कोरोना संकट के बीच पत्रकारों पर मीडिया हाउस गिरा रहे हैं गाज

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    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

“मैंने 10 साल उस संस्थान में काम किया है. पन्ने पर बदलाव करने के लिए कई बार घर से देर रात वापस ऑफ़िस भी गई ताकि एडिशन ठीक से निकले. लेकिन मेरी 10 साल की सर्विस को ख़त्म करने में उन्हें कुछ ही मिनट लगे.”

काजल हिंदी अख़बार नवभारत टाइम्स में काम करती थीं और कुछ दिनों पहले अचानक उनसे इस्तीफ़ा माँग लिया गया है.

नवभारत टाइम्स में वह अकेली नहीं हैं बल्कि सीनियर कॉपी एडिटर से लेकर एसोसिएट एडिटर स्तर तक के कई पत्रकारों से इस्तीफ़ा देने को कहा गया है.

संस्थान में दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ और अन्य ब्यूरो से लोग निकाले गए हैं. सांध्य टाइम्स और ईटी हिंदी बंद हो गए हैं. इसके अलावा फ़ीचर पेज की टीम को भी मिला दिया गया है.

इसी संस्थान के एक और पत्रकार ने बताया कि एक दिन संपादक और एचआर ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके कहा लॉकडाउन के कारण कंपनी नुक़सान में है और इसलिए आपकी सेवाएं ख़त्म की जा रही हैं. आप दो महीने का वेतन लीजिए और इस्तीफ़ा दे दीजिए.

मीडिया में नौकरी जाने की शुरुआत मार्च में लॉकडाउन के कुछ समय बाद ही हो गई थी. अलग-अलग संस्थानों से बड़ी संख्या में पत्रकारों को नौकरी से निकाला जाने लगा. ये सिलसिला अब तक जारी है.

मीडिया संस्थानों का कहना है कि लॉकडाउन के कारण उनके अख़बारों का सर्कुलेशन कम हुआ है, सप्लीमेंट बंद हो रहे हैं और विज्ञापन का पैसा भी कम हुआ है.

किसी संस्थान ने कर्मचारियों को बिना वेतन की छुट्टियों पर भेज दिया है, किसी ने दो महीने का वेतन देकर इस्तीफ़ा माँगा है तो किसी ने तुरंत प्रभाव से निकाल दिया है.

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कहाँ-कहाँ हुई छँटनी

हाल ही में दैनिक हिंदी अख़बार ‘हिंदुस्तान’ का एक सप्लीमेंट ‘स्मार्ट’ बंद हुआ है. इस सप्लीमेंट में क़रीब 13 लोगों की टीम काम करती थी जिनमें से आठ लोगों को कुछ दिनों पहले इस्तीफ़ा देने के लिए बोल दिया गया.

हिंदी न्यूज़ वेबसाइट राजस्थान पत्रिका के नोएडा दफ़्तर सहित कुछ और ब्यूरो से भी लोगों को टर्मिनेशन लेटर दे दिया गया है. उन्हें जो पत्र मिला है उसमें दो या एक महीने का वेतन देने का भी ज़िक्र नहीं है. सिर्फ़ बक़ाया लेने के लिए कहा गया है.

इसी तरह हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप में भी पत्रकार से लेकर फ़ोटोग्राफ़र तक की नौकरियों पर संकट आ गया है. एचटी ग्रुप के ही सप्लीमेंट ‘मिंट’ और ‘ब्रंच’ से भी लोगों को इस्तीफ़ा देने के लिए कहा है.

'द क्विंट' नाम की न्यूज़ वेबसाइट ने अपने 200 लोगों की टीम में से क़रीब 45 को 'फ़र्लो' यानी बिना वेतन की छुट्टियों पर जाने को कह दिया है.

दिल्ली-एनसीआर से चलने वाले न्यूज़ चैनल 'न्यूज़ नेशन' ने 16 लोगों की अंग्रेज़ी डिजिटल की पूरी टीम को नौकरी से निकाल दिया था.

