कोरोना वायरस: सरकार के वादे पर भरोसा कर बैठे आदिवासी कब होंगे रिहा

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
कोरोना वायरस की दहशत के बीच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर रायपुर की सेंट्रल जेल से 96 विचाराधीन बंदियों को शुक्रवार की रात जमानत पर रिहा कर दिया गया.
माना जा रहा है कि कोरोना वायरस के मद्देनज़र कैदियों को विशेष पैरोल और फर्लो देकर रिहा किये जाने से जेलों में भीड़ कम होगी. राज्य की दूसरी जेलों से भी बंदियों की जल्दी रिहाई होगी. इधर, इस फ़ैसले के बाद राज्य भर की जेलों में बंद आदिवासियों को रिहा करने की मांग फिर से उठने लगी है.
राज्य के मंत्री कवासी लखमा के बेटे और माओवाद प्रभावित सुकमा ज़िला पंचायत के अध्यक्ष कवासी हरीश ने राज्य सरकार को पत्र लिख कर फिर से इन आदिवासियों की रिहाई की मांग की है.
2018 में सत्ता में आई भूपेश बघेल की सरकार ने आदिवासियों की रिहाई का फ़ैसला किया था. लेकिन पिछले साल भर में राज्य सरकार अब तक केवल 215 ऐसे मामलों की वापसी करने में सफल हो पाई है, जो आबकारी एक्ट यानी शराब से जुड़े थे.
इसके उलट राज्य की जेलों में हज़ारों की संख्या में आदिवासी अपनी रिहाई के लिये उम्मीद लगाए बैठे हैं.
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आजीवन कारावास के मामले
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अधिवक्ता रजनी सोरेन कहती हैं, "राज्य भर की जेलें क़ैदियों से ठसाठस भरी हुई हैं. अब जबकि राज्य में कोरोना वायरस के मामले सामने आ चुके हैं और सरकार लॉकडाउन व कर्फ़्यू जैसे रास्ते पर है, तब सरकार को बरसों से जेलों में बंद आदिवासियों की रिहाई की कार्रवाई को लेकर गंभीर होने की ज़रुरत है."
यह चार साल पुराना मामला है, जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में इस बात पर बहस हो रही थी कि राज्य भर की जेलों में जिन लोगों ने आजीवन कारावास की अपनी सज़ा पूरी कर ली है, उन्हें क़ानूनी प्रावधानों के तहत रिहा कर देना चाहिये.
भारतीय दंड संहिता की धारा 432 और 1968 के नियम 358, 359 में यह प्रावधान है कि आजीवन कारावास के मामले में 14 साल जेल में गुजार चुके क़ैदी की रिहाई के लिये बंदी समीक्षा बोर्ड, मामले की समीक्षा करके उसे संबंधित न्यायाधीश के पास भेजती है. संबंधित न्यायाधीश की अगर सहमति हो तो फिर क़ैदी को रिहा कर दिया जाता है.
दंतेवाड़ा में हमसे बात करते हुये आदिवासी किसान पदामी लच्छू कहते हैं, "जेल में रहते हुये बंदी या क़ैदी आधे वकील तो हो ही जाते हैं. बंदियों की रिहाई पर हाईकोर्ट में हुई बहस की ख़बर जब जेल तक आई तो सबको लगने लगा कि कुछ लोगों की रिहाई का रास्ता तो साफ़ हो ही जायेगा. फुलनार के रहने वाले चित्तू को किसी ने बता दिया था कि इस साल उसकी रिहाई हो जायेगी."

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हाई कोर्ट का आदेश
हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे दंतेवाड़ा के फुलनार गांव के रहने वाले चित्तू ऊर्फ सीताराम की फ़ाइल से पता चलता है कि जब बिलासपुर हाईकोर्ट में क़ैदियों की रिहाई पर बहस हो रही थी, वे अपनी ज़िंदगी के लगभग 20 साल जेल में गुज़ार चुके थे.
लेकिन हाईकोर्ट की इस बहस और आदेश के बाद महीनों और साल गुज़र गये. हाईकोर्ट के आदेश पर फ़ाइलें आगे बढ़ती रहीं, टिप्पणियां दर्ज़ होती रहीं. इन फ़ाइलों के साथ ही चित्तू की रिहाई के सपने तार-तार होते गये.
चित्तू की एक फ़ाइल पर जगदलपुर के तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश ने लिखा, "बंदी का परिहार मंजूर करने की शक्ति राज्यपाल को है. यदि इस संबंध में जेल मेनुअल में कोई प्रावधान हो या राज्य सरकार का कोई दिशा-निर्देश हो तो उसका पालन किया जाये."
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में फिर से इस मामले पर बहस हुई और पिछले साल मई में कोर्ट ने क़ैदियों की रिहाई को लेकर राज्य सरकार को गंभीरता बरतते हुये कई दिशा-निर्देश जारी किये. कोर्ट के आदेश की फ़ाइल जगदलपुर जेल में भी पहुंची. लेकिन चित्तू की रिहाई नहीं हो सकी.

