कोरोना वायरस को सरकार क्या सिर्फ़ लॉकडाउन से रोक पाएगी?

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- Author, नवीन नेगी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत सरकार की तरफ़ से जारी ताज़ा जानकारी के मुताबिक़, कोरोना वायरस के ख़तरे को देखते हुए 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पूरी तरह से लॉकडाउन किया जा चुका है. इसके अलावा छह राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जहां के चुनिंदा इलाकों में लॉकडाउन किया गया है.
चंडीगढ़, दिल्ली, गोवा, जम्मू कश्मीर, नागालैंड, राजस्थान, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, लद्दाख, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, बिहार, त्रिपुरा, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश को पूरी तरह से लॉकडाउन किया जा चुका है.

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रविवार को जनता कर्फ्यू वाले दिन शाम होते-होते दुनिया के सबसे व्यस्ततम रेल नेटवर्क की रफ़्तार थामने का फ़ैसला भी ले लिया गया साथ ही राज्यों को सड़कमार्ग से जोड़ने वाली इंटरस्टेट बस सेवा पर भी ब्रेक लगा दिए गए.
सुबह से घरों में बैठी जनता इन खबरों के कई मायने निकाल रही है. उन्हें समझ आ रहा है कि हालात एक दिन के 'जनता कर्फ़्यूं' से सुधरने वाले नहीं हैं और इसीलिए अब कई दिनों का लॉकडाउन किया जा रहा है.

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क्या हैं लॉकडाउन के मायने?
लॉकडाउन एक तरह की आपातकालीन व्यवस्था को कहा जाता है. जिसके तहत सार्वजनिक यातायात के साथ-साथ निजी प्रतिष्ठानों को भी बंद कर दिया जाता है. मौजूदा वक़्त में हेल्थ इमरजेंसी के तहत देश के तमाम हिस्सों में लॉकडाउन लगाया गया है.
स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने सोमवार को प्रेस ब्रीफ़िंग में लॉकडाउन के संबंध में जानकारी दी. उन्होंने कहा, "लॉकडाउन जनता के बीच पहले से प्रचलित शब्द है. इस दौरान जो भी कदम उठाए जा रहे हैं या आगे उठाए जाएंगे वो एपिडेमिक डिज़ीज़ एक्ट, डिज़ास्टर मैनेजमेंट एक्ट, आईपीसी और सीआरपीसी के तहत लिए जा रहे हैं."
लव अग्रवाल ने साथ ही कहा, "जब हम लॉकडाउन शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह साफ़ करना चाहते हैं कि इस दौरान बेहद ज़रूरी सेवाओं के अलावा अन्य चीजों को बंद किया जाएगा. इससे संक्रमण के फैलने की दर को कम किया जा सकेगा. इसके साथ ही लॉकडाउन के दौरान जो मामले पॉज़िटिव पाए जाएंगे उन्हें नियंत्रित तरीक़े से मैनेज किया जा सकेगा."

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क्या लॉकडाउन एक सही फ़ैसला?
कोरोना के तेज़ी से बढ़ते ख़तरे को देखते हुए कई देशों में लॉकडाउन किया गया है. इसकी शुरुआत चीन से हुई.
इसके बाद अमरीका, इटली, फ्रांस, आयरलैंड, ब्रिटेन, डेनमार्क, न्यूज़ीलैंड, पोलैंड और स्पेन में भी कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए इसी तरीके को अपनाया.
लेकिन लॉकडाउन पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान ने इस तरीके पर सवाल उठा दिए. डब्ल्यूएचओ के एग्ज़िक्यूटिव डायरेक्टर माइक रायन ने कहा कि कोरोना वायरस को रोकने के लिए सिर्फ लॉकडाउन किया जाना ही कारगर तरीका नहीं है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स में प्रकाशित ख़बर में बताया गया है कि माइक रायन ने अपने इस बयान के साथ ही कहा, ''लॉकडाउन के साथ-साथ सभी देशों को कोरोना वायरस की सही तरह से टेस्टिंग भी करनी होगी. क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता है और जब लॉकडाउन ख़त्म किया जाएगा तो कोरोना का संक्रमण बहुत तेज़ी से फैलने लगेगा.''

