कोरोना वायरस: जूट मज़दूरों की बदहाली दूर होने के कितने आसार

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों के बार-बार अनुरोध के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य की जूट मिलों में 20 अप्रैल से सशर्त काम शुरू करने को हरी झंडी तो दिखा दी है. लेकिन पहले से ही तमाम समस्याओं से जूझ रहे इस उद्योग या इसमें काम करने वाले लगभग दो लाख मजदूरों के चेहरे शायद ही खिलेंगे.
इसकी वजह वह शर्त है जिसके तहत महज 15 फीसदी मजदूरों को साथ ही मिल चलाने का निर्देश दिया गया है.
इससे जहां ज्यादातर मजदूरों को लगभग एक महीने तक बेरोजगार बैठने के बावजूद काम नहीं मिलने का अंदेशा है.
वहीं, मिल मालिकों ने भी अंदेशा जताया है कि इससे मिलों को चलाने का खर्च बढ़ जाएगा.
मिलों को खोलने का अनुरोध
दरअसल, रबी के सीजन में खाद्यान्नों और दलहन की पैकिंग के लिए जूट की बोरियों की मांग पूरी करने के लिए केंद्र सरकार बार-बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से राज्य की चुनिंदा 18 जूट मिलों को खोलने का अनुरोध कर रही थी.
लेकिन ममता ने पहले सुरक्षा का हवाला देकर वह अनुरोध ठुकरा दिया था.
उन्होंने बाद में इस उद्योग को सशर्त काम शुरू करने की अनुमति दे दी.
उनका कहना था, "मैं इस तरह भेदभाव नहीं कर सकतीं. महज 18 मिलों को चालू करने की अनुमति देना बाकियों के साथ अन्याय होता. इसलिए 20 अप्रैल से तमाम मिलों को महज 15 फीसदी मजदूरों और कुछ शर्तों के साथ इन मिलों को चलाने की अनुमति दी गई है. सरकार उन मिलों के संचालन के साथ ही वहां सोशल डिस्टेंसिंग और सुरक्षा नियमों के पालन की निगरानी करेगी."

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जूट उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि 15 फीसदी मजदूरों के काम करने से जूट की बोरियों की मांग को पूरा करना संभव नहीं है.
लॉकडाउन से पहले राज्य की 60 जूट मिलों में उत्पादन चल रहा था. इनकी उत्पादन क्षमता प्रतिदिन तीन हजार टन है.
लेकिन 15 फ़ीसदी मजदूरों के साथ काम करने का मतलब यह है कि बाकी मजदूरों को काम नहीं मिलेगा.
दूसरी ओर, जूट मिल मालिकों इन शर्तों के साथ काम करने को तैयार नहीं हैं.
उनकी दलील है कि मिलों को बंद होने से जितना नुकसान हो रहा था उससे कहीं ज्यादा नुकसान 15 फ़ीसदी मजदूरों के साथ काम शुरू करने से होगा.
इसके अलावा कम मजदूरों को काम मिलने की स्थिति में कानून और व्यवस्था की समस्या भी पैदा हो सकती है.
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एक जूट मिल मालिक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "15 फ़ीसदी मजदूर तो सिर्फ रखरखाव के लिए ही जरूरी हैं. इसके अलावा उत्पादन से जितना मुनाफा होगा उससे कहीं ज्यादा खर्च मिलों के संचालन और मजदूरी के भुगतान पर होगा. इसकी वजह यह है कि उत्पादन बहुत कम होगा."
एक अन्य मिल मालिक कहते हैं, "लगभग 80 फ़ीसदी मजदूर मिलों के आस-पास ही रहते हैं. उनमें से सिर्फ 15 फ़ीसदी को चुनने की स्थिति में बाकी मजदूर हंगामा खड़ा कर सकते हैं."
एक मिल मालिक कहते हैं, "हर शिफ्ट से पहले सुरक्षा कर्मियों के अलावा सफाई कर्मचारियों और केयरटेकरों को मिल के भीतर जाने की अनुमति देनी होगी. 15 फीसदी में यह लोग भी शामिल होंगे. ऐसे में काम करने वाले मजदूर कितने बचेंगे? इससे तो मिलों को बंद रखना ही बेहतर है."

