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कोरोना: जो देख नहीं सकते वो लॉकडाउन और संक्रमण से कैसे जूझ रहे?
- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
“आप लोग ग्लव्स क्यों नहीं पहनते हैं? फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग क्यों नहीं रखते हैं?”
“अगर हम ग्लव्स पहनेंगे तो हमारा काम कैसे चलेगा? हम देख नहीं सकते. हमें तो चीज़ें छूकर ही पता करनी पड़ती हैं. अगर आपसे कहा जाए कि आंखें मूंदकर चलिए तो आप चल पाएंगे?”
कुछ दिनों पहले स्मृति सिंह के पड़ोसियों और उनके बीच ऐसी ही तीख़ी बहस हुई.
स्मृति दिल्ली विश्वविद्यालय के मैत्रेयी कॉलेज में अंग्रेज़ी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. वो दृष्टिबाधित भी हैं.
नोएडा की केपटाउन सोसायटी में रहने वाली स्मृति और उनके परिवार को कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के दौरान तरह-तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.
वो बताती हैं, “जो लोग देख नहीं सकते वो चीज़ें छूकर ही पहचानते-समझते हैं. ग्लव्स पहनना हमारे लिए बहुत ही असुविधानजनक होता है. दुख इस बात है कि एक पॉश सोसायटी में रहने वाले लोगों में इतनी संवेदनशीनलता भी नहीं है कि वो हमारी परेशानी समझने की कोशिश करें. वो हम पर चिल्लाने और ताने मारने से नहीं चूकते. ”
स्मृति कहती हैं कि दृष्टिबाधित लोगों का चलते-चलते किसी के क़रीब आ जाना या किसी से छू जाना स्वाभाविक है. अगर कोई देख ही नहीं सकता तो ज़ाहिर है वो दो मीटर का फ़ासला बनाकर नहीं चल पाएगा.
उन्होंने बताया, “हमारे पड़ोसियों को इस बात से भी दिक्क़त थी कि सोसायटी का गार्ड हमारी मदद क्यों करता है! मैं समझती हूं कि वो अपनी सुरक्षा को लेकर डरे हुए हैं लेकिन ऐसी मुश्किल घड़ी में इस तरह के बर्ताव को बर्दाश्त करना भी मुश्किल है.”
स्मृति सिंह भारत के उन डेढ़ करोड़ दृष्टिबाधित लोगों में से एक हैं जो लॉकडाउन के दौरान भेदभाव और असंवेदनशीलता का शिकार हो रहे हैं.
ये भी पढ़ें: कोरोना वायरस: 'हम चल नहीं सकते, देख नहीं सकते, लॉकडाउन में कैसे रहें? सोशल डिस्टेंसिंग कैसे करें?'
‘आरोग्य सेतु: ऐसा खाना जो खानहीं सकते’
ये भेदभाव सिर्फ़ समाज के स्तर पर नहीं है. सरकार भी विकलांग समुदाय की ज़रूरतों को हमेशा की तरह नज़रअंदाज़ कर रही है.
लखनऊ में रहने वाले राकेश जैन एंड्राएड और आईओएस दोनों से आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड करने की न जाने कितनी कोशिशें कर चुके हैं.
वो कहते हैं, “हमारे लिए आरोग्य सेतु ऐप ऐसा है जैसे भूखे के सामने लज़ीज़ खाना ऐसे पैक करके रखा हो जिसे वो खाना तो दूर, खोल ही न सकता हो.”
राकेश जैन लखनऊ के नेशनल पीजी कॉलेज में अंग्रेज़ी विभाग के प्रमुख हैं और वो भी देख नहीं सकते.
आरोग्य सेतु ऐप के कई फ़ीचर्स दृष्टिबाधित लोगों के लिए एक्सेसिबल नहीं हैं.
भारतीय गृह मंत्रालय ने एक मई को जारी किए गए अपने आदेश में कहा था कि सभी निजी और सरकारी कंपनियों के लिए अपने कर्मचारियों से आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड कराना अनिवार्य है.
केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों में ये भी कहा गया था कि ऐप डाउनलोड न करने वालों को डिज़ास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत कार्रवाई भी की जा सकती है.
इसके बाद दफ़्तरों के अलावा कई अन्य जगहों पर आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड किए बिना प्रवेश पाना असंभव सा हो गया.
‘हमारे लिए बेकार है आरोग्य सेतु ऐप’
राकेश जैन कहते हैं, “पहले ही हम लोगों में संक्रमण की चपेट में आने का ख़तरा बाकियों के मुकाबले ज़्यादा है. कभी चलते हुए हमसे रेलिंग छू जाती है तो कभी दीवार. कभी हम किसी के बिल्कुल नज़दीक आ जाते हैं तो किसी से टकरा भी जाते हैं. बार-बार हाथ धोना भी हमारे लिए बाकी सबकी तरह आसान नहीं है. ऐसे में सुरक्षा के लिए सरकार ने एक ऐप बनाया, वो भी हमारे किसी काम का नहीं है.”
