भारत-चीन सीमा विवाद: लद्दाख में चीन की सीमा के नज़दीक रहने वाले लोगों का क्या है हाल – ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, आमिर पीरज़ादा, बीबीसी संवाददाता
- पदनाम, रिंचेन अंगमो चुमिकचन, स्वतंत्र पत्रकार
लद्दाख में भारत और चीन की सेना के बीच जिस दिन बातचीत चल रही थी, उसी दिन दूसरी ओर इस क्षेत्र के लोग ख़ासे तनाव में थे.
उनको डर है कि अगर दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ता है तो यह तब ख़त्म होगा जब उनके चरागाह चीनी क्षेत्र में चले जाएंगे.
कथित तौर पर 5 मई के बाद लद्दाख के कई क्षेत्रों में भारत और चीनी सुरक्षाबल आमने-सामने हैं.
पूर्वी लद्दाख में एक महीने से चली आ रही इस तनातनी को ख़त्म करने के लिए शनिवार को दोनों पक्षों के बीच शीर्ष सैन्य स्तर की बातचीत हुई.
रविवार को भारतीय रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी किया कि दोनों पक्षों के कमांडर शांतिपूर्ण तरीक़े से पूर्वी लद्दाख के वर्तमान सीमा मुद्दों को द्विपक्षीय समझौतों के आधार पर सुलझाने के लिए तैयार हैं.
वास्तविक नियंत्रण रेखा
भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक टीवी चैनल को हाल ही में दिए इंटरव्यू में कहा था कि क्षेत्र में चीनी सैनिकों ने बड़े निर्माण किए हैं और भारत ने पर्याप्त क़दम उठाए हैं.
इससे पहले दोनों सेनाओं के जवानों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर झड़प की ख़बरें आई थीं.
भारत और चीन के बीच पैंगॉन्ग झील और गलवान नदी इलाक़े में सीमा का कोई निर्धारण नहीं है. बेहद ठंडे इलाक़े में ये झील लद्दाख क्षेत्र में 4,350 मीटर की ऊंचाई पर है.
समाचार एजेंसियों के मुताबिक़, इस क्षेत्र में दोनों देशों के जवान डेरा डाले हुए हैं और दोनों एक दूसरे पर क्षेत्र में घुसपैठ का आरोप लगा रहे हैं.

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स्थानीय लोगों के लिए क्या है इन सबका मतलब?
भारत और चीन बेहद लंबी सीमा साझा करते हैं और दोनों ही पक्ष सीमा के कई क्षेत्रों पर अपना-अपना दावा करते रहे हैं.
भारत के रक्षा मंत्री ने हालिया इंटरव्यू में कहा था कि दोनों देशों की सीमा को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं और भारत-चीन आमने-सामने आते रहे हैं लेकिन उन्हें शांतिपूर्वक सुलझा लिया गया था.
वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का ख़राब सीमांकन लद्दाख में दोनों देशों को अलग-अलग करता है. दोनों देश की सीमाओं के बीच में नदियां, झीलें और बर्फ़ीले पहाड़ पड़ते हैं जो दोनों देशों के जवानों को अलग करते हैं लेकिन वे टकराव के लिए क़रीब भी आ सकते हैं.
विभिन्न सूत्रों के अनुसार, दोनों देशों के बीच वर्तमान टकराव पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी और पैंगॉन्ग झील में हुई है जिसने स्थानीय लोगों के भविष्य को लेकर चिंता में डाल दिया है.
लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के काउंसलर और शिक्षा के एग्ज़िक्युटिव काउंसलर कोंचोक स्टेंज़िन कहते हैं, "मैं गांवों को लेकर चिंतित हूं क्योंकि हमारे कुछ गांव उस जगह से 2-3 किलोमीटर दूर हैं जहां पर भारत-चीन के बीच टकराव हुआ है."
बीते महीने से एलएसी से जुड़े पूरे क्षेत्र में भारतीय सुरक्षाबलों की भारी आवाजाही देखी गई है. एलएसी पर अधिकतर जगहों पर आईटीबीपी के जवान ही सुरक्षा के लिए तैनात होते आए हैं.
लेकिन हालिया तनाव के बाच स्थानीय लोगों का कहना है कि वहां पर भारतीय सेना की तैनाती की गई है.

