H1B वीज़ा: अमरीका में चुनाव से पहले इस 'ट्रंप कार्ड' का भारत पर क्या होगा असर?

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- Author, शुभम किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीन कार्ड और विदेशियों को मिलने वाले वर्क वीज़ा H1B पर लगी पाबंदियों को साल के अंत तक के लिए बढ़ा दिया है.
व्हाइट हाउस ने अपने बयान में कहा कि इस क़दम से अमरीकी लोगों के लिए नौकरी के मौक़े बढ़ेंगे. अमरीकी राष्ट्रपति कार्यालय का अनुमान है कि वीज़ा पर पाबंदी के चलते 5,25,000 नौकरियां अमरीकियों को उपलब्ध होंगी. यह कोरोना वायरस के दौर में अमरीकी बेरोज़गारों के लिए राहत भरा हो सकता है.
हालांकि वो कंपनियां जो विदेशी कर्मचारियों पर ज़्यादा निर्भर हैं, उन्होंने इसका विरोध किया है.
गूगल की पैरेंट कंपनी एलफ़ाबेट के सीईओ सुंदर पिचाई ने ट्विटर पर लिखा, “इमिग्रेशन ने अमरीका की आर्थिक सफलता में बहुत योगदान दिया है और इसे दुनिया में टेक्नॉलॉजी का लीडर बनाया है, गूगल को भी यहां तक पहुंचाया है. मैं इस घोषणा से निराश हूं – हम अप्रवासियों के साथ हैं और सबको लिए बेहतर मौक़े देने के लिए काम करते रहेंगे."
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किन लोगों पर होगा असर
जिन लोगों को H1B वीज़ा मिलता है उन्हें ही अमरीका में अस्थायी रुप से काम करने की इजाज़त होती है. H1B वीज़ा धारकों के परिवारजनों को H4 वीज़ा मिलता है और वो भी अमरीका में रह सकते हैं.
साल 2015 में राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान H1B वीज़ा के नियमों में बदलाव किए गए थे और H4 वीज़ा धारकों को भी अमरीका में काम करने की इजाज़त देने की बात की गई.
अब ट्रंप प्रशासन ने फिर से इसमें बदलाव किए हैं.
अमरीकी प्रशासन के मुताबिक़ इस नियम से 5,25,000 लोगों पर सीधा असर पड़ेगा. इसमें 1,70,000 वैसे लोग हैं जिन्होंने ने ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन दिया है. व्हाइट हाइस ने इससे पहले वीज़ा पर रोक लगाने का आदेश अप्रैल में पास किया था जिसकी अवधि सोमवार को ख़त्म होने वाली थी. वो लोग जिनके पास अभी वीज़ा है, उनका इसपर कोई असर नहीं होगा.
स्किल्ड वर्करों के लिए H1B वीज़ा, कंपनी के अंदर कर्मचारियों के ट्रांसफ़र वाले L-1 वीज़ा, एकेडमिक और रिसर्चरों के लिए J वीज़ा और सीजनल वर्करों के लिए H-2B वीज़ा पर इस फ़ैसले का असर होगा.
हालांकि इस पाबंदी में फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में काम करने वाले लोगों को छूट मिल सकती है.

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भारतीयों पर कितना होगा असर
पिछले साल H1B वीज़ा के 85,000 रिक्त स्थानों के लिए क़रीब 2,25,000 आवेदन आए थे. टेक कंपनियों में काम करने वाले हज़ारों भारतीय हर साल H1B वीज़ा के लिए आवेदन करते हैं.
यूएस सिटीज़नसिप एंड इमीग्रेशन सर्विसेंज़ के आंकड़े बताते हैं कि 5 अक्टूबर 2018 तक 3,09,986 भारतीयों ने इस वीज़ा के लिए आवेदन दिए थे. ये संख्या दुनिया के किसी भी देश से ज़्यादा है. दूसरे नंबर पर चीन आता है जहां के 47,172 लोगों ने इस वीज़ा के लिए आवेदन दिया.
बेंगलुरू की एक कंपनी में काम करने वाली मोनिका कुमारी बताती हैं, “मुझे अक्टूबर में अमरीका जाना था लेकिन अब मैं दिसंबर तक नहीं जा पाऊंगी. दिसंबर के बाद भी क्या ये बैन जारी रहेगा, इसे लेकर भी अनिश्चितता है.”
मोनिका बताती हैं कि सिर्फ़ काम ही नहीं, निजी ज़िंदगी पर भी इसका असर पड़ेगा. वो कहती हैं, “मेरे पति भी अमरीका में काम करते हैं, इसलिए भी मैं वहां जाना चाहती थी. लेकिन इस नए आदेश के बाद मुझे भारत में ही रहना पड़ेगा.”