लखनऊ में ही रहने वाली गौरी सेन का कहना है कि बहुत से दृष्टिबाधित लोगों को तो आरोग्य सेतु डाउनलोड करने में ही परेशानी हो रही है.
गौरी केंद्र सरकार की कर्मचारी हैं और फ़िलहाल घर से ही काम कर रही हैं लेकिन आने वाले दिनों में उन्हें अपनी परेशानियां बढ़ती ही नज़र आ रही हैं.
नेशनल असोसिएशन फ़ॉर द ब्लाइंड (NAB) के महासचिव और एक्सेसिबिलिटी विशेषज्ञ प्रशांत रंजन वर्मा भी मानते हैं कि आरोग्य सेतु ऐप में कई समस्याएं हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, “सिर्फ़ दृष्टिबाधित ही नहीं बल्कि अगर बधिर और लर्निंग डिसेबिलिटी से जूझ रहे लोगों को ध्यान में रखकर देखें तो इस ऐप में कई तकनीकी ख़ामियां हैं. ये स्पष्ट है कि ऐप को विकलांग समुदाय के लिए टेस्ट करके नहीं बनाया गया है.”
हालांकि प्रशांत ये भी मानते हैं कि बाकी सरकारी ऐप के मुक़ाबले आरोग्य सेतु फिर भी थोड़ा ठीक है.
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सरकार को चिट्ठी लिखी पर कोई जवाब नहीं
दृष्टिबाधित जनों के लिए काम करने वाले संगठन ‘ऑल इंडिया कन्फ़ेडरेशन ऑफ़ द ब्लाइंड’ ने इस बार में सम्बन्धित मंत्रालयों को पत्र भी लिखा था जिसका उन्हें अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.
संगठन के उपाध्यक्ष प्रोफ़ेसर अनिल अनेजा ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि 10 दिनों के बाद भी सरकार ने हमें कोई जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा. इससे साफ़ पता चलता है कि विकलांग समुदाय सरकार की प्राथमिकता नहीं हैं.”
उन्होंने कहा, “राइट्स ऑफ़ पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज़ ऐक्ट के सेक्शन 42 के तहत ये सरकार का दायित्व है कि वो अपनी सभी वेबसाइट और अपने सभी ऐप एक्सेसिबल बनाए. ये क़ानून ख़ुद सरकार ने बनाया है और अगर वो अपने ही बनाए क़ानूनों का पालन नहीं कर रही है तो हम दूसरों से क्या उम्मीद करें?”
हालांकि लॉकडाउन के चौथे चरण में आरोग्य सेतु ऐप की अनिवार्यता को लेकर थोड़ी ढील ज़रूर दी गई है लेकिन रेल यात्रा और एयरपोर्ट पर चेक इन करने समेत कई जगहों पर यह अब भी अनिवार्य है.
लॉकडाउन खुलने से ख़त्म नहीं होंगी मुश्किलें
स्मृति का मानना है कि सरकार ने न तो लॉकडाउन के दौरान तो विकलांग जनों का ध्यान रखा और न ही लॉकडाउन खुलने के बाद की स्थिति के लिए कोई तैयारियां हैं.
वो कहती हैं, “पहले लोग हमें सड़क पर देखकर ख़ुद पास आ जाते थे और हाथ पकड़कर हमें सड़क पार करा देते थे. अब संक्रमण के डर से लोग पास आने से भी कतराने लगे हैं. लॉकडाउन में ट्रैफ़िक कम है तो हम जैसे-तैसे सड़क पार कर लेते हैं. पाबंदियां हटने के बाद जब ट्रैफ़िक बढ़ेगा तब हम क्या करेंगे? संक्रमण का डर तो तब भी रहेगा. लोग तब भी पास नहीं आएंगे.”
राकेश जैन भी कुछ ऐसी ही समस्या की ओर ध्यान दिलाते हैं. उन्होंने कहा, “अभी दुपहिया वाहन में एक ही व्यक्ति के बैठने की छूट है लेकिन कोई विकलांग व्यक्ति बाइक या स्कूटर कैसे चला पाएगा? उसे तो किसी के साथ ही बैठना होगा. ट्रैफ़िक पुलिस तो सिर्फ़ वाहन की नंबर प्लेट देखकर घर पर चालान भेज देती है. उसे कैसे पता चलेगा कि बाइक पर पीछे बैठा व्यक्ति देख या चल नहीं सकता?”
प्रशांत रंजन वर्मा दृष्टिबाधित और विकलांग जनों की समस्याओं की एक लंबी लिस्ट गिनाते हैं:
-हमारा इंफ़्रास्ट्रक्चर ही ऐसा है जहां फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग की बहुत कम गुंज़ाइश है. ख़ासकर, विकलांग लोगों के लिए तो ये बेहद मुश्किल है. जैसे, मेट्रो में मेट्रो का स्टाफ़ और एयरपोर्ट पर एयरपोर्ट का स्टाफ़ दृष्टिबाधित लोगों की मदद करता था. अब ये कैसे हो पाएगा?
