दिल्ली के नतीजे- बिरयानी की कहानी और गोली मारने के नारे BJP के कितना काम आए?

अरविंद केजरीवाल

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    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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"शाहीन बाग़ के लोग घर में घुसकर आपकी बहू बेटियों के साथ बलात्कार करेंगे."

"आतंकवादियों को बिरयानी खिलाने के बजाय बुलेट (बंदूक़ की गोली) खिलानी चाहिए."

"देश के ग़द्दारों को "गोली मारो सा*** को."

"अरविंद केजरीवाल आतंकवादी है."

ये मामूली वाक्य नहीं हैं बल्कि दिल्ली चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की पुरज़ोर कोशिश की कुछ मिसालें हैं. वैसे तो देश श्मशान-क़ब्रिस्तान जैसे चुनाव प्रचार यूपी में देख चुका है लेकिन दिल्ली के चुनाव को ध्रुवीकरण की कोशिश के लिए यादगार चुनावों में गिना जाएगा.

भड़काऊ नारों का आलम ये रहा है कि पार्टी के स्टार प्रचारकों को चुनाव आयोग ने कैम्पेन करने से रोक दिया.

अमित शाह

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क्या दिल्ली चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के पास दूसरे मुद्दों नहीं थे?

ये कहना भी ग़लत होगा. प्रधानमंत्री मोदी ने देश के विकास की बात दोहराई और केजरीवाल सरकार पर "केंद्र सरकार की अच्छी स्कीमों में रुकावट पैदा करने" का ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने केजरीवाल के मोहल्ला क्लिनिक की काट के लिए बार-बार कहा कि दिल्ली सरकार ने आयुष्मान भारत स्कीम को लागू नहीं किया.

लेकिन मोटे तौर पर छोटी-छोटी सभाएं आयोजित करके प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर जैसे नेता शाहीन बाग़, देशद्रोही, पाकिस्तान और आतंकवाद की बातें करते रहे.

अमित शाह और कई बड़े नेताओं ने भारत की सीमाओं को मज़बूत और देश को 'दुश्मनों की पहुँच से बाहर" बताया. उन्होंने बार-बार याद दिलाया कि भारत ने किस तरह पाकिस्तान की बुरी हालत कर दी है और अब वह डर से कांपता है.

आम आदमी पार्टी

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बात रोज़गार, पीने के साफ़ पानी, बेहतर सड़कें और मूलभूत सुविधाओं में बुनियादी बदलाव लाने की भी हुई. बात और ज़्यादा विदेशी निवेश, ग़रीबों के लिए घर और उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के वायदे की भी हुई.

नाकाम रही ध्रवीकरण की कोशिश

लेकिन इस सबके बीच चंद मुद्दे सुबह-शाम की चाय की तरह लगभग हर चुनावी सभा के भाषणों में तैरते रहे वो सारे मामले ध्रुवीकरण को गहरा करने के मक़सद से ही उठाए जा रहे थे.

कौन कितना भारतीय है, किसके अंदर राष्ट्रवाद की भावना ज़्यादा है और किसमें कम है, जो नागरिकता क़ानून का विरोध कर रहे हैं वे नहीं चाहते कि पड़ोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता मिले.

बार-बार बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या मुसलमानों की बात हुई और बीजेपी से जुड़े नेता लगातार बताते रहे कि किस तरह भारत में बांग्लादेशी घुसपैठिए घुस आए हैं और केंद्र सरकार उन्हें निकालने में किस क़दर जुटी हुई है, बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या कभी एक करोड़, तो कभी दो करोड़ बताई गई.

यह भी कहा गया कि जिसे भारत पसंद न हो उसे कहीं और जाने से किसने रोका है और सैकड़ों सालों तक विदेशी शासकों ने भारत के बहुसंख्यक हिंदुओं पर शासन किया, अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

फ़ोकस इस पर भी रहा कि सभी देशवासियों को एनआरसी और सीएए जैसे क़ानूनों की ज़रूरत क्यों है. सोशल मीडिया से लेकर चुनावी मंचों से लटकते भारी-भरकम लाउड स्पीकरों से ज़्यादातर बातें कुछ इस तरह की ही निकलीं.

भारतीय जनता पार्टी ने अपने 250 सांसदों को मैदान में उतार दिया, इतना ही नहीं देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रात-दिन प्रचार करते रहे, यहाँ तक कि सांसदों को रात में झुग्गी बस्तियों में रुकने को कहा गया. यह झुग्गी बस्तियों में केजरीवाल की पकड़ की काट करने की कोशिश थी.

मनोज तिवारी

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सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके चुनाव जीतने की कोशिश पहली बार हुई हो, ऐसा भी नहीं है.

2019 के लोकसभा चुनावों समेत पिछले कई विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने मतदान क़रीब आते-आते अपने स्टार प्रचारकों को ज़्यादा जोश से उतारा था.

भगवