#BoysLockerRoom: बलात्कार का पहला क़दम है लड़कों की ऐसी 'प्राइवेट बातचीत'-ब्लॉग

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    • Author, सिन्धुवासिनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ट्रिगर वॉर्निंग: यौन उत्पीड़न, सेक्सिज़्म

ये ट्रिगर वॉर्निंग उन लोगों के लिए नहीं है जिन्हें सोशल मीडिया पर औरतों को रोज़ मिलने वाली बलात्कार की धमकियां सामान्य लगती हैं.

ये ट्रिगर वॉर्निंग उन लोगों के लिए नहीं है जिन्हें किसी लड़की के शरीर के बारे में हल्के ढंग से कमेंट करके हंसी आती है. ये ट्रिगर वॉर्निंग उन लोगों के लिए भी नहीं है जिन्हें 'हसबैंड-वाइफ़' वाले घटिया चुटकुले शेयर करने से कोई गुरेज़ नहीं है.

ये ट्रिगर वॉर्निंग उन लड़कियों, उन महिलाओं के लिए है जो रोज़ इसका शिकार होती हैं, रोज़ इससे प्रभावित होती हैं.

अब आगे.

"ब्रो, इस लड़की को बुलाते हैं. हम सानी से इसका रेप कर सकते हैं. मैं और लड़कों को बुला लूंगा. हम इसका गैंगरेप कर सकते हैं. हम बहुत कुछ कर सकते हैं."

"डूड, ये देख. इसकी न्यूड सेल्फ़ी. मैं 10वीं क्लास में इससे हुकअप करता था, रोज़ मुझे न्यूड्स भेजती थी."

"ब्रो, एक काम करते हैं. जो हमारे ख़िलाफ़ बोल रही हैं ना, उनकी न्यूड्स लीक कर देते हैं. बड़ी फ़ेमिनिस्ट बन रही हैं. कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएंगी."

ये बातें दिल्ली के महंगे, एलीट और मॉर्डन स्कूलों में पढ़ने वाले 15-16 साल के लड़के कर रहे हैं. अपने ही स्कूल में पढ़ने वाली अपनी ही उम्र की लड़कियों के बारे में.

ये सारी बातें इंस्टाग्राम पर boieslockerroom नाम के एक ग्रुप में हो रही थीं. किसी तरह इसके स्क्रीनशॉट बाहर आ गए और अब दिल्ली पुलिस की साइबर सेल इसकी जांच कर रही है.

लॉकर रूम टॉक

लॉकर रूम

लॉकर रूम यानी बंद कमरा और बंद कमरे में हुई बातचीत यानी लॉकर रूम टॉक. विस्तृत मायनों में लॉकर रूम टॉक का मतलब मर्दों की उस बातचीत जिसमें औरतें शामिल नहीं होतीं.

ये लॉकर रूम कहीं भी हो सकता है. जैसे कि कोई वॉट्सऐप या फ़ेसबुक ग्रुप, कोई बार, जिम या ऑफ़िस का कोई हिस्सा, जहां मर्द इकट्ठे होकर औरतों के बारे में चाहे जैसी बातें कर सकते हैं.

चूंकि ये बातें पब्लिक स्पेस में नहीं होतीं, इनके बारे में आम तौर पर कोई नहीं जान पाता. सिवाय उन पुरुषों के, जो इसका हिस्सा होते हैं. हां, ये बात और है कि इस लॉकर रूम में हुई बातचीत भी कभी न कभी सामने आ ही जाती है, जैसे इन स्कूली लड़कों का इंस्टाग्राम ग्रुप सामने आ गया.

इसमें क्या दिक्कत है?

ये जानकर ज़रा भी हैरानी नहीं होती कि बहुत से लोग इन स्कूली लड़कों की चैट को 'प्राइवेट बातचीत' बताकर उसका बचाव कर रहे हैं.

लड़के हैं, आपस में थोड़ा 'हंसी-मज़ाक' कर भी लिया तो उसमें क्या दिक़्कत है? ग्रुप में होने वाली ऐसी बातचीत में दरअसल दिक्कतें बहुत सी हैं और दिक्कतों को समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है.

