भारत चीन सीमा विवाद: चीन के बयान में ऐसा क्या है, जिससे मोदी सरकार पर उठ रहे हैं सवाल

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत चीन सीमा विवाद के बाद दोनों तरफ से शांति बहाल करने की कोशिशें शुरू हो चुकी है. ये कोशिशें भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच रविवार को टेलीफ़ोन पर बातचीत के बाद शुरू हुई हैं.

इस शांति बहाल प्रक्रिया को लेकर दोनों देशों की तरफ से बयान जारी किए गए हैं. भारत की तरफ़ से जारी बयान में तीन मुख्य बिंदु में बात कही गई है. 

भारत सरकार का बयान

भारत की तरफ से बयान में सबसे पहले कहा गया है कि दोनों देशों के प्रतिनिधि, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच रविवार को टेलीफ़ोन पर बातचीत हुई.

दोनों देशों ने पूर्वी सीमा पर हाल के दिनों में हुई गतिविधियों पर विस्तार से चर्चा की. इसके बाद ही भारत-चीन के बीच इस बात पर सहमति बनी कि आपसी रिश्तों को बनाए रखने के लिए सीमा पर शांति ज़रूरी है. 

बयान के दूसरे हिस्से में कहा गया है कि रविवार को हुई बातचीत के बाद भारत-चीन के प्रतिनिधि इस बात पर सहमत हुए कि जल्द से जल्द वास्तविक नियत्रंण रेखा पर सैनिकों के डिस-एंगेजमेंट की प्रक्रिया शुरू होगी.

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इस बात पर भी सहमति बनी कि सीमा पर तनाव कम करने और शांति बहाल के लिए दोनों देश चरणबद्ध तरीक़े से डी-एस्कलेशन की प्रक्रिया अपनाएँगे. बातचीत में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि भारत और चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा का पूरी तरह सम्मान करेंगे और ऐसा कोई एकतरफ़ा कदम नहीं उठाएंगे जिससे यथास्थिति में कोई बदलाव हो.

भविष्य में भी ऐसा ना हो, ये सुनिश्चित करने पर भी भारत और चीन के बीच सहमति बनी है. 

भारत के विदेश मंत्रालय की तरफ़ से जारी बयान के तीसरे हिस्से में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर दोनों देशों के बीच आगे भी बातचीत जारी रहेगा. 

लेकिन चीन की तरफ़ से जारी किए गए बयान की भाषा भारत के जारी किए गए बयान से अलग है. 

भारत के विदेश मंत्रालय की तरफ़ से जारी बयान

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चीन सरकार का बयान

चीन के विदेश मंत्रालय की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया है कि भारत और चीन के बीच वेस्टर्न सेक्टर सीमा के गलवान घाटी में जो कुछ हुआ है, उसमें सही क्या है और ग़लत क्या हुआ है- ये स्पष्ट है. 

चीन अपनी संप्रभुता की रक्षा करने के साथ-साथ इलाक़े में शांति भी बहाल करना चाहता है. हमें उम्मीद है कि भारत, चीन के साथ मिल कर इस दिशा में काम करेगा ताकि जनता की सोच दोनों देशों के रिश्तों के बारे में सकारात्मक हो, आपसी सहयोग से दोनों से अपने मतभेदों को और ना आगे बढ़ाएं और मामले को जटिल ना बनाते हुए भारत-चीन के आपसी रिश्ते की बड़ी तस्वीर पेश करें. 

इसके बाद चीन ने भारत की तरह चार मुख्य बिंदुओं पर सहमति की बात अपने बयान में कही है. उन्होंने बयान में आगे कहा है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और सैन्य स्तर की बातचीत का सिलसिला चलता रहेगा.

हालाँकि चीन सरकार के बयान में ना तो डिस-एंगेजमेंट शब्द का इस्तेमाल है, ना ही डि-एस्कलेशन की प्रक्रिया का ज़िक्र किया गया है.

यही वजह है कि भारत में विपक्ष के साथ दोनों देशों के संबंधों पर नज़दीक से नज़र रखने वाले जानकार भी इन बयानों पर सवाल उठा रहे हैं. 

चीन के विदेश मंत्रालय की तरफ़ से जारी किया गया बयान

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बयान पर कांग्रेस के सवाल

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मंगलवार को इस मुद्दे पर ट्वीट कर दोबारा से केंद्र सरकार को घेरा.

अंग्रेज़ी में किए इस ट्वीट में उन्होंने दोनों देशों के जारी किए बयानों का स्क्रीनशॉट शेयर किया और तीन सवाल पूछे.

  • सीमा पर यथास्थिति की बात पर भारत सरकार ने दवाब क्यों नहीं बनाया?
  • गलवान में हुई हिंसक झड़प में मारे गए 20 जवानों को चीन ने अपने बयान में सही साबित क्यों करने दिया गया?
  • गलवान घाटी की संप्रभुता का ज़िक्र बयान में क्यों नहीं हैं?
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इसी से मिलता-जुलता ट्वीट दोनों देशों के संबंधों पर नज़र रखने वाले जानकार ब्रह्म चेलानी ने भी किया है. 

उन्होंने दोनों देशों के बयानों का स्क्रीन शॉट दो अलग-अलग ट्वीट में शेयर करते हुए पाँच मुद्दों पर भारत सरकार को घेरा है. 

उन्होंने लिखा, "चीन की तरफ़ से जारी बयान में ना तो वास्तविक नियंत्रण रेखा के सम्मान की बात है, ना ही यथास्थिति बहाल किए रखने की बात है, ना ही चीन ने अपने बयान में जल्द से जल्द या डि-एस्केलेशन जैसे शब्दों का प्रयोग किया है."

