कोरोना वायरस: प्रवासी मज़दूरों की वापसी कई राज्यों में बढ़ने लगा संक्रमण
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Author, भूमिका राय
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बढ़कर एक लाख के पार पहुंच गए है. मरने वालों की संख्या भी तीन हज़ार से अधिक हो चुकी है.
देश में लॉकडाउन का चौथा चरण चल रहा है, जिसमें केंद्र सरकार की ओर से कई तरह की छूट दी गई है और इस बार ज़्यादा ज़िम्मेदारी राज्यों के हिस्से है.
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बढ़े हैं संक्रमण के मामले
इन सबके बीच प्रवासी मज़दूरों का अपने-अपने गांव और ज़िलों में लौटना भी जारी है.
तीन मई के बाद से राज्यों में संक्रमण के जो आँकड़े सामने आ रहे हैं उनमें कई मामले प्रवासियों के भी हैं. उन राज्यों में भी संक्रमण के मामले बढ़ गए हैं जहां अब तक संक्रमण बहुत नियंत्रित था.
सड़क के रास्ते पैदल चलकर, ट्रकों-ट्रॉलियों में लदकर कितने प्रवासी मज़दूर अपने घरों को लौटे हैं इसका कोई सटीक आँकड़ा तो नहीं है लेकिन पीआईबी की रिपोर्ट के मुताबिक़, बीते 19 दिनों में भारतीय रेलवे ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन के ज़रिए क़रीब 21.5 लाख से अधिक प्रवासियों को उनके गृह-राज्य पहुंचाया है. इसके अलावा कुछ राज्यों ने प्रवासी मज़दूरों की वापसी के लिए बस की भी व्यवस्था की है.
एक ओर जहां केंद्र सरकार और राज्य सरकारों का ये फ़ैसला सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र पैदल तय करने को मजबूर हो चुके प्रवासियों के लिए राहत की ख़बर है वहीं प्रवासी मज़दूरों की वापसी से उनके गृह राज्यों में संक्रमण का ख़तरा बढ़ा है.
बिहार, ओडिशा, राजस्थान, झारखंड जैसे कई राज्यों में प्रवासियों की वापसी से संक्रमण के मामले बढ़े हैं.
बड़े शहरों से अपने गृह राज्य और गांवों को लौटने वाले कई लोग कोरोना वायरस संक्रमित पाए गए हैं.
बिहार के शीर्ष स्वास्थ्य अधिकारी संजय कुमार ने बताया है कि मई महीने की शुरुआत से बिहार में कोरोना वायरस से संक्रमण के जितने मामले सामने आए हैं उनमें से 70 फ़ीसदी मामले प्रवासी मज़दूरों से संबंधित हैं.
20 मई को बिहार स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक़, तीन मई के बाद बिहार लौटे कुल प्रवासी मज़दूरों में से 788 प्रवासी कोरोना पॉज़ीटिव पाए गए हैं.
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ओडिशा में तीन मई से लेकर 19 मई तक क़रीब 1,91,925 प्रवासी वापस लौटे हैं.
20 मई को राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी पिछले 24 घंटे के आँकड़ों के मुताबिक़, 74 लोगों का टेस्ट पॉज़ीटिव आया है जिसमें से 72 मामले प्रवासियों से जुड़े हुए हैं.
राजस्थान के आँकड़े भी कुछ ऐसे ही हैं. राज्य में अभी तक क़रीब साढ़े छह लाख प्रवासी वापसी कर चुके हैं और इनमें से 20 मई तक 946 प्रवासियों का कोरोना टेस्ट पॉज़ीटिव पाया गया है.
पश्चिम बंगाल में भी जो प्रवासी लौटे हैं उनमें से कुछ के संक्रमित होने की पुष्टि हुई है.
संक्रमण के मामले में भारत चीन से भी आगे निकल गया है और ये स्थिति तब है जब देश में 25 मार्च के बाद से ही लॉकडाउन है.
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सरकारी रणनीति में कमी कहां
ऐसे में सवाल यह उठता है कि लॉकडाउन की रणनीति से संक्रमण को नियंत्रित करने की सरकार की नीति क्या अब धरी की धरी रह जाएगी? आख़िर क्यों सरकार प्रवासियों की समस्या का हल नहीं तलाश पा रही है? जिस तरह (बिना टेस्ट के, बिना सोशल डिस्टेंसिंग के) ये मज़दूर अपने गृह-प्रदेश या ज़िले पहुंच रहे हैं उससे संक्रमण का ख़तरा बढ़ा है.