टाइम्स ग्रुप में ना सिर्फ़ लोग निकाले गए हैं बल्कि कई विभागों में छह महीनों के लिए वेतन में 10 से 30 प्रतिशत की कटौती भी गई है. इसी तरह नेटवर्क18 में भी जिन लोगों का वेतन 7.5 लाख रुपये से अधिक है उनके वेतन में 10 प्रतिशत की कटौती हुई है.

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प्रधानमंत्री ने की थी अपील

दूसरों की नौकरी और रोज़ी-रोटी पर मँडरा रहे संकट पर बात करने वाले पत्रकारों का भविष्य अब खुद खतरे में है. जबकि 22 मार्च के अपने संबोधन में पीएम नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि 'पुलिस और स्वास्थ्यकर्मियों की तरह मीडिया की भी इस महामारी से लड़ने में अहम भूमिका होगी.'

प्रधानमंत्री ने आग्रह भी किया था कि 'आप अपने व्यवसाय, उद्योग में साथ काम करने वाले लोगों के प्रति संवेदना रखें और किसी को नौकरी से ना निकालें.'

कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने भी अप्रैल में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखकर मीडिया सेक्टर पर मँडरा रहे संकट का ज़िक्र किया था.

उन्होंने ये भी कहा था कि 'मीडिया संस्थान सिर्फ़ तीन हफ़्तों के लॉकडाउन के बाद महामारी को लोगों की नौकरियां छीनने का बहाना नहीं बना सकते.'

लेकिन, उसके बावजूद भी संस्थान बेधड़क अपने कर्मचारियों से इस्तीफा ले रहे हैं. पत्रकारों पर दोहरी मार पड़ी है. लॉकडाउन में नौकरी जाने से दूसरे संस्थान में फ़िलहाल नौकरी मिलना भी मुश्किल है.

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स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां

आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST

गर्भवती पत्नी और बच्ची का एडमिशन

हिंदुस्तान टाइम्स में कई सालों से काम कर रहे फ़ोटोग्राफ़र अमन को इस्तीफ़ा देने के लिए बोला गया है.

उनकी पत्नी गर्भवती हैं. वो कहते हैं, “मुझे अगले कई महीनों तक नौकरी मिलने के आसार नज़र नहीं आते. अब इस हालत में अपनी पत्नी को क्या बताऊं. उन्होंने मुझे ऐसे समय पर निकाला है जब मुझे इस नौकरी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी.”

एक प्रतिष्ठित हिंदी न्यूज़ वेबसाइट में कंसल्टेंट के पद पर काम करने वाले रोहित कहते हैं कि उनका कॉन्ट्रैक्ट छह महीने बाद ख़त्म कर दिया गया.

कंपनी का कहना था कि अभी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है इसलिए कॉन्ट्रैक्ट नहीं बढ़ा सकते. आगे ज़रूरत होगी तो उन्हें सूचना देंगे. रोहित कहते हैं कि वो दिल्ली में किराए पर रहते हैं. कोई मकान मालिक किराया माफ़ करने वाला नहीं है. बेटी को इस साल स्कूल में एडमिशन भी दिलवाना है. ख़र्चे तो उतने ही हैं, ऊपर से तनख्वाह बंद हो गई है.

कैमरा

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निजी पसंद-नापसंद का आरोप

अचानक ही सेवाओं से निकाले गए कई पत्रकारों का ये भी आरोप है कि उन्हें नौकरी से निकालने का ठोस कारण नहीं बताया गया. अगर कंपनी घाटे में है तो उन्हें ही क्यों चुना गया.

हिंदुस्तान अख़बार के सप्लिमेंट ‘स्मार्ट’ की टीम का हिस्सा रहे अमित कहते हैं, “हम वर्क फ्रॉम होम कर रहे थे. एक दिन एचआर का फ़ोन आया और हमें ऑफ़िस बुलाया. वहाँ जाकर अचानक बोल दिया गया कि कंपनी नुक़सान में है, स्मार्ट बंद हो गया है और आपकी सेवाएँ भी ख़त्म हो गई हैं. सबसे दुख की बात है कि मैनेजमेंट के पास इसका कोई जवाब नहीं कि हमें ही क्यों निकाला. ना काम में कमी बताई और ना कोई ग़लती. मैं यहाँ पर पिछले एक साल से काम कर रहा हूं. आज मेरे पूरे परिवार के लिए मुश्किल खड़ी हो गई है.”