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माइक ने अपना यह बयान अमरीका के संदर्भ में पूछे गए सवाल के जवाब में दिया. उन्होंने बताया कि सभी देशों की सामाजिक संरचना अलग-अलग है लेकिन सिर्फ लोगों को घरों में रखने से ही संक्रमण को रोक नहीं सकते.
इसी मुद्दे पर जब बीबीसी ने डब्ल्यूएचओ से भारत के संदर्भ में सवाल किया और पूछा कि भारत में लॉकडाउन कितना कामयाब हो सकता है. इस पर डब्ल्यूएचओ के दक्षिण-पूर्वी एशिया में स्थानीय आपातकालीन सेवाओं के निदेशक डॉक्टर रॉड्रिको ऑफ़रिन ने लिखित जवाब दिया.
उन्होंने अपने जवाब में लिखा, "कोविड-19 के संक्रमण को रोकने की दिशा में भारत सरकार ने जो कदम उठाए हैं वो सराहनीय हैं. भारत सरकार ने 75 ज़िलों में लॉकडाउन किया साथ ही ट्रेन और बस सेवाओं को रोकने का फैसला किया. इससे संक्रमण के फ़ैलने की दर में कमी आएगी. लेकिन इसके साथ ही लगातार टेस्टिंग और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग को भी बढ़ाना होगा."

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भारत में लॉकडाउन कितना कारगर?
भारत में कोरोना वायरस संक्रमितों का आंकड़ा 400 के पार पहुंच चुका है साथ ही इससे मरने वालों की संख्या भी सात हो चुकी है.
लव अग्रवाल से जब इस संबंध में पूछा गया कि एक दिन के लॉकडाउन और उससे पहले जनता कर्फ्यू का कितना असर देखने को मिला. तो उन्होंने जवाब दिया, "अभी लॉकडाउन का एक ही दिन हुआ है उससे पहले जनता कर्फ्यू था. हम जानते हैं कि जब लॉकडाउन के तहत लोगों घरों में रहेंगे तो इस संक्रमण को नियंत्रित करने में भी हमें निश्चित तौर पर मदद मिलेगी."

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स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस ब्रीफिंग के दौरान ही गृह मंत्रालय की तरफ से एक अधिकारी पुण्य सलिला श्रीवास्तव भी मौजूद रहीं. उन्होंने बताया कि लॉकडाउन के दौरान जितनी भी पाबंदियां लगाई गई हैं उन्हें सख्ती से लागू करवाने के लिए सभी राज्यों के डीजीपी की बैठक भी करवाई गई और निर्देश दिए गए कि जो भी इन पाबंदियों का पालन नहीं करेगा उन्हें ख़िलाफ़ सख्त कदम उठाए जाएंगे.
सवाल उठता है कि भारत में लॉकडाउन कितना कारगर हो सकता है, इसे लेकर दिल्ली स्थित एम्स हॉस्पिटल में आरडब्ल्यूए (रेजिडेंट डॉक्टर्स वेलफेयर) के पूर्व अध्यक्ष हरजीत भाटी बहुत अधिक आश्वान्वित नहीं दिखते.
हरजीत भाटी कहते हैं, ''लॉकडाउन करने का एक ही मकसद होता है कि लोग एक-दूसरे के संपर्क में ना आएं. लेकिन भारत में इसे पूरी तरह से लागू कर पाना संभव नहीं है. हम देख चुके हैं कि जनता कर्फ्यू के दौरान भी लोग शाम के वक़्त रैलियां निकालते हुए सड़कों पर आ गए थे.''
हरजीत भाटी कहते हैं कि सेल्फ क्वांरटीन या आइसोलेशन जैसी चीज़ें भारतीय लोगों के लिए बहुत नई हैं. वो कहते हैं कि सरकार बहुत देरी से कदम उठा रही है. हरजीत कहते हैं, "अब हम तीसरी स्टेज की तरफ़ जा रहे हैं ऐसे में सिर्फ लॉकडाउन ही काफ़ी नहीं होगा.
हालांकि, डॉक्टर सुरेश कुमार राठी का मानना है कि लॉकडाउन एक बेहतर फ़ैसला है, सरकार ने इसे सही वक़्त पर लिया है. डॉक्टर सुरेश कुमार राठी पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ इंडिया में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.
डॉक्टर राठी कहते हैं, ''सरकार ने लॉकडाउन करके बहुत सही कदम उठाया है लेकिन सब कुछ अकेले सरकार ही नहीं कर सकती. आम लोगों को भी सरकार का साथ देना होगा और खुद को एक-दूसरे के संपर्क में आने से रोकना होगा.''



