कोरोना लॉकडाउन: ग्राहकों तक इस तरह पहुंच रहा है 'आमों का राजा' अलफांसो

- Author, मयूरेश कोन्नुर
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
राजापुर में संजय राणे के आम के बाग़ में इस बार पेड़ अलफांसो आम से लदे हुए हैं. बाग़ में इन आमों को पेटियों में पैक करने का काम चल रहा. यहां से 'कोंकण का राजा' कहे जाने वाले इन आमों को अलग-अलग जगह पहुंचाने के लिए हरसंभव तरीका आजमाया जा रहा है. राणे के बाग़ के ये आम यहां से सीधे मुंबई जा रहे हैं.
अलफांसो किसानों पर आफ़त
कोरोना संकट के इस दौर में अलफांसो आमों के कारोबार को काफ़ी मुश्किल वक्त का सामना करना पड़ रहा है. लॉकडाउन की वजह से सड़कें बंद हैं. राज्य के बाज़ार भी बंद हैं और इस वजह से ये आम यहां तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.
अलफांसो आम के किसानों और कारोबारियों को काफ़ी नुकसान हो रहा है. लेकिन कुछ ने इन इस आम के ग्राहकों तक पहुंचने के लिए नया रास्ता खोज निकाला है.
संजय राणे कहते हैं "सीजन की शुरुआत में हम ये आम वाशी मार्केट भेजते हैं. हर साल आम पहले वहीं जाते हैं. लेकिन इस साल कोरोना वायरस की वजह से हम काफ़ी चिंतित थे. हमें लग रहा था कि इस बार हमारे ये हापुस आम (अलफांसो का स्थानीय नाम) मार्केट में बिक भी पाएंगे या नहीं."
राणे बताते हैं, "हर साल मैं एक से डेढ़ हज़ार पेटी आम वाशी मार्केट भेजता हूं. वहां इसका बढ़िया रेट मिल जाता है. लेकिन इस बार कोरोना की वजह से रेट गिर गए हैं. इसलिए सारे किसानों ने मिल कर प्राइवेट सप्लाई शुरू करने का फ़ैसला किया है. हर किसान खुद आमों की सप्लाई कर रहा है. हमें लगा कि अगर आमों को वाशी मार्केट भेजने के बजाय खुद बेचें तो हमें वहां से ज़्यादा पैसे मिलेंगे".
अब संजय राणे के राजापुर के बाग़ों से आम की पेटियों से लदी गाड़ियां दादर (मुंबई) में नीतिन जठार के यहां पहुंचती हैं. जठार के भी देवगढ़ के नजदीक कुछ आम के बाग़ हैं. जठार, संजय राणे और उनके जैसे दूसरे एक सौ किसानों के आम 'किंग्स मैंगो' ब्रांड नाम से बेचे जा रहे हैं. 'किंग्स मैंगो' ब्रांड के ये अलफांसो आम पुणे, मुंबई के अलावा देश के दूसरे राज्यों में भेजे जाते हैं. ये आम विदेश, ख़ास कर खाड़ी देशों में भी भेजे जाते हैं.
लेकिन इस साल ये आम अब तक विदेश नहीं भेजे गए हैं. बाज़ार और दुकानें बंद होने की वजह से यह स्थिति आई है. अब किसान अलफांसो आमों को सीधे मुंबई में इसके ग्राहकों तक पहुंचा रहे हैं. आम तौर पर ये किसान हर साल कम से कम बारह हज़ार पेटी आम बेच लेते थे. लेकिन इस बार लगता है इन्हें सात से आठ हज़ार पेटियों पर ही संतोष करना पड़ेगा.