पहली दिक्कत

मान लेते हैं कि ये उन लड़कों की निजी बातचीत है. मगर, ये न भूलें कि आपकी निजता का अधिकार वहीं ख़त्म हो जाता है जहां से किसी और की निजता शुरू होती है.

अगर किसी लड़की ने किसी लड़के को न्यूड सेल्फ़ी भेजी तो उसका दायित्व है कि वो उसे अपने तक रखे. अगर वो यह तस्वीर बिना ल़ड़की की सहमति से कहीं और भेजता है तो यह लड़की की निजता का उल्लंघन है. भले ही वो तस्वीर किसी 'लॉकर रूम' में शेयर क्यों न हो. ये न सिर्फ़ नैतिक रूप से ग़लत है बल्कि क़ानूनी अपराध भी है.

दूसरी दिक्कत

अगर आप उस इंस्टाग्राम ग्रुप की चैट देखें तो पाएंगे कि सभी लड़के एक-दूसरे का साथ दे रहे हैं. सब मिलकर लड़कियों के शरीर का मज़ाक बना रहे हैं, सब मिलकर उनके रेप की योजना बना रहे हैं.

लड़के हँस रहे हैं, रेप की बात कहकर हँसने वाली इमोजी बना रहे हैं और कोई इस पर आपत्ति नहीं जता रहा है.ये सब 'रेप कल्चर' को बढ़ावा देता है. ये ऐसे व्यवहार को 'नॉर्मल' बनाता है.

अगर आप एक प्राइवेट ग्रुप में 'रेप जोक्स' शेयर कर रहे हैं, उस पर हंस रहे हैं तो क्या पब्लिक में आने पर आपके विचार अचानक बदल जाएंगे? नहीं.

सच तो ये है कि भले ही आप दुनिया को दिखाने के लिए कुछ और बोलें मगर आपके मन में वही बात रहेगी जो आपने उस 'लॉकर रूम' में कहीं थीं.

महिलाओं का प्रदर्शन

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तीसरी दिक्कत

ग्रुप में और बड़ी संख्या में कही गई बातें इसलिए भी ज़्यादा ख़तरनाक होती हैं क्योंकि वो आपको 'ताकतवर' और 'सही' होने का अहसास दिलाती हैं.

एक सीधा सा सिद्धांत है कि अगर बहुत से लोग हमारा समर्थन करते हैं तो हम अपनी बात पर ज़्यादा मज़बूती से टिके रहते हैं. अगर ग्रुप में 25 लोग आपके भद्दे कमेंट्स पर हँस रहे हैं तो वो आपको एक तरह की मानसिक मज़बूती दे रहे हैं.

ऐसे में अगर कोई आपको ग़लत कहे तो आप ये मानने को तैयार नहीं होंगे. क्योंकि आपको लगेगा: अरे! इतने सारे लोग एकसाथ ग़लत कैसे हो सकते हैं? क्या मेरे साथ के बाकी 24 लोग ग़लत हैं? सब ऐसा करते हैं, फिर तो ये स्वीकार्य ही होगा!

ये है 'लॉकर रूम' में होनी वाली बातचीत का असर और ख़तरा.

चौथी दिक्कत

अगर पुरुष आपस में ऐसी बातचीत करते हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि वो औरतों को अपने बराबर नहीं समझते. क्योंकि जिसे आप वाक़ई में ख़ुद के बराबर समझेंगे, उसके बारे में ऐसा कुछ कहने से पहले दो बार सोचेंगे.

इतना ही नहीं, ये सब आपको महिलाओं के साथ कभी सामान्य रिश्ता नहीं बनाने देगा. आप उन्हें सिर्फ़ किसी सेक्स की वस्तु की तरह देखेंगे. अपने बराबर के इंसान के तौर पर, एक सहकर्मी या दोस्त के तौर पर नहीं.

