उत्तर प्रदेश: सिखों को बंटवारे के बाद मिली ज़मीन पर विवाद क्यों?

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश में लखीमपुर ज़िले की निघासन तहसील के सिसैया गांव के रहने वाले अंग्रेज़ सिंह काफ़ी परेशान हैं क्योंकि जिस ज़मीन को उनके पुरखों ने पिछले छह दशक में तैयार किया और बनाए रखा, उस ज़मीन से हटाने के लिए उन्हें वन विभाग ने नोटिस दे दिया है.
नोटिस पाने वाले अपने गांव में अकेले अंग्रेज़ सिंह ही नहीं हैं बल्कि कई लोग हैं.
इसी तहसील के रणनगर गांव के भी कई लोगों को वन विभाग ने ज़मीन खाली करने का नोटिस दिया है.
यह नोटिस पिछले कुछ दिनों में न सिर्फ़ लखीमपुर में बल्कि उत्तर प्रदेश के तराई इलाक़ों में बसे तमाम सिख परिवारों को मिल चुका है.
इन लोगों ने अपनी आवाज़ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंचाई जिसके बाद इन्हें आश्वासन मिला कि किसी को बेदख़ल नहीं किया जाएगा. बावजूद इसके नोटिस मिलना जारी है और कुछ लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर भी दर्ज कराई गई है.

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कौन हैं ये सिख?
भारत विभाजन के बाद ही पाकिस्तान के अलग-अलग जगहों से लाकर कई सिख परिवारों को उत्तर प्रदेश में बसाया गया था. ये परिवार लखीमपुर खीरी, पीलीभीत, रामपुर, सीतापुर और बिजनौर ज़िलों में बसे हुए हैं.
लखीमपुर खीरी ज़िले के रणपुर गांव में ऐसे क़रीब 400 सिख परिवार हैं और गांव की आबादी लगभग 1500 है. पूरा गांव ही इन्हीं सिखों का है जो विभाजन के वक़्त यानी 1948 के आस-पास यहां आकर बसे हैं.
रणपुर गांव के ही बुज़ुर्ग जसवीर सिंह कहते हैं, "विभाजन के बाद सरकार ने सिख परिवारों को यहां लाकर बसाया. हमारे बाप-दादा जब यहां आए तो यह स्थानीय राजा विक्रम शाह का इलाक़ा था. उन्होंने यह ज़मीन दी. कुछ ज़मीनें ख़रीदी गईं. उस समय ज़मीन की रजिस्ट्री नहीं होती थी इसलिए ज़मीन विक्रम शाह के नाम पर ही बनी रही. लेकिन 1966 सीलिंग के दौरान यह ज़मीन वन विभाग के रिकॉर्ड में चली गई."
जसवीर सिंह बताते हैं कि 1980 में चकबंदी के बाद ज़मीनें हमारे नाम पर हो गईं और तब से हमें इनका मालिकाना हक़ मिला हुआ है लेकिन अब हमें यहां से बेदख़ल किया जा रहा है.
वो कहते हैं, "चकबंदी में सिख परिवारों को 1960 से काबिज़ मानते हुए हमारे खाते बांध दिए गए और इसकी खतौनी (भूलेख या ज़मीनों के सरकारी दस्तावेज़) आज भी हमारे पास है. इन्हीं खतौनियों की वजह से हम लोग चीनी मिलों में शेयर होल्डर बने, नलकूपों पर बिजली के कनेक्शन लिए, सरकार ने टंकी, पक्की सड़कें और विकास के कई काम कराए. हमारे पास यहीं के वोटर कार्ड, राशन कार्ड सब कुछ हैं. अब हमें यहां से हटाया जाएगा तो हम कहां जाएंगे."

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वन विभाग का क्या है कहना?
जसवीर सिंह बताते हैं कि सिर्फ़ लखीमपुर में ही नहीं बल्कि भारत विभाजन के बाद पंजाब से आकर उत्तर प्रदेश में बसे क़रीब चार हज़ार सिख परिवार इस समय अनिश्चितता और आशंका से घिरे हुए हैं.
वो कहते हैं कि सात दशक से ज़मीन पर काबिज़ होने और मालिकाना हक़ होने के बावजूद इन पर बेदखली का ख़तरा मँडरा रहा है. हालांकि वन विभाग का कहना है कि सिर्फ़ उन्हीं लोगों को नोटिस भेजा गया है जिन्होंने वन विभाग की ज़मीन पर अतिक्रमण किया है.
लखीमपुर खीरी में उत्तरी रेंज प्रभागीव वन अधिकारी अनिल कुमार पटेल बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "हमने केवल नोटिस दिया है किसी को बेदख़ल तो किया नहीं है. हमारा उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं है लेकिन ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से वन विभाग की ज़मीन पर यदि किसी ने कब्ज़ा किया है तो उसे क़ानूनी प्रक्रिया से हटाया जाएगा."
अनिल कुमार पटेल कहते हैं कि कोरोना संकट की वजह से वन विभाग ने किसी तरह का दबाव भी नहीं बनाया है लेकिन कुछ लोग जानबूझकर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "अतिक्रमण हमने पहले भी हटाया है कई जगहों से और अब भी हटाने की कोशिश कर रहे हैं. जिनकी ज़मीनें वैध होंगी, वो कागज़ दिखाएं, उन्हें कुछ नहीं कहा जाएगा."

