कोरोना वायरस के लिए रैपिड टेस्टिंग किट, आख़िर दिक़्क़त कहां है?

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- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस से निपटने की कोशिशों में रैपिड टेस्ट को गेम चेंजर के तौर पर देखा गया था, लेकिन अब रैपिड टेस्ट किट के नतीजों पर सवाल उठ रहे हैं. हालांकि आईसीएमआर का कहना है उसे 48 घंटे का वक्त चाहिए, जिसमें वो खुद इन सभी किट की जांच करेंगे और इसके बाद ही कोई दिशा-निर्देश जारी किया जाएगा.
आईसीएमआर के डॉ रमन गंगाखेडकर ने मंगलवार को बताया कि सभी राज्यों में रैपिड टेस्ट किट बांटी गई थीं, लेकिन एक राज्य से शिकायत आई कि इसमें कम डिटेक्शन हो रहा है, "इसलिए हमने तकरीबन तीन राज्यों से पूछ लिया. हमें पता चला कि नतीजों में वेरिएशन बहुत ज़्यादा है. कई जगह 6 फीसदी से लेकर 71 फीसदी तक फर्क है."
दरअसल राजस्थान वो राज्य है, जिससे आईसीएमआर को रैपिड टेस्ट किट में खामी की शिकायत मिली थी.
राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा के मुताबिक उन्हें बताया गया था कि इन सभी टेस्ट किट से करीब 90 प्रतिशत नतीजे ठीक आने की उम्मीद है. इसकी पुष्टि के लिए पहले से कोरोना संक्रमित मरीज़ों पर टेस्ट किट का प्रयोग करके देखा गया. लेकिन स्वास्थ्य मंत्री के मुताबिक वो उस वक्त हैरान रह गए जब सिर्फ पांच फीसदी नतीजे ही सही आए. इसके बाद राजस्थान में रैपिड टेस्ट रोक दिए गए.
लेकिन डॉ गंगाखेडकर के मुताबिक़, जब दिल्ली में रैपिड टेस्ट किट से जांच की गई थी तो नतीजे 71 प्रतिशत सही आए थे.

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किट में खामी या इस्तेमाल के तरीक़े में ग़लती?
इससे पहले पश्चिम बंगाल ने आरटी-पीसीआर टेस्ट किट को लेकर शिकायत की थी कि वो ठीक से काम नहीं कर रही हैं और राज्य को टेस्ट दोबारा करने पड़ रहे हैं.
लेकिन सोमवार को आईसीएमआर के डॉ गंगाखेडकर ने इस शिकायत को संज्ञान में लेते हुए कहा था कि ये आरटी-पीसीआई टेस्ट किट यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन से अप्रूवड हैं और इनकी क्वालिटी स्टैंडर्ड काफी अच्छी है.
वो कहते हैं, "इसमें सिर्फ एक दिक्कत है कि इस किट को हमें 20 डिग्री से कम के तापमान पर रखना है. अगर तापमान 20 डिग्री के ऊपर गया तो टेस्ट के नतीजे गड़बड़ आ सकते हैं."
हालांकि उन्होंने ये आरटी-पीसीआर टेस्ट के बारे में कहा था. लेकिन रैपिड टेस्ट किट के बारे में भी ये बात लागू हो सकती है कि उसके इस्तेमाल के तरीके में कोई गलती हो रही हो? इसलिए शायद आईसीएमआर कोई भी राय बनाने से पहले खुद रैपिड टेस्ट किट की जांच करना चाहता है.
डॉ. गंगाखेडकर भी कह चुके हैं कि ये एक नया वायरस है, जो महज़ साढ़े तीन महीने पहले ही हमारे सामने आया है. "मैंने बार-बार समझाकर बोला था कि जब नया टेस्ट आता है तो उसमें वेरिएशन दिखते हैं. नई तकनीकों को रिफाइन करना भी ज़रूरी होगा. इसलिए हमने फैसला किया है कि इन फाइडिंग्स को नज़रअंदाज़ नहीं करना है."
आईसीएमआर ने कहा है कि वो अपनी आठ टीमों को उन जगहों पर भेजेगी जहां से शिकायत आई है. ये टीमें फील्ड में फिर से रैपिड टेस्ट किट को खुद इस्तेमाल करके देखेंगी. उसके बाद दोबारा इस पर बात होगी. अगर फिर भी खामी पाई जाती है तो इन किट को मैन्युफैक्चरर को लौटाया भी जा सकता है.


