बिहार: कुछ बच्चे खेलते-खेलते मर गए, कुछ घर की ज़िम्मेदारी उठाते-उठाते

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
"मेरे जीजा जी सुबह धान रोपने गए थे. सुबह 8 बजे हमें फ़ोन आया कि उनकी मौत हो गई थी. ज़ोर का ठनका गिरा और जीजा जी दो मिनट में ही गुज़र गए." - अपनी आवाज़ में मायूसी और परिवार में हुई मृत्यु का दुख उठाए नौशाद ने ये बात मुझसे फ़ोन पर कही.
उनके जीजा मोहम्मद अज़ीम की मौत हो चुकी है. गोपालगंज के नौतनहरइया गांव के रहने वाले अज़ीम उन 93 लोगों में से एक थे जिनकी 25 मई को बिहार में बिजली गिरने से मौत हुई है.
नौशाद बताते है, "सुबह साढ़े सात बजे की बात रही होगी. मेरे जीजा अपने खेत में धान रोप रहे थे. अचानक बिजली गिरी, तो खेत और उसके आसपास मौजूद लोग लेट गए. उनकी पत्नी मुन्नी ख़ातून भी उनके साथ थीं. मेरे जीजा जी भी लेट गए, लेकिन अचानक तड़पने लगे और दो मिनट में उनकी मौत हो गई."
छोटे किसान मोहम्मद अज़ीम मुख्य तौर पर मज़दूरी करके अपना परिवार चलाते थे. अपने पीछे वो चार लड़कियों और एक लड़के को छोड़ गए थे. नौशाद कहते हैं, "घर में अकेले वही कमाने वाले थे. लेकिन ऊपर वाले ने उनको बुला लिया. सरकार ने आकर 4 लाख रूपये का मुआवज़ा दिया है. लेकिन इससे वो वापस तो नहीं आ जाएगें."
मासूमों की मौत: कुछ घर की जिम्मेदारी उठाने में, कुछ खेल-खेल में
मोहम्मद अज़ीम के घर जैसा ही मातम वीरेन्द्र पासवान के यहां भी पसरा है. वीरेंद्र सहरसा के सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड के धनपुरा पंचायत के भंवरी गांव में रहते हैं. उनके 17 साल के बेटे रवीश कुमार की मौत हो गई है.
पंचायत के मुखिया धनंजय कुमार सिंह ने बीबीसी को फ़ोन पर बताया, "मेरा बच्चा तक़रीबन डेढ़ बजे के आसपास अपने मवेशियों के लिए घास काटने गया था. ठनका गिरा और वहीं पर उसकी मौत हो गई. पोस्टमार्टम कराया गया है और शुक्रवार को दाह संस्कार होगा. बच्चे के पिता खेत मज़दूर हैं."
वहीं पूर्णिया के क़सबा थाना क्षेत्र के भमरा लागन गांव में बिजली पाँच बच्चों पर गिरी है.
मुखिया प्रतिनिधि अफ़ज़ल हुसैन के मुताबिक़, "बारिश में बच्चे नदी किनारे खेल रहे थे. पाँच बच्चे थे. मोहम्मद तूफ़ान, नवाब, तालीम, नज़ीर और अरमान. सबकी उम्र 12 साल से 10 साल के बीच थी. जब मालूम चला कि बच्चों पर बिजली गिर गई है तो पहले उन्हें क़सबा हॉस्पिटल ले कर गए. एक बच्चे की मौत हो गई है. अब सब बच्चों को सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है."
इसी तरह बांका के रजौन प्रखंड के कठचातर गांव में जानवर चरा रहे तीन बच्चों की मौत वज्रपात से हो गई है.
स्थानीय पत्रकार मनोज कुमार ने बीबीसी को बताया, "कठचातर गांव का 16 साल का शशिकांत दास, 11 साल का रघुनंदन दास, 12 साल का वासुदेव दास दोपहर में मवेशी चरा रहे थे. तभी तेज़ बारिश शुरू हो गई और बिजली भी चमकने लगी. ये बच्चे वज्रपात की चपेट में आ गए. गांववाले उन्हें अस्पताल ले कर भागे, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया."

