ब्लॉग: 'स्त्री ज़बरदस्ती नहीं करती, ज़बरदस्ती मर्द करते हैं'

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    • Author, सिन्धुवासिनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

लेकिन स्त्री ने हमारे साथ ज़बरदस्ती 'वो' कर लिया तो?

नहीं, स्त्री किसी के साथ ज़बरदस्ती नहीं करती. ज़बरदस्ती मर्द करते हैं. स्त्री पहले पूछती है- हैलो मिस्टर फ़लाना ढिमकाना...

ये सुनते ही दिल्ली के चाणक्यपुरी पीवीआर थिएटर में ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगते हैं.

डायलॉग एक हॉरर-कॉमेडी फ़िल्म 'स्त्री' का है.

कहानी उस स्त्री की जो सेक्स वर्कर (समाज जिसे वेश्या कहता है) थी और उसे किसी से इश्क़ हुआ था.

बात शादी तक पहुंच गई, लेकिन शादी हो नहीं पाई क्योंकि शहर के लोगों को ये बर्दाश्त नहीं हुआ.

एक सेक्स वर्कर किसी से प्रेम कर रही है, शादी करके अपना घर बसाना चाहती है. अगर वो शादी कर लेगी तो पुरुषों की यौन कुठांओं की पूर्ति कौन करेगा?

'स्त्री': फ़िल्म के ट्रेलर की एक झलक

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स्त्री की सुहागरात

नतीज़ा स्त्री और उसके प्रेमी की हत्या कर दी गई. अब वो स्त्री अपना खोया प्यार वापस पाना चाहती है. अपनी सुहागरात मनाना चाहती है. बड़ी ही शिद्दत से. लेकिन स्त्री तो वेश्या थी ना?

एक सेक्स वर्कर के मन में सुहागरात की इतनी लालसा क्यों है? वो तो रोज़ न जाने कितने मर्दों के साथ सोती होगी!

फ़िल्म देखते हुए मन इन सवालों के समदंर में डूबता-उतराता है. सेक्स वर्कर थी, रोज़ न जाने कितने मर्दों के साथ सोती थी. वो मर्दों के साथ सोती थी या मर्द उसके साथ सोते थे? क्या कोई रात उसके लिए सुहागरात जैसी रही होगी? या उसके साथ बलात्कार हुआ होगा?

ख़ैर! अब स्त्री अपना खोया प्यार ढूंढ रही है, अपनी सुहागरात का इंतज़ार कर रही है.

फ़िल्म का एक दृश्य

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उसके पास सबका आधार नंबर है!

अब वो शहर के मर्दों को नाम लेकर पुकारती है और जो उसकी तरफ़ मुड़कर देखता है उसे उठा ले जाती है.

स्त्री को सबका नाम और पता मालूम है क्योंकि उसके पास सबका आधार नंबर है. हां, वही वाला आधार जो 13 फ़ीट ऊंची और पांच फ़ीट मोटी दीवार के पीछे सुरक्षित है! लेकिन हैकरों ने ट्राई वाले शर्मा जी की डिटेल्स नहीं छोड़ी तो ये तो फिर स्त्री है! कैसे न मर्दों की डिटेल निकाल लेती?

मर्दों को उठा ले जाती है मगर छोड़ जाती है उनके कपड़े.

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मर्द को दर्द हो रहा है

मर्दों के वो छूटे हुए कपड़े शहर भर में दहशत फैला रहे हैं. मर्दों को दर्द हो रहा है. मर्द घरों में बंद हैं, औरतें बाहर जा रही हैं. मर्द उनसे जल्दी घर वापस आने को कह रहे हैं क्योंकि उन्हें डर सता रहा है. उन्हें स्त्री का डर सता रहा है.

अब मांएं अपने बेटों को जल्दी लौटने और रात में बाहर न घूमने की हिदायत दे रही हैं. बहनें अपने भाइयों की रक्षा के लिए बॉडीगार्ड बन उनके साथ चल रही हैं. पार्टी करते लड़कों को अंधेरा बढ़ते ही मम्मी की डांट का डर सता रहा है.

यानी सब कुछ असलियत से उल्टा-पुल्टा हो गया है. औरतों और मर्दों की भूमिकाएं बदल गई हैं शहर में.