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हालांकि कई लोगों का मानना है कि ये फ़ैसला चौंकाने वाला नहीं था. नोएडा में 'इम्पैक्ट क्यूए' नाम की एक कंपनी के फाउंडर और सीईओ जेपी भट्ट ने बीबीसी को बताया, “हमें पहले से उम्मीद थी कि ऐसा फ़ैसला आ सकता है. हालांकि मेरा मानना है कि इस फ़ैसले के लिए बाहर की कंपनियां भी ज़िम्मेदार हैं, उन्होंने इस नियम का ग़लत फ़ायदा उठाया है, वो बाहर से आए लोगों को बहुत कम सैलेरी देती थीं, जो सही नहीं है.”
भट्ट का कहना है कि ये एक शॉर्ट टर्म फ़ैसला है और इसका बहुत ज़्यादा असर भारतीय कंपनियों पर नहीं पड़ेगा, अगर ये फ़ैसला लंबी अवधि के लिए लिया जाता तो असर ज़्यादा होता. कई कंपनियां कोरोना के कारण पहले से ही लोगों को दूसरे देशों में नहीं भेजना चाह रही थीं.
हालांकि अमरीका के नॉर्थ कैरोलीना में बतौर एसोसिएट साइंटिस्ट काम कर रहे सतीश रेकुलापल्ली की राय अलग है. बीबीसी तेलुगू से बात करते हुए उन्होंने कहा, “ये अस्थाई निलंबन लाखों नौकरियों पर असर डालेगा. इसका असर अमरीका पर भी पड़ेगा क्योंकि इस देश के पास कई ज़रूरी स्किल वाले लोग नहीं हैं. इसका नुक़सान अमरीका की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा.”
उनकी बात सुंदर पिचाई की आशंका से मिलती जुलती ही है.
सतीश आगे बताते हैं, “अमरीकी सरकार का सबसे ज़्यादा सैलेरी के आधार पर H1B वीज़ा देने का भी तर्क सही नहीं है. वो छात्र जो यहां एमएस या पीजी कोर्स करते हैं उनके लिए पहली बार में ज़्यादा सैलेरी वाली जॉब पाना मुश्किल है,”

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ट्रंप का राजनीतिक फ़ैसला
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष पंत इसे एक राजनीति फ़ैसला बताते हैं, “ट्रप काफ़ी समय से इमिग्रेशन से जुड़े क़ानूनों को सख़्त करने की बात करते रहे हैं, कोरोना महामारी से उन्हें मौक़ा मिल गया है. उन्होंने अभी ये कोरोना को ध्यान में रखकर कहा है कि ये एक राजनीतिक पैकेजिंग का हिस्सा है जो पिछले चुनाव से लेकर इस चुनाव की कड़ी को जोड़ती है.
लेकिन कई कंपनियों का कहना है कि जिस स्किल्ड लेबर को वो H1B वीज़ा के तहत नौकरी देती हैं, वो स्किल्ड लेबर अमरीका में नहीं है, इसलिए इस फ़ैसले का अमरीकी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा.
हर्ष पंत कहते हैं, “जिन वोटरों को ध्यान में रखकर ये किया गया है, वो बेरोज़गार इसलिए है कि वहां मैन्यूफैक्चरिंग बंद हो गई, वो हाई एंड टेक्नॉलॉजी के फ़ील्ड के नहीं है कि उसको मौक़े मिलेंगे. कम समय में अर्थव्यवस्था को बेहतर करने लिए टेक कंपनियों का अच्छा प्रदर्शन ज़रूरी है. इस फ़ैसले से नुक़सान होगा. लेकिन शॉर्ट टर्म में चुनाव भी हैं, तो इसका फ़ायदा ट्रंप को मिल सकता है.”
हर्ष पंत मानते हैं बड़ी कंपनियों को ये डर है कि इसे लंबे समय तक के लिए बढ़ाया जा सकता है. वो कहते हैं, “ट्रंप अगर वापस आ गए तो वो कह सकते हैं कि लंबे समय में इसका फ़ायदा होगा और इसे रहना चाहिए. ये भी देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रपति के रेस में उनके प्रतिद्वंदी बाइडन इसपर क्या कहते हैं.”




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