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25 जून को हुई 93 मौत
पूरे राज्य में सिर्फ़ 25 जून को 93 मौत ठनका या बिजली गिरने से हुई है.
बिहार राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के स्टेट कंट्रोल रूम के सजन कुमार ने 26 जून की सुबह 10 बजे के क़रीब बीबीसी को बताया, "25 जून की रात आठ बजे तक 83 मौत हुई थी. जो रात 10 बजे तक बढ़कर 93 हो गई है."
हालांकि इसमें कितने मनुष्य घायल हुए और पशुधन का कितना नुक़सान हुआ, इसका आंकड़ा स्टेट कंट्रोल रूम के पास नहीं है. लेकिन स्थानीय अख़बारों में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ 25 जून को ठनका गिरने से कम से कम 50 लोग घायल हुए हैं.
इससे पहले भी बीती 26 अप्रैल को बिजली गिरने से बिहार में 12 लोगों की मौत हुई थी. जिसमें सबसे ज़्यादा मौत सारण ज़िले के विशुनपुरा गांव में हुई थी. स्थानीय दैनिक हिंदुस्तान में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ बिहार में साल 2020 में अब तक 196 मौत सिर्फ़ वज्रपात के चलते हुई है.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सभी मृतकों के आश्रितों को 4 लाख रूपये का मुआवज़ा देने की घोषणा करते हुए राज्य के लोगों से सतर्कता बरतने की अपील की है.

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मौसम विभाग की चेतावनी
पटना स्थित मौसम विज्ञान केन्द्र ने 25 से 29 जून को लेकर जो एलर्ट जारी किया है उसके मुताबिक़ 25 जून को गोपालगंज, सीवान, सीतामढ़ी, दरभंगा, सुपौल, अररिया, पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार (9 ज़िलों) के लिए चेतावनी थी जबकि 26 जून के लिए पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सीवान, सारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, मुज़फ़्फ़रपुर सहित 16 ज़िलों के लिए चेतावनी दी है.
29 जून तक मौसम विज्ञान केन्द्र ने बारिश के साथ बिजली गिरने या वज्रपात की सूचना दी है.

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मिड मॉनसून 2019 लाइटनिंग रिपोर्ट - सिर्फ़ 4 महीनों में 170 मौत
क्लाइमेट रिसाइलेंट आब्सर्विंग सिस्टम प्रमोशन कांउसिल, भारतीय मौसम विभाग, मिनिस्ट्री ऑफ़ अर्थ साइंस और वर्ल्ड विज़न इंडिया के साझा सहयोग से निकली इस रिपोर्ट के मुताबिक़ बीते साल 1 अप्रैल से 31 जुलाई 2019 तक बिहार में 170 मौतें वज्रपात से हुई थीं. सबसे ज़्यादा 224 मौतें उत्तरप्रदेश में हुई हैं. जबकि इस मामले में ओडिशा तीसरे नंबर पर है जहां 129 मौतें हुई हैं.
दिलचस्प है कि अगर हम लाइटनिंग स्ट्राइक्स के लिहाज़ से देखें तो ओडिशा में 9 लाख से ज़्यादा लाइटनिंग स्ट्राइक्स हुईं लेकिन यहां मौतों का आंकड़ा 129 है. जबकि बिहार में 2 लाख से ज़्यादा और उत्तरप्रदेश में 3 लाख से ज़्यादा लाइटनिंग स्ट्राइक हुईं, लेकिन मौतें ओडिशा की अपेक्षा कहीं ज़्यादा हुईं.
रिपोर्ट ये टिप्पणी करती है कि उत्तरप्रदेश और बिहार में वज्रपात से बचने की तैयारियों की कमी के चलते इन दो प्रदेशों मे मौतें ज़्यादा होती हैं. हालांकि बिहार सरकार ने 'इंद्रवज्र' नाम का एक मोबाइल एप्प बनाया है.
गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध इस एप्प को डाउनलोड करने पर ये स्मार्ट फ़ोन यूज़र के लगभग 20 किलोमीटर की परिधि में ठनका गिरने की स्थिति में व्यक्ति को लगभग 40 से 45 मिनट पहले ही अलार्म टोन के साथ चेतावनी संदेश देगा.
लेकिन ये सवाल अहम है कि बिहार में स्मार्ट फ़ोन यूज़र कितने हैं और उसमें भी ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले खेत किसान और मज़दूरों की तादाद कितनी है?