-ब्लाइंड स्कूलों में बच्चे समूह में बैठकर पढ़ते और सीखते थे. अब ये व्यवस्था जारी रखने में मुश्किल होगी. दृष्टिबाधित छात्रों की परीक्षा दिलवाने के लिए कोई उनके साथ बैठता था. वो सवालों के जवाब बोलते थे और वो सुनकर लिखता जाता था. क्या ये जारी रह पाएगा?
-लॉकडाउन में जो दृष्टिबाधित लोग कहीं अकेले रह गए हैं उनका काम कैसे चल रहा है? स्विगी, ज़ोमैटो और बिग बास्केट के ऐप भी पूरी तरह एक्सेसिबल नहीं हैं. ऐसे में देख न सकने वालों के लिए ऑनलाइन खाना या कोई दूसरी चीज़ ऑर्डर करना भी मुश्किल है.
-विकलांगों के लिए काम करने वाली संस्थाएं बंद होने की कगार पर हैं. उनके लिए स्टाफ़ को सैलरी देना तक मुश्किल हो रहा है. यानी उन्हें जहां से जो भी थोड़ी-बहुत मदद मिलती थी, अब वो भी बंद होने का डर है.
प्रशांत कहते हैं, “ऐसा लगता है कि सरकारें हमारे बारे में सोचती ही नहीं हैं. और अगर सोचती भी हैं तो सबसे आख़िर में.”
क्या कहते हैं क़ानून और सरकारी दिशानिर्देश
सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय के दिव्यांग जन सशक्तीकरण विभाग नेगाइडलाइंस और एक्शन पॉइंट्स की लंबी फ़ेरहिस्त जारी की है:
-विकलांग व्यक्तियों की देखभाल करने वालों को लॉकडाउन के नियमों से छूट मिलनी चाहिए. संक्रमण के ख़तरे से बचाव के लिए उन्हें पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट (पीपीई) दिए जाने चाहिए.
-रेज़िटेंड वेलफ़ेयर असोसिएशन्स को विकलांग लोगों और उनकी ज़रूरतों के बारे में संवेदनशील बनाया जाए.
-अगर कोई विकलांग व्यक्ति अकेले या क्वारंटीन में है तो खाने-पीने की चीज़ें, दवाइंया और ज़रूरी सामान उनके पास पहुंचाए जाने चाहिए.
-दृष्टिबाधित और अन्य गंभीर विकलांगता से जूझ रहे लोगों को लॉकडाउन के दौरान काम से छुट्टी से दी जानी चाहिए.
-करोनो वायरस से जुड़ी हर जानकारी एक्सेसिबल फॉर्मेट में उपलब्ध होनी चाहिए.
-विकलांग जनों की काउंसलिंग और अन्य ज़रूरतों के लिए 24 घंटे चालू रहने वाली हेल्पलाइन मौजूद हो जहां उन्हें सांकेतिक भाषा और वीडियो कॉलिंग के ज़रिए जानकारी दी जाए.
संयुक्त राष्ट्र ने भी इन्क्लूज़िव कोविड-19 रिस्पॉन्स की बात की है औरइसमें सम्बन्धित कई सुझाव जारी किए हैं:
- विकलांग जनों के कोरोना वायरस संक्रमण की गिरफ़्त में आने की आशंका ज़्यादा होती है, इसलिए उनकी टेस्टिंग को प्राथमिकता दी जाए
- स्वास्थकर्मियों को विकलांग लोगों के इलाज के लिए ख़ास तौर पर प्रशिक्षित किया जाए.
- महामारी के दौरान विकलांग जनों के शारीरिक, मानसिक और यौन हिंसा का शिकार होने की आशंका बढ़ जाती है. इसलिए उनके लिए 24 घंटे एक्टिव इमर्जेंसी हेल्पलाइन, फ़ोन पर काउंसलिंग आश्रय गृह और क्वारंटीन की व्यवस्था की जाए.
- बेरोज़गार और कम आमदनी वाले विकलांग जनों को सहायता राशि दी जाए. उनकी नियमित मदद राशि बढ़ाई जाए.
- दुकानों और मॉल में खरीदारी के लिए कुछ घंटे सिर्फ़ विकलांग और बुजुर्गों के लिए तय किए जाएं.
विकलांग जनों के लिए कुछ महत्वपूर्ण नंबर
किसी भी तरह की मानसिक परेशानी के लिए काउंसलिंग : 0804611007
कोविड -19 से जुड़ी एक्सेसिबल जानकारी के लिए 24 घंटे उपबल्ध हेल्पलाइन 011-23978046, 9013151515
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