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स्थानीय लोगों में डर
कोंचोक स्टेंज़िन कहते हैं, "इस इलाक़े में सेना की बड़ी आवाजाही से स्थानीय लोगों में डर है. 1962 युद्ध के बाद से हमने ऐसी स्थिति कभी नहीं देखी थी."
इस क्षेत्र के सरपंच सोनम आंगचुक कहते हैं, "हम अपने गांव से हर दिन 100-200 वाहन आते-जाते देखते हैं. हम सेना के वाहनों की यह असामान्य आवाजाही देखकर डर गए हैं."
"हमारी सेना और चीनी सेना के बीच पहले भी कई बार टकराव हो चुका है लेकिन वर्तमान स्थिति असामान्य लगती है."
आंगचुक मान, पैंगॉन्ग और फ़ोबरांग गांवों के सरपंच हैं. ये गांव एलएसी के बेहद क़रीब हैं.
पूर्वी लद्दाख के सीमाई गांवों में हाल ही में स्थानीय संसद जमयांग सेरिंग नामग्याल के साथ काउंसलर की टीम पहुंची थी.
तांगस्ते निर्वाचन क्षेत्र के काउंसलर ताशी यकज़ी भी उस समूह के सदस्य थे.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मनेराक गांव पैंगॉन्ग झील की फ़िंगर-4 की दूसरी ओर है, गांव वाले बेहद डरे हुए हैं और सीमा के क़रीब होने की वजह से वो बेहद कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं."
उन्होंने कहा, "रोज़ाना का काम वैसे ही चल रहा है लेकिन इसने लोगों की ज़िंदगियों को प्रभावित किया है. पहले कोरोना वायरस, अब चीनी आक्रमण और उस पर भी कोई बातचीत नहीं हुए है. यह स्थानीय लोगों में डर भर रहा है. रोज़ का कामकाज चल रहा है लेकिन दिमाग़ी रूप से वे डर और बेचैनी के साए में हैं."

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'जानवरों के घास के मैदान पर चीन ने क़ब्ज़ा किया'
गलवान घाटी में एलएसी के नज़दीक रहने वाले अधिकतर स्थानीय लोग ख़ानाबदोश समुदाय से आते हैं जो अपने पशुओं पर निर्भर हैं.
लद्दाख को ठंडा रेगिस्तान कहा जाता है जहां पर आम परिस्थितियों में भी पशुओं के लिए चारा ढूंढना बेहद मुश्किल है. ये ख़ानाबदोश लोग उन चरागाहों पर निर्भर रहते हैं जहां पर अब दोनों देशों के बीच टकराव है.
उन लोगों को डर है कि उनके जानवरों के चरागाह सिकुड़ते जा रहे हैं क्योंकि चीनी हर साल इस पर क़ब्ज़ा कर रहे हैं.
कोंचोक स्टेंज़िन कहते हैं, "हमारे बहुत से चरागाह वाले इलाक़े चीनियों द्वारा क़ब्ज़ा कर लिए गए हैं और यह डर है कि वो बाकी इलाक़ों पर भी क़ब्ज़ा कर लेंगे. अगर हमारे जानवरों के चरने की यह जगहें चली जाएंगी तो हमारे घुमंतू समुदाय की जीवनरेखा भी चली जाएगी फिर हमारे यहां रहने की कोई वजह नहीं बचेगी."
लेह में लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद में कोरज़ोक क्षेत्र से काउंसलर गुरमेट डॉर्जी कहते हैं, "पहले यह क़ब्ज़ा इंच या फ़ुट में होता था लेकिन अब ये किलोमीटर में होने लगा है. हमारे लिए यहां रहना मुश्किल हो जाएगा."
चुमुर गांव के प्रधान पद्म इशे कहते हैं, "पहले हम अपने याक और घोड़ों को घास के मैदानों में भेज देते थे लेकिन अब वो वापस नहीं आते हैं. हमें उन्हें ढूंढने की अनुमति नहीं है. 2014 में तक़रीबन 15 घोड़े ग़ायब हो गए थे."
स्थानीय लोगों के दावों पर भारतीय रक्षा मंत्रालय के एक सूत्र ने बीबीसी को बताया कि वहां भूमि का कोई अतिक्रमण नहीं हुआ है क्योंकि भारत और चीन के बीच अभी तक कोई स्थापित सीमा नहीं है.
मंत्रालय के सूत्र ने कहा, "इस बात से कोई इनकार नहीं है कि पारंपरिक चरागाह के क्षेत्र सिकुड़ गए हैं. लेकिन जैसे-जैसे जनसंख्या में बढ़ोतरी हो रही है वैसे-वैसे भारत और चीन अपने क्षेत्रों की मुस्तैदी से सुरक्षा कर रहे हैं."

