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कोरोना वायरस: 'हम चल नहीं सकते, देख नहीं सकते, लॉकडाउन में कैसे रहें? सोशल डिस्टेंसिंग कैसे करें?'
- Author, सिंधुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"लॉकडाउन ने अब मुझ पर भी असर दिखाना शुरू कर दिया है. मेरे घर पर मैं और मेरी वाइफ हैं. मेरी पत्नी पिछले आठ साल से कुछ सोच-समझ नहीं पातीं. मैं भी दिव्यांग हूं. कहीं आ-जा नहीं सकता..."
72 वर्षीय विनय श्रीकर को कुछ दिनों पहले मजबूरी में ये बातें फ़ेसबुक पर लिखनी पड़ीं.
लखनऊ में रहने वाले विनय के पैरों में तकलीफ़ है और उनकी पत्नी सिज़ोफ़्रेनिया (एक तरह की मासनिक बीमारी) से ग्रसित हैं.
ऐसे में लॉकडाउन के बाद विनय और उनकी पत्नी, दोनों के लिए ही बड़ी मुसीबत पैदा हो गई है. उन्हें खाना मिलना भी मुश्किल हो गया है.
शहर में कुछ जगहों पर लोग मुफ़्त खाना खिला रहे हैं लेकिन विनय के लिए वहां तक चलकर जाना मुश्किल है.
विनय श्रीकर को अपनी ब्लड प्रेशर की दवाइयां मंगाने के लिए भी आस-पास के लोगों से मिन्नतें करनी पड़ती हैं और आजकल उनका हर दिन किसी न किसी से मिन्नतें करते ही बीत रहा है.
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विकलांग कैसे करेंगे सोशल डिस्टेंसिंग?
कोरोना संक्रमण का ख़तरा और लॉकडाउन भारत में विकलांग जनों के लिए एकसाथ कई मुसीबतें लेकर आया है. चलने-फिरने और खाने-पीने जैसी छोटी-छोटी चीज़ों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने वाले विकलांग लोगों के लिए 'सोशल डिस्टेंसिग' का पालन कर पाना औरों से कहीं ज़्यादा मुश्किल है.
न तो उनके लिए बार-बार वॉशरूम जाकर हाथ धोना आसान है और न ही अकेले सारे काम निबटाना.
भारतीय सांख्यिकी मंत्रालय के जुलाई, 2018 में किए गए सर्वे के मुताबिक़ भारत में लगभग 2.2 करोड़ लोग विकलांग हैं और उनमें से करीब 70 फ़ीसदी आबादी गांवों में रहती है. ज़ाहिर है, एक बड़ी आबादी संक्रमण के ख़तरे और लॉकडाउन की परेशानियों से जूझ रही है.
दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से पीएचडी करने वाली निधि मिश्रा को लॉकडाउन के ऐलान से पहले ही अपने घर उत्तर प्रदेश जाना पड़ा था.
संक्रमण का दोहरा ख़तरा, लॉकडाउन की दोहरी मार
26 साल की निधि दृष्टिबाधित हैं और जेएनयू के 'सेंटर फ़ॉर सोशल एक्स्कलूज़न ऐंड इंक्लूसिव पॉलिसी' में पढ़ाई करती हैं.
उन्होंने बीबीसी से बातचीत में बताया कि संक्रमण के ख़तरे को देखते हुए जेएनयू में लॉकडाउन से पहले ही क्लासेज़ बंद कर दी गई थीं. छात्रों के इकट्ठा होने पर भी रोक लगा दी गई थी और हॉस्टल खाली करने को कह दिया गया था.
निधि कहती हैं, "बाकी छात्रों के लिए तो फिर भी उतनी मुश्किल नहीं थी. वो बिना किसी की मदद के अपने घर चले गए लेकिन मैं चूंकि देख नहीं सकती इसलिए मुझे अपने घर वालों को यहां बुलाना पड़ा. किसी तरह मेरे घरवाले दिल्ली पहुंचे और अपने मुझे साथ घर लेकर गए. यानी हमने संक्रमण का दोहरा ख़तरा झेला."