राजस्थान पत्रिका न्यूज़ वेबसाइट में काम करने वाले सुनील वहाँ कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर रहे थे. वह बताते हैं, “हमारे यहाँ से छह लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है. मेरा प्रदर्शन कोई ख़राब नहीं था. हाँ, मेरी संपादक से बहस हो चुकी थी. उन्होंने बिना कारण बताए निकाला है तो ज़रूर निजी वजह रही होगी.”

राजस्थान पत्रिका में एक कर्मचारी को मिला बर्खास्तगी पत्र
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नवभारत टाइम्स की काजल भी कहती हैं कि उन्होंने संपादक की रिश्तेदार के ख़िलाफ़ शिकायत की थी. वो लंबे समय से संपादक की नज़रों में खटक रही थीं इसलिए अब लॉकडाउन में मौक़ा मिला तो उन्हें निकाल दिया गया.

बीबीसी ने इन मीडिया संस्थानों से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क करने की कोशिश की. हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान में जब एचआर से बात की गई तो उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

टाइम्स ग्रुप में सीनियर वाइस प्रेज़िडेंट एचआर सिद्धार्थ गांगुली ने नौकरी से निकाले जाने के सवाल पर सिर्फ़ इतना कहा कि ‘उनके यहाँ ऐसा कुछ नहीं हुआ है.’ इसके बाद उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया है.

न्यूज़ नेशन चैनल के एडिटोरियल डायरेक्टर मनोज गैरोला ने बीबीसी से बातचीत में 16 लोगों की छँटनी की बात स्वीकार की थी. लेकिन, उनका कहना था कि इस फ़ैसले का महामारी या लॉकडाउन से कोई संबंध नहीं है.

मनोज ने कहा था, "हमारी पहचान एक हिन्दी चैनल के तौर पर है और हम डिजिटल में भी इसी भाषा में निवेश कर रहे हैं. इसलिए 16 लोगों की अंग्रेज़ी की टीम को हटा कर हमने सिर्फ़ हिन्दी वेबसाइट रखने का निर्णय किया है. यह फ़ैसला लॉकडाउन से पहले किया गया था जिसे 1 अप्रैल से लागू किया जाना था."

बीबीसी से बातचीत में 'द क्विंट' के प्रबंधन ने अपने मुलाज़िमों को बिना वेतन छुट्टी पर भेजे जाने की बात स्वीकार की थी लेकिन उन्होंने इस बारे में कुछ और बोलने से इनकार कर दिया था.

राजस्थान पत्रिका में एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपना नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया, "संस्थान में कई ब्यूरो और सेंटर से लोगों को निकाला गया है. प्रबंधन का कहना था कि कोरोना वायरस के कारण जिन सेंटर से रिवेन्यू नहीं आ रहा है और पिछले तीन-चार महीनों से जो आर्थिक स्थिति ख़राब है, उसे ध्यान में रखते हुए वेतन में कटौती की गई है और छँटनी का फ़ैसला भी लिया गया है."

"लेकिन, ऐसा नहीं है कि किसी को निजी नापसंदगी की वजह से नहीं निकाला गया है. किन लोगों को निकाला जाएगा इस फैसले में कई वरिष्ठ अधिकारियों को भी शामिल नहीं किया गया. प्रबंधन कभी इस तरह नहीं सोचता. ये फैसला उच्च स्तर पर लिया गया है. कर्मचारियों को कंपनी की स्थिति की सूचना दी गई है."

हालांकि, जिन कंपनियों ने भी अपने कर्मचारियों को निकालने का कारण बताया है, उन्होंने लॉकडाउन के चलते हुए नुक़सान की बात कही है. उनका कहना है कि अख़बारों के पन्ने कम हो गए हैं, सप्लीमेंट बंद हो गए हैं और विज्ञापन आना कम हुआ है.

