कोरोना लॉकडाउन: नरेंद्र मोदी की चिट्ठी पर आया है इन प्रवासी मज़दूरों का जवाब
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कोरोना संकट के दौरान भारत ने शुरुआती दौर में जो बड़ा संकट देखा, वो था प्रवासी मज़दूरों का पलायन.
पैदल चलते, साइकिल चलाते, बसों और ट्रकों में चढ़ने के लिए संघर्ष करते मज़दूरों की तस्वीरें लंबे समय तक लोगों के दिलो-दिमाग़ पर बनी रहेंगी.
किसी ने साइकिल से लंबी-लंबी यात्राएँ की, तो भूख-प्यास से बेहाल कोई मज़दूर पैदल ही बिना चप्पल के तपती दुपहरी में अपने-अपने गंतव्य के लिए निकल पड़े.
कई गर्भवती महिलाएँ अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लिए लगातार चल रही थीं, तो कई बच्चे अपने पिता का हाथ थामे लंबी यात्रा पर चल रहे थे. ऐसे नज़ारे भारत के हर हिस्से में आम हो गए थे.
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शुरू में सरकारें ख़ामोश थीं, तो विपक्ष आक्रामक था. सरकार जगी और कुछ क़दम उठाने की कोशिश भी की, लेकिन तब तक कई मज़दूर अपनी जान गँवा चुके थे. कई ट्रेन के नीचे आ गए, तो कई ट्रक और बस दुर्घटनाओं का शिकार हो गए.
इसी कोरोना काल में भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का पहला साल पूरा किया.
इस मौक़े पर पीएम मोदी ने देश की जनता के नाम एक पत्र लिखा. इस पत्र में देश को संकटकाल में आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान था, तो सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास की भी बात की. अनुच्छेद 370, तीन तलाक़ विधेयक और राम मंदिर निर्माण की भी ज़ोर-शोर से चर्चा की गई थी.
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लेकिन इन सबके बीच पीएम मोदी ने लॉकडाउन के दौरान मज़दूरों के संकट पर ज़्यादा कुछ नहीं कहा. उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा कि प्रवासी मज़दूरों को दिक़्क़त हुई है और इसे दूर करने की कोशिश हो रही है.
पीएम मोदी की इस चिट्ठी के जवाब में अगर इन प्रवासी मज़दूरों और इनके परिजनों को चिट्ठी लिखनी होती, तो वे पीएम मोदी को क्या लिखते. बीबीसी ने इन्हीं में से तीन लोगों से बात की, जो प्रवासी मज़दूरों की असीमित पीड़ा का चेहरा बन गए थे.
अशोक सिंह गौड़, शहडोल, मध्य प्रदेश
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इमेज कैप्शन, अशोक सिंह का बेटा और उनके परिवार के नौ लोग महाराष्ट्र में रेल हादसे में मारे गए थे.
लॉकडाउन के दौरान महाराष्ट्र के औरंगाबाद का ट्रेन हादसा और रेल पटरी पर बिखरी रोटियाँ एक दर्दनाक दास्ताँ थी. उस हादसे ने मज़दूरों की एक ऐसी बेबसी बयां की, जो रुलाने वाली थी.
आँसू तो मध्य प्रदेश में शहडोल के रहने वाले अशोक सिंह गौड़ के भी नहीं सूख रहे हैं. अशोक सिंह का बेटा इस हादसे में अपनी जान गँवा बैठा. आइए जानते हैं अशोक सिंह पीएम मोदी के नाम पत्र में क्या लिखना चाहते हैं.....
चौबीस साल का था, एक बच्चा भी है, डेढ़ साल का बच्चा. दोषी किसको बनाएँ? सरकार को बनाएँ? इन बच्चों को बनाएँ? रेलवे विभाग को, किसको?
याद रहेगा कि लॉकडाउन में बच्चा गुज़र गया. दो पैसा कमाता था तो बाप-बेटे अपना परिवार पालते थे. लेकिन उस चीज़ में अधूरे हो गए.
प्रधानमंत्री हमारे जो कह देंगे, उसमें हम बराबर भरोसा मानेंगे.
जीवन तो गुज़र गया, लेकिन उनके बाल बच्चों के लिए कुछ रोज़गार आधार चाहिए. हमारा कर्तव्य और मांग तो यही है.
सरकार जो कहेगी, हम मान लेंगे. मांग हमारी यही है कि हमारा बेटा गया तो गया, लेकिन उनके बच्चों का कोई आधार होना चाहिए.
हमारी केंद्र सरकार है, प्रधानमंत्री महोदय जी हैं, उनकी निंदा से हमको क्या करना है?
प्रधानमंत्री को तय करना है कि उन्हें पब्लिक के साथ बहलावा करना है या हमें न्याय दिलाना है. हमारी सोच यही है कि जो करना है सरकार को ही करना है. हम सरकार से इंसाफ़ मांग रहे हैं. सरकार इंसाफ़ हमें दे.
