भारत में चीनी निवेश पर चीन के बहिष्कार आंदोलनों का असर क्या होगा?
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Author, ज़ुबैर अहमद
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत-चीन सीमा विवाद के बीच देश में कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर चीनी सामान और सॉफ़्टवेयर के बहिष्कार की मुहिम छेड़ दी है.
हालांकि अब ऐसा लगता है कि ये मुहिम परवान चढ़ने से पहले ही कमज़ोर पड़ गई.
चीन पर कोरोना वायरस फैलाने के आरोप तो पहले से लगते रहे हैं जिसका कोई सबूत अभी तक सामने नहीं आया है.
संक्रमण की हालत जानने के लिए ज़िले का नाम अंग्रेज़ी में लिखें
लेकिन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर एशिया की इन दो बड़ी ताक़तों के बीच जैसे-जैसे तनाव बढ़ता जा रहा है, देश में चीन विरोधी भावनाएं भी मुखर हो रही हैं.
ख़ुद को राष्ट्रवादी कहने वाले लोगों की ओर से किए गए बहिष्कार के इस आह्वान से मुमकिन है कि मोदी सरकार को वक़्ती तौर पर फ़ायदा हुआ हो.
पर ऐसा केवल भारत-चीन सीमा विवाद की वजह से नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़ुद भी आत्मनिर्भरता हासिल करने का नारा बुलंद किया है. लेकिन भारत में चीन की मौजूदगी एक ऐसी बात है, जिससे बचा नहीं जा सकता है.
भारत के रसोई घर, बेडरूम में, एयर कंडीशनिंग मशीनों की शक्ल में, मोबाइल फोन और डिजिटल वैलेट के रूप में चीन कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में मौजूद है.
'लोकल के लिए वोकल' के मोदी के नारे के तहत भले ही फ़्लिपकार्ट और अमेज़न ने भारत में बनी चीज़ों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया हो लेकिन कारोबार जगत अभी भी पूरी तरह से इसके पक्ष में नहीं दिख रहा है.
चीन ने भारत में छह अरब डॉलर से भी ज़्यादा का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कर रखा है जबकि पाकिस्तान में उसका निवेश 30 अरब डॉलर से भी ज़्यादा का है.
मुंबई के विदेशी मामलों के थिंक टैंक 'गेटवे हाउस' ने भारत में ऐसी 75 कंपनियों की पहचान की है जो ई-कॉमर्स, फिनटेक, मीडिया/सोशल मीडिया, एग्रीगेशन सर्विस और लॉजिस्टिक्स जैसी सेवाओं में हैं और उनमें चीन का निवेश है.
इसकी हालिया रिपोर्ट में जानकारी सामने आई है कि भारत की 30 में से 18 यूनिकॉर्न में चीन की बड़ी हिस्सेदारी है. यूनिकॉर्न एक निजी स्टार्टअप कंपनी को कहते हैं जिसकी क़ीमत एक अरब डॉलर है. रिपोर्ट में कहा गया है कि तकनीकी क्षेत्र में निवेश की प्रकृति के कारण चीन ने भारत पर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया है.
उदाहरण के लिए, बाइटडांस, टिकटॉक की मूल कंपनी है, जो चीन की है और यह यूट्यूब के मुक़ाबले भारत में काफ़ी लोकप्रिय है.
सामरिक चीनी निवेश पर भारत सरकार थोड़ा सतर्क थी. हाल ही में उसने अपनी नई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) नीति को यह कहकर टाल दिया कि भारत के साथ ज़मीनी सीमा से जुड़े देशों के सभी निवेशों को निवेश से पहले मंज़ूरी की आवश्यकता होगी.
इस नए जनादेश ने चीनी पूंजीपतियों की चिंता थोड़ी बढ़ा दी है. लेकिन यह फ़ैसला उस निवेश को प्रभावित नहीं करेगा जो अप्रैल से पहले हो चुका है. चीनी निवेश की जाँच करने की नई भारतीय नीति के बावजूद, भारत में चीन की मौजूदगी हर जगह दिखती है.