अख़बार पढ़ता व्यक्ति

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कितना बड़ा है संकट

लेकिन, क्या कंपनियों की मुश्किलें इतनी बढ़ गई हैं कि कुछ ही महीनों में इतने बड़े स्तर पर कर्मचारियों को निकाल दिया जाए. इसे लेकर हमने भारतीय जन संचार संस्थान के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर आनंद प्रधान से बात की.

डॉ. आनंद प्रधान कहते हैं, “ये आर्थिक संकट पिछले एक-डेढ़ साल से चल रहा था. अख़बार से लेकर न्यूज़ चैनल तक की विज्ञापनों से कमाई में कमी आ रही थी. अब कोरोना वायरस के कारण ये संकट अचानक और गहरा गया है जिसका असर हम देख रहे हैं. लेकिन, ये भी सही है कि बड़े मीडिया समूहों कि आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब नहीं है कि उन्हें लोगों को नौकरी से निकालना पड़े. ये लोग एक-डेढ़ साल मैनेज कर सकते थे. शीर्ष प्रबंधन स्तर पर वेतन में कटौती हो सकती थी.”

“लेकिन, ये सभी कारोबारी हैं, लिस्टेड कंपनियाँ हैं जिन्हें अपना मुनाफ़ा दिखाना होता है. इसलिए ये लोग हायर और फायर की नीति अपनाते हैं. आज ज़रूरत कम है तो निकाल दिया और कल हालत सुधरने पर जब विस्तार करेंगे तो फिर से नए लोगों को रख लिया.”

वहीं, प्रेस एसोसिएशन के अध्यक्ष जयशंकर गुप्ता भी मुसीबत के इस दौर में कर्मचारियों को निकालने को सही नहीं मानते.

वह कहते हैं, “कंपनियों को घाटा नहीं हुआ है बस उनका मुनाफ़ा कम हो गया है और ये लोग उसी मुनाफ़े की भरपाई कर्मचारियों से कर रहे हैं. अगर 25 पन्नों का अख़बार 15 पन्नों का हो गया है तो उसकी छपाई का ख़र्च भी कम हुआ है. फिर ये कंपनियाँ जब कई गुना मुनाफ़ा कमाती हैं तो क्या उसी अनुपात में कर्मचारियों को भी फ़ायदा देती हैं लेकिन नुक़सान में उनसे ही भरपाई करती हैं.”

जयशंकर गुप्ता इस संबंध में सरकार के हस्तक्षेप की बात कहते हैं. वह कहते हैं कि सरकार से इन अख़बारों को सब्सिडी मिलती है तो क्यों नहीं इन पर दबाव डालकर लोगों की नौकरी बचाई जाती है.

हालांकि, आनंद प्रधान मानते हैं कि सरकार का निजी कंपनियों पर बहुत ज़्यादा ज़ोर नहीं चल सकता. सरकार कुछ वित्तीय मदद कर सकती है लेकिन ये कंपनी और कर्मचारी के बीच का मामला होता है. सरकार पर भी कंपनियों की ओर से काफ़ी दबाव होता है.

वह कहते हैं कि आज हर सेक्टर में नौकरियाँ जा रही हैं. मीडिया कारोबारी स्तर पर दूसरे सेक्टर या कंपनियों से अलग नहीं है. लेकिन, जैसे कि इससे लोग सूचना पाते हैं, जागरुक होते हैं तो ये जन कल्याण से जुड़ा काम है.

इसलिए अगर मीडिया संस्थान बंद होने लगे या टीम छोटी होने लगे तो लोकतंत्र के लिए बेहद ज़रूरी, सूचना और विचारों की विविधता व बहुलता पर बुरा असर पड़ेगा.

(लोगोंकेअनुरोधपरस्टोरी मेंउनकीपहचान छिपाई गई है. पत्रकारों केनामबदलदिएगएहैं.)

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले

    कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है

    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

    लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.

  • एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल

    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
  • कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स

    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

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मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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