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एक फ़ोन कॉल के लिए 70 कि.मी. की यात्रा
इस क्षेत्र के कई गावों में संपर्क का साधन बड़ा मुश्किल होता है. लेकिन इस दूरस्थ क्षेत्र के कुछ गावों में बीएसएनएल काम करता है जिसकी सेवाएं बीते एक सप्ताह से रद्द हैं जो स्थानीय लोगों में डर भर रहा है.
सोनम आंगचुक कहते हैं, "सीमा के इलाक़ों के साथ जब भी कोई समस्या होती है तो वो सबसे पहले संचार का साधन काट देते हैं जो हमारे लिए एक समस्या है. सिर्फ़ हमारे इलाक़े में बीएसएनएल काम करता है जो छह साल पहले ही शुरू हुआ है."
स्थानीय काउंसलर ताशी यकज़ी कहते हैं, "पूर्वी लद्दाख़ में 12 मई को न्योमा और दुर्बुक ब्लॉक में संचार बंद कर दिया गया था. फिर मैं इस मामले को प्रशासन के पास ले गया और इसके बाद 15 मई को इसे दोबारा बहाल किया गया. 3 जून को दोबारा बंद किया गया और आज (7 जून) तक यह बहाल नहीं किया गया है."
लद्दाख के सीमाई गांवों में बेहद कम मोबाइल सेवा पहुंची है. बीते कुछ सालों से सरकारी बीएसएनएल सेवा कई गांवों में मोबाइल सेवा दे रही है लेकिन दुनिया से जोड़े रखने में ये बहुत दूर है.
पद्म कहते हैं, "हमारे पास कोई संचार का साधन नहीं है और अगर कुछ होता है तो हम कैसे संपर्क कर पाएंगे ये बड़ा सवाल है. हमें एक कॉल करने के लिए 70 किलोमीटर दूर कोरज़ोक (सोमोरिरी) जाना पड़ता है और कभी-कभी इससे भी काम नहीं बन पाता है."
उन्होंने कहा, "पिछले साल तक हमारे पासे डीएसपीटी (डिजिटल सेटेलाइट फ़ोन टर्मिनल्स) थे जो अब बंद हो गए हैं. और सर्दियों में हम सेटेलाइट फ़ोन इस्तेमाल करते थे लेकिन इनके महंगे होने की वजह से इसे बंद कर दिया गया है इसलिए अब कुछ नहीं है."

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भारतीय सेना को कैसे देख रहे हैं लोग?
स्थानीय लोग कहते हैं कि जब भी क्षेत्र में तनाव होता है तो वो भारतीय सेना को समर्थन करने में आगे रहते हैं.
कोंचोक कहते हैं, "1962 के भारत-चीन युद्ध में हम ख़ानाबदोश दूसरे मार्गदर्शक बल थे."
सोनम आंगचुक कहते हैं, "जब भी ऐसी स्थिति रही हो हमने सेना की बड़े तरीक़ों से मदद की है. हमने कुलियों, घायल जवानों को ले जाकर और राशन से मदद की थी."
कोचोक कहते हैं कि हालिया तनाव के बाद स्थानीय लोग ज़रूरत के वक़्त फिर खड़े होंगे.
वो कहते हैं, "हमारी सेना, गांव के सरपंच और प्रधान के साथ बैठक हुई थी. हमने सेना से कहा कि हम उनकी सहायता के लिए तैयार हैं चाहे वो लोगों से हो, वाहनों से हो या फिर दूसरी चीज़ों से हो."
लद्दाख जैसे इलाक़े में सैन्य अभियान बेहद कठिन है. 14 से 18 हज़ार की ऊंचाई पर इस इलाक़े में बहुत सी जगहों पर गाड़ियां नहीं जा सकती लेकिन स्थानीय लोग कई तरीक़े से समर्थन कर सकते हैं.
लेकिन इस बार वो बेहद डरे हुए हैं क्योंकि प्रशासन की ओर से कोई भी संचार का साधन नहीं है.
कोंचोक कहते हैं, "गांववाले नहीं जानते हैं कि सीमा पर क्या हो रहा है और प्रशासन को चाहिए कि वो सूचित करे ताकि स्थानीय लोगों में डर न हो."
भारत और चीन के बीच तनाव के बाद दोनों ही देशों ने आधिकारिक रूप से बातचीत की कोई विस्तार से जानकारी साझा नहीं की है.
इससे पहले भी दोनों देशों के बीच 2017 में टकराव हुआ था. डोकलाम में भारत और चीन के बीच यह तनाव महीनों तक चला था.
हालिया घटना भारत में कई विश्लेषकों को चिंता में डाल देती है.
लद्दाख के लेह शहर के लेखक और राजनयिक पी स्टोबडान कहते हैं, "1962 युद्ध के बाद हमने ऐसी संघर्ष की स्थिति नहीं देखी थी. कई जगहों पर छोटी-मोटी घटनाएं होती थीं लेकिन उस वक़्त वो कई कारण बताते थे. जैसे कि भारत किसी इलाक़े में कुछ निर्माण कर रहा है, उसके बाद आपको उस जगह को हटाना होता था जिसके बाद आगे की बातचीत होती थी लेकिन इस बार मुझे लगता है कि बातचीत उन्हें झुकाने वाली है. हालांकि, मैं सोचता हूं कि भारत सरकार इससे निपटने में अच्छी तरह से तैयार है."
वहीं, चीन भी कह चुका है कि स्थिति इस क्षेत्र में 'स्थिर और नियंत्रण में है' और भारत के साथ बातचीत जारी है.
वैश्विक संकटों के कारण चीन के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा भड़का हुआ है लेकिन यहां पर स्थानीय लोग जो अपने जानवरों पर निर्भर हैं, उनके लिए यह आजीविका का मामला है.
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