निधि बताती हैं कि लॉकडाउन के हफ़्ते भर पहले से जेएनयू कैंपस के अंदर स्विगी और ज़ोमैटो जैसी फ़ूड डिलिवरी सर्विस रोक दी गई थी और यूनिवर्सिटी के मेस भी बंद होने लगे थे.
उन्होंने बताया, "एक तरफ़ खाना डिलिवर करने वालों को मेन गेट के अंदर नहीं आने दिया जाता था और दूसरी तरफ़ मेस में खाना बनना बंद हो रहा था. ऐसे में मुझ जैसे दृष्टिबाधित और विकलांग छात्रों के लिए ठीक से खाना-पीना भी मुनासिब नहीं था. हमारे लिए बार-बार अकेले हॉस्टल से मेन गेट तक खाना लेने जाना आसान नहीं होता था."
इन सभी परेशानियों के बावजूद दूसरों की मदद के लिए हरसंभव कोशिश कर रही हैं. वो कहती हैं, ''अगर किसी को खाने-पीने और दवाइयों जैसी बुनियादी चीज़ें न मिल रही हों तो वो मुझसे बेहिचक संपर्क करे. मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करूंगी कि उसकी मदद हो जाए.''
पटना में काम करने वाले अविनाश को लॉकडाउन के बाद छुट्टी लेकर अपने गांव जाना पड़ा क्योंकि उनके लिए अकेले रहना मुश्किल हो रहा था.
30 वर्षीय अविनाश के परिवार में उनके माता-पिता और एक भाई हैं जो ख़ुद भी विकलांग हैं.
अविनाश कहते हैं, "ऐसे मुश्किल वक़्त में सरकार की तरफ़ से भी हमसे संपर्क साधने की कोई कोशिश नहीं हुई. न पंचायत स्तर से और न ही कहीं और से."
क्या कर रही है सरकार?
सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग ने लॉकडाउन में विकलांग समुदाय को ध्यान में रखते हुए कुछ दिशानिर्देश जारी किए थे. जैसे कि:
-क्वरंटीन या आइसोलेशन में रह रहे विकलांग लोगों के लिए ज़रूरी खाना, पानी और दवाइयां उनके घर तक पहुंचाई जानी चाहिए.
-विकलांग लोगों के परिजनों या उनके लिए काम करने वाली संस्थाओं को ट्रैवेल पास मिले.
-कोविड-19 से जुड़ी हर जानकारी स्थानीय और एक्सेसिबल भाषा (ऑडियो, सांकेतिक भाषा और ब्रेल) में उपलब्ध हो.
-अस्पताल में काम करने वाले और अन्य आपातकाली सेवाएं देने वाले लोगों को विकलांग जनों के प्रति संवेदनशील बनाया जाए.
-हर सरकारी और निजी संस्थान में ज़रूरी सेवाएं देने वाले दिव्यांग जनों को पूरे भुगतान के साथ छुट्टी दी जाए.
-दुकानों में एक तय अवधि में सिर्फ़ विकलांगों और बुजुर्गों को खरीदारी की सुविधा दी जाए.
-किसी भी तरह की मानसिक परेशानी के लिए ऑनलाइन काउंसलिंग उपलब्ध कराई जाए. (0804611007)
-24 घंटे उपबल्ध हेल्पलाइन जहां एक्सेसिबल तरीके से जानकारी मिल सके. (011-23978046, 9013151515)
दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग के सोशल मीडिया हैंडल्स (Disability Affairs, @socialpdws) पर सांकेतिक भाषा, ऑडियो और वीडियो के ज़रिए कोविड-19 से जुड़ी कुछ जानकारियां दी जा रही हैं, लेकिन विशेषज्ञ इसे नाकाफ़ी बताते हैं.
भीख मांगकर जीने वाले विकलांगों का क्या?
वर्ल्ड बैंक में 'इंक्लूज़न कंसल्टेंट' रहे समीर घोष कहते हैं कि सबसे बड़ी बाधा जानकारी का एक्सेसिबल न होना है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के बारे में देश के प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री तक बोल रहे हैं लेकिन साइन लैंग्वेज कहां है? ब्रेल बुकलेट्स कहां हैं? एक्सेसिबल वेबसाइट्स कितनी हैं? जब प्रधानमंत्री देश को संबोधित करते हैं तो उनकी बातों को कोई साथ-साथ साइन लैंग्वेज में क्यों नहीं समझाता. समस्या ये है कि विकलांग जनों तक ख़बरें और सूचनाएं भी दूसरे चरण में पहुंचती हैं."