पहले आप पीठ पीछे लॉकर रूप में 'मज़ाक' करेंगे, फिर सार्वजनिक रूप से यही बातें कहेंगे. सोशल मीडिया पर लड़कियों को अपने विचार ज़ाहिर करने के लिए, विरोध जताने के लिए और महज अपनी तस्वीरें पोस्ट करने के लिए ट्रोल करेंगे.

फिर आपको कपिल मिश्रा के उस ट्वीट में कोई बुराई नज़र नहीं आएगी जिसमें वो कहते हैं, "सफ़ूरा जरगर की प्रेगनेंसी को मेरे भाषणों से न जोड़ा जाए. चीज़ें ऐसे नहीं होतीं." या फिर आप सिर्फ़ इसके बुरा लगने का ढोंग करेंगे क्योंकि पीठ पीछे तो आप ख़ुद ऐसी बातें करते हैं!

धीरे-धीरे ऐसी बातें, ऐसी ही 'लॉकर रूम टॉक' और ऐसी ही 'लूज़ टॉक' बलात्कार जैसे यौन अपराधों को अंजाम देंगी.

महिलाओं का प्रदर्शन

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लॉकर रूप से लेकर खुले तौर पर उत्पीड़न

क्या ये लॉकर रूम हमें वाक़ई हैरान करता है? क्या इसमें कुछ नया है? नहीं.

हम रोज़ तो देखते हैं ट्विटर पर महिलाओं से जुड़ी गालियां ट्रेंड करते हुए. रोज़ फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम पर न जाने कितनी लड़कियों को गालियां, बलात्कार की धमकी और चरित्र हनन...ये सब झेलना पड़ता है. कुछ को अपने इनबॉक्स में और कुछ को खुले तौर पर. कुछ इसका स्क्रीनशॉट शेयर करके 'अंटेशन सीकर' कहलाती हैं और कुछ बिना किसी से कहे-सुने रोज़ इसका शिकार होती हैं.

ऐसी यौन हिंसा किसी न किसी रूप में हर वर्ग में, हर जगह मौजूद है. पिता अपने बेटे के सामने मां-बहन की गालियां देता है. सब कुछ नॉर्मल लगता है. फिर बेटा अपने दोस्तों के साथ मिलकर गालियां देता है, सब कुछ 'कूल' लगता है.

स्कूली लड़के एक-दूसरे को 'आई हैड फ़न टाइम विद योर मॉम' कहकर 'कूल' दिखने की कोशिश करते हैं. धीरे-धीरे ये सब इस हद तक कूल लगने लगता है कि इसमें कुछ ग़लत दिखता ही नहीं.

स्कूलों में शिक्षक लड़कियों की स्कर्ट की लंबाई पर कमेंट करते हैं. ये वही शिक्षक हैं जो सेक्स एजुकेशन पढ़ाते हुए 'सेक्स' शब्द बोलते तक नहीं. या फिर लड़कियों को अलग ले जाकर मासिक धर्म के बारे में बताते हैं.

माता-पिता बेटियों की 'सेफ़्टी' रहने के नाम पर उन पर बंदिशें लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ते लेकिन बेटों की हरकतों पर कोई सवाल नहीं उठाते.

इसी परवरिश का नतीज़ा है लड़कियों के साथ होने वाली हिंसा और शोषण को नॉर्मल मान लिया जाता है. ख़ुद माता-पिता और परिवार के लोग लड़की के उत्पीड़न को कई बार उसी की ग़लती मानते हैं.

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#NotAllMen?

हैशटैग नॉट ऑल मेन-यानी सभी मर्द एक जैसे नहीं होते. जब भी महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों या ग़ैर-बराबरी की बात होती है, बचाव के रूप में इस हैशटैग का ब्रह्मास्त्र आगे कर दिया जाता है.

स्कूल की जिन लड़कियों ने अपने बॉयफ़्रेंड को न्यूड्स भेजे होंगे उन्होंने भी शायद यही सोचा होगा: #NotAllMen.