अभी तो डेढ़ साल का बच्चा है, उसे पालने में हमें कुछ दिन लगेंगे. अगर परमात्मा नहीं रूठा, तो हमारे पास आधार है. जो परमात्मा ही रूठ गया तो हमारे पास क्या रहेगा.
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इमेज कैप्शन, रेल हादसे में जान गंवाने वाले युवक
आश्वासन तो बहुत दे रहे हैं प्रधानमंत्री कि मदद भेजेंगे, रेलवे मदद भेजेगा, कंपनी वाले मदद करेंगे. लेकिन हमें अभी तक कुछ नहीं मिला है.
आज हमारे पास ज़मीन होती, खेती बाड़ी होती तो हम बाहर नहीं जाते, कुछ न कुछ यहीं रोज़गार करते. बिना रोज़गार के आदमी अगर बाहर नहीं जाएगा तो घर में चूल्हा भी नहीं जलेगा.
आप ये लॉकडाउन ना लगवाते या तीन मई से कम से कम एक सप्ताह के लिए लॉकडाउन खोल दिए होते, तो जितने प्रवासी मज़दूर थे, वो अपने गाँव पहुँच जाते.
दिक़्कत़ तो है, कुछ न कुछ कमी तो है शासन की ओर से, हम ये नहीं कहते कि कमी नहीं है. अगर एक सप्ताह के लिए लॉकडाउन खुला होता तो सब घर पहुँच जाते.
जो महीने भर से भूख से तड़प रहे थे, जिनके पास खाने के लिए नहीं था. उन्हें एक दिन का मौक़ा भी नहीं मिला.
सात बजे चले हैं जालना से, पेट में भोजन नहीं, फिर पैदल चलना. 900 किलोमीटर पैदल चलना था, जो रोटी बचाकर ना रखते तो कौन रोटी देता.
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इमेज कैप्शन, रेल की पटरी पर पैदल चलते मज़दूर
रोड पर पुलिस का डंडा. सिर्फ़ पटरी और रोटी का सहारा था. रोटी को लेकर एक पटरी पर चलते रहे. जब तक चंद्रमा का प्रकाश रहा, चलते रहे.
अंधेरा हुआ तो ये लोग सोचे कि पटरी पर जाएँगे तो रपट कर गिर जाएँगे, जब सारी रात ट्रेन नहीं आई और दिन निकलने वाला था. ट्रेन शायद अब भी नहीं आएगी, यही सोचकर, जब सुबह होने वाली थी, तब वो आराम लेने के लिए लेट गए.
जैसे ही लेटे नींद लग गई, भूख से परेशान रहे, नींद अलग, थकान अलग. उस वक़्त तीनों सिस्टम एक बराबर रहे. इसलिए ही ना ट्रेन की आवाज़ उन्हें सुनाई दी, पटरी एक किलोमीटर पहले से ही आदमी को सतर्क कर देती है. लेकिन उन्हें कोई अहसास नहीं हुआ.
नींद के लिए कोई बिस्तर नहीं चाहिए. जब शरीर में नींद आ जाती है तो आदमी बिस्तर नहीं ढूंढता है, वो आराम चाहता है. उसे लेटना है तो लेटना है. यही उन्होंने किया.
मोहन पासवान, दरभंगा, बिहार
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इमेज कैप्शन, ज्योति कुमारी के साथ मोहन पासवान
बिहार की ज्योति कुमारी की चर्चा अब देश-विदेश पहुँच गई है. अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इंवाका ट्रंप ने उनकी सराहना में ट्वीट किया और उनके पास सहायता करने वालों की भी क़तार लग गई.
लेकिन एक समय ऐसा भी था जब अपने बीमार पिता को साइकिल से गुरुग्राम से बिहार लाने का फ़ैसला ज्योति कुमारी ने कर लिया. एक छोटी साइकिल पर अपने पिता को बैठाकर निकल पड़ी ज्योति को रास्ते में परेशानी भी झेलनी पड़ी, तो मदद भी मिली.
लेकिन उनकी साइकिल वाली तस्वीर भी लॉकडाउन की पीड़ा की एक कहानी थी कि कैसे मजबूरी में एक बेटी को साइकिल से इतनी लंबी यात्रा पर निकलना पड़ा.
जानते हैं कि ज्योति के पिता मोहन पासवान पीएम मोदी के लिए पत्र में क्या कहना चाहते हैं.
हम लोग किसी तरह मरके जीके आए हैं. सरकार से अनुरोध है, जो भी मज़दूर लोग बाहर फँसे हैं या तो उन्हें सही समय पर काम दे दें या उनकी सहायता करें.
जो प्रवासी मज़दूर फँसे हैं अगर उन्हें काम मिल जाता तो वो घर क्यों जाते. हमें ही काम मिल जाता तो हम अपने घर क्यों जाते.
या अगर हमारी खाने-पीने की ही व्यवस्था हो जाती तो हम क्यों आते?
ये नहीं कि कह दिए टीवी पर कि व्यवस्था हो गई और गली मोहल्ले में कुछ नहीं. हम लोग मौत और ज़िंदगी के बीच में थे, और सिर्फ़ हम ही नहीं हम जैसे लाखों थे.
