कोरोना ने सेहत के मामले में सरकारी कंजूसी की पोल खोली है?

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कोरोना महामारी के बीच लोगों के टेस्ट न हो पाने, स्वास्थ्यकर्मियों को उपयुक्त पीपीई किट न मिल पाने, और उन्हें सैलरी तक न दिए जाने की ख़बरों ने भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र के संकट को एक बार फिर से सामने लाकर खड़ा कर दिया है.

वैसे भारत में सरकारी अस्पतालों की हालत किसी से छिपी नहीं है जहाँ डॉक्टरों, बिस्तरों, सुविधाओं और दवाइयों की कमी एक आम बात है, बदइंतज़ामी की समस्या ऊपर से है, और यह हालत दो-चार साल पुरानी नहीं, बल्कि शुरू से ही ऐसी है.

इस बदहाली की मुख्य वजह है स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश की कमी. हालांकि पिछले सालों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी बजट में पहले की तुलना में बढ़ोतरी हुई है और यह 2016-17 के तक़रीबन 37 हज़ार करोड़ से बढ़कर अब 65 हज़ार करोड़ से ऊपर जा चुका है लेकिन ये अभी भी भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद के दो प्रतिशत से भी कम है.

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि 2013-14 में ये आंकड़ा 1.15 प्रतिशत था, जो अब 1.8 प्रतिशत हो गया है. उन्होंने सदन को पिछले साल दिए गए लिखित जवाब में कहा था कि सरकार के पास फ़िलहाल यही आंकड़े मौजूद हैं.

जीडीपी का दो प्रतिशत भी स्वास्थ्य पर नहीं

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स्वास्थ्य के क्षेत्र में केंद्र और राज्य सरकारें दोनों अपनी तरफ़ से ख़र्च करती हैं और ऊपर दिए आंकड़े सिर्फ़ केंद्र सरकार के ख़र्च के हैं, हाल के दिनों में भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी कंपनियों का दख़ल भी बहुत तेज़ी से बढ़ा है मगर वहां मिलने वाली सुविधाओं के चार्ज इतने अधिक हैं कि वो भारत की बड़ी जनसंख्या की पहुंच से बाहर हैं.

पाँच विकासशील देशों के समूह - ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, चीन, भारत और दक्षिण अफ़्रीका) में स्वास्थ्य के क्षेत्र में ख़र्च करने वालों में भारत सबसे निचले पायदान पर है. जहां ब्राज़ील अपने कुल जीडीपी का 9.2 प्रतिशत इस क्षेत्र में लगाता है, वहीं चीन जिससे भारत की बार-बार तुलना की जाती है उसका आंकड़ा पाँच फ़ीसद है, जो भारत के ढाई गुने से भी अधिक है.

भारत में स्वास्थ्य पर ख़र्च हमेशा से ही जीडीपी के दो प्रतिशत के नीचे ही रहा है चाहे जिसकी भी सरकार रही हो जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इसे पाँच के आस-पास होना चाहिए. आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पूर्ववर्ती यूपीए सरकारों के दो कार्यकालों की तुलना में स्वास्थ्य पर ज़्यादा ख़र्च किया है.

सरकारी आंकड़ों की अगर तुलनात्मक समीक्षा की जाए तो अपने छह सालों के कार्यकाल में एनडीए की सरकार ने स्वास्थ्य के मद में वित्तीय आवंटन को हर पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में ज़्यादा ही रखा है. साथ ही, साथ एनडीए की 'आयुष्यमान भारत योजना' को स्वास्थ्य की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण क़दम के रूप में देखा जा रहा है.

लेकिन जानकार कहते हैं कि ये तो यूपीए के कार्यकाल में ही शुरू की गई स्वास्थ्य बीमा की योजना थी लेकिन स्वास्थ्य के मद में वित्तीय आवंटन एनडीए के शासनकाल की तुलना में कम ही रहा.

हालांकि स्वास्थ्य राज्य का मुद्दा है, लेकिन केंद्र सरकार राज्यों को जो आवंटन सेस वसूलने के बाद करती हैं उसे राज्य सरकारें अलग-अलग मद में खंर्च करतीं हैं जिसमें स्वास्थ्य भी एक है. हर राज्य सरकार की अपनी स्वास्थ्य नीति अलग होती है. मिसाल के तौर पर दक्षिण भारतीय राज्य और छत्तीसगढ़ अपनी अलग स्वास्थ्य नीति पर चलते हैं. जबकि कुछ राज्यों ने केंद्र सरकार के आयुष्मान भारत योजना की जगह अपने यहाँ स्वास्थ्य के लिए अलग योजनाएं बना रखी हैं.

प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप का प्रस्ताव

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जन स्वास्थ्य अभियान नामक ग़ैर-सरकारी संस्था भारत में लोगों के स्वास्थ्य के मुद्दे को लेकर काम करती आ रही है. संस्था की दीपिका जोशी कहती हैं कि स्वास्थ्य के सम्बन्ध में जो आधारभूत बदलाव होने शुरू हुए वो यूपीए के शासन काल से शुरू हुए जब स्वास्थ्य बीमा का चलन शुरू हुआ.

इसके बाद भी कई अलग मॉडल राज्यों ने अपनाए. कुछ पूर्णतः सरकार संचालित हैं जबकि कुछ के पैसे सरकार देती है जबकि उनका क्रियान्वयन निजी संस्थान करते हैं.

हाल ही में नीति आयोग ने भी स्वास्थ्य के सम्बन्ध में एक प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप यानी पीपीपी जैसे प्रयोग का प्रस्ताव दिया है जिसमें निजी क्षेत्र के समूह सरकार के साथ मिलकर आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराएंगे. इस प्रस्ताव पर विचार चल रहा है.

नरेंद्र मोदी की सरकार का पहला बजट वर्ष 2015 में पेश किया गया था. आंकड़े बताते हैं कि पहले बजट से ही स्वास्थ्य के लिए हर बजट में पिछले बजट की तुलना में लगभग तीस प्रतिशत के आसपास का प्रावधान किया जाता रहा है. अपने कार्यकाल के आख़िरी वर्ष में यूपीए ने जो बजट पेश किया उसमें स्वास्थ्य के लिए 33 हज़ार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया.

वीडियो कैप्शन, केजरीवाल बोले, सारे मरीज़ों को अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत नहीं

जहाँ तक एनडीए की सरकार का सवाल है तो आते ही पहले बजट में स्वास्थ्य के लिए 29 हज़ार करोड़ रुपये आवंटित किए गए जबकि अगले वित्तीय वर्ष में इस राशि को बढ़ाकर 37 हज़ार करोड़ रुपये कर दिया गया. फिर वर्ष 2017-18 के वित्तीय वर्ष में इस राशि को बढ़ाकर 47 हज़ार करोड़ रुपये कर दिया गया. वित्तीय वर्ष 2018-19 में स्वास्थ्य के मद में 52 हज़ार करोड़ रुपये बजट में आवंटित किए गए जबकि वित्तीय वर्ष 2019-20 में ये राशि बढ़ाकर लगभग 65 हज़ार करोड़ रुपये कर दी गई.

वरिष्ठ पत्रकार अश्लिन मैथ्यू कहती हैं कि यूपीए के शासनकाल में एक बात गंभीर थी - स्वास्थ्य के लिए आवंटित की गई राशि का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया जबकि देश के ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव रहा. इस मामले में एनडीए की सरकार ने अभी तक अपना रिकॉर्ड ठीक रखा है जब आवंटित की गई राशि का इस्तेमाल पूर्णतः किया जा रहा है.

लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि पिछले वित्त वर्ष में स्वास्थ्य के मद में सरकार ने आवंटन की रक़म बढ़ा तो दी मगर इसमें कई क्षेत्र अछूते रह गए जैसे कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम और ह्रदय रोग और मधुमेह नियंत्रण कार्यक्रम जिनके आवंटन में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई.

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले

    कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है

    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

    लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.

  • एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल

    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
  • कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स

    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

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मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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