ग्राहकों तक सीधी बिक्री लेकिन सही दाम नहीं मिल रहे
जठार कहते हैं, "लॉकडाउन की वजह से अलफांसो आम के दाम लगभग 25 से 30 फ़ीसदी गिर गए हैं. कुछ जगहों पर हम 3000 रुपये पेटी आम बेच रहे हैं तो कुछ जगहों पर सिर्फ़ 1200-1300 रुपये में बेचना पड़ रहा है. आम का सही दाम नहीं मिल पा रहा है. किसान घाटे में हैं. ग़रीब किसान पुणे, औरगांबाद, कोल्हापुर जैसी जगहों पर अपने आमों की मार्केटिंग नहीं कर पा रहे हैं. लिहाजा उन्हें, जो रेट मिल रहा है उसी पर बेच रहे हैं.
"छोटे आम दुबई और खाड़ी देशों में जाते हैं, जबकि बड़े साइज के आम सऊदी अरब और कुवैत जाते हैं. जो आम हम वहां बेचते हैं उन्हें यहां नहीं बेच सकते".
किसान और आम कारोबारी अब ग्राहकों से सीधे ऑर्डर ले रहे हैं. कारोबारियों को ट्रांसपोर्टिंग में कुछ छूट मिली है. इसका लाभ लेते हुए वे आमों से लदी गाड़ियां लेकर सीधे रेजिडेंशियल सोसाइटी के गेट पर पहुंचते हैं. सोशल डिस्टेंसिंग ज़रूरी होने की वजह से हर कोई दुकानों से आम खरीदने को तैयार नहीं दिखता. ग्राहक अब थोक में आमों की ऑनलाइन या वॉटसऐप बुकिंग कर लेते हैं. इस आधार पर आम उनके घर पर पहुंचा दिए जाते हैं.
अभिजीत जोशी दादर में कई साल से एक 'फैमिली स्टोर' चला रहे हैं. उनकी दुकान में आमों की सप्लाई जाठर के यहां से ही होती है. कुछ ग्राहक जोशी की दुकान से ही आम लेते हैं. लेकिन इस बार उनकी दुकान में ये आम नहीं हैं.
जोशी कहते हैं "सबसे बड़ी समस्या डिस्ट्रीब्यूशन की है. ग्राहकों तक आम पहुंचने में तीन से चार दिन लग जाते हैं. अब सभी ऑर्डर ऑनलाइन लिए जा रहे हैं. कोई घर से बाहर नहीं निकलना चाहता. हर चीज़ ऑनलाइन या फोन पर ऑर्डर की जा रही है. हम भी ई-मेल, वॉट्सऐप पर ऑर्डर ले रहे हैं. पेमेंट भी ऑनलाइन ले रहे हैं."
लॉकडाउन की वजह से बाज़ार बंद हैं. इसलिए किसानों पर, जो भाव मिले, उसी पर आम बेचने का दबाव बढ़ गया है. लेकिन दूसरी ओर कुछ किसान इसमें फ़ायदा देख रहे हैं. वे खुदरा ग्राहकों से सीधे संपर्क साध रहे हैं और उन्हें अपना आम बेच रहे हैं. सीधी बिक्री से उनका बिचौलिये का कमीशन बच जाता है.
लेकिन इस तरीके की अपनी सीमाएं हैं. मान लीजिये कोई गाड़ी देवगढ़ से आम लेकर निकली है, लेकिन वह पुणे या मुंबई में हर जगह नहीं जा सकती. लॉकडाउन के नियम काफ़ी कड़े हैं. इसलिए किसान ऐसी बड़ी हाउसिंग सोसाइटी से आने वाले ऑर्डर, जहां से 30 या इससे ज्यादा पेटियों की मांग है, वहीं आम पहुंचा रहे हैं. ऑर्डर मिलने के बाद गाड़ी सीधे उस सोसाइटी में पहुंच जाती हैं. वहां से कस्टमर अपनी-अपनी आम की पेटियां ले जाते हैं.
लॉकडाउन की वजह से इस वक्त बड़े शहरों के सभी बाज़ार बंद हैं या थोड़ा-बहुत खुल रहे हैं. रेगुलर डिलीवरी सिस्टम के ज़रिये इन बाजारों में आम नहीं पहुंचाए जा सकते. इसलिए इस वक्त अलफांसो के किसान जो भाव मिल रहा है उसी पर अपना आम खुदरा ग्राहकों को बेच रहे हैं.

स्टेट बसों से आम ढुलाई की मांग
महाराष्ट्र स्टेट मार्केटिंग कॉरपोरेशन भी आम ख़रीदने के लिए किसानों से सीधे संपर्क साध रहा है. हालांकि इसके लिए किसानों को रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है. लेकिन लॉकडाउन की वजह से यह तरीका भी ज्यादा कारगर नहीं है. अलफांसो आम की कुछ खेप मालगाड़ियों के ज़रिये राज्य के बाहर भी भेजी गई है. लेकिन इस साल अलफोंसो किसानों की मदद के लिए डाक विभाग भी आगे आया है. डाक विभाग किसानों के आम ग्राहकों तक पहुंचा रहा है.
लेकिन इतना काफ़ी नहीं है. किसानों और कारोबारियों ने दूसरे शहरों में आम ले जाने के लिए राज्य परिवहन निगम की बसें इस्तेमाल करने की मांग की है.
महाराष्ट्र किसान मैंगो कल्टीवेटर्स यूनियन (Maharashtra State Mango Cultivators' Union) के प्रेसिडेंट चंद्रकांत मोकाल कहते हैं, " लॉकडाउन की वजह से आम किसान काफ़ी चिंतित हैं. उन्हें समझ में नहीं आ रहा है, आम की इस ज़बरदस्त पैदावार को लेकर जाएं तो जाएं कहां? इसलिए हमने मांग की है कि इस बार राज्य परिवहन निगम (स्टेट बसों) की बसों से आम ढोने की इजाज़त दी जाए. इन बसों को अलग-अलग बाज़ारों में भेजा जाए ताकि किसान अपने आम बेच सकें. इसी तरीके से किसानों के आम बिक पाएंगे और उन्हें पैसा मिल पाएगा."
इस साल बेमौसम की बारिश की वजह से अलफांसो का सीजन लेट हो गया. जब पहली खेप के आम से पेड़ लदे हुए थे, तभी लॉकडाउन लागू हो गया. अब पेड़ दूसरी खेप के आम से लदे हुए हैं. यह फसल ऐसे ही सड़ न जाए इसलिए किसान अपने अलफांसो आमों को बेचने लिए नियमों में कुछ छूट की उम्मीद कर रहे हैं.
कोंकण इलाके में हर साल आम की 2.75 लाख टन पैदावार होती है. इनमें से छह हज़ार टन आम निर्यात कर दिए जाते हैं. भारत से आम के निर्यात में इसकी हिस्सेदारी 13 से 15 फ़ीसदी तक है. लेकिन दुनिया के तमाम देशों में लॉकडाउन की वजह से एक्सपोर्ट रुक गया है. आम फलों का राजा है. और अलफांसो को 'आमों का राजा' कहा जाता है. ग्राहकों तक पहुंचने के लिए यह 'राजा आम' बड़ी बेसब्री से लॉकडाउन से बंद पड़े रास्तों के खुलने का इंतज़ार कर रहा है.

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