दिलचस्प बात ये है कि अक्सर पिता या भाई अपनी बेटियों और बहनों को समझाते हुए कहते हैं-मैं मर्द हूं इसलिए जानता हूं उनके दिमाग़ में क्या चलता है. इसलिए तुम्हें उनसे प्रोटेक्ट करने की कोशिश कर रहा हूं. मगर यौन उत्पीड़न, बलात्कार और ग़ैर-बराबरी की बात करते ही यही पुरुष एक स्वर में कह उठते हैं: #NotAllMen

मुद्दा #NotAllMen या #YesAllMen का नहीं है. मुद्दा ये है कि #NotAllMen कहकर आप मौजूदा अपराधों को दरकिनार नहीं कर सकते. इससे आप बस ख़ुद को अलग कर लेते हैं या फिर अप्रत्यक्ष रूप से दोषियों को बचाने की कोशिश ही करते हैं क्योंकि कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में आप उनमें ख़ुद को देखते हैं.

क्या ये समझना इतना मुश्किल है कि अगर एक वर्ग दूसरे वर्ग के साथ ग़लत करता है तो दोषी वर्ग को ज़िम्मेदार ठहराया ही जाएगा? बेहतर होगा कि #NotAllMen कहकर पतली गली से बच निकलने के बजाय आप 'ब्रो कल्चर' को ख़त्म करें. पुरुष एक-दूसरे को ग़लत बर्ताव पर रोकें और टोकें, ज़िम्मेदार ठहराएं. एक-दूसरे की ग़लतियां ढंकने के बजाय उनका विरोध करें.

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ये 'इक्वल टू' वाला मामला नहीं है

लड़कों के 'लॉकर रूम कन्वर्सेशन' का अब ये कहकर बचाव किया जा रहा है कि लड़कियों के ग्रुप में भी तो लड़कों के बारे में 'इस तरह की बातें' होती हैं.

BoiesLockerRoom सामने आने के बाद अचानक GirlsLockerRoom और Hot Guys Memes जैसे ग्रुप्स की चर्चा भी होने लगी है.

अब ये समझना इतना भी मुश्किल नहीं है कि लड़कियों का 'वो कितना हॉट है', लड़कों के 'भाई, उसे दारू पिलाकर उसके मज़े लेते हैं' के बराबर नहीं है.

लड़कियों का किसी लड़के को अपना क्रश बताना या उसके बार में फ़ैंटेसाइज़ करना लड़कों के 'भाई, उसके साथ सोई थी. इसे कमरे पर बुलाते हैं' के बराबर नहीं है.

क्या GirlsLockerRoom में लड़कियां, पुरुषों के रेप की योजना बना रही हैं? नहीं. इसलिए ये इक्वल टू वाला मामला नहीं है.

यौन उत्पीड़न

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पुरुषों का उत्पीड़न कौन करता है?

जब भी महिलाएं अपने साथ होने वाले यौन अपराधों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती हैं, एक वर्ग कह उठता है: पुरुषों का भी तो शोषण होता है.

ये सच है कि पुरुषों का भी बलात्कार होता है. पुरुष भी यौन उत्पीड़न का शिकार होते हैं. मगर ये करता कौन है? ज़्यादातर मामलों में ख़ुद पुरुष.

महिलाओं द्वारा पुरुषों के यौन उत्पीड़न का क्या अनुपात है? क्या पुरुषों के यौन उत्पीड़न का हवाला देकर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को 'न्यूट्रलाइज़' किया जा सकता है? या पुरुषों के यौन शोषण का ज़िक्र करके महिलाओं का यौन शोषण जारी रहने को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है?

ये सारा मामला ग़ैर-बराबरी का है. आप जिसे ख़ुद से कमज़ोर समझेंगे उसी का मज़ाक बनाएंगे, उसे ही भद्दी बातें कहेंगे और उसका ही उत्पीड़न करेंगे.

शारीरिक आकर्षण और यौन इच्छाएं प्राकृतिक हैं लेकिन इनकी पूर्ति बिना दूसरे पक्ष की सहमति से और हिंसा या धोखे के ज़रिए नहीं की जा सकती. बस इतनी सी बात समझनी है. अगर सहमति से सेक्स होता है तो इसमें लड़की की बदनामी और लड़के की बहादुरी नहीं है. बस इतनी सी बात समझनी है.

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