उदाहरण के लिए, देश की बेशक़ीमती हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का निर्यात देख सकते हैं जिसे अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कोरोना वायरस की प्रतिरोधक दवा के रूप में प्रचारित किया है.
इस दवा का कच्चा माल जिसे एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स (एपीआई) कहते हैं, चीन से आयात किया जाता है. या दूसरी निर्यात की जाने दवा क्रोसीन, जिसका एपीआई पैरासीटामॉल भी चीन से आता है. असल में, संसद में भारत सरकार के एक बयान के मुताबिक़, भारत की दवा बनाने वाली कंपनियां क़रीब 70 फ़ीसदी एपीआई चीन से आयात करती हैं.
साल 2018-19 के वित्तीय वर्ष में देश की फर्मों ने चीन से 2.4 अरब डॉलर मूल्य की दवाइयां और एपीआई आयात किए.
दवाइयों के निर्यात के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में से एक है. देश का दवा निर्यात 2018-19 में 11 प्रतिशत बढ़कर 19.2 अरब डॉलर हो गया है. इसमें जेनेरिक दवाएं भारतीय फ़ार्मास्युटिकल क्षेत्र का सबसे बड़ा हिस्सा हैं और कमाई के मामले में इनका मार्केट शेयर 75 फीसदी है. काफ़ी हद तक चीनी एपीआई पर निर्भरता भी इसकी वजह है. भारत चीनी कच्चे माल को प्राथमिकता देता है क्योंकि यह बहुत सस्ता है और सामग्री वहां आसानी से उपलब्ध है.
इससे दो विरोधी देशों की आपस में निर्भरता भी झलकती है. सिचुआन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के प्रो. हुआंग यूनसॉन्ग ने बीबीसी को बताया, ''चीन में कच्चा माल उपलब्ध कराने वाली कंपनियां भारत के फ़ार्मास्युटिकल निर्माताओं के बिना चल नहीं पाएंगी.''
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चीनी आयात पर निर्भरता
लेकिन यह भी एक तथ्य है कि मौजूदा वक़्त में भारत को चीन की ज़्यादा ज़रूरत है न कि चीन को भारत की. उनके द्विपक्षीय व्यापार में असंतुलन से यह और स्पष्ट होता है. बीते साल द्वपक्षीय व्यापार क़रीब 90 अरब डॉलर का था इसमें क़रीब दो तिहाई हिस्सा भारत में चीनी निर्यात का था.
प्रो. हुआंग यूनसॉन्ग का मानना है कि यह दोनों देशों के बीच का मुद्दा है.
वो कहते हैं, "इसे आसान तरीक़े से कहें तो, यह एक संरचनात्मक मुद्दा है क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्थाएं विकास के अलग-अलग स्तर पर हैं. इस मुद्दे को हल करने के लिए दोनों तरफ दीर्घकालिक योजना और धैर्य की ज़रूरत है. इसे अगर दूसरी तरह से देखें तो, इस व्यापारिक असंतुलन से भारत को फ़ायदा हो रहा है. तुलनात्मक रूप से सस्ते चीनी उत्पादों का आयात करके भारत ने क़ीमती फॉरेन करंसी रिज़र्व को बचाया है और अपनी पूंजी दक्षता में सुधार किया है."
लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि असंतुलन की परवाह किए बिना भारत चीन से आयात कर रहा है. दिल्ली में थिंक टैंक सोसाइटी फॉर पॉलिसी रिसर्च एंड एंपावरमेंट के डॉ. महजबीन बानू का तर्क है कि चीन बड़े भारतीय बाज़ार को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता है.
वो कहती हैं, "हम चीन से आयात पर निर्भर हैं, इस बारे में कोई संदेह नहीं है. इसके अलावा, चीन भारतीय बाज़ार की विशाल क्षमता को देखते हुए इसे ख़ुद से दूर भी नहीं कर सकता."
जेएनयू के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रो. स्वर्ण सिंह का कहना है कि कई देश चीन के साथ व्यापार असंतुलन से पीड़ित हैं. "भारत के साथ चीन का व्यापार पिछले 15 वर्षों में लगभग एकतरफ़ा हो गया है और यह अधिकतर दूसरे देशों के साथ चीन के व्यापार का सच है.
