नेपाल क्या हमेशा भारत को चीन का डर दिखाता है?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नेपाल नाराज़ है. आठ मई को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने धारचुला से चीन की सीमा लिपुलेख तक एक सड़क का उद्घाटन किया था. नेपाल का दावा है कि सड़क उसके क्षेत्र से होकर गई है.
नेपाल इस बात से इतना ख़फ़ा है कि उसने कालापानी के क़रीब छारुंग में सशस्त्र बलों की तैनाती कर दी. नेपाल ने जिस वक़्त सुरक्षा बलों की तैनाती की, वो भारत के लिए असहज करने वाला रहा.
नेपाल के रक्षा मंत्री ईश्वर पोखरेल ने राइजिंग नेपाल को दिए इंटरव्यू यहाँ तक कहा दिया कि अगर ज़रूरत पड़ी तो नेपाल की सेना लड़ने के लिए तैयार है. कालापानी ने इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस की भी तैनाती है. ज़ाहिर है कि आईटीबीपी की तैनाती नेपाल को लेकर नहीं है.
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने बीबीसी हिंदी के साथ विशेष बातचीत में कहा कि भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद पर तनातनी दुर्भाग्यपूर्ण है.
उन्होंने कहा, ''कालापानी, सुस्ता और लिपुलेख जैसे इलाक़ों को लेकर विवाद कोई नया नहीं है. लेकिन दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति रही है कि इसे बातचीत के ज़रिए सुलझा लेंगे. जहाँ तक नेपाल की ओर से नया नक्शा जारी करने की बात है तो इसका एक संदर्भ है. भारत सरकार ने पिछले साल नवंबर महीने में अपना नया नक्शा जारी किया था. इस नक्शे में कालापानी और सुस्ता इलाक़े को भारत ने अपनी ज़मीन के तौर पर शामिल कर लिया. इसके बाद से नेपाल पर दबाव था कि वो भी जवाब दे. सरकार से संसद में तीखे सवाल पूछे जा रहे थे और पब्लिक का भी प्रेशर था.''

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तो क्या नेपाल ने जनभावना के दवाब में नया नक्शा प्रकाशित किया? इस सवाल के जवाब में बाबूराम भट्टराई कहते हैं, ''ऐसा नहीं है. यह सरकार का फ़ैसला है और पूरी तरह से एक राजयनिक फ़ैसला है. पहले भारत ने ऐसा किया तब हमने ऐसा किया है. इसके बावजूद मेरा दोनों देशों की सरकारों से अनुरोध है कि किसी उच्चस्तरीय बाततीच के ज़रिए इस विवाद को सुलझाया जाए.''
नेपाल के साथ सीमा विवाद

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भारत और नेपाल के बीच सीमांकन का इतिहास बहुत लंबा है. 1816 में सुगौली संधि के पहले नेपाल किंगडम का विस्तार पश्चिम में सतलज से लेकर पूरब में तीस्ता नदी तक था.
एंग्लो-नेपाली युद्ध में नेपाल की हार हुई और इसका अंत सुगौली संधि के साथ हुआ. सुगौली संधि के तहत नेपाल को काली और राप्ती नदी के बीच का पूरा मैदानी इलाक़ा ब्रिटिश इंडिया को सौंपना पड़ा. नेपाल में भारत के राजदूत रहे जयंत प्रसाद ने द हिंदू में 23 मई को लिखा है कि सुगौली संधि के तहत नेपाल फिर से इन इलाक़ों पर दावा नहीं कर सकता था.
जयंत प्रसाद ने लिखा है, ''ब्रिटिश इंडिया में लिपुलेख पास का इस्तेमाल तिब्बत और चीन के साथ व्यापार के लिए होता था. 1870 के दशक से सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे में लिपुलेख डाउन से कालापानी तक का इलाक़ा ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा है. भारत की आज़ादी के बाद से नेपाल के राणा शासक और नेपाली राजाओं ने इनको लेकर कोई दावा नहीं किया. 1857 के विद्रोह में सैन्य मदद के लिए जंगबहादुर राणा को ब्रिटिश इंडिया ने इनाम के तौर पर नेपालगंज और कपिलवस्तु दे दिया था. लेकिन ब्रिटिश इंडिया ने गढ़वाल और कुमाऊं का कोई भी इलाक़ा वापस नहीं किया था. ब्रिटिश इंडिया ने केवल नेपाल के साथ ही सीमांकन नहीं किया था बल्कि चीन और पाकिस्तान के साथ भी ब्रिटिश इंडिया ने ही किया था.''

