कोरोना वायरस महामारी से हमें कब मिलेगा छुटकारा?

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- Author, दीपाली जगताप
- पदनाम, बीबीसी मराठी
कोरोना संक्रमित रोगियों के मामले में महाराष्ट्र देश का नंबर-1 राज्य है. अकेले मुंबई में इसके मरीज़ों की संख्या कुछ राज्यों के कुल रोगियों से अधिक है.
राज्य सरकार ने कोरोना से होने वाली मृत्यु दर पर लगाम लगाने और इसके प्रसार पर निगरानी रखने के उद्देश्य से 12 अप्रैल को कोविड टास्क फ़ोर्स का गठन किया था. टास्क फ़ोर्स को राज्य में कोरोना के इलाज की दिशा तय करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी.
बीते ढाई महीनों के दौरान इस टास्क फ़ोर्स ने कैसा काम किया है? रोज़ कोरोना मरीज़ों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है ऐसे में भविष्य के लिए उसकी योजना क्या है? ऐसे तमाम मसलों पर बीबीसी मराठी ने कोविड टास्क फ़ोर्स के प्रमुख डॉ. संजय ओक से बातचीत की.

जब हमने उनसे पूछा कि महाराष्ट्र में जहां लगातार मरीज़ों की संख्या बढ़ रही है वहीं कोरोना मरीज़ों के ठीक होने की दर भी यहां अच्छी है. आख़िर इसका क्या कारण है?
संजय ओक कहते हैं कि टास्क फ़ोर्स ने अभी राहत की सांस नहीं ली है. फ़िलहाल अधिक से अधिक लोगों का परीक्षण किया जा रहा है और जिनमें कोरोना के लक्षण दिखते हैं उनका कोविड टेस्ट किया जाता है. लिहाज़ा कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ों को समय से इलाज मुहैया हो पा रहा है.
वो कहते हैं, "बीमारियों को हम गंभीरता से नहीं लेते. हमें लगता है कि सर्दी, खांसी या बुख़ार होना बेहद आम बात है. लेकिन इस वक्त हमें ऐसी बीमारियां होने पर लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए. रेमडेसिवीर (Remdesivir) और फाविपिराविर (Favipiravir) नाम से जो दो दवाइयां हमें मिली हैं, वो एंटी-वायरल हैं. ये बीमारी को नियंत्रित रखने में मदद कर सकती हैं."

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क्या होगा न्यू नॉर्मल?
बीते कुछ दिनों में यह देखा गया है कि लोगों के मन में कोरोना के प्रति डर में कमी आई है और वो पहले की अपेक्षा अब बड़ी संख्या में घर के बाहर जा रहे हैं. क्या इसे ख़तरनाक माना जाए या यह सकारात्मक क़दम है.
डॉ. ओक कहते हैं, "आगे हमें न्यू नॉर्मल के साथ अपनी ज़िंदगी को जीना है. हमें घर से बाहर बिना मास्क पहने नहीं निकलना चाहिए. दूसरों के साथ हाथ मिलाने से परहेज़ करना होगा. हमें सोशल डिस्टेंसिंग का बहुत कड़ाई से पालन करना होगा."
घर से बाहर निकलने से पहले ख़ुद से ये पूछें कि क्या यह काम घर से नहीं हो सकता. यानी किसी काम के लिए घर से तभी निकलें जब वो काम घर बैठे कर पाना संभव नहीं हो.
डॉ. ओक कहते हैं कि डॉक्टर और मरीज़ का रिश्ता भी सामान्य नहीं रह जाएगा. इलाज के संबंध में हमें भी मरीज़ों से फ़ोन पर ही अधिक से अधिक बातें करनी होंगी.
डॉ. ओक कहते हैं कि जब लॉकडाउन को आंशिक रूप से हटाया गया था तब कोरोना मरीज़ों की संख्या में दुनिया के दूसरे देशों की भांति यहां भी इज़ाफ़ा हुआ था, लेकिन यहां इससे मौतों की संख्या वैसी नहीं बढ़ी.
कोरोना हमारी ज़िंदगी से कब जाएगा?
फिर हमने डॉ. ओक से वो सवाल पूछा जिसके जवाब का हम बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे. हमने उनसे पूछा कि आख़िर कोरोना वायरस हमारी ज़िंदगी से कब दूर होगा. यानी उसका ख़ात्मा कब होगा?
इस पर उन्होंने पहले तो दो टूक जवाब दिया, "कभी नहीं. यह हमारी ज़िंदगी से कभी ख़त्म नहीं होगा. हमें इसके साथ ही जीना होगा."
इसके बाद उन्होंने इस पर विस्तार से बताना शुरू किया. उन्होंने बताया, "कोरोना वायरस इन्फ़्लुएंज़ा ग्रुप का सदस्य है. जब इन्फ़्लुएंज़ा आया था तब भी लोगों की मौतें हुई थीं. इसके बाद इसकी वैक्सीन आई. लेकिन इन्फ्लुएंज़ा आज भी बरक़रार है. हालांकि उस वायरस की वजह से मौत का डर लोगों के मन में लगभग ख़त्म हो चुका है."
"इसी तरह कोरोना वायरस का वैक्सीन भी आएगा, भले ही इसे आने में डेढ़ या दो वर्ष लगे. स्वाइन फ़्लू को ही देखें, जब टैमिफ़्लू का आविष्कार हुआ तो इसके मामले नियंत्रण में आने लगे. लेकिन कोविड और इन्फ़्लुएंज़ा अलग-अलग तरह के वायरस हैं. कोरोना वायरस सतह पर 72 घंटे तक टिका रहता है. यह एक संक्रामक बीमारी है."