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चीन से मंगाई 10 लाख किट
टेस्टिंग को तेज़ करने के लिए भारत ने चीन से करीब 10 लाख किट मंगाई थी. कई दूसरे देशों ने भी चीन से मिली किट में खामियों की शिकायत की है, हालांकि चीन ने क्वालिटी की समस्या से इनकार किया है.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में लाल पैथ लैब के मैनेजिंग डायरेक्टर अरविंद लाल भी कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि चीन में बनी हर चीज़ ख़राब ही होती है, "हो सकता है कि उन्होंने टेस्ट ठीक तरीक़े से ना किए हों. इसलिए जबतक आईसीएमआर की टीमें खुद फील्ड में जाकर टेस्ट करके नतीजे देख ना लें, तब तक कुछ भी कहना ठीक नहीं है."
वो बताते हैं कि सारी दुनिया में इन एंटी बॉडी टेस्ट का इस्तेमाल होता है, सिर्फ एक-दो जगह इसकी शिकायत आई है, जैसे स्पेन में चीन से आई किट ख़राब निकलीं.

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कैसे काम करता है रैपिड बॉडी टेस्ट?
अरविंद लाल के मुताबिक़, ये एंटीबॉडी टेस्ट डाइग्नोस्टिक टेस्ट नही है. बल्कि इनका इस्तेमाल सिर्फ सर्विलांस स्टडी और सोसाइटी के इम्यून स्टेटस को पता लगाने के लिए किया जाता है. ये टेस्ट डाइग्नोस्टिक इसलिए नहीं हैं, क्योंकि पहले सात दिन में ये टेस्ट कभी भी पॉज़िटिव नहीं आएंगे.
वायरस या किटाणुओं के शरीर में आने के सात दिन बाद पहला एंटीबॉडी (IgM एंटी बॉडी) डेवलप होता है और बॉडी में इसका प्रोडक्शन करीब 17-18 दिन तक होता है और इक्कीस दिन पर ये एकदम नॉर्मल या ज़ीरो हो जाती है.
अगर किसी में आईजीएम एंटी बॉडी पाया जाता है तो इसका मतलब है कि अभी उस मरीज़ को इन्फेक्शन है. ये इन्फेक्शन का एक साइन है.
वहीं 14वें दिन के बाद IgG एंटी बॉडी बननी शुरू होती है, जो 28 दिन के बाद हाई हो जाती है, उसके बाद कई महीनों तक ये बहुत ज़्यादा रहती है. एंटी बॉडी को ऐसे समझा जा सकता है कि वायरस जब हमारे शरीर के अंदर जाता है तो बॉडी का इम्यून सिस्टम इससे लड़ने के लिए एक एंटी बॉडी बनाता है.

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जब आईजीजी एंटी बॉडी आपको मिल जाती है तो इससे पता चल जाता है कि ये व्यक्ति एकदम ठीक है और इनका प्लाज़्मा अब आप और मरीज़ों को भी ठीक होने के लिए दे सकते हैं.
अगर आईजीजी 50 प्रतिशत लोगों में ज़्यादा मिले, तो इसका मतलब है कि उन मरीज़ों में हर्ड इम्युनिटी आ गई है. हर्ड इम्युनिटी का मतलब है कि इस वायरस का प्रभाव अब एकदम ख़त्म हो गया है और लोग अपनी सामान्य ज़िंदगी में लौट सकते हैं.
रैपिड टेस्ट पर सरकारों का ज़ोर
सरकार ने मंगलवार को कहा कि भारत के टेस्टिंग के अनुभव को देखा जाए तो 69% पॉज़िटिव मामले एसिम्टोमेटिक हैं और 31% सिम्टोमेटक या जिनमें हल्के लक्षण हैं.
इन तथ्यों ने भारत की चिंता भी बढ़ाई है. क्योंकि अगर ज़्यादातर मामलों में लक्षणों का पता ही नहीं चल रहा तो वायरस को रोकना चुनौती बन सकता है.
अब तक कोरोना वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है, इसलिए टेस्ट के ज़रिए इन मरीज़ों की पहचान करना ही एक अहम हथियार है. ऐसे में रैपिड टेस्ट एक उम्मीद की तरह आए थे. जिसे करने की प्रक्रिया आसान है और नतीजे भी कुछ मिनटों में आने का दावा किया जा रहा है.
राजस्थान सरकार ने भी पहले रैपिड बॉडी टेस्ट किए जाने पर ज़ोर दिया था. दिल्ली में भी अधिकारियों ने कन्टेनमेंट ज़ोन में जाकर रैंडम लोगों के रैपिड टेस्ट करके देखने की कोशिश की थी.
वहीं महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने भी 20 अप्रैल को कहा था कि हम जल्द ही 75000 रैपिड टेस्ट करेंगे. "केंद्र सरकार से हमें इसके लिए सशर्त मंज़ूरी मिल गई है."