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क्या नेपाल भारत को चीन का डर दिखाता है? सीमा पर कुछ इलाक़ों को लेकर विवाद अगर द्विपक्षीय है तो नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने चीन से संपर्क क्यों किया?
बाबूराम भट्टराई कहते हैं, ''लिपुलेख का इलाक़ा ट्राइजंक्शन है. चीन, नेपाल और भारत तीनों की सीमा यहाँ से लगती है. लिपुलेख से चीन तक सड़क बनाने को लेकर चीन और भारत में 2015 में समझौता हुआ था. जैसे भारत चीन के साथ संबंध बनाने के लिए स्वतंत्र है वैसे नेपाल भी है. हम चीन से कोई रिश्ता रखते हैं तो वो हमारी अंतरराष्ट्रीय नीति का हिस्सा होता है. ज़ाहिर है चीन इस विवाद में कोई पार्टी नहीं है लेकिन ये तो सच है कि यह ट्राइजंक्शन है. इस मुद्दे को सुलझाने के लिए नेपाल और भारत को मिलकर बात करनी चाहिए.''
हालाँकि चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि लिपुलेख पर नेपाल और भारत के बीच का विवाद द्विपक्षीय है और उम्मीद है कि दोनों देश आपस में मिलकर सुलझा लेंगे. अगर चीन का विदेश मंत्रालय इसे द्विपक्षीय मुद्दा बता रहा है तो नेपाल फिर चीन से संपंर्क क्यों कह रहा है? बाबूराम भट्टराई कहते हैं कि चीन का यह कूटनीतिक बयान है.
नाराज़गी

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वरिष्ठ पत्रकार और नेपाल मामलों के जानकार आनंदस्वरूप वर्मा कहते हैं कि लिपुलेख वाले मामले में चीन का शामिल होना स्वाभाविक है क्योंकि 2015 में प्रधानमंत्री मोदी जब चीन गए थे तो उसकी वक़्त धारचुला से लिपुलेख (चीनी सरहद) तक सड़क बनाने का समझौता किया था.
आनंदस्वरूप वर्मा कहते हैं, ''नेपाल ने उस वक़्त भी विरोध किया था और कहा था कि लिपुलेख का इलाक़ा उसका है और आप ऐसे समझौता नहीं कर सकते हैं. इस मामले में नेपाल चीन को लेकर नहीं आया है. यह सबको पता है कि लिपुलेख ट्राइजंक्शन है. यहाँ तीनों देशों की सीमाएं मिलती हैं.''

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वर्मा कहते हैं, ''भारत को अधिनायकवादी प्रवृत्ति से बाज आना चाहिए. जिस इलाक़े को लेकर विवाद है और वह अगर भारत के लिए रणनीतिक लिहाज से बहुत अहम भी है तो इसे लेकर बात करनी चाहिए. अचानक से बिना भरोसे में लिए अपने मानचित्र में शामिल कर लेना यह तो कोई समझदारी भरा फ़ैसला नहीं है. आप नेपाल पहले बात कर लेते. आपने वहाँ की सरकार को ही नाराज़ नहीं किया है बल्कि लोगों को भी नाराज़ किया है.''
क्या भारत ने नया नक्शा जारी कर एक रणनीतिक भूल की है? बीजेपी नेता और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार शेषाद्री चारी कहते हैं, ''ऐसा नहीं है. जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया. एक लद्दाख और दूसरा जम्मू-कश्मीर. ऐसे में नया राजनीतिक नक्शा जारी होना ही था. लेकिन इसमें कोई नया भूभाग नहीं शामिल किया गया. उत्तराखंड का जो आधिकारिक नक्शा है उसमें कालापानी और लिपुलेख जैसे इलाक़े हैं. भारत के नक्शे में पहले से शामिल इलाक़े को ही रखा गया है न कि कोई नया इलाक़ा शामिल किया गया है. जहाँ तक कालापानी की बात है तो ये भारत का ही रहा है. इसमें कोई विवाद ही नहीं है.''
'ओली पर उठ रहे हैं सवाल'

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वो कहते हैं, ''नेपाल के साथ दिक़्क़त यह है कि वर्तमान प्रधानमंत्री ओली के ख़िलाफ़ पार्टी के भीतर ही गंभीर सवाल उठ रहे हैं. उन्होंने कुछ भी ठोस किया नहीं है. ऐसे में वो ज़रूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं. उन्हें तय करना है कि वो चीन की कठपुतली बनना चाहते हैं या फिर संप्रभु राष्ट्र. उन्हें चीन के निवेश और संबंधों के ख़तरों का अंदाज़ा होना चाहिए.''
हालांकि शेषाद्री चारी ये भी मानते हैं कि अतीत में कुछ हालात ऐसे पैदा हुए हैं जिनसे नेपाल के पास चीन या भारत में किसी एक को चुनने का विकल्प मिला है. वो कहते हैं, ''2015 में आर्थिक नाकेबंदी पूरी तरह से दुर्भाग्यपूर्ण थी. ऐसा नहीं होना चाहिए था लेकिन यह हुआ. राजीव गांधी के वक़्त में भी ऐसा हुआ था.''
आनंदस्वरूप वर्मा को इस बात का डर है कि अब तक भारत पर नेपाल में माइक्रोमैनेजमेंट कर सत्ता चलाने का आरोप लगता था लेकिन भारत की ग़लतियों से यह मौक़ा चीन ने लपक लिया, तो न नेपाल के लिए ये ठीक होगा और न भी भारत के लिए.

