कोरोना लॉकडाउन: ईद पर इस बार 'प्रेमचंद का हामिद' क्यों नहीं जाएगा ईदगाह

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इस बार 'हामिद' ईदगाह नहीं जाएगा, न ही अपने किसी प्रिय के लिए कोई तोहफ़ा ख़रीदेगा, जैसे कि प्रेमचंद की कालजयी रचना ईदगाह में उसने दादी के लिए चिमटा ख़रीदा था.
हामिद के पास ग़ुरबत की वजह से नए कपड़े नहीं थे लेकिन इस बार हामिद जैसे लाखों मुस्लिम बच्चों के अभिवावकों ने 'इस ईद नए कपड़े नहीं' और 'बचे पैसों को ज़रूरतमंदों को दान' का मन बना रखा है.
रमज़ान और ईद को 'क़ानूनी दायरों में रहकर मनाने,' 'ज़िम्मेदार शहरी होने का फ़र्ज निभाने', सोशल डिस्टेंसिंग, तालाबंदी वग़ैरह के मद्देनज़र पवित्र माह में पढ़ी जानेवाली विशेष 'नमाज़ों को घर में ही अदा' करने, इफ़्तार की दावतों से बचने और वैश्विक महामारी के समय 'मानवता की सुरक्षा का दायित्व निभाने' जैसी बातें तक़रीबन महीने भर पहले तबसे ही होने लगीं थीं जब रमज़ान शुरू होने पर लोग एक दूसरे को बधाई संदेश भेज रहे थे.
और 25 अप्रैल को रमज़ान के भारत में शुरू होने के दो-तीन दिनों के बाद से ही पर्सनल मैसेजिंग, वॉट्सऐप ग्रुप्स और सोशल मीडिया में चर्चा होने लगी कि इस बार ईद की ख़रीदारी न करके किसी भूखे परिवार के लिए भोजन का इंतजाम करें, किसी बच्चे की स्कूल फ़ीस भरें, किसी के घर का किराया अदा कर दें और 'रमज़ान का सही अर्थ में निर्वाह करें.
वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी इन बातों को मुस्लिम समाज में 'नई चेतना की शुरुआत' के तौर पर देखते हैं तो राजनीतिक विश्लेषक भारत भूषण का मानना है कि ये 'मुस्लिम समाज में हो रहे बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा है जिसकी लौ नागरिकता क़ानून के विरोध प्रदर्शन से निकली है.
सहयोग की अपील

वहीं मानवधिकार कार्यकर्ता ओवैस सुल्तान ख़ान के मुताबिक़ इसे समुदाय में उभर रही नई लीडरशिप की छाप के तौर पर देखा जा सकता है जो नई सोचों को नई रोशनी में पेश करने की कोशिश कर रहा है.
रमज़ान के शुरू होने तक कोरोना से हो सकने वाली तबाही साफ़ होने लगी थी और कई केंद्रीय मंत्रियो-कई राज्य सरकारों और मीडिया के एक हिस्से ने तब्लीग़ी जमात मामले को सांप्रदायिक रंग देना शुरू कर दिया था.
24 मार्च को अचानक से हुए लॉकडाउन के ऐलान और उसके बाद सड़कों पर प्रवासी मज़दूरों के उमड़े सैलाब के बीच दिल्ली स्थित तब्लीग़ी जमात मुख्यालय में आयोजित हुए धार्मिक सम्मेलन का मामला सामने आया था जिसके बाद कोरोना के फैलाव का ठीकरा जमात के सिर फोड़ा जाने लगा, कुछ तत्वों ने इसे 'मुस्लिम जानबूझकर कोरोना फैला रहे हैं' जैसा मोड़ देने की पूरी कोशिश की.
लेखिका रख्शंदा जलील कहती हैं कि मुस्लिम समाज का बड़ा तबक़ा, जिसमें पढ़ा-लिखा नौजवान भी शामिल है इस तरह के इल्ज़ामों से बेहद सदमे में हैं और शायद यही वजह है कि समुदाय के कुछ लोग इस तर्ज़ पर भी सोच रहे हैं कि ईद की ख़रीदारी इसलिए भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे बाज़ारों में भीड़ लगेगी और वायरस के फैलाव की ज़िम्मेदारी फिर से उनपर थोपी जाएगी.
सोशल मीडिया पर संदेश

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कई वॉट्सऐप ग्रुप्स में ऐसे मैसेज सर्कुलेट हो रहे हैं कि हालात की नज़ाकत के तहत ख़रीदारी और ईदी देने की रस्म पर क़ाबू रखें वरना 'ईद की शॉपिंग के चलते सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ी', 'मुस्लिम औरतों को नहीं देश की चिंता, चाहती हैं कोरोना फैलाना' जैसे हैडलाइन के साथ टेलीविज़न चैनल तैयार बैठे हैं.
इस तरह के मोबाइल मैसेज में कोरोना, तब्लीग़ी, मुसलमान पर ख़ास प्रोग्राम चलाने वाले टीवी एंकरों के नाम के साथ कहा गया है कि कौन सा एंकर इस मामले पर कौन सी हेडलाइन चला सकता है.
दिल्ली के भजनपुरा में रहने वाले एजी मलिक ने कहा उनके पास ये मैसेज कहीं से फॉरवर्ड होकर आया था, 'यूं भी दंगे और हाल के दिनों में ऊभरे हालात के बाद उनके भीतर बढ़-चढ़कर त्यौहार मनाने की कोई ख़्वाहिश नहीं है.'