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बिहार और पूर्वी यूपी में क्यों गिरती है बिजली?
इंडियन मेट्रोलॉजिकल सोसाइटी बिहार यूनियन के अध्यक्ष और बिहार स्टेट एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज के सदस्य प्रोफ़ेसर प्रधान पार्थसारथी बताते हैं कि मॉनसून के महीने में सामान्य तौर पर बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में वज्रपात की घटनाएं ज़्यादा होती हैं.
वो इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, "जून से सितंबर के बीच मॉनसून महीने में तीन तरह के क्लाउड या बादल बनते हैं. लो, मीडियम और हाई क्लाउड. लो और मीडियम क्लाउड के चलते बारीश होती है. अब इसमें भी क्यूमलस, आल्टो स्ट्रेटस और क्यूम्लोनिम्बस क्लाउड होते हैं. सामान्य तौर पर ठनका या वज्रपात क्यूम्लोनिम्बस क्लाउड के चलते ही होता है."
नेपाल का तराई इलाक़ा मददगार
नेपाल का तराई वाले इलाक़ा मॉनसून के समय में वज्रपात लाने में मददगार साबित होता है.
दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्दालय में प्रो. प्रधान पार्थ सारथी बताते हैं, "ये तराई वाले इलाक़े मददगार इसलिए साबित होते हैं क्योकि बादल को ऊपर चढ़ने का माध्यम मिल जाता है. बादल ऊपर चढ़ता है और ज़्यादा इंटेंस हो जाता है. बादल के ऊपर हिस्से में पॉज़िटीव चार्ज होता है और नीचे निगेटिव चार्ज. ये पॉज़िटीव और निगेटिव चार्ज जब मिलते हैं तो वज्रपात होता है. बादलों के अंदर हो रहे इस वज्रपात को ज़मीन का जो हिस्सा गीला और खुला है, वो ले लेता है."
चूंकि ये वज्रपात खुली जगहों पर होती है. यानी ग्रामीण इलाक़ों में, इसलिए ज़्यादातर मृतक किसान, खेत मज़दूर, मवेशी चराने वाले ही होते हैं.

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जागरूकता ही वज्रपात से लड़ने का उपाय
हालांकि मिनिस्ट्री ऑफ़ अर्थ साइंस ने बिहार में दो जगह लाइटनिंग सेंसर लगाए हैं. पहला दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्दालय (गया, बिहार) और मधुबनी में.
प्रोफ़ेसर प्रधान पार्थ सारथी बताते हैं कि लाइटनिंग सेंसर वज्रपात होने के बाद सूचित करता है और मौसम विभाग सिर्फ़ वज्रपात होने का फ़ोरकास्ट कर सकता है, लेकिन हमारे पास अभी ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जो वज्रपात की एकदम सही घोषणा कर सके.
ऐसे में क्या उपाय है, इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, "एकमात्र रास्ता ये है कि लोगों को जागरूक किया जाए. बिहार का इन्द्रवज्र और मौसम विभाग के दामिनी एप से ज्यादा प्रभावी है कि आप मुखिया, सरपंचों को वज्रपात से बचने की ट्रेनिंग दें, जो अपने गांव में जाकर जागरूकता फैलाएं."
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