कोरोना: अफ़वाहों के वायरस से जूझता पॉल्ट्री कारोबार

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- Author, सिराज हुसैन
- पदनाम, पूर्व कृषि सचिव, बीबीसी हिंदी के लिए
फ़ेक न्यूज़ और झूठी तस्वीरों का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर बीते कुछ सालों से भड़काऊ भाषणों, लिचिंग और साम्प्रदायिक हिंसा भड़काने के लिए किया जाता रहा है.
लेकिन ऐसा पहली बार है कि कोरोना वायरस की वजह से फ़ैलाई जा रही फ़ेक न्यूज़ के चलते भारत के करीब 50 लाख लोगों की रोज़ी रोटी का ज़रिया और देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पॉल्ट्री प्रोडक्ट पर बुरा असर पड़ा है.
इसका परिणाम ये हुआ है कि पॉल्ट्री (मुर्गी पालन) के कारोबार में लगे लोग निराश हो चुके हैं और तनाव में जी रहे हैं.
फ़ेक न्यूज़ के जरिए लोगों के बीच ये संदेश फैलाने की कोशिश की गई है कि शाकाहारी खाना मांसाहार के मुकाबले ज़्यादा बेहतर और स्वास्थ्यवर्धक है.
भारत में मीडिया, प्रशासन, न्याय व्यवस्था और राजनीति में भी शाकाहार को लेकर बेहद प्रभावी बातें सामने आती रही हैं.

भ्रम दूर करने की कोशिशें
अप्रैल 2018 में भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने दो महिलाओं की तस्वीरें ट्वीट की थीं.
जिनमें से एक में दिखाया गया था कि मोटी दिखने वाली महिला मांसाहार की शौकीन है जबकि दूसरी तस्वीर में दिखाया गया कि शाकाहारी खाना, फल और सब्जियां खाने वाली महिला पतली और स्वस्थ दिख रही है.
हालांकि बाद में ये ट्वीट डिलीट कर दिया गया लेकिन शाकाहार को बढ़ावा देने की बातें लगातार सामने आती रही हैं.
भारतीय रेलवे और एयर इंडिया ने भी इसे बढ़ावा देने की बात कही और कई रूटों पर नॉनवेज खाना पूरी तरह बंद करने का फ़ैसला भी लिया.
यही नहीं, देश के कई राज्यों ने सरकारी स्कूलों के मिड-डे मील में अंडा शामिल करने से भी इनकार कर दिया.

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अचानक घट गई मांग
कोरोना वायरस को लेकर फैल रही अफवाहों के बीच केंद्रीय पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन मंत्री ने एक बयान जारी करके कहा कि इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि पक्षियों से इंसानों में कोई वायरस आ रहा है.
तेलंगाना में कई मंत्रियों ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया जिसमें चिकन और अंडे से बनी कई डिश परोसी गईं.
ये कार्यक्रम जनता के बीच फैली उन भ्रांतियों को दूर करने के लिए रखा गया था जिनमें दावा किया जा रहा था कि चिकन और अंडा खाने से कोरोना वायरस का संक्रमण हो सकता है.
पॉल्ट्री प्रोडक्ट से कोरोना वायरस का संक्रमण होने की फ़ेक न्यूज़ सोशल मीडिया पर फैली तो अचानक प्रोडक्ट की मांग घट गई और देश के कई हिस्सों में किसान 28 से 30 रुपये किलो की दर से मुर्गियां बेचने को मजबूर हो गए जबकि इनकी पालन में 70 से 80 रुपये प्रति किलो का खर्च आता है.
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सबसे तेज़ विकास
दिल्ली के ग़ाज़ीपुर स्थित मंडी में भी जिस मुर्गे की कीमत दिसंबर महीने में 85 रुपये किलो थी वो अब 36 रुपये किलो बिक रहा है. इस गिरावट की वजह से छोटे किसानों और उन तमाम लोगों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट आ गया है जो इस सेक्टर पर निर्भर हैं.
बीते दशक में खेती से जुड़े दूसरे सेक्टर देखें तो पॉल्ट्री में सबसे तेज़ विकास देखने को मिला. इसकी वजह बढ़ती आमदनी, शहरीकरण, खाने की बदलती आदतों के अलावा अंडा और चिकन की आसान उपलब्धता भी थी.
डॉक्टर आरएस परोडा की अगुवाई में बनी विशेषज्ञ समिति की 'पॉलिसीज़ एंड एक्शन प्लान फॉर ए सिक्योर एंड सस्टेनेबल एग्रीकल्चर' पर रिपोर्ट जो साल 2011-12 और 2016-17 में तैयार की गई उसमें अंडा और पॉल्ट्री सेक्टर की विकास दर 13 फ़ीसदी और 15 फ़ीसदी दर्ज की गई थी.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि साल 2016-17 में भारत दुनिया का सबसे बड़ा अंडा उत्पादक (दुनिया का 7 फ़ीसदी) देश था और पॉल्ट्री मुर्गा उत्पादन में पांचवें नंबर पर रहा.

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पॉल्ट्री उत्पादन का यूनीक मॉडल
साल 2019 में पशुधन जनगणना में पॉल्ट्री की आबादी साल 2019 में 85.18 करोड़ थी जो साल 2012 में 72.92 करोड़ थी. यह बढ़त 17 फ़ीसदी रही. इसी दौरान बैकयार्ड में मुर्गी पालन करीब 73 फ़ीसदी तक बढ़ा और साल 2012 में 21.75 करोड़ मुर्गियों के मुकाबले साल 2019 में मुर्गियों की संख्या 31.70 करोड़ हो गई.
इससे पता चलता है कि किसानों को मुर्गी पालन का बाज़ार सुलभ लगा और मुर्गी पालन में उन्हें मुनाफ़ा नज़र आया. इससे ग्रामीण इलाकों में रोज़गार भी पैदा हुआ. भारतीय पॉल्ट्री सेक्टर निजी और सरकारी क्षेत्र के सहयोग का सफल उदाहरण है जिसमें पॉलिसी सपोर्ट की वजह से बेहतर विकल्प और वैल्यू चेन बनीं.
इसका मूल्य लगभग 80000 करोड़ रुपये है, जिसमें से 80 फ़ीसदी संगठित क्षेत्र में है. असंगठित क्षेत्र में वो मुर्गीपालन आता है जिसमें किसान अपने घरों में कुछ मुर्गियां पालते हैं. यह उनकी आमदनी बढ़ाने का एक जरिया है.
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हाई क्वॉलिटी प्रोटीन
कृषि से जुड़े कई सेक्टर से पॉल्ट्री अलग है जहां संगठित क्षेत्र में उत्पादन और मार्केटिंग की लागत बहुत कम है.
अंडा बेहद उचित मूल्य में हाई क्वॉलिटी प्रोटीन का स्रोत है. इसमें प्रोटीन, ज़रूरी अमीनो एसिड, विटामिन ए, बी6, बी12 और फोलेट, आयरन, फास्फोरस, सेलेनियम, कोलीन और ज़िंक जैसे मिनरल भी मौजूद होते हैं. अंडा की मांग में आने वाली कमी भारत के ग़रीब तबके को ज़रूरी पोषक तत्वों से दूर कर देगी.
पॉल्ट्री उत्पादन में भारत में यूनीक मॉडल अपनाया जा रहा है.
कई बड़ी कंपनियों ने हैचरी और फीड मिलों की इंटीग्रेटेड चेन बनाई है और वे किसानों को पशु चिकित्सा और विस्तार सेवाओं के साथ-साथ कर्ज भी देती हैं. ये कंपनियां किसानों को ज़रूरी चीज़ें उपलब्ध कराती हैं.

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किसानों का भविष्य ख़तरे में
किसान मुर्गियों की देखभाल करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि स्वच्छता बनी रहे ताकि मौतें कम हों. अधिकतर पॉल्ट्री फार्म साधारण से बाड़े होते हैं. देश में कुछ ही बड़े पॉल्ट्री फार्म हैं जहां तापमान कंट्रोल करने और ऑटोमैटिक फीडिंग और पीने के पानी की व्यवस्थाएं हैं.
किसान इन बाड़ों में मुर्गियों की देखभाल करते हैं और 35 से 40 दिनों में जब पॉल्ट्री का मुर्गा 1.8 किलो से 2.2 किलो तक का हो जाता है तो वे उसे इंटीग्रेटर को दे देते हैं. किसान को हर पॉल्ट्री मुर्गे के बदले 15 रुपये मिलते हैं. एक पॉल्ट्री फॉर्म में औसतन सात से आठ हज़ार मुर्गियां होती हैं.
सामान्य रूप देखे तो किसानों और इंटीग्रेटर कंपनियों, दोनों के लिए यह बेहतर व्यवस्था है क्योंकि कीमतों का रिस्क किसान वहन नहीं करते.
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और तेलंगाना में सबसे अधिक पॉलट्री फॉर्म हैं. हालांकि दूसरे राज्यों को भी इस सेक्टर की अहमियत का अंदाज़ा हो चुका है कि अगर किसानों की आय साल 2023 तक दोगुनी करनी है तो बढ़ती मांग को देखते हुए पॉलट्री एक बेहतर विकल्प है.

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पीएम किसान योजना का फ़ायदा मिलेगा?
हालांकि कोरोना वायरस की वजह से कीमतों में काफ़ी गिरावट आई है जिसकी वजह से इस कारोबार में लगे किसानों का भविष्य ख़तरे में दिख रहा है. कई किसानों ने इसके लिए बैंकों से कर्ज़ ले रखा है और उसे चुकाने में किसानों को मुश्किल होगी. ऐसी भी रिपोर्ट आई हैं कि किसान पॉलट्री में मुर्गों को ज़िंदा दफना रहे हैं.
पीएम किसान योजना ने किसानों की थोड़ी मदद ज़रूर की है जिसके तहत सभी जमीनधारक 6000 रुपये तक पा सकते हैं. कोरोना वायरस को लेकर फैली अफ़वाहों की वजह से किसानों को जो नुकसान हुआ है उसमें उन्हें सीधे तौर पर इस योजना का फायदा मिल सकता है.
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साथ ही, आने वाले दो दशकों के लिए इस पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है और जनसंख्या की पोषण संबंधी ज़रूरतों के साथ-साथ किसानों के लिए आजीविका के विकल्प तलाशना भी ज़रूरी है. सरकार कुपोषण से जूझते भारत की चुनौती से निपटने के लिए बेहतर फ़ैसला लेगी अगर वो ये बात लोगों पर छोड़ दे कि उन्हें क्या खाना है.
फिलहाल जब कोरोना वायरस का प्रकोप तेज़ी पकड़ रहा है, केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वो इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और सोशल मीडिया के ज़रिए इस बात की जानकारी दे कि कोरोना वायरस का पॉल्ट्री इंडस्ट्री से कोई लेना-देना नहीं है, इसके कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं मिले.
जबकि पॉल्ट्री प्रोडक्ट खाने से इम्युनिटी बेहतर होती है जिससे कोरोना वायरस से लड़ने में और मदद मिलेगी.
(लेखक भारत सरकार के पूर्व कृषि सचिव हैं. वर्तमान में वो ICRIER के विजिटिंग सीनियर फ़ेलो हैं. )

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