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फ़ाइलों में क़ैद ज़िंदगी
पिछले महीने की 6 तारीख़ को चित्तू की जेल में ही मौत हो गई. इधर, भारत सरकार के मानवाधिकार आयोग की एक फ़ाइल से पता चलता है कि 3 मार्च को आयोग ने छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव, बस्तर के कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और जेल अधीक्षक से चित्तु की मौत को लेकर रिपोर्ट मांगी है.
इस फ़ाइल के अनुसार राज्य सरकार को 26 अप्रैल तक संबंधित रिपोर्ट भेजनी है. एक सरकारी अफ़सर इसे 'रुटिन' की फ़ाइल बताते हैं.
हाईकोर्ट की अधिवक्ता रजनी सोरेन कहती हैं, "आदिवासियों की ज़िंदगी फ़ाइलों में क़ैद हो कर रह गई है. सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट और निचली अदालतों तक बहसें होती हैं, अदालतें आदेश जारी करती हैं लेकिन उन पर कार्रवाई की फ़ाइलों की रफ़्तार इतनी धीमी है कि यह कई बार निराशा पैदा करती है."
रजनी सोरेन का दावा है कि अकेले जगदलपुर के जेल में ही केवल आजीवन कारावास के क़ैदियों की रिहाई के 30 से अधिक मामले लंबित हैं. क़ैदियों की रिहाई के बजाये फाइलें बस इधर से उधर हो रही हैं.
हालत ये है कि क़ानूनन जिन न्यायधीशों को इस तरह के मामले में साफ़-साफ़ राय के लिये फ़ाइल भेजी जाती है, वे भी अपनी टिप्पणी देने के बजाये, इसे किसी और पर टाल देते हैं.

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सामाजिक कार्यकर्ताओं में निराशा
आजीवन कारावास के क़ैदियों की रिहाई के मामले में हमने जगदलपुर के प्रथम अपर सत्र न्यायालय की कई फ़ाइलों में यह टिप्पणी देखी, "उल्लेखित दोषसिद्धी दंडित बंदियों को इस न्यायालय के द्वारा दिये गये आजीवन कारावास के दंडादेश का लघुकरण का परिहार के संबंध में इस स्तर को कोई भी अभिमत दिया जाना न्यायोचित प्रतीत नहीं हो रहा है."
यानी जिस मामले में क़ानूनन क़ैदी की रिहाई को लेकर न्यायाधीश से राय मांगी गयी, उन्होंने कमेटी को यह लिख भेज दिया कि इस न्यायालय द्वारा जिस क़ैदी को आजीवन कारावास की सज़ा दी गई है, उसे कम करने पर कोई राय देना इस स्तर पर न्यायोचित नहीं लग रहा है.
दिलचस्प ये है कि इस मामले में न्यायाधीश की राय के बाद ही क़ैदी की रिहाई पर बात आगे बढ़ पाती. ज़ाहिर है, ऐसी टिप्पणियों के बाद मामला फिर से फ़ाइलों में इस दफ़्तर से उस दफ़्तर घूमता रहा और क़ैदियों की रिहाई पर कोई निर्णय नहीं हो सका. कई न्यायाधीशों ने इस मामले को राज्यपाल के पाले में डाल दिया.
जिन आदिवासियों को सज़ा हो गई है, उनके मामलों में भी और जिनके मुक़दमों की ट्रायल यानी सुनवाई चल रही है, उनके मामलों की भी रफ़्तार को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं में निराशा है. राज्य के 21 केंद्रीय और उपजेलों के आंकड़े भी बताते हैं कि हालात ठीक नहीं हैं.
केवल पांच केंद्रीय जेलों की बात करें तो इन सभी पांच केंद्रीय जेलों में क़ैदियों की संख्या क्षमता से 46.28 प्रतिशत अधिक है.
जस्टिस पटनायक कमेटी
बस्तर की सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी का कहना है कि राज्य में 2018 में सत्ता में आते ही जब भूपेश बघेल की सरकार ने दावा किया था कि एक कमेटी बना कर निर्दोष आदिवासियों की रिहाई की जाएगी तो आदिवासियों ने बहुत उम्मीद पाल रखी थी.
लेकिन अब जा कर राज्य भर में आदिवासियों के ख़िलाफ़ केवल आबकारी यानी शराब से जुड़े 215 फ़र्ज़ी मामलों की ही वापसी हो पाई है. असल में कांग्रेस पार्टी ने सत्ता में आते ही निर्दोष आदिवासियों की रिहाई का वादा किया था. इसके लिये सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज एके पटनायक की अध्यक्षता में एक कमेटी भी बनाई गई.
इस कमेटी में छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता, गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव, आदिम जाति विकास विभाग के सचिव, महानिदेशक जेल, पुलिस महानिदेशक और बस्तर संभाग के कमिश्नर इस समिति के सदस्य बनाये गये थे.
लेकिन पूरे साल भर में यह कमेटी आदिवासियों से जुड़े गंभीर मामलों के बजाये केवल आबकारी से जुड़े 313 मामलों की वापसी का निर्णय ले पाई. इनमें से भी अब तक ऐसे 215 मामलों में ही कार्रवाई हो पाई है.

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माओवादी बता कर...
यहां तक कि इस शनिवार और रविवार को भी गठन के बाद से तीसरी बार आयोजित पटनायक कमेटी की बैठक में भी 197 मामलों पर ही चर्चा की अनुशंसा की गई है.
यहां तक कि 7 और 8 मार्च को भी गठन के बाद से तीसरी बार आयोजित पटनायक कमेटी की बैठक में भी 197 मामलों पर ही चर्चा की अनुशंसा की गई है.
सोनी सोरी का दावा है कि उन्होंने पिछले सप्ताह ही केवल बस्तर के तीन ज़िलों सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर से आदिवासियों के लगभग 400 ऐसे मामले एकत्र किये हैं, जिसमें निर्दोष आदिवासियों को माओवादी बता कर जेल में डाल दिया गया था.
सोनी सोरी का दावा है कि उन्होंने केवल बस्तर के तीन ज़िलों सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर से आदिवासियों के लगभग 400 ऐसे मामले एकत्र किये हैं, जिसमें निर्दोष आदिवासियों को माओवादी बता कर जेल में डाल दिया गया था.

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सुप्रीम कोर्ट के प्रावधान
जेल में बंद आदिवासियों के कई मामलों की पैरवी करने वाली हाईकोर्ट की अधिवक्ता रजनी सोरेन का कहना है कि पटनायक कमेटी जिन मामलों में फ़ैसले ले रही है, उसके लिये सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही ज़िला स्तर पर प्रावधान रखे हैं.
24 अप्रैल 2015 के अपने एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने हर ज़िले में ज़िला न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली 'अंडर ट्रायल रिव्यू कमेटी' स्थापित करने और भारतीय दंड संहिता की 1973 की धारा 436 ए के तहत मामलों की समीक्षा के निर्देश दिये थे.
5 फरवरी 2016 के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी रिव्यू कमेटी को हर तीन महीने में बैठक करने के निर्देश जारी किये थे. 6 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में क़ैदियों की अधिकता के मद्देनज़र हाईकोर्ट को ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान ले कर कार्रवाई के आदेश जारी किये थे.
रजनी सोरेन कहती हैं, "अगर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार ज़िलों में गठित कमेटियां ही कार्रवाई कर दें तो आदिवासियों को बहुत सारी मुश्किलों से छुटकारा मिल सकता है."
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तीन साल तक की सज़ा
बस्तर में आदिवासियों की क़ानूनी सहायता पर काम कर रही शिखा पांडेय का कहना है कि आदिवासियों के मामलों की सुनवाई भर सही समय पर हो जाये और उन्हें पर्याप्त क़ानूनी सहायता मिल जाये तो पटनायक कमेटी की सार्थकता सिद्ध हो जायेगी.
लेकिन इस कमेटी के सदस्य और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक रंजन तिवारी का कहना है कि पटनायक कमेटी ने पिछली बैठक में 313 मामलों को सुलझाया था, जिनमें अधिकांश मामले आबकारी यानी शराब से जुड़े हुये थे.
इसके बाद 7-8 मार्च की बैठक में 91 ऐसे मामलों में कमेटी ने अनुशंसा की, जिनमें अधिकतम तीन साल तक की सज़ा का प्रावधान है. इनमें अधिकांश मामले जुआ, आपसी झगड़े और गाली-गलौच के थे.
विवेक रंजन तिवारी कहते हैं, "कमेटी की कोशिश है कि वह अधिक से अधिक आदिवासियों को राहत पहुंचा सके. अगली बैठक में ऐसे मामलों पर विचार करने का प्रस्ताव है, जिनमें सात साल तक की सज़ा है. इस कमेटी के फ़ैसलों का दूरगामी परिणाम नज़र आयेगा."

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