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बिजनौर और रामपुर में भी दिए गए नोटिस
हाल ही में बिजनौर में पीएसी को ज़मीन देने के लिए भी क़रीब 650 परिवारों को प्रशासन ने नोटिस दिया है जिसमें अधिकतर परिवार सिखों के हैं.
रामपुर ज़िले की स्वार तहसील में भी वन विभाग कई गांवों में बसे परिवारों को नोटिस दिया है. पीलीभीत ज़िले में भी कुछ परिवारों को नोटिस दिए गए हैं.
पंजाब से शिरोमणि अकाली दल का एक शिष्टमंडल पिछले दिनों इन लोगों की समस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिला तो उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी को बेदख़ल नहीं किया जाएगा.
हालांकि किसानों का कहना है कि इसके बावजूद उन्हें न सिर्फ़ नोटिस भेजा जा रहा है बल्कि उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर भी दर्ज कराई गई है.
लखीमपुर में निघासन के एसडीएम ओमप्रकाश बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि किसी को बेदख़ल करने का तो सवाल ही नहीं है.
वो कहते हैं, "किसी को परेशान नहीं किया गया है. साफ़-साफ़ कहा गया है कि आप कागज़ लेकर आइए. यदि आपने अतिक्रमण नहीं किया है और ज़मीन आपके नाम पर है तो आपको कोई वहां से नहीं हटाएगा."
फिर किसने किया कब्ज़ा?
स्थानीय पत्रकार मोहित शुक्ल बताते हैं कि दरअसल इस इलाक़े में कई बड़े काश्तकार हैं जिन्होंने वन विभाग की हज़ारों एकड़ ज़मीन कब्ज़ा कर रखा है.
उनके मुताबिक, "जहां घने जंगल हैं वहां लोग आगे नहीं बढ़ पाए लेकिन जहां वन विभाग की ज़मीन पर केवल झाड़-झंखाड़ है, उसे साफ़ करके ये लोग आगे बढ़ते गए हैं. इसमें वन विभाग के लोगों की भी लापरवाही रही है कि कभी किसी से कुछ कहा नहीं गया. बड़े काश्तकार छोटे किसानों को बटई पर ज़मीन देते हैं और ये किसान यहां खेती करते हैं. हालांकि इनके पास अपनी भी ज़मीनें हैं."
राज्य सरकार के एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि यहां पर ज़मीनों का बड़ा हिस्सा राजस्व दस्तावेज़ों में दर्ज ही नहीं है. इनके मुताबिक, मुख्यमंत्री ने भले ही कह दिया है कि ये ज़मीनें सिख परिवारों को दी जाएंगी लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है. यहां सिखों को बसाया ज़रूर गया था लेकिन जितनी ज़मीन पर उन्हें बसाया गया उससे कई गुना ज़मीन पर अब उनका अवैध कब्ज़ा है.
यूपी सरकार में राज्यमंत्री बलदेव सिंह औलख कहते हैं कि प्रतिनिधिमंडल से मुलाक़ात के बाद मुख्यमंत्री ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की चार टीमें बना दी हैं जो कि इस बात का पता लगाएगी कि सिखों को उनकी ज़मीनों पर मालिकाना हक़ कैसे दिया जाए.

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औलख कहते हैं, "रामपुर, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर, बहराइच और तराई के कुछ अन्य ज़िलों में सिख और ग़ैर सिख किसानों की प्रताड़ना के कई मामले सामने आने के बाद यह फ़ैसला किया गया है. टीम सर्वे कर रही है. रिपोर्ट मिलने के बाद जल्द ही ऐसे लोगों को उनकी ज़मीन का मालिकाना हक सरकार दिलाएगी."
इस बीच, इस मामले में शिरोमणि अकाली दल के अलावा आम आदमी पार्टी और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी ने भी सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है.
सिख परिवारों का आरोप है कि मुख्यमंत्री के आश्वासन के बावजूद उन्हें परेशान किया जा रहा है जबकि प्रशासन का कहना है कि अवैध तरीक़े से सरकारी ज़मीनों पर काबिज़ लोग जानबूझकर इसका राजनीतिकरण कर रहे हैं.
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