भारत-नेपाल नक़्शा विवाद: बिहार में सीमा पर बाज़ारों के क्या हैं हालात?

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- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, रक्सौल बाज़ार से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार के रक्सौल शहर के बाज़ार में आजकल सन्नाटा पसरा है. दुकानें खुल रहीं हैं लेकिन ग्राहक नहीं हैं, ज़्यादातर सड़कें खाली पड़ी हैं.
यह इकलौता शहर है जो भारत-नेपाल की सीमा पर बसा है. सीमा के उस पार बीरगंज शहर है जिसे नेपाल की औद्योगिक राजधानी भी कहा जाता है.
दोनों देशों के बीच जारी तनाव का असर यहां के बाज़ार पर साफ़ देखा जा सकता है. सीमा सील है और आमतौर पर नेपाल से आने वाले ग्राहक नदारद हैं.
रक्सौल के स्थानीय पत्रकार अमरदीप कहते हैं, "अगर बॉर्डर सील नहीं होता तो यहां मेला लगा रहता क्योंकि यह शादियों का सीज़न था, सारे त्योहार भी आने वाले हैं. इस बाज़ार में 70-80 फ़ीसदी ग्राहक नेपाल से आते हैं. वो यहां से किराने का सामान, बर्तन, कपड़ा जैसी चीज़ें ख़रीदते हैं."
अमरदीप हमें शहर के मेन रोड में कपड़ों के सबसे बड़ी खुदरा दुकान में ले गए. दो मंज़िला उस दुकान में दो दर्जन से अधिक स्टाफ़ काम कर रहे थे, लेकिन ग्राहक इक्के-दुक्के ही थे.
नेपाल की संसद ने एक नया नक़्शा पारित कर भारत के नियंत्रण वाले लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा इलाक़ों पर अपना दावा जताया है. इसी को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है.
पलायन का सोचने लगे कारोबारी

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दुकान के मालिक बिमल कुमार रुंगटा कहते हैं, "हमारे यहां 90 फ़ीसदी ग्राहक नेपाल से आते थे. लॉकडाउन के बाद 24 दिन हो गए दुकान खोले हुए, लेकिन इतनी भी बिक्री नहीं हो रही कि हम स्टाफ़ को सैलरी दे सकें. घर से पैसे ख़र्च हो रहे हैं. बीते तीन महीनों में दुकान बंद रहने से हमारी कमर टूट गई है. अगर यह तनाव तीन महीने और रह गया तो हमारे पास दुकान समेटने के सिवा कोई और विकल्प नहीं बचेगा."
दूसरे कारोबारियों की तरह रक्सौल के कारोबारियों को भी कोरोना माहामारी से नुक़सान हुआ है लेकिन नेपाल से तनाव ने उनकी परेशानियां कई गुना बढ़ा दी हैं.
कपड़े का थोक व्यापार करने वाले दिनेश धनौठिया कहते हैं, "उम्मीद थी कि लॉकडाउन के बाद सब ठीक हो जाएगा. दुकानें खोलने की इजाज़त मिली लेकिन नेपाल बॉर्डर पर तनाव हो गया है. लोगों का आना-जाना अभी भी बंद है. हमारे लिए दुकान का किराया निकालना भी मुश्किल है इसलिए अब सोच रहे हैं यहां से पलायन कर दूसरी जगह पर व्यवसाय करें."
नो मेन्स लैंड में मिलने को मजबूर लोग
इसके बाद हम रक्सौल से सटी नेपाल की सीमा पर पहुंचे जहां 'गेटवे ऑफ़ नेपाल' बना हुआ है.
लेकिन गेटवे ऑफ़ नेपाल से कुछ ही दूरी पर हमें नेपाल पुलिस ने रोक दिया.
हालांकि सड़क मार्ग से नेपाल की तरफ़ माल से लदे ट्रक आ-जा रहे थे क्योंकि ट्रेड और ट्रांजिट रूट अब भी चालू है.

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तनाव से पहले नेपाल के लोग बॉर्डर पर इजाज़त लेकर भारतीय सीमा में प्रवेश कर सकते थे, लोगों से मिलजुल सकते थे और सामानों का आदान-प्रदान कर सकते थे.
लेकिन अब ये मुलाक़ात 'नो मैन्स लैंड' पर हो पा रही है. दोनों ही देशों ने अपने चेकपोस्ट बनाए हैं जहां सामानों की चेकिंग की जाती है. नो मैंन्स लैंड पर भी ज़्यादा देर रुकने की इजाज़त सुरक्षाकर्मी नहीं दे रहे.
'नेपालियों को भी है नुक़सान'
नेपाल का नागरिक अगर भारत आकर कोई सामान ख़रीदता है तो उसे उतनी ही क़ीमत पर सामान मिल जाएगा जितनी भारत में क़ीमत होती है. लेकिन वही सामान यदि व्यापार के लिए ट्रांसपोर्ट के ज़रिए नेपाल पहुंचे तो उसकी क़ीमत बढ़ जाएगी.
महेश अग्रवाल रक्सौल और दूसरे सीमावर्ती इलाक़े में किराने का व्यवसाय करते हैं और सीमा जागरण मंच नाम के एक संगठन के प्रदेश अध्यक्ष हैं.
उनके मुताबिक़, "नुकसान तो हमारा हो रहा है मगर उससे ज़्यादा नुक़सान नेपालियों का हो रहा है क्योंकि वो ज़्यादा क़ीमत पर सामान ख़रीदने को मजबूर हैं. हमसे चार गुना ज़्यादा नुक़सान उनका है. पर हमें उम्मीद है कि बॉर्डर फिर से जल्दी ही खुल जाएगा क्योंकि कोई भी ज़्यादा दिनों तक नुकसान नहीं सह सकता. अगर नेपाली प्रशासन अधिक सख़्त होगा तो नेपाल के लोग विद्रोह कर देंगे."

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नेपाल में कारोबार करने वाले भारतीयों को भी नुक़सान
नेपाल का बॉर्डर आम लोगों के लिए बंद हो जाने से उन लोगों की मुसीबतें बहुत बढ़ गई हैं जो भारत के नागरिक हैं लेकिन नेपाल में उनका कारोबार है.
नेपाल के बीरगंज में मोटर पार्ट्स का व्यवसाय करने वाले सुरेश कुमार उन्हीं में से एक हैं.
वो कहते हैं, "हमारे जैसे हज़ारों लोग हैं. पिछले तीन महीनों से कारोबार एकदम ठप है. अब तक तो हमारे ग्राहक, दूसरों के ग्राहक बन गए होंगे. अगर आगे दुकान खुलेगी भी तो फिर से बाज़ार बनाना हमारे लिए नई चुनौती होगी. ताज़ा ज़मीन के विवाद को देखते हुए हमने प्लान बना लिया है कि व्यवसाय को वापस भारत में ले आएं. लेकिन उसके लिए भी आवागमन शुरू होने का इंतज़ार करना पड़ रहा है."
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