आदत में बदलाव कितना असरदार?
जब कोरोना वायरस इतना घातक है और इसकी वैक्सीन अभी आई नहीं है तो ऐसे में लॉकडाउन में ढील देना कितना सही फ़ैसला है.
इस पर डॉ. ओक कहते हैं कि आख़िर लॉकडाउन कब तक लागू रख सकते हैं, आर्थिक पहलुओं को भी देखना होगा. अगर लॉकडाउन एक विज्ञान है तो अनलॉक कला. हमें विभिन्न चरणों में इसे शुरू करना होगा और यही किया जा रहा है. हमनें अचानक सब कुछ नहीं शुरू किया है.
वो कहते हैं कि इस बीच जैसे जैसे मुंबई के किसी हिस्से में कोरोना पॉज़िटिव मामले बढ़ेंगे, वहां हमें लॉकडाउन फिर से करना पड़ेगा. लेकिन यह हमें प्रभावित इलाके के आधार पर करना होगा. यही न्यू नॉर्मल है.
डॉ. ओक कहते हैं, "सब कुछ लोगों पर निर्भर है. मरीज़ों की संख्या बढ़ेगी या कम होगी यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि लोग अपने व्यवहार में कैसे बदलाव लाते हैं. सोशल डिस्टेंसिंग के मानदंडों का कितनी कड़ाई से पालन करते हैं. लोगों को अपना ख़याल रखना होगा, वो जितनी जल्दी अपनी आदतें बदलेंगे समाज के लिए यह उतना ही अच्छा होगा."
वो कहते हैं कि यह बीमारी हमारे लिए नई है. अमरीका से लेकर एशिया और अफ़्रीका तक के लिए यह नई है और इससे निपटने की रणनीति में लगातार बदलाव किया जा रहा है. हम इसके प्रभाव को देख कर फ़ैसले ले रहे हैं.