लेकिन भला ऐसे कितने दिन चलेगा? पुरुष कब तक एक स्त्री से डरकर रहेंगे? आख़िर है तो वो मर्द के पैर की जूती ही ना? ज़्यादा मनमानी करे तो उसे एक खींचकर थप्पड़ मारो, काट डालो, जला दो. इस शहर के लोगों ने भी उस वेश्या के साथ ऐसा ही किया था, उस स्त्री के साथ ऐसा ही किया था.

लेकिन अब चुड़ैल बन चुकी स्त्री को कैसे थप्पड़ मारें, काटें या जलाएं? वो तो ज़िंदा औरतों के साथ करते हैं! या फिर ज़िंदा औरतों के साथ अपनी सुविधानुसार उन्हें चुड़ैल या डायन बताकर मारते, काटते या जलाते हैं!

अगर ये सब सुनने में अजीब लग रहा है तो अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन को याद करिए. वो बता चुके हैं कि सच्चाई कल्पना से ज़्यादा अजीब होती है.

सच्चाई यह है कि झारखंड, ओडिशा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में हर साल लोग औरतों को चुड़ैल और डायन बताकर मार डालते हैं.

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एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के आंकड़ों के मुताबिक साल 2016 में झारखंड में 27 और ओडिशा में 24 औरतों को डायन बताकर मार डाला गया.

लेकिन स्त्री आख़िर चाहती क्या है? इस सवाल से दुनिया भर के मर्द वैसे भी हमेशा जूझते हैं- आख़िर औरतें चाहती क्या हैं? वॉट वीमेन वॉन्ट?

इस सवाल का जवाब आपको यह स्त्री देगी और ऐसे तमाम सवालों के जवाब सोचने के लिए भी उकसाएगी.

औरतों की इच्छा

कॉमेडी और हॉरर को मिलाकर बनाई गई किसी फ़िल्म में गंभीर बहस की गुंजाइश कम ही होती है, लेकिन 'स्त्री' संकेतों में कई गंभीर बातें कह जाती है.

फिर चाहे वो 'औरत कभी ज़बरदस्ती नहीं करती, ज़बदस्ती मर्द करते हैं' के बहाने 'कंसेंट' यानी सहमति पर बात करना हो या स्त्री की सुहागरात के बहाने औरतों की उस यौन इच्छा की ओर इशारा करना, जिसे सदियों से दबाने की कोशिश की गई है.

बॉलीवुड फ़िल्म में एक पिता का अपने युवा बेटे को 'स्वयंसेवा' (मास्टरबेट) करने की सलाह देते हुए देखना सुखद आश्चर्य जैसा लगता है. बताने की ज़रूरत नहीं है कि यौन अपराधों की एक बड़ी वजह सही सेक्स एजुकेशन का न मिलना भी है.

बायॉलजी (जीवविज्ञान) की किताबों में दसवीं क्लास में पढ़ाने वाले टीचर 'प्रजनन तंत्र' वाला वो पूरा चैप्टर ही छोड़ देते हैं जिसमें सेक्स एजुकेशन की थोड़ी-बहुत ही सही, गुंजाइश होती है.

फिर सेक्स एजुकेशन का अधपका सबक मिलता है पॉर्न से. वही पॉर्न जो हिंसात्मक होता है, सच से कोसों दूर होता है और जिसमें महिला के यौन सुख को कभी-कभार ही तवज्जो मिलती है.

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इंसाफ़ और बराबरी की तलाश

जब याददाश्त खोकर इमरजेंसी के दौर में अटके रह जाने वाले किरदार को लोग बताएंगे कि इमरजेंसी बीत गई है, देश अब बेहतर हालात में है तो आप ख़ुद से पूछेंगे कि क्या ये सच है.

फ़िल्म ख़ुद तो परफ़ेक्ट नहीं है, लेकिन आपको सवालों के परफ़ेक्ट जवाब ढूंढने को ज़रूर कहेगी.

इंसाफ़ और बराबरी की तलाश में भटकती उन लाखों औरतों की कहानी है 'स्त्री'. ये उन स्त्रियों की कहानी है जिनके 'ख़्वाबों' का कभी न कभी क़त्ल किया गया है, जिनका कभी न कभी क़त्ल किया गया है.

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