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घाटे का सौदा
इंडियन जूट मिल्स एसोसिएशन (इज्मा) के अध्यक्ष राघवेंद्र गुप्ता कहते हैं, "15 फ़ीसदी मजदूरों के साथ मिलों में काम शुरू करना घाटे का सौदा होगा. सरकार ने जूट की बोरियों की कीमत पहले से तय कर रखी है. यही हमारा प्रमुख उत्पाद है."
इज्मा के एक सदस्य बताते हैं, "जूट मिलों में उत्पादन एक सतत प्रक्रिया है. इसमें कोई रुकावट नहीं डाली जा सकती. 60-65 फीसदी से कम मजदूरों के साथ यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती."
लेकिन श्रम विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, "मुख्यमंत्री ने एक-एक दिन के अंतराल पर 15 फीसदी मजदूरों को बारी-बारी से काम पर लगाने को कहा है. इसका मतलब यह है कि 30 फ़ीसदी मजदूरों को बारी-बारी से काम मिलेगा. ऐसे में कानून-व्यवस्था की कोई समस्या नहीं पैदा होगी."
जूट मिल मालिकों का कहना है कि अचानक लॉकडाउन होने की वजह से जूट की 6.10 लाख गांठें जस की तस रखी हैं. इसके अलावा अब कम से कम 40 हजार अतिरिक्त गांठों की मांग बढ़ेगी. लेकिन इतने कम मजदूरों के साथ उत्पादन लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता.

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बंगाल का जूट उद्योग फिलहाल अपने सबसे बदहाल दौर से गुजर रहा है.
हुगली के किनारे बसीं यह मिलें सत्तर-अस्सी के दशक में सोना उगलती थीं. लेकिन अब यहां काम करने वाले बदहाली के शिकार हैं.
राज्य में अक्सर किसी न किसी मिल के बंद होने और इससे नाराज मजदूरों के हिंसा करने की खबरें आती रहती हैं.
ज़्यादातर मिल मालिकों ने काम बंद रहने के दौरान मजदूरों को वेतन नहीं देने का भी एलान कर दिया है.
इन मिलों में फिलहाल तीन तरह के मजदूर काम करते हैं. इनमें से पहला वर्ग स्थाई मजदूरों का है.
लेकिन कुल कर्मचारियों में इनकी तादाद महज पांच फ़ीसदी है.

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प्रवासी मजदूर का संकट
ऐसे मजदूरों को मासिक वेतन और दूसरी सुविधाओं के साथ सेवानिवृत्ति का लाभ भी मिलता है. मजदूरों के दूसरे वर्ग में ठेके पर काम करने वाले शामिल हैं.
इनको हर महीने वेतन मिलता है. लेकिन यह ठेका सीमित समय के लिए होता है और समय-समय पर इसका नवीनीकरण किया जाता है.
इन मजदूरों में सबसे बड़ी तादाद बदली मजदूरों की है. यह लोग दैनिक मजदूर के तौर पर काम करते हैं और इनको साप्ताहिक वेतन मिलता है. लॉकडाउन के ऐलान से सबसे ज्यादा प्रभावित मजदूर ही हैं. काम नहीं होने पर इनको वेतन भी नहीं मिलता है.
बंगाल की इन मिलों में 90 फ़ीसदी मजदूर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के रहने वाले हैं. यह लोग कई पीढ़ियों से इनमें काम करते रहे हैं.
दूसरी ओर, जूट मजदूर यूनियनों ने ममता बनर्जी पर मजदूरी के अनिवार्य भुगतान जैसे अहम मुद्दे पर चुप्पी साधने का आरोप लगाया है.
माकपा से जुड़े ट्रेड यूनियन सीटू के महासचिव अनादि साहू कहते हैं, "कम मजदूरों के साथ मिलों को खोलने का फैसला तो ठीक है. हर मजदूर काम करना चाहता है. लेकिन सरकारी निर्देश में यह साफ नहीं है कि जिस मजदूर को काम नहीं मिलेगा, उसे मजदूरी मिलेगी या नहीं." एक अन्य संगठन मजदूर क्रांति परिषद के नेता अमिताभ भट्टाचार्य कहते हैं, "सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर मजदूर को काम मिल सके ताकि उसकी रोजी-रोटी पर संकट नहीं पैदा हो. ऐसा नहीं होने की स्थिति में ऐसे मजदूरों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी सरकार को लेनी चाहिए."

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