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कुछ राज्यों ने खुद अपने लिए रैपिड टेस्ट किट मंगाए
कुछ राज्यों ने खुद ही अपने लिए रैपिड टेस्ट किट खरीदने शुरू कर दिए. उन्होंने अलग-अलग कंपनियों से और अलग-अलग जगहों से किट खरीदे.
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिंह ने ट्वीट कर बताया कि उन्होंने भारत में स्थित साउथ कोरिया की कंपनी से 75 हज़ार रैपिड टेस्ट खरीदे हैं. उन्हें ये टेस्ट किट 337 रु कीमत पर खरीदे.
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वहीं आन्ध्र प्रदेश ने भी किसी दूसरी कंपनी से अलग से किट खरीदी, जिसकी कीमत 700 रु पड़ी.
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इससे पहले ख़बर आई थी कि असम ने सीधे चीन से पचास हज़ार पीपीई किट मंगा ली थी.
इसे देखते हुए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंगलवार को ट्वीट किया कि कोविड-19 से लड़ने के लिए टेस्टिंग किट, वेंटिलेटर, मेडिकल उपकरण केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीयकृत खरीद कर राज्यों को उपलब्ध कराने चाहिए ताकि राज्यों को इनकी खरीद में आसानी हो, राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा न हो और आईसीएमआर की गाइडलाइन पर खरे उतरने वाले टेस्ट किट, उपकरण ही मिल सकें.
गहलोत ने ट्वीट किया कि उस वक्त मैंने प्रधानमंत्री के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस में अनुरोध किया था कि इन चीज़ों की केंद्रीयकृत खरीद हो, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया. अब रैपिड टेस्ट के नतीजों पर देशभर में संदेह का वातावरण बना है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है.
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दूसरे देशों को क्या समस्या आई?
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमरीका में टेस्ट के गलत नतीजे आ रहे हैं, जिन लोगों में एंटी बॉडी नहीं है, टेस्ट से उनमें भी एंटी बॉडी मिल रही है.
वहीं ब्रिटेन में वैज्ञानिकों का कहना है कि टेस्ट में सेंसिटिविटी रेट कम है और स्वास्थ्य सचिव ने पत्रकारों से कहा कि ये इतने काम के नहीं हैं.
वहीं स्पेन, तुर्की और नीदरलैंड्स ने चीन में बने हज़ारों टेस्टिंग किट और मेडिकल मास्क को डिफेक्टिव बताकर रिजेक्ट कर दिया था.
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक मार्च के अंत में स्पेन की सरकार ने बताया कि उन्होंने एक चीन की कंपनी से हज़ारों टेस्ट किट ख़रीदी थीं. लेकिन इस्तेमाल के कुछ दिनों बाद ही पता चला कि क़रीब 60 हज़ार किट मरीज़ों में वायरस को ठीक तरीक़े से डिटेक्ट नहीं कर पाईं.
हालांकि स्पेन स्थित चीनी दूतावास ने ट्वीट कर दावा किया कि स्पेन ने जिस कंपनी, किट ख़रीदी हैं, उसके पास प्रोडक्ट बेचने के लिए चीन की मेडिकल अथोरिटी का आधिकारिक लाइसेंस नहीं है.
दूतावास ने ये स्पष्टीकरण भी दिया कि चीनी सरकार और चीनी कंपनी अलीबाबा ने जो सामान डोनेट किया है, उसमें उस कंपनी के उत्पाद शामिल नहीं हैं.
तुर्की ने भी कहा कि चीनी कंपनियों से ख़रीदी गई कुछ टेस्टिंग किट सटीक नतीजे नहीं दे रहीं, हालांकि तुर्की ने ये भी कहा कि करीब साढ़े तीन लाख टेस्ट किट ने सही काम भी किया.



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