कोरोना लॉकडाउन में हर दिन कितने हज़ार करोड़ का नुकसान, कितनी नौकरी जाएंगी?

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    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

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स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

14 अप्रैल को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन को 19 दिन और बढ़ाने का एलान किया तो नैनीताल के तल्ली ताल में पति पदम सिंह बोरा और दो बेटियों के साथ टीवी सेट के सामने बैठी मंजू बोरा के ज़हन में बस एक ही सवाल कौंधा, "हे मालिक, कैसे मैनेज होगा आगे?!"

मंजू बोरा की "चाय-मैगी की रेड़ी हफ़्तों से नहीं लगी, हर दिन की 200-300 रूपयों की होनेवाली कमाई बंद है और गुज़ारा उधार लेकर चल रहा है."

मंजू बोरा और उनका परिवार

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नैनीताल से क़रीब 300 किलोमीटर दूर दिल्ली के राजेश कुमार और उनके भाई मनोज कुमार को गुज़र-बसर के लिए बूढ़े मां-बाप के सामने हाथ फैलाना पड़ रहा है.

नेशनल हॉकर्स फेडेरेशन के मुताबिक़ देशभर के चार करोड़ से अधिक रेड़ी-पटरी-ठेलेवालों में 95 फ़ीसद घर पर बैठे हैं, और आठ हज़ार करोड़ रूपये दैनिक का टर्नओवर देने वाले भारतीय अर्थव्यवस्था के इस हिस्से की पूंजी तेज़ी से बिखर रही है.

फेडेरेशन के महासचिव शक्तिमान घोष के मुताबिक़ अंडरवियर, गोल गप्पे, फल-सब्ज़ी, मसाले, अनाज से लेकर मोबाईल ऐक्सेसरीज़ बेचनेवाले इस सेक्टर से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से - जैसे घरों में क़ारख़ाना चलानेवाले, सप्लायर्स, छोटे किसान और दूसरे लोग जुड़े हैं जो आज उस स्थिति में पहुंच चुके है जैसी उन्होंने "अपने पांच दशक में संगठन काल में नहीं देखी."

कितना महंगा है लॉकडाउन?

रिक्शे-ठेले चलानेवाले, घरों में काम करने और छोटे-छोटे धंधों में लगे हुए दूसरे लोगों को, जिनकी अबतक बात तक नहीं उठी है, अगर शामिल कर लें तो ये तादाद करोड़ों में है, शक्तिमान घोष कोलकाता से फ़ोन पर बात करते हुए कहते हैं.

लॉकडाउन को आगे बढ़ाने का कर एलान करते वक़्त शायद प्रधानमंत्री ने इस बात का ज़िक्र भी किया, "अगर आप अर्थव्यवस्था के नज़रिये से देखें तो ये महंगा साबित हुआ है."

मनोज कुमार

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अद्योग और व्यवसाय से जुड़े संगठन फ़िक्की यानी फेडेरेशन ऑफ़ इंडियन चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के एक अनुमान के मुताबिक़ बंद के हर दिन भारतीय अर्थव्यवस्था को चालीस हज़ार करोड़ रूपयों का नुक़सान हो रहा है.

संगठन की अध्यक्ष संगीता रेड्डी ने कहा है कि साल 2020 के अप्रैल-सितंबर के बीच कम से कम चार करोड़ नौकरियों के जाने का ख़तरा है.

कितनी नौकरियां जाएंगी

जाने-माने बैंकों और रेटिंग एजेंसियों ने अर्थव्यवस्था के बढ़ने के अनुमान को पहले से कम कर दिया - बार्कलेय ने साल 2020 के पुर्वानुमान को ढ़ाई प्रतिशत से घटाकर शुन्य कर दिया, वहीं फ़िच रेटिंग्स को लगता है कि इसमें दो फ़ीसद की बढ़ौतरी दर्ज हो सकती है, उस हिसाब से एडीबी यानि एशियन डेवलपमेंट बैंक चार फ़ीसद पर अधिक आशावान दिखता है.

वर्ल्ड बैंक ने दक्षिणी एशिया के आर्थिक फ़ोकस रिपोर्ट में इस बढ़ोतरी को ढ़ेढ़ से 2.8 प्रतिशत के बीच रखा है, जो उसके मुताबिक़ पिछले तीन दशक में सबसे कम है.

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लेकिन दिल्ली आईआईटी में अर्थशास्त्र के पूर्व शिक्षक प्रोफेसर वी उपाध्याय मानते हैं कि अर्थव्यस्था मंदी की तरफ़ जाएगी.

प्रोफेसर उपाध्याय कहते हैं, 'लॉकडाउन में एक माह तो पहले ही निकल गया है, और अब इसे और बढ़ा दिया गया है, सारी गतिविधियां बंद पड़ी हैं, और जब ये शुरु भी होंगी तो इसे पटरी पर आते-आते वक़्त लगेगा तो किसी बढ़ौतरी का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है.'