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दोनों देशों की तरफ से जारी बयान पर बीबीसी ने बात की भारत की पूर्व विदेश सचिव रही निरुपमा राव से. 

निरुपमा नहीं मानती कि दोनों देशों की बयानों में किसी तरह का कोई विवाद है. निरुपमा राव भारत चीन के रिश्तों पर एक किताब भी लिख रही है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "ये बात सही है कि दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच लंबी बातचीत के बाद कोई साझा बयान सामने नहीं आया है. इसके बावजूद, दोनों देशों की तरफ़ से जारी बयान में ख़ामियां निकालने का ये सही वक़्त नहीं है. दोनों देशों को इस समय इस बात की ओर ध्यान देने की ज़रूरत है कि ग्राउंड पर परिस्थितियां थोड़ी बेहतर हो, तनाव कम हो."

उनके मुताबिक़ दोनों देशों के बयानों को शब्दश: पढ़ने की ज़रूरत नहीं है. वो कहती हैं कि "कूटनीतिक रिश्तों में ऐसा नहीं होता."

वो कहती हैं "भारत को ये नहीं भूलना चाहिए कि चीन ने अपने बयान में दोनों देशों को अपने रिश्ते को बिग पिक्चर में देखने की बात कही है. ये इस ओर इशारा है कि ना सिर्फ़ एशिया में बल्कि पूरे विश्व की नज़र भारत और चीन के रिश्तों पर है."

"ये इस बात की ओर इशारा है कि चीन ख़ुद तनाव कम करने के पक्ष में है. चीन भी मानता है कि तनाव जारी रखने से किसी भी देश के लिए भला नहीं होने वाला. चीन ने ये भी कहा है कि पुराने समझौतों का दोनों देश सम्मान करेंगे."

निरुपमा राव कहती हैं कि भारत और चीन के बीच 1993 से अब तक चार समझौते हुए हैं. चीन के बयान में उन समझौतों का ज़िक्र होना इस बात की ओर इशारा है कि चीन उन समझौतों का सम्मान करता है. 

प्रधानमंत्री मोदी का लेह दौरा

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यहां ये जानना ज़रूरी है कि भारत-चीन सीमा पर 15-16 जून की रात गलवान घाटी में भारत और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष हुए, जिसमें 20 सैनिकों की मौत हो गई. उस वक़्त ये विपक्ष ने ये सवाल पूछा था कि भारतीय सेना ने हथियार क्यों नहीं उठाए थे?

ये सवाल उन मीडिया रिपोर्ट्स के बात उठे थे जिसमें बताया गया था कि चीन के सैनिकों ने कील लगे लोहे की रॉड से भारतीय सेना पर हमला किया था. विपक्ष के इस सवाल के जवाब में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बताया कि गलवान घाटी में भारत-चीन सीमा पर तैनात भारतीय जवानों के पास हथियार थे लेकिन चीन से समझौतों के तहत उन्होंने हथियार का इस्तेमाल नहीं किया.

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, "सीमा पर तैनात सभी जवान हथियार लेकर चलते हैं. ख़ासकर पोस्ट छोड़ते समय भी उनके पास हथियार होते हैं. 15 जून को गलवान में तैनात जवानों के पास भी हथियार थे. लेकिन 1996 और 2005 में हुई भारत-चीन संधि के कारण लंबे समय से ये प्रक्रिया चली आ रही है कि फ़ेस-ऑफ़ के दौरान जवान फ़ायरआर्म्स (बंदूक़) का इस्तेमाल नहीं करते हैं."

निरुपमा राव अपनी बातचीत में इसी समझौते का ज़िक्र कर रही थी. वो आगे कहती है कि "उस इलाक़े से जितनी ख़बरें आ रही हैं उससे स्पष्ट है कि तनाव वाले इलाक़े में डिस-ऐंगेजमेंट की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. भारत को थोड़ा इंतज़ार करना चाहिए. ये वक़्त देश के अंदर तनाव का राजनीतिकरण करने का नहीं है. सरकार पर भरोसा जताने का है."

गलवान घाटी की सेटेलाइट तस्वीरें

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हालाँकि चीन ने अपने बयान में साफ़तौर पर ये नहीं कहा कि उसकी सेना पीछे हटी है या नहीं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान से पूछा, "भारतीय मीडिया की ख़बरों के मुताबिक़ चीन गलवान घाटी, जहां दोनों देशों के बीच झड़प हुई थी, वहां से टेंट और उपकरण लेकर पीछे हटा है. क्या आप इसकी पुष्टि कर सकते हैं कि ऐसा हुआ है?"

इसके जवाब में झाओ लिजियान ने कहा, "चीनी और भारतीय सैनिकों ने 30 जून को कमांडर स्तर की वार्ता के तीसरे दौर का आयोजन किया. दोनों ही पक्षों के बीच सहमति बनी कि वो उन बातों पर अमल करेंगे जिसके लिए पिछले दो राउंड के कमांडर स्तर की बातचीत में सहमति बनी थी और हमने सीमा पर तनातनी कम करने दिशा में प्रभावी क़दम उठाए हैं."

"हमें उम्मीद है कि भारत भी अपनी तरफ़ से इतनी ही दूरी तय करेगा, दोनों के बीच बनी सहमति को लागू करने के लिए कड़े क़दम उठाएगा, चीन के साथ सैन्य और राजनयिक चैनलों के माध्यम से संपर्क में रहेगा और चीन के साथ सीमावर्ती इलाक़ों में तनाव कम करने के लिए काम करता रहेगा."

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