेगी.
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