बढ़ोतरी के अनुमान को बहुत आशावान मानते हुए वो मुल्क में बेरोज़गारी की दर की तरफ़ इशारा करते हैं जो अर्थव्यवयस्था का लेखा-जोखा रखनेवाली प्राइवेट संस्था सेंटर फ़ॉर मानीटरिंग इंडियन इकॉनॉमी (सीएमआई) के मुताबिक़ फ़िलहाल 23 फ़ीसद पर पहुंच गई है.

1929 से अगले 10 साल तक चली विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी - जिसे ग्रेट डिप्रेशन के नाम से जाना जाता है, अमरीका में बेरोज़गारी की दर 24.9 प्रतिशत (1933) हो गई थी.

बेरोज़गारी दर - कुल कामगारों में बेरोज़गारों का प्रतिशत, अर्थव्यवस्था को मापने का अहम पैमाना समझा जाता है. मंदी के दौर में बेरोज़गारी बढ़ जाती है.

घटती मांग की वजह से उद्योग और व्यवसाय कामगारों को बाहर करते हैं, "नतीजा लोगों के पास ख़र्च करने को पैसे नहीं होते, उससे बाज़ार में मांग और कम हो जाती है, जब मांग और कम होती है तो कंपनियों की आमदनी पर इसका और असर होता है, और फिर कुछ और लोगों को काम से बाहर होना पड़ता है."

नरेंद्र मोदी

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शायद इसी वजह से प्रधानमंत्री बार-बार कंपनियों से लोगों को काम से बाहर न करने का आग्रह कर रहे हैं लेकिन उसका कितना असर हुआ है ये लॉकडाउन के बाद से सड़कों पर निकलने और सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर गांव वापिस जाने को मजबूर हुए मज़दूरों की भीड़ से साफ़ हो गया है.

प्रधानमंत्री की 14 अप्रैल की स्पीच के बाद, उनके वायदे के मुताबिक़ कई क्षेत्रों जैसे कृषि, निर्माण और अन्य में छूट दी गई है, 20 से कुछ और क्षेत्रों में ढील होगी लेकिन घोषणाओं से अधिक ये अहम होगा कि वो किस तरह लागू हो पाते हैं.

लॉकडाउन में कब मिलेगी ढील?

पंजाब के मोगा से किसान और छोटे आढ़ती दविंदर सिंह गिल ने बताया कि गेंहू की ख़रीदी की बात 15 अप्रैल से शुरु होने की बात थी लेकिन अबतक माल लाने ले जाने के लिए लोगों को पास तक नहीं मिल पाए हैं, मार्किट कमीटि से पूछने पर वो चंडीगढ़ से बात न हो पाने की बात कहतें है, चंडीगढ़ में क्या हो रहा है ये यहां के किसानों और आढ़तियों को क्या पता?

हरियाणा के सोनीपत के किसान नेता रमनदीप सिंह मन कहते कि कुछ क्षेत्रों को छूट और दूसरी पर रोक लगी रहने से समस्या का समाधान नहीं होगा.

जैसे, किसान के पास बेचने को दूध है लेकिन होटल, रेस्तरां, हलवाईयों की दुकानें बंद हैं तो दूध की मांग 40 फ़ीसद तक कम हो गई है, गाय को फिर भी चारा चाहिए और चारे की क़ीमत बढ़ गई है तो किसान की लागत तो ऊपर चली गई लेकिन आमदनी या तो नदारद हो गई है या पहले से बहुत कम है.

कोरोना वायरस

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ख़बर है कि पंजाब-हरियाणा के आढ़तों में अनाज-सब्ज़ी-फ़ल को उतारने, तौलने फिर गोदाम तक ले जाने के लिए मज़दूर नहीं मिल पा रहे क्योंकि बिहार, उत्तर प्रदेश से आए प्रवासी मज़दूर गावों वापिस चले गए.

उधर बिहार के गावों में कटाई के लिए पंजाब-हरियाणा से जानेवाली मशीनें नहीं पहुंच पा रही हैं, मुज़फ्फ़रपुर के महरथा गांव के अक़ील अहमद कहते हैं.

पिछले दिनों वित्त मंत्रालय के 1.75 लाख करोड़ के पैकेज के बाद अब रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने कई क़दमों का एलान किया है लेकिन जानकार कहते हैं कि ये भी याद रखने की ज़रूरत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पहले से ही नोटबंदी, जीएसटी के ग़लत तरीक़े से लागू करने जैसी वजहों से पहले से ही प्रभावित रही थी, बैंक के एनपीए अधिक थे, और क़र्ज़ मांगने वालों की भी कमी थी, उसपर से अब कोरोना और उसको क़ाबू करने के लिए तालेबंदी और पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसका असर.

मगर तेल की गिरी क़ीमत और आरबीआई के पास मौजूद बड़ा कैश भंडार उसके लिए प्लस साबित हो सकते हैं.

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