कोरोना लॉकडाउन: जो लोग कश्मीर में फंस गए, उनके साथ कैसे पेश आ रहे हैं कश्मीरी

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
देशव्यापी लॉकडाउन के चलते मुंबई की ख़दीजा शेख़ अपने बेटे के साथ पिछले एक महीने से भारत प्रशासित कश्मीर में फंसी हुई हैं.
पाम्पोर इलाक़े में ठहरीं ख़दीजा ने बीबीसी हिंदी से फ़ोन पर बताया, "मेरे दिमाग़ में कश्मीर को लेकर बुरी धारणाएं थीं लेकिन अब मुझे अनुभव हो गया है कि कश्मीर के लोग बाहरी लोगों का कितना ख्याल रखते हैं. मुझे कश्मीर में सेवा, प्यार ही नहीं मिला बल्कि एक नया घर मिल गया है."
कोरोना वायरस संक्रमण पर अंकुश के लिए जब भारत सरकार ने पिछले महीने लॉकडाउन घोषित किया जब ख़दीजा अपने बेटे के साथ कश्मीर में थीं. लॉकडाउन के चलते वे अपने घर नहीं लौट सकीं हैं, इन दिनों वे दक्षिण कश्मीर के पाम्पोर इलाक़े में नज़ीर अहमद के घर में ठहरी हुई हैं.
ख़दीजा ने बताया कि कश्मीर में जो सत्कार और प्यार उन्हें मिल रहा है, इसे वह शब्दों में नहीं बता सकतीं.
ख़दीजा ने बताया, "मैं पूरी कहानी नहीं बता सकती. हमारे मुंबई में कोरोना के डर से लोग एक दूसरे से बातचीत नहीं कर रहे हैं लेकिन उसी वक़्त कश्मीर में एक अपरिचित परिवार पिछले एक महीने से हमारी देखभाल कर रहा है. यह मेरे लिए घर जैसा बन गया है. नज़ीर अहमद की बेटियां मुझे अपनी बड़ी मां की तरह प्यार कर रही हैं."
"जब हम पिछले महीने कश्मीर आए थे, तभी अचानक से कोरोना के चलते लॉकडाउन घोषित हो गया. मैं पूरा कश्मीर भी नहीं देख पाई थीं, क्योंकि देश भर में कोरोना फैलने की ख़बरें आने लगी थीं. लेकिन पूरे कश्मीर को नहीं देख पाने की कसक अब दिमाग़ से निकल चुकी हैं, क्योंकि नज़ीर अहमद के परिवार से वह सबकुछ मिल गया है जिसके बारे में मैंने सोचा भी था."

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15 साल बाद आई थीं कश्मीर
ख़दीजा बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख़ के फ़र्म एसआरके में हेयर स्टायलिश के तौर पर काम करती हैं. वह 15 साल के लंबे अंतराल के बाद दूसरी बार कश्मीर घूमने आयी थीं.
ख़दीजा के 28 साल के बेटे जावेद अहमद शेख़ के मुताबिक़ एक कश्मीरी परिवार के साथ रहना शानदार अनुभव साबित हुआ है.
जावेद अहमद शेख़ ने बताया, "हम पांच मार्च को मुंबई से निकले थे और नौ मार्च को कश्मीर पहुंचे थे. हम कश्मीर में कुछ जगहों को देखा. इसके बाद पाम्पोर इलाक़े के कुछ दोस्तों ने हमें यहां बुलाया. हम वहां दो दिन रहे. तब तक लोगों के दिमाग़ में कोरोना को लेकर डर व्याप्त होने लगा था. लोग सोचने लगे थे कि टूरिस्ट ही कोरोना को फैला रहे हैं. डॉक्टरों की एक टीम ने हमारा कोरोना टेस्ट किया. हमारी रिपोर्ट निगेटिव निकली. इन दो दिनों मैं मस्जिद जाता रहा, वहीं मैं नज़ीर अहमद से मिला. उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रख कर पूछा परेशान क्यों हो? तुम हमारे साथ रहो और वे हमें अपने घर ले आए. तब से हम लोग नज़ीर अहमद के परिवार के साथ रह रहे हैं."
जावेद अहमद शेख़ इसके बाद नज़ीर अहमद के परिवार की तारीफ़ करते नहीं थकते. उन्होंने कहा, "नज़ीर अहमद के परिवार ने मानवता की मिसाल पेश की है, जिसे हम आख़िरी सांस तक नहीं भूल पाएंगे. हर रात सोने से पहले नज़ीर अहमद की पत्नी हमें पूरा ग्लास दूध भी देती हैं. ज़रूरत पड़ने पर उनकी बेटियां मेरी मां के कपड़े धो देती हैं. मेरी एक ही बहन है लेकिन अब मेरी मां को लगने लगा कि उनकी तीन बेटियां हैं."
"मैं अपने देश के लोगों से अपील करता हूं कि कश्मीर के लोगों ने भारत के प्रति प्यार दिखाया है और हमें भी कश्मीर के प्रति प्रेम दिखाना चाहिए. मैं लोगों को कश्मीर का असली चेहरा दिखाना चाहता हूं. समाचारों में जो दिखाय जाता है वह केवल प्रोपगैंडा होता है. कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है, लेकिन कश्मीर के लोग दिव्य हैं, जिन्होंने अपनी संस्कृति को संरक्षित रखा है. मेरी मां कहती हैं कि उन्हें इस घर में सारी सुंदरता मिल गई है."
नज़ीर अहमद के बेटे हिलाल अहमद अपने घर में कश्मीर के बाहर के मेहमानों के होने से बेहद ख़ुश हैं.
हिलाल अहमद ने बताया, "हमलोग क़िस्मत वाले हैं, ऐसे मुश्किल वक़्त में अल्लाह ने हमें मेहमानों की ख़ातिर करने का मौक़ा दिया है. मैं अपने अब्बू का आभारी हूं कि उन्होंने ऐसा किया. इस वक़्त जब हर कोई अपने में सिमटा हुआ है, मेरे अब्बू ने इसकी परवाह नहीं की. यह हमारी संस्कृति है और इस पर हमें गर्व है. यह कोई दिखावा नहीं है. हमारे मेहमान हमसे केवल एक ही बात कहते हैं कि वे हमें और हमारे प्यार को मिस करेंगे."