आइने का कारोबार करनेवाले मलिक ने अपने बेटे को भी ईद की शॉपिंग न करने को समझा लिया है और इरादा है कि इससे बचे पाँच हज़ार रूपयों को वो अलीगढ़ के अपने गांव जाकर ज़रूरतमंदों में बाँट देंगे.
मुस्लिम समाज और राजनीति को क़रीब से जानने वाले लेखक रशीद क़िदवई कहते हैं कि 'नो-टू-ईद-शॉपिंग' या इस जैसी कोई मुहिम तो बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी नहीं चली थी और जामा मस्जिद दिल्ली के अहमद बुख़ारी और चंद दूसरे मज़हबी नेताओं ने जब विध्वंस और ईद को लिंक करने की कोशिश की थी तो जाने-माने आलिम अली मियां ने इससे साफ़ मना कर दिया था.
ज़िम्मेदारियों का महीना

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रशीद क़िदवई कहते हैं रमज़ान 'ज़िम्मेदारियों का महीना है' जिस दौरान सभी स्वस्थ्य मुसलमानों से उपवास रखने, ख़ास नमाज़ अदा करने और उस माध्यम से अपने किरदार को बेहतर बनाने का हुक्म है और इसी 'हुक्म को ख़ुदा के कहे मुताबिक़ पूरा कर लेने का उत्सव है ईद', जिसमें नए लिबास और सेवइयां खाने की किसी तरह की क़ैद नहीं, ये सब महज़ रस्म हैं.
लेकिन इस बार नो-टू-ईद-शापिंग को लेकर जो अपीलें जारी हो रही हैं उसमें रमज़ान में किसी की मदद करने और पवित्र माह को सही अर्थ में मनाने की बात हो रही है.
रमज़ान शुरू होने के लगभग हफ़्ता भर पहले इस्लाम की अलग-अलग विचारधाराओं- शिया, सुन्नी, अहले हदीस वग़ैरह से जुड़े रहनुमाओं ने साझा तौर पर एक विस्तृत अपील जारी की, जिसमें समाज और देश की तरफ़ कर्तव्यों की बात कही गई थी.

भोर से पहले किया जानेवाला भोजन 'सेहरी' और 'इफ़्तार', जो उपवास तोड़ने का शाम में खाया जानेवाला खाना है, उसे घर पर ही खाएँ, नमाज़ के लिए मस्जिद न जाएँ, बिना ज़रूरत बाहर न निकलें, न ही किसी तरह की दावतों का इंतज़ाम करें और रिश्तेदारों, पड़ोसियों और ज़रूरतमंदों की मदद करें.
इसके बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता ख़लीलुर रहमान सज्जाद नोमानी की तरफ़ से एक वीडियो अपील भी जारी की गई जिसे आईआईटी और इंजीनियरिंग से जुड़े कुछ प्रोफ़ेशनल्स जैसे दिल्ली में रहनेवाले इम्बिसात अहमद और दुबई-स्थित मुनीब उमर जैसे लोगों ने शार्ट वीडियो फ़िल्म की शक्ल दे दी है, जो उनके मुताबिक़ 'क़ौम में जागरूकता' फ़ैलाने और दूसरे समुदायों में मुस्लिमों को लेकर जो भ्रांतियाँ हैं उसे दूर करने की उनकी कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है.
बदलाव की बयार
भारत भूषण उलमाओं के नज़रिये में आए हाल के बदलाव के पीछे नेतृत्व में आई तब्दीली को देखते हैं, 'जो नागरिकता क़ानून विरोधी आंदोलन के समय पुरानी लीडरशिप के हाथों से निकलर नए उभर रहे लोगों के हाथों चली गई है' और पुराना नेतृत्व शायद इस वजह से बदलने को मजबूर हो गया हो.
भारत भूषण के मुताबिक़ नागरिकता विरोधी आंदोलन के समय जिसे वो 'मुस्लिम राजनीति का सेक्यूलराइज़िंग मूमेंट' मानते हैं, प्रदर्शन से जुड़े युवक-युवतियों ने पारंपरिक मुस्लिम रहनुमाओं और राजनीतिक दलों की तरफ़ से थोपे गए नेताओं को क़रीब तक फटकने नहीं दिया था और हालांकि इसके बाद कोई एक चेहरा या दूसरे चेहरे नेता के तौर पर नहीं उभरे हैं लेकिन इसे 'लीडरशिप के लोकतांत्रिकरण' के तौर पर देखा जाना चाहिए.
लखनऊ के मशहूर धार्मिक संस्थान फिरंगी महल से जुड़े नईमुर रहमान सिद्दीक़ी हालांकि इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते और कहते हैं कि चीज़ों को इस तरह ब्लैक और व्हाइट में नहीं देखा जा सकता है.
नईमुर रहमान सिद्दीक़ी कहते हैं- उलमा भी इन हालात से अनभिज्ञ नहीं कि शराब की दुकानों पर लगी भीड़ और उसमें उड़ी सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियों पर कोई भी मीडिया या सरकारें बवाल नहीं मचातीं, लेकिन बात जब मसलमानों की हो तो हर तरह के सवाल खड़े होने लगते हैं.
रख्शंदा जलील मुसलमानों में आई जागरूकता को अहम मानती हैं और कहती हैं कि इसमें और भी कोशशों की ज़रूरत है क्योंकि तमाम कोशिशों के बाद भी अलीगढ़ के जमालपुरा बाज़ार और बिहार के गया के मार्किटों में ईद की ख़रीदारी करने वालों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी.
लॉकडाउन की घोषणा के बाद मुस्लिम रहनुमाओं ने जुमा नमाज़ अदा करने के लिए सामूहिक तौर पर इकट्ठा न होने और मस्जिदों में न जाने की जो अपील जारी की थी उसे भी बहुत सारे लोगों ने भी मानने से इनकार किया था.
दिल्ली से सटे नोएडा में ही छत पर सामूहिक नमाज़ अदा करने को लेकर पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ़्तार भी किया था.
चिंता

