कोरोना वायरस: सरकार का पुराने वेंटिलेटर ख़रीदना सही या ग़लत

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भारत में कोरोना वायरस की वजह से सोमवार तक 559 लोगों की मौत हो चुकी है और 17656 लोग संक्रमित हो चुके हैं.
राज्यों की बात करें तो सबसे ज़्यादा संक्रमित लोगों की संख्या महाराष्ट्र में हैं. वहां, अब तक 4000 से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं.
तेज़ गति से बढ़ते हुए मामलों को देखते हुए सरकार टेस्टिंग के नियमों को बदलने के साथ-साथ चिकित्सकीय उपकरणों को जल्द से जल्द उपलब्ध करवाने में लगी हुई है.
इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए केंद्र सरकार ने बीते दिनों पुरानी वेंटीलेटर मशीनों को आयात करने की इजाज़त दे दी है.

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क्या हैं नुक़सान?
सरकार ने इससे पहले इस्तेमाल किए जा चुके वेंटिलेटर और दूसरे क्रिटिकल केयर उपकरणों की ख़रीद पर प्रतिबंध लगाया हुआ था.
लेकिन राज्यों की ओर से आती मांग का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने 30 सितंबर 2020 तक पुराने वेंटीलेटर को आयात करने की इजाज़त दे दी है.
लेकिन सरकार के इस फ़ैसले के बाद विशेषज्ञों के बीच इस्तेमाल किए जा चुके वैंटिलेटर को लेकर मिली जुली राय है.
इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री एसोशिएसन के को-ऑर्डिनेटर राजीव नाथ मानते हैं कि सरकार को अपना ये क़दम वापस लेना चाहिए.
राजीव नाथ बताते हैं, "हम सरकार से निवेदन करते हैं कि वे किसी अन्य द्वारा इस्तेमाल किए जा चुके सेकेंड हैंड वेंटीलेटर मशीनों को मुफ़्त में आयात करने की इजाज़त न दें."
अपने इस रुख की वजह समझाते हुए राजीव कहते हैं, "देखने में तो ये एक बहुत ही सुंदर विकल्प लगता है कि इस आपातकाल के समय में हम कम क़ीमत में वेंटीलेटर हासिल कर पा रहे हैं. लेकिन इन मशीनों को एचएलएल प्रॉक्यूरमेंट स्पेसिफिकेशन नियमों के तहत ख़रा उतरना चाहिए. इन्हें एनएबीएल द्वारा एक्रिडिएटेड लैब में एचएलएल स्पेसिफिकेशन और आईएसआई मानकों के तहत जाँचा जाना चाहिए."
राजीव ये भी मानते हैं कि इन सभी जाँचों के साथ-साथ सरकार को मशीनें बेचने वालों से कम से कम सात सालों तक सर्विस आदि की शर्तों पर सहमति हासिल करनी चाहिए क्योंकि अगर ऐसा नहीं होगा तो ये भारत में बेकार पड़े हज़ारों वेंटीलेटर मशीनों की संख्या में इज़ाफ़ा करने जैसा होगा.

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क्या हैं फ़ायदे?
हालांकि, स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों की मानें तो इस्तेमाल किए जा चुके वेंटीलेटर मशीनों को आयात करना तो ठीक है.
लेकिन वे इसके साथ कुछ हिदायतों का पालन करने की सलाह देते हैं.
मध्य प्रदेश जहां अब तक कोरोना वायरस से 55 लोगों की मौत हो चुकी हैं, वहीं काम कर रहे एक डॉक्टर इसके इस्तेमाल को लेकर चेतावनी देते हुए नज़र आते हैं.
डॉ. सौरभ गुप्ता बताते हैं, "एक तरह से देखा जाए तो वेंटीलेटर की उपलब्धता ज़रूरी है. और वर्तमान स्थिति में पुरानी वेंटीलेटर मशीनों को इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन ये कहते हुए मैं ये भी कहना चाहूंगा कि ऐसा करते हुए सेनिटेशन से जुड़े नियमों को सख्ती से पालन किया जाना ज़रूरी है."
इसकी वजह बताते हुए डॉ. सौरव बताते हैं, "हमें मुख्यत: नोसोकॉमियल इन्फ़ेक्शन यानी अस्पताल में फैलने वाले संक्रमण को बचाना होता है. और इसके लिए सफ़ाई के नियमों का पालन ज़रूरी है."

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कितना ख़तरनाक है ये चलन?
लेकिन ये बात किसी से छिपी नहीं है कि भारत के बड़े शहरों और ज़िलों के अस्पतालों में सफ़ाई के स्तरों में भारी अंतर है.
कई बार ये भी देखने में आता है कि ज़िला अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट और मरीज़ों को एक ही जगह बैठे देखा जा सकता है.
कहीं कहीं पर सफाई कर्मियों की अनुपलब्धता भी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत में सभी जगहों पर सफ़ाई के नियमों का पालन हो पाएगा.
डॉ. सौरव इस सवाल के जवाब में कहते हैं, "ये बात एक बड़ा ख़तरा पैदा करती है. क्योंकि कुछ राज्यों में सफाई के नियमों का ठीक ढंग से पालन किया जा सकता है. कुछ राज्यों में ढिलाई बरती जाती है. इसके साथ ही दूरस्थ इलाक़ों में इन नियमों को लेकर स्वास्थ्यकर्मियों की कोई ट्रेनिंग भी नहीं है. ऐसे में उनके लिए ये नियम मानना बेहद मुश्किल हो जाता है."
"सफाई के नियमों के पालन के लिए ट्रेनिंग की भारी ज़रूरत है. ऐसे में सरकार को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को ट्रेनिंग देनी चाहिए ताकि अस्पताल से फैलने वाले संक्रमण को रोका जा सके. इसके लिए सख़्त दिशानिर्देश भी जारी किए जाने चाहिए."

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