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लॉकडाउन घोषित होते ही सबकुछ ठहर गया
महाराष्ट्र के ही पुणे शहर के डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माताओं के एक समूह को इन दिनों जम्मू-कश्मीर के डोडा ज़िले के बादरवाह इलाक़े में ठहरना पड़ा है. उन्हें भी एक तरह से अपना दूसरा घर मिल गया है.
नचिकेत गुतातिर अपने दल के दो सदस्यों, शमीम कुलकर्णी और निनाद दतार के साथ 5 मार्च को बादरवाह आए थे, उन्हें 25 मार्च को वापसी की फ़्लाइट पकड़नी थी.
लेकिन लॉकडाउन घोषित होते ही सबकुछ ठहर गया. ऐसे में गुतातिर को बादरवाह में जिस तरह की मदद मिली, उसकी कल्पना भी इन लोगों ने नहीं की थी.
गुतातिर ने नाज़िम के घर से फ़ोन पर बीबीसी हिंदी को बताया, "नाज़िम मलिक और उनकी पत्नी ने हमें अपने बेटे जैसा माना है. इन लोगों ने जो हमारे लिए किया है उसे शब्दों में नहीं बता सकता. जब हमें क्वारंटीन के लिए ले जाया गया तो नाज़िम मलिके के बेटे हमारे साथ ही रहे. दूसरी जगह पर ऐसा प्यार शायद ही मिलता. हमें जो प्यार सत्कार मिला है, उसके लिए हम जम्मू-कश्मीर के लोगों के आभारी हैं. होटल बंद हो गए थे, ट्रांसपोर्ट का कोई साधन नहीं था तब नाज़िम मलिक ने हमारी मदद की."
गुतातिर 2011 से जम्मू-कश्मीर आते रहे हैं. उन्होंने बताया कि बादरवाह में किसी एजुकेशनल प्रोजेक्ट के सिलसिले में वे लोग आए थे और नाज़िम की शैक्षणिक गतिविधि भी उनके एजेंडे में थी.
नाज़िम मलिक बादरवाह में उर्दू पढ़ाते हैं. उन्होंने बीबीसी हिंदी से फ़ोन पर बताया कि तीनों लॉकडाउन घोषित होने से बहुत डिस्टर्ब हो गए थे क्योंकि वे अपने घर वापस नहीं लौट पाए थे.

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नाज़िम मलिक ने बताया, "मैंने इन लोगों से कहा कि इतना परेशान क्यों हो, हमलोग के साथ रहो. मैंने उनसे यह भी कहा कि ये तो केवल तीन लोगों की बात है, अगर तीन सौ लोग भी ऐसी स्थिति में होते हम लोग उन्हें अपने घर ले जाते. प्रशासन की ओर से जब इन लोगों को क्वारंटीन सेंटर ले जाया गया तो मेरी पत्नी ने मुझे उनके साथ रहने के लिए कहा, मैंने वैसा ही किया. हमने सोचा कि जब उनके माता पिता को मालूम होगा उन्हें जम्मू-कश्मीर के क्वारंटीन सेंटर में रखा गया है तो वे डिस्टर्ब होंगे. इसलिए मैंने डॉक्टरों से कहा कि मेरा बेटा भी इन लोगों के साथ रहेगा. डॉक्टर इसके लिए तैयार हो गए. हमारा उद्देश्य यही था कि इनके माता पिता को मालूम हो जाए कि ये लोग अकेले नहीं हैं बल्कि स्थानीय लोग उनके साथ हैं."
नाज़िम मलिक ने अपने मेहमानों की स्थिति के बारे में बताया, "ये लोग अब ख़ुश हैं. पहले तो उन्हें डर लगा था कि अजनबी होने के चलते पता नहीं क्या होगा. लेकिन अब उनके दिमाग़ में कोई डर नहीं है. ये लोग हमारे घर के सामने क्रिकेट खेलते हैं. मैं और मेरी पत्नी नाज़िमा ने यह प्रण लिया था कि मेहमानों को नाराज़गी का कोई मौक़ा नहीं देंगे."

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श्रीनगर प्रशासन ने भी कहा है कि सभी विदेशी और घरेलू पर्यटकों का ख्याल रखा जा रहा है.
श्रीनगर के डीसी शाहिद चौधरी ने बीबीसी हिंदी से बताया, "कश्मीर आए कुछ विदेशी पर्यटक जो कोरोना संक्रमित नहीं हैं, वे हमारे साथ हैं. गुजरात और अन्य जगहों से आए कुछ घरेलू पर्यटकों को हाउस बोट और होटलों में ठहराया गया है. स्थानीय लोग भी इन लोगों का ख्याल रख रहे हैं. हम इन लोगों से नियमित संपर्क में हैं."
गुतातिर के टीम में शामिल शमीम कुलकर्मी ने बताया कि जम्मू-कश्मीर को लेकर जितने तरह के विचार थे वे सब ग़लत साबित हुए.
कुलकर्णी ने बताया, "हमने सुना था कि कश्मीर कंफ्लिक्ट्स ज़ोन है और हमारे साथ कुछ भी हो सकता है. लेकिन हमें यहां केवल प्यार और सेवा सत्कार मिला है."



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