समीर घोष ख़ुद भी विकलांग हैं और विकलांग समुदाय के लिए कई नीतियां बनाने में भारत सरकार की मदद कर चुके हैं.
वो कहते हैं, "दूसरी सबसे बड़ी समस्या है विकलांग समुदाय का आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा होना. इन वजहों से न सिर्फ़ उन पर लॉकडाउन का दोहरा असर पड़ा है बल्कि उनके कोरोना वायरस के संक्रमण में आने की आशंका भी ज़्यादा है."
समीर घोष याद दिलाते हैं कि आज भी भारत में विकलांगों की एक बड़ी संख्या भीख मांगकर अपना पेट भरती है.
वो कहते हैं, "आप उस विकलांग व्यक्ति के बारे में सोचिए जो ट्राइसाइकल पर बैठा मंदिरों के बाहर किसी भंडारे का इंतज़ार करता है. लॉकडाउन में उसे खाना कहां से मिल रहा होगा? वो बार-बार हाथ कैसे धो रहा होगा?"
समीर कहते हैं, "विकलांग लोग वैसे भी आमतौर पर साथ-साथ रहना पसंद करते हैं ताकि एक-दूसरे की मदद कर सकें. अब कोरोना के ख़तरे को देखते हुए लोगों को दूरी बनाने को कहा जा रहा है. दूरी जितनी बढ़ेगी, उनकी ज़िंदगी भी उतनी ज़्यादा मुश्किल हो जाएगी."
'दिव्यांगजनों को आम लोगों में गिना ही नहीं जाता'
समीर कहते हैं कि सरकारें जो दिशा-निर्देश बनाती हैं, उसकी भाषा ऐसी होती है कि किसी तरह की असुविधा होने पर आप सरकार पर सवाल नहीं उठा सकते. मिसाल के तौर पर- To the extent possible (जहां तक संभव हो सके) और Within their means (अपनी क्षमता के अनुसार).
यानी अगर आपको वो सुविधा नहीं मिली, जिसका वादा किया गया था तो सरकारें साफ़ कह सकती हैं कि ये संभव नहीं हो पाया.
समीर कहते हैं, "ऐसा लगता है कि विकलांगों को मिलने वाली सुविधाएं वैकल्पिक हैं और जब तक ये वैकल्पिक बनी रहेंगी, समस्याएं भी तस की तस बनी रहेंगी."
डॉक्टर्स विद डिसएबिलिटीज़: एजेंट्स ऑफ़ चेंज ने भी इस बारे में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और सामाजिक न्याय एंव सशक्तीकरण मंत्रालय को चिट्ठी लिखी है.
विकलांग डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के इस संगठन ने अपनी चिट्ठी में लिखा है, "कोविड-19 के बारे में उपलब्ध ज़्यादातर जानकारियां एक्सेसिबल नहीं हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय की एक एक भी प्रेस वार्ता साइन लैंग्वेज में नहीं है और न ही ये दृष्टिबाधित लोगों के लिए सुगम (एक्सेसिबल) है."
- दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर कोविड-19 से जुड़ा एक भी अपडेट नहीं है.
- देश में विकलांग लोगों के लिए नौ अलग-अलग संस्थान हैं लेकिन वो पैन्डेमिक के इस दौर में कुछ ख़ास नहीं कर रहे हैं.
- दृष्टिबाधित लोगों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग बना पाना बेहद मुश्किल है क्योंकि वो ज़्यादातर काम छूकर करते हैं. इसके बावजूद विकलांगों के लिए काम करने वाली प्रमुख राष्ट्रीय संस्थाओं ने इस बारे में कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं.
इसके अलावा केंद्र सरकार का महत्वाकांक्षी एक्सेसिबल इंडिया अभियान भी पिछले कुछ वर्षों से ठप पड़ा है.
न तो एक्सेसिबल इंडिया की वेबसाइट पर कोविड-19 से जुड़ी कोई जानकारी है और न ही इसके सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म्स पर.
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