लोग पैदल थे, साइकिल से थे, ठेली से थे, मोटरसाइकिल से थे. सड़क लोगों से भरी थी. लोग रात भर सफ़र कर रहे थे.
लोगों का तांता देखकर हिम्मत बढ़ती गई. एक डेढ़ लाख लोग सड़क पर चल रहे थे. उन्हें देखकर हौसला मिल रहा था.
वीडियो कैप्शन, पिता को साइकिल पर बैठाकर कई किलोमीटर ले गई बेटी
हमने लॉकडाउन भी फॉलो किया, लेकिन जैसे टीवी पर कह रहे थे कि खाना-पीना मिलेगा, लेकिन हमें मिल नहीं रहा था. कह रहे थे कि घर-घर राशन भेजा जा रहा है, लेकिन हम लोगों को मिल नहीं रहा था.
ठीक है लॉकडाउन में काम नहीं था, लेकिन जो प्रवासी मज़दूर थे उन्हें भूखे तो नहीं मारना था.
हम मज़दूर इंसान हैं, ना हम राजनीति जानते हैं ना ही और कुछ. इन सब चीज़ों से अच्छा था कि जहाँ लोग फँसे थे, वहाँ उन्हें खाना मिल जाता.
सबसे ज़्यादा दिक़्क़त खाने की हुई. नंबर लगाया, लाइन में खड़े रहे, लेकिन खाने को नहीं मिला. दिल दहल जाता है उस वक़्त का सोचकर. हमारी बच्ची हमें उठाकर लेकर आई.
दूसरों का ग़म देखकर इंसान अपना ग़म भूल जाता है. साथ चले रहे प्रवासियों के पैर ज़ख़्मी हो गए थे. वो औरतें पैदल चल रहीं थीं जिनकी डिलीवरी होनी थी. छोटे-छोटे बच्चे पैदल चल रहे थे. उन्हें देखकर हौसला बढ़ रहा था.
हम सोच रहे थे कि कितने मुश्किल हालात हैं कि लोग पेट की ख़ातिर घरों की ओर जा रहे हैं. अगर खाने-पीने का इंतज़ाम शहर में ही हो गया होता तो इतने कष्ट लोग क्यों उठाते?
रामपुकार पंडित, बेगूसराय
बिहार में बेगूसराय के रहने वाले रामपुकार पंडित की फ़ोन पर बात करते रोते हुए तस्वीर काफ़ी वायरल हुई थी. लेकिन इस तस्वीर के पीछे की कहानी वाक़ई रुलाने वाली थी.
रामपुकार बेटे की मौत की ख़बर सुनकर 11 मई को दिल्ली से पैदल ही बेगूसराय के अपने गाँव तारा बरियारपुर के लिए निकल पड़े थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें दिल्ली-यूपी बोर्डर पर रोक दिया था.
अपने बेटे की मौत के ग़म के बीच व्यवस्था की आँच में झुलसे रामपुकार को आज भी इसका मलाल है कि वे अपने बेटे को आख़िरी विदाई नहीं दे पाए.
रामपुकार अपनी कहानी बताते हैं और ये भी बताते हैं कि पीएम मोदी से उन्हें क्या कहना है.
मेरा नाम है रामपुकार पंडित. मेरे लड़का का नाम था राम प्रवेश कुमार. मैं बिहार के बेगूसराय ज़िले में रहता हूँ.
मोदी जी के नाम मेरी चिट्ठी, अगर वो पढ़ें तो-
चार या पाँच मई को मेरे लड़के की तबीयत ख़राब थी. मेरे पास दो हज़ार रुपए थे तो हम लगा दिए थे. वो लेकिन नहीं बचा. बच्चा टिक नहीं पाया. साल भर का बच्चा था.
हम लेबर का काम करते थे, सीमेंट में बालू मिलाकर देते थे. लॉकडाउन हो गया, लॉकडाउन में बच्चा बीमार पड़ गया. तीन लड़कियों के बाद एक लड़का हुआ था.
मैं दिल्ली से निकल पड़ा कि अपने बेटे की सूरत देख लूँ. मैंने अपने आप से कहा कि मैं मर जाऊँगा अगर सूरत न देख पाया तो.
अब कुछ मन नहीं लगता. मन पूछता है कि मेरे बेटा क्या कहेगा?
उसकी माँ कहती है वो मुझे कंधे पर लेकर जाता, लेकिन उसे मैं कंधे पर लेकर गई. माँ और क्या कहेगी, माँ यही कहेगी और कलेजे पर पत्थर धर लेगी. घर में अब तीन बेटियाँ हैं, पत्नी हैं.
सरकार से यही मांग करता हूँ कि कुछ काम दिला देंगे तो हम कर लेंगे. हम सरकार से यहीं कहना चाहेंगे कि हमारा घर देखकर, हमारा रुतबा देखकर, उन्हें जो ख़ुशी हो वो हमारे लिए कर दें.
वो जो करेंगे, हम मान लेंगे. हम क्या कहेंगे, बस हमारे लिए रोज़गार हो.
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
बाीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.