वह कहते हैं, "कोई भी द्विपक्षीय व्यापार, यहां तक कि एकतरफ़ा व्यापार, पारस्परिक निर्भरता बनाता है. यह कई तत्वों पर निर्भर करता है - नीतियों की प्रकृति, राजनीतिक नेतृत्व और आर्थिक ताक़त - जो किसी भी देश को व्यापार से संबंधित तनावों से निपटने का अधिकार देता है, चाहे वह बहिष्कार हो या टैरिफ़ बढ़ाना हो."
प्रो. हुआंग युनसॉन्ग का मानना है कि दोनों देशों को एक-दूसरे की ज़रूरत है.
वो कहते हैं, "चीन भारत को नजरअंदाज़ नहीं कर सकता. एक वैश्विक अर्थव्यवस्था में, देश एक-दूसरे पर निर्भर हैं. मैं चीन-भारत संबंधों से निपटने के लिए एक सकारात्मक मानसिकता को बढ़ावा देने का पक्षधर हूं. ख़ासकर जब कोविड-19 महामारी के कारण दुनिया इतनी कमज़ोर हो गई है. यदि निर्णय लेने वाले लोग आर्थिक तर्क के मुक़ाबले भूराजनीति को अपनाने का विकल्प चुनते हैं, तो वैश्विक आपूर्ति की चेन निश्चित तौर पर बाधित हो जाएगी. केवल उस असामान्य परिस्थिति में, भारत चीन को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम उठा सकता है, जिसकी क़ीमत काफ़ी ज़्यादा होगी.''
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बहिष्कार अभियान का कोई स्थायी असर?
क्या चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का भारतीय अभियान दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करेगा? इस सवाल पर प्रो. स्वर्ण सिंह का कहना है कि इसके राजनीतिक प्रभाव हो सकते हैं.
वो कहते हैं, "भारत के चीन के बहिष्कार का चीन पर आर्थिक प्रभाव से कहीं अधिक राजनीतिक प्रभाव पड़ेगा जो कोविड-19 महामारी के लिए वैश्विक ग़ुस्से का सामना कर रहा है."
डॉ. महजबीन बानू का मानना है कि सोशल मीडिया कैंपेन एक भावनात्मक गुस्सा था. वह कहती हैं, "सोशल मीडिया में कही जाने वाली बातें हमेशा थोड़े वक़्त के लिए होती हैं और मुझे नहीं लगता कि ये कैंपेन दोनों देशों के बीच व्यापार और राजनीतिक संबंध ख़राब करने वाला है."
लेकिन भारत में चीन के बहिष्कार को लेकर जो कैंपेन चल रहे हैं उन पर चीन कैसे प्रतिक्रिया दे रहा है?
प्रो. हुआंग युनसॉन्ग कहते हैं कि इस पर चीन की कोई प्रतिक्रिया नहीं है. "भारतीय सोशल मीडिया पर चीन विरोधी आंदोलन के लिए, चीनी सॉफ्टवेयर को हटाने से लेकर चीनी उत्पादों का बहिष्कार करने तक, चीनी लोग इस पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दे रहे हैं. हम जानते हैं कि भारत में क्या हो रहा है. इस सब को लेकर चीन की ओर से जवाबी प्रतिक्रिया देने की संभावनाएं न के बराबर हैं."
यदि चीन ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डाला है तो भारत ने चीनी समाज पर भी कुछ प्रभाव डाला है. इसके लिए इसकी नरमी की सराहना की जानी चाहिए. जैसा कि प्रो. फेसर हुआंग युनसॉन्ग कहते हैं, "एलएसी पर हो रही कुछ घटनाओं के कारण हम बॉलीवुड फ़िल्मों, दार्जिलिंग चाय, योग और भारतीय रेस्तरां से परहेज़ नहीं कर सकते."
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
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वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
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दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
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हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
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ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
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कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
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शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
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पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
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अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
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गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
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अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.