झारखंड सरकार के स्वास्थ्य सचिव नितिन कुलकर्णी कहते हैं कि इस बात से इनक़ार नहीं किया जा सकता है कि प्रवासियों के लौटने से संक्रमण के मामले बढ़े हैं.
वो कहते हैं, "झारखंड में हमने स्थिति को लगभग पूरी तरह संभाल लिया था लेकिन तीन मई के बाद से जब से प्रवासियों का लौटना शुरू हुआ है. हमारे यहां संक्रमण के मामले अचानक से बढ़ गए हैं."
वो 20 मई के आँकड़ों का हवाला देते हुए कहते हैं कि आज ही 33 नए मामले सामने आए हैं और ये सभी मामले प्रवासियों से जुड़े हैं. वो कहते हैं कि राज्य में संक्रमण के क़रीब 110 मामले ऐसे हैं जो प्रवासियों के हैं.
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हालांकि नितिन प्रवासियों को लेकर केंद्र सरकार की नीति पर कोई टिप्पणी नहीं करते.
वो कहते हैं "ये वो वक़्त नहीं है जिस समय हम इन बातों की चर्चा करें. अभी जो करना है वो सिर्फ़ इतना कि जैसे-जैसे मामले आ रहे हैं उन्हें सुव्यवस्थित तरीक़े देखा जाए."
तो क्या राज्य इसके लिए तैयार थे?
इस सवाल के जवाब में नितिन कहते हैं "तैयार होने की बात नहीं है लेकिन ये तो सभी को पता था ही कि एक ना एक दिन प्रवासी वापस लौटेंगे ही. किसी को कितने दिन रोका जा सकता है." तो इस परिस्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकारें क्या कर रही हैं और क्या कोई हल निकाला जा सकेगा?
नितिन कहते हैं "अभी इसका कोई हल नहीं है. पहली चीज़ जो की जाएगी वो ये कि जो लोग लौट रहे हैं उन्हें डिसइंफ़ेक्टेड किया जाए. क्वारंटीन किया जाए."
लेकिन नितिन इस बात को लेकर चिंता ज़रूर ज़ाहिर करते हैं कि अभी तो कुछ ही स्पेशल ट्रेनें आ रही हैं लेकिन अब जबकि घोषणा हो चुकी है नियमित ट्रेन होंगी तो आने वाले समय में शायद ऐसा हो कि रिकॉर्ड रखना भी मुश्किल हो जाए.
तो क्या दूसरे फ़ेज़ की तरफ़ हम बढ़ रहे हैं?
नितिन इसका सिर्फ़ इतना ही जवाब देते हैं कि अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है, आने वाले समय में ही जो होगा स्पष्ट हो सकेगा.
स्वराज पार्टी के अध्यक्ष योगेंद्र यादव राज्यों में प्रवासियों के पहुंचने पर संक्रमण के बढ़ते सवाल पर कहते हैं, "क़ायदे से जब लॉकडाउन शुरू हुआ अगर सरकार उसी वक़्त ट्रेन चलने देती और लोगों के जाने की व्यवस्था करती तो उस समय संक्रमण होने की आशंका अभी से कम होती. क्योंकि उस समय संक्रमण 500 के क़रीब थे लेकिन अब जबकि संक्रमण के मामले एक लाख के पार हो गए हैं तो संक्रमण का ख़तरा दो सौ गुना बढ़ गया है. लेकिन अगर और बाद में इस लागू किया जाएगा तो ख़तरा और बढ़ जाएगा."
योगेंद्र यादव कहते हैं "सरकार ने अपने शुरुआती और पहले ग़लत क़दम की वजह से अपने लिए कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा है."
वो कहते हैं "सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब संक्रमण के मामले कम थे तब हमने ट्रेन नहीं चलाई लेकिन अब जब मामले बढ़ गए हैं तो हम ट्रेन चला रहे हैं. उसकी वजह से संक्रमण के मामलों का बढ़ना तो तय है लेकिन अब भी अगर सरकार आने वाले पांच-छह दिनों में सभी को भेज दे या जाने दे तो वह समझदारी भरा फ़ैसला होगा. लेकिन अगर इसे और चलने दिया, लोगों को बंद करके रख दिया तो लोग तो भूख से ही मर जाएंगे."
नक्शे पर
दुनिया भर में पुष्ट मामले
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गोले प्रत्येक देश में कोरोना वायरस के पुष्ट मामलों की संख्या दर्शाते हैं.
स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां
आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST
हालांकि योगेन्द्र यादव यह ज़रूर कहते हैं "जिन लोगों को भेजा जा रहा है उन्हें पूरी तरह टेस्ट करके, सारी सावधानियां अपनाते हुए उन्हें भेजा जाना चाहिए था. लेकिन जब ज़रूरत कम थी तब इतना ज्यादा कुछ कर दिया और अब जब सबसे अधिक सतर्कता की ज़रूरत है तो अब उस स्तर की सावधानी नहीं अपनायी जा रही है."
वो मानते हैं कि इन सारी चीज़ों से एक बात जो स्पष्ट होती है वो ये कि इसे लेकर सरकार की कोई सोची-समझी रणनीति नहीं थी.
लेकिन सरकारें प्रवासियों को संभाल क्यों नहीं पा रहीं?
इस सवाल के जवाब में योगेंद्र यादव कहते हैं "सरकार को शुरू से इतनी समझ नहीं थी और सरकार के लिए ये लोग अदृश्य थे. हमारी नीतियों में शुरू से ही इन लोगों को अदृश्य बनाया गया है. लेकिन जब वो सड़क पर आए तब दिखे वरना उसके पहले तो गाइडलाइन्स में उनका ज़िक्र तक नहीं था. जब ये लोग सड़क पर आए उसके बाद भी इनके लिए कोई रणनीति नहीं बनाई गई. ये पूरी तरह से राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी नज़र आती है."
ऐसा मेडिकल टेस्ट जिससे साबित हो सके कि किसी शख्स को कोरोना वायरस था और अब उसमें कुछ इम्युनिटी आ गई है. यह टेस्ट खून में एंटीबॉडीज का पता लगाता है, जिन्हें बीमारी से लड़ने के लिए शरीर पैदा करता है.
बिना लक्षण वाले
ऐसा शख्स जिसे बीमारी हुई मगर उसमें कोई लक्षण नहीं दिखाई दिए. कुछ स्टडीज से पता चला है कि कोरोना वायरस का शिकार हुए कुछ लोगों में तेज़ बुखार या कफ़ जैसे आम लक्षण नहीं नज़र आए.
कोरोना वायरस
वायरस समूह में से एक वायरस जिससे मनुष्यों या जानवरों में गंभीर या हल्की बीमारी हो सकती है. पूरी दुनिया में फैले कोरोना वायरस से कोविड-19 बीमारी हो रही है. सामान्य सर्दी या इंफ्लूएंजा (फ़्लू) फैलाने वाले दूसरे तरह के कोरोना वायरस हैं.
कोविड-19
कोरोना वायरस की वजह से फैल रही बीमारी का सबसे पहले पता 2019 के अंत में चीन के वुहान में लगा. यह मूलरूप में फ़ेफ़ड़ों पर असर डालता है.
संक्रमण की तेज़ी को रोकना
ट्रांसमिशन की दर को कम करना ताकि चार्ट पर प्रदर्शित किए जाने पर मामलों की संख्या के आधार पर पीक को फ्लैट कर कर्व को नीचे लाया जाए ताकि स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते बोझ को कम किया जा सके.
फ़्लू
इंफ्लूएंजा का संक्षिप्त नाम. एक वायरस जो कि सीजनल बीमारियों में मनुष्यों और जानवरों में फैलता है.
सामुदायिक प्रतिरोधक क्षमता
एक बड़ी आबादी तक पहुंचने के बाद किस तरह से एक बीमारी का फैलाव सुस्त पड़ता है.
लड़ने में सक्षम
ऐसा शख्स जिसका शरीर किसी बीमारी के सामने टिक सके या उसे रोक दे वह इससे इम्यून कहा जाता है. एक बार जब कोई शख्स कोरोना वायरस से उबर जाता है तो ऐसा माना जाता है कि वह एक निश्चित अवधि तक इस बीमारी का फिर से शिकार नहीं हो सकता.
वायरस के असर करने की अवधि
किसी बीमारी का शिकार होने और उसका लक्षण दिखाई देना शुरू होने के बीच की अवधि
लॉकडाउन
आवाजाही या रोज़ाना की ज़िंदगी पर पाबंदियां, जिनमें सार्वजनिक इमारतें बंद हैं और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए कहा गया है. कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कई देशों में लॉकडाउन को कड़े उपायों के तौर पर लागू किया गया है."
शुरुआत
किसी क्लस्टर या अलग-अलग इलाकों में तेज रफ्तार से बीमारी के कई मामले सामने आना.
महामारी
किसी गंभीर बीमारी का कई देशों में एकसाथ तेजी से फैलना महामारी कहलाता है.
एकांतवास
किसी संक्रामक बीमारी को फैलने से रोकने के लिए इसकी जद में आए लोगों को अलग रखना.
सार्स
सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम एक कोरोना वायरस का ही प्रकार है जो कि एशिया में 2003 में शुरू हुआ था.