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हालाँकि समुदाय के एक वर्ग में ये चिंता भी है कि लॉकडाउन के दौरान सरकार की तरफ़ से लागू आदेशों और मुस्लिमों के ज़रिए लिए गए ख़ुद के फ़ैसले - नमाज़ का जमात से न होना या जुमा नमाज़ सामूहिक तौर पर न पढ़ने की बात हुकूमत की तरफ़ से सदा के बंधन न बना दिए जाएं.
ईद की नमाज़ को ही लेकर देवेगौड़ा की सरकार में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री रहे कर्नाटक के एमएलसी सीएम इब्राहीम ने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को ख़त लिखकर ईदगाह और मस्जिदों को खोले जाने और सामूहिक नमाज़ की मांग की है, जबकि धार्मिक गुरुओं ने साफ़तौर पर कहा है कि इस बार ईद के दिन भी लोग नमाज़ घर पर ही पढ़ें.
नमाज़, रोज़ा और ईद से परे भी इस दौरान मुस्लिम समुदाय के बीच कई नई पहलें सामने आईं - पुणे की एक मस्जिद में क्वारंटाइन सेंटर बनाने के लिए मुसलमानों की तरफ़ से पेशकश, मुसलमानों के ज़रिए कोविड महामारी में मारे गए कई हिंदुओं का सनातन रीति-रिवाजों से अंतिम क्रिया-कर्म और कोरोना लॉकडाउन की मार झेल रहे लोगों की आर्थिक मदद.
जमात-ए-इस्लामी के छात्र विंग स्टूडेंट इस्लामिक ऑर्गनाइज़ेशन के जनरल सेक्रेटरी सैयद अज़हरूद्दीन लाखों प्रवासी मज़दूरों और रोज़ेदार ग़रीबों की आर्थिक मदद का दावा करते हैं तो कैम्ब्रिज में रिसर्च स्कॉलर मुमताज़ नैयर कहते हैं कि उनके और उनके दोस्तों ने बिहार से लेकर महाराष्ट्र तक लोगों को राशन किट बाँटे हैं.
हालांकि भोपाल स्थित सामाजिक कार्यकर्ता आसमा ख़ान कहती हैं कि ज़रूरतमंदों की मदद की चाह मुस्लिम युवाओं में अचानक से नहीं आई और ये तो इस्लाम की बुनियादी तालीम का हिस्सा है, लेकिन शायद पहले नेकी कर दरिया में डाल की बात थी और अब शायद सोशल मीडिया की वजह से ये बातें सामने आ जा रही हैं.
इम्बिसात अहमद कहते हैं कि नई मुस्लिम पीढ़ी में दूसरों को अपने बारे में बताने की चाह है.
रामशरण जोशी मानते हैं कि मुस्लिम समुदाय में उठ रहे ये छोटे-छोटे सकारात्मक क़दम जिसमें भारतीय नागिरक होने का अहसास बहुत गहरा है किस ओर जाएगा, ये आने वाले दिनों की देश की राजनीति और उससे उभरे हालात तय करेंगे लेकिन फ़िलहाल जो हो रहा है वो स्वागतयोग्य है.

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