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फाविपिराविर कितनी कामयाब?
डॉ. ओक कहते हैं कि कोई भी नई दवा एक लंबी जांच प्रक्रिया से गुज़रने के बाद ही बाज़ार में आती है. जो दवाइयां अभी बाज़ार में मौजूद हैं वो कोरोना वायरस के इलाज के लिहाज़ से टेस्ट प्रक्रिया से नहीं गुज़री हैं. हमें यह ज़रूरी तथ्य को समझना होगा. लेकिन हमें लोगों की जान बचानी है.
"जब हम किसी तूफ़ान में फंसते हैं तो रास्ते में पड़ने वाले किसी भी सहारे को पकड़ना होता है. ठीक वैसा ही रेमडेसिवीर (Remdesivir) और फाविपिराविर (Favipiravir) के साथ है. अमरीका ने कहा है कि वहां रेमडेसिवीर के इस्तेमाल से 50% लोगों का सफल इलाज हुआ है, इसका मतलब 50% असफलता भी है."
वो कहते हैं, "हमारे पास फाविपिराविर को लेकर बहुत वैज्ञानिक आंकड़े नहीं हैं लेकिन जापान और मलेशिया में टेस्ट किए गए हैं. वहां इस दवा का असर हुआ है तो हम इसे यहां भी ले आए."
क्या मुंबई को जल्द ही लॉकडाउन से छुटकारा मिल जाएगा. इस सवाल पर डॉ. ओक कहते हैं कि एक तरफ़ हम आंशिक अनलॉक कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या, स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ा रहे हैं.
वो कहते हैं, "तो मुझे लगता है कि अगले कुछ हफ़्तों में मुंबई एक बार फिर से चल पड़ेगी."
कोरोना की दूसरी लहर आएगी?
बारिश के मौसम में वैसे ही बीमारियों से लोग परेशान रहते हैं. तो क्या बरसात के मौसम में कोरोना वायरस की दूसरी लहर आएगी.
इस पर डॉ. ओक कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि कोरोना वायरस की दूसरी लहर भी आएगी. ऐसा नहीं है कि मामले कम हो जाएंगे लेकिन, दूसरी लहर नहीं आएगी. आने वाले वक्त में हम कोविड को भी अन्य एंडेमिक (endemic) की तरह ही देखेंगे.
क्या कोरोना से प्रत्येक व्यक्ति संक्रमित होगा?
क्या कोरोना वायरस से प्रत्येक व्यक्ति को संक्रमित होना पड़ेगा. इस सवाल के जवाब में डॉ. ओक कहते हैं कि एक बार वैक्सीन आ जाए हम बचाव के कुछ उपाय कर सकते हैं. अगर हम कोरोना वायरस से संक्रमित हो जाएं तो वैक्सीन स्वतः ही एंटीबॉडी बनाएगा. इससे भविष्य में कोरोना संक्रमण की संभावना कम हो जाएगी.
"वैसे हमने कुछ ऐसे भी मामले देखे हैं जहां मरीज़ को दोबारा कोरोना संक्रमण हो गया. कोरोना के कुछ सब-टाइप हैं. जैसे कि ग्लाइकोप्रोटीन. लिहाज़ा हम यह यकीन से नहीं कह सकते कि जो व्यक्ति एक प्रकार के सब-टाइप से संक्रमित हुआ है वो दूसरे प्रकार के सब-टाइप से संक्रमित नहीं होगा."
क्या अभी स्कूलों को खोला जाना चाहिए?
स्कूल और शिक्षा दो चीज़ें हैं. अगर हम बच्चों से स्कूल आने को कहें तो वो एक दूसरे के बहुत क़रीब इकट्ठा होंगे. वो मज़े करेंगे, एक दूसरे के क़रीब जाएंगे. तो जब तक मरीज़ों की संख्या में कमी नहीं आती हमें स्कूलों को नहीं खोलना चाहिए.
दुनिया भर के आंकड़ों पर गौर करें तो हमें अहसास होगा कि भारत में बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद अब तक हमारे यहां उतनी मौतें नहीं हुई हैं जितनी कि पश्चिमी देशों में. भारत में युवा आबादी ज़्यादा है. यह भी संभव है कि जो वायरस भारत में आया वो अलग प्रकार का है.
हालांकि कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो हमारी ज़िंदगी से कभी नहीं जाती. लेकिन हमें अपना समुचित ख़याल रखना होगा. अगर हम डॉक्टरों की सलाह को मानेंगे तो कोरोना वायरस हमारी ज़िंदगी तबाह नहीं कर सकेगा.


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