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वर्मा कहते हैं, "भारत को नेपाल के साथ सम्मान और संप्रभु राष्ट्र को मिलने वाली तवज्जो के साथ पेश आना चाहिए. नेपाल का जब नया संविधान लागू हो रहा था तो मोदी सरकार ने प्रचंड से मिलने के लिए भगत सिंह कोश्यारी को विशेष दूत के तौर पर भेजा था. कोश्यारी ने प्रचंड से कहा था कि वो नेपाल के संविधान से हिंदू राष्ट्र शब्द नहीं हटाएँ लेकिन प्रचंड ने इसे मानने से इनकार कर दिया था. भगत सिंह कोश्यारी ने ये बात उस नक्त नेपाल के अख़बार नया पत्रिका को दिए इंटरव्यू में कही थी. भारत की एक नाराज़गी ये भी रहती है.''
क्या नेपाल का राष्ट्रवाद भारत विरोध पर केंद्रित होता जा रहा है? इस सवाल के जवाब में बाबूराम भट्टराई कहते हैं, ''किसी देश की जनता में ऐसी भावना नहीं होती है. लेकिन शासक अपने हितों के लिए ऐसी भावनाओं को ज़रूरी मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए उकसाता है. कई शासक अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को साज़िश की तरह पेश करते हैं और जनता का ध्यान भटकाते हैं. भारत नेपाल के बीच जो सीमा विवाद है, उसमें तो किसी को शक नहीं है कि वो विवाद नहीं है. शासकों को इसे द्विपक्षीय मुद्दों की तरह ही सुलझाना चाहिए. दोनों देश इस बात को मानते भी हैं. मुझे लगता है कि पीएम ओली और पीएम मोदी को इस मुद्दे पर उच्चस्तरीय बात करनी चाहिए और विवाद को सुलझा लेना चाहिए.''
'वफ़ादारी अपनी जनता के प्रति'

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भारत में नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की छवि भारत विरोधी बन रही है. आप इस पर क्या सोचते हैं? बाबूराम भट्टराई ने कहा, ''मैं इससे सहमत नहीं हूँ. हर प्रधानमंत्री की वफ़ादारी वहां की जनता प्रति होती है. पीएम मोदी अपनी जनता के प्रति वफ़ादार होंगे, पीएम इमरान ख़ान अपनी जनता के प्रति. वैसे ही नेपाल का कोई भी प्रधानमंत्री होगा तो वो अपनी जनभावना की उपेक्षा कैसे कर देगा?''
आनंदस्वरूप वर्मा कहते हैं कि भारत पर हमेशा नेपाल में माइक्रोमैनेजमेंट करने का आरोप लगता है यानी सत्ता को अपने तरीक़े चलाने का आरोप.
वो कहते हैं, ''यह केवल मोदी सरकार की बात नहीं है. पूर्ववर्ती सरकारों ने भी ऐसा ही किया है. राजीव गांधी ने भी आर्थिक नाकाबंदी कर बड़ी ग़लती की थी. वही ग़लती 2015 में मोदी सरकार से हुई. नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तो भारत समर्थक माने जाते थे. लेकिन 2015 में मोदी सरकार की अघोषित नाकाबंदी के कारण ओली को भी चीन के पास मदद के लिए जाना पड़ा. चीन की तरफ़ जाने के लिए मजबूर तो हमारी सरकारें कर रही हैं. नेपाल एक लैंडलॉक्ड देश है. तीन तरफ़ से भारत से घिरा है एक तरफ़ चीन है. कहा जाता है कि दो चट्टानों के बीच एक भूभाग दबा हुआ है. ऐसी भौगोलिक स्थिति में हमें नेपाल के साथ संवेदनशीलता और विवेक से पेश आने की ज़रूरत है.''
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने एक बार फिर से पूरे विवाद पर सर्वदलीय बैठक बुलाई है. स्पष्ट है कि नेपाल इस विवाद पर अभी और आगे बढ़ने के मूड में है.
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