सेल्फ-आइसोलेशन
घर पर ही रहना और अन्य लोगों से सभी तरह के संपर्क से बचना ताकि बीमारी को फैलने से रोका जा सके.
सामाजिक दूरी
अन्य लोगों से दूर रहना ताकि बीमारी के ट्रांसमिशन की रफ्तार कम की जा सके. सरकार की सलाह है कि अपने साथ रह रहे लोगों के अलावा दोस्तों और रिश्तेदारों से न मिलें. साथ ही सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल से भी बचें.
आपातकालीन स्थिति
किसी संकट के वक्त सरकार द्वारा रोज़ाना की जिंदगी पर पाबंदी लगाने के मकसद से उठाए गए कदम. इसमें स्कूलों और दफ्तरों को बंद करना, लोगों की आवाजाही पर पाबंदी लगाना और यहां तक कि सैन्य बलों को तैनात करना ताकि रेगुलर इमर्जेंसी सेवाओं को सपोर्ट किया जा सके."
लक्षण
संक्रमण से लड़ने के लिए शरीर की कोशिश के तौर पर इम्यून सिस्टम से किसी बीमारी के संकेत. कोरोना वायरस का मुख्य लक्षण बुखार, सूखी खांसी और सांस लेने में दिक्कत होना है."
टीका
ऐसा इलाज जिससे शरीर एंटीबॉडीज पैदा करता है, जो कि बीमारी से लड़ता है और आगे के संक्रमण से लड़ने की इम्युनिटी देता है."
वेंटीलेटर
ऐसी मशीन जो कि ऐसे वक्त पर शरीर के लिए सांस लेने का काम करती है जब फ़ेफ़ड़े काम करना बंद करने लगते हैं.
विषाणु
एक छोटा सा एजेंट जो कि किसी जीवित सेल के भीतर अपनी कॉपी बना लेता है. वायरस की वजह से ये सेल मरने लगती हैं और शरीर की सामान्य केमिकल प्रक्रियाओं को अवरुद्ध कर देती हैं जिससे बीमारी हो जाती है.
मुख्य कहानी नीचे जारी है
ट्रांसलेटर
इन सभी शब्दों का क्या मतलब है?
हालांकि पूर्व गृह सचिव बाल्मिकी प्रसाद सिंह कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सरकार ने रणनीति के तहत काम नहीं किया. वो कहते हैं, "सरकार की रणनीति थी पहले कि जो प्रवासी मज़दूर और दूसरे लोग हैं वो वहीं रहें और बाहर नहीं जाएं. और सरकार उनके लिए व्यवस्था करे. लेकिन लोगों में जो आवेश था वापस लौटने का, उसके आगे सरकार की यह रणनीति धराशायी हो गई. इसके बाद लोगों को भेजने का फ़ैसला किया गया. लेकिन उस समय लोगों को यह संभावना पता क्यों नहीं दिखी कि जब लोग लौटेंगे तो वो एक बड़ी तादाद होगी और उसके बाद आप कोई रणनीति नहीं बदले सकेंगे."
बाल्मिकी प्रसाद सिंह कहते हैं "अब तो जो है उसी के साथ चलना होगा और फिर आपको स्टेबलाइज़ करना होगा. सरकारें ऐसी ही होती हैं. प्रत्येक जगह कुछ ना कुछ ग़लतियां होती हैं. लेकिन कई बार ऐसे मामलों में दूरदर्शिता मुश्किल है. अब इसका कोई उपाय नहीं. अब इसे सिर्फ़ फ़ेस करना है."
तो क्या पहले लॉकडाउन की घोषणा से पहले मज़दूरों को लौटने के लिए वक़्त नहीं देना चाहिए था. इस सवाल के जवाब में बाल्मिकी प्रसाद सिंह कहते हैं "इसे भूल नहीं कहा जाना चाहिए. कई बार आकस्मिक मौक़े पर जो बातें कही जाती हैं उनका असर होता है और इस मामले में भी हुआ ही."
पूर्व गृह सचिव बाल्मिकी प्रसाद सिंह मानते हैं कि अब जो स्थिति है, हमें उसी में हल खोजना होगा. वो कहते हैं "अब सबसे ज़रूरी है कि टेस्ट किए जाएं, क्वारंटीन किया जाए क्योंकि अब जो रास्ता ले लिया गया है उसे बदला नहीं जा सकता. जिस रास्ते पर अब हम हैं उसी रास्ते पर बुद्धिमानी से आगे बढ़ने की ज़रूरत है."
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
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वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
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दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
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ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
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कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
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शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.