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लॉकडाउन और डॉक्टरों के सामने दिक्कतें
लॉकडाउन के दौरान लोगों की सोशल डिस्टेंसिंग बढ़ाने को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है. लेकिन इस दौरान डॉक्टरों के सामने कैसी समस्याएं पेश आ रही हैं वो भी काफी अहम हैं.
गंगाराम अस्पताल में सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर धीरेन गुप्ता कहते हैं, "इस वायरस की इंफेक्शन रेट बहुत तेज है. आमतौर किसी दूसरे फ्लू की इंफेक्शन रेट 0-1 होती है यानी एक संक्रमित शख्स अन्य किसी एक ही शख्स को संक्रमित करता है जबकि कोविड-19 की यही दर 4-6 है, यानी एक कोविड-19 संक्रमित शख्स अन्य 4-6 लोगों को संक्रमित कर सकता है. इसलिए लॉकडाउन के दौरान भी लोगों की टेस्टिंग होना बहुत ज़रूरी है."
वो कहते हैं, "भारत में अभी तक बहुत कम लोगों की टेस्टिंग की जा रही है. इसका दायरा बढ़ाया जाना चाहिए. ऐसा करने के बाद हम पाएंगे कि संक्रमित लोगों की संख्या भी बढ़ने लगेगी."

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डॉक्टर धीरेन इटली का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि इटली ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि 25 से 29 साल की उम्र वाले अधिकतर लोगों में कोरोना के लक्षण नहीं दिख रहे थे लेकिन जब उनकी जांच हुई तो उसमें कई लोग संक्रमित पाए गए. इसलिए भारत में भी जब अधिक से अधिक लोगों की टेस्टिंग की जाएगी तो हक़ीक़त बाहर निकलकर आएगी.
कुछ-कुछ ऐसी ही बात डॉक्टर हरजीत भाटी भी कहते हैं. उनका कहना है कि लॉकडाउन तो ठीक है लेकिन देश में ज़्यादा से ज़्यादा आइसोलेशन सेंटर बनाए जाने चाहिए. लोगों की अगर रैंडम तरीके से जांच होने लगेगी तो इससे संक्रमितों का आंकड़ा भी बढ़ेगा. ऐसे लोगों को रखने के लिए पर्याप्त आइसोलेशन सेंटर भी नहीं हैं.
इसके साथ ही डॉक्टरों के पास टेस्ट करने के लिए उचित उपकरण और पर्याप्त संख्या में डॉक्टर भी नहीं हैं. हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस संबंध में कहा है कि नए टेस्टिंग उपकरणों के लिए कुछ और कंपनियों से संपर्क किया गया है.
लॉकडाउन की एक और स्थिति और उपकरणों की कमी को समझाते हुए डॉक्टर धीरेन बताते हैं कि लोगों ने बहुत से मास्क और सैनिटाइज़र पहले से ही घरों में रख लिए हैं, जिसके चलते अस्पतालों में डॉक्टरों और स्टाफ को भी पर्याप्त मात्रा में ये बेसिक चीजें नहीं मिल रहीं.

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इसी पर डॉक्टर सुरेश कुमार राठी कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान घरों में मौजूद लोगों को मास्क पहनने की ज़रूरत नहीं है लेकिन फिर भी हम देखते हैं कि कई लोग अपने घरों के अंदर भी मास्क पहनकर बैठे हैं.
वो कहते हैं, ''मास्क पहनना कोरोना वायरस का बचाव नहीं है. मास्क तभी पहनना ज़रूरी है जब आपमें सर्दी-खांसी जैसे लक्षण हों या आपके आसपास ऐसा कोई मरीज़ हो.''
डॉक्टर हरजीत भाटी कहते हैं कि लोगों मास्क पहनने का तरीका भी नहीं आता, वो बार-बार उसे छूते रहते हैं और कई-कई दिनों तक एक ही मास्क को लगाए रहते हैं, यह सब एक स्वस्थ्य इंसान को भी बीमार कर सकता है.
कुल मिलाकर सरकार की तरफ से किया गया लॉकडाउन एक ज़रूरी कदम तो है लेकिन यह लंबे वक्त तक जारी नहीं रखा जा सकता. कोरोना का ख़ात्मा करने के लिए हमारे अस्पतालों के साथ-साथ आम लोगों को भी अपने व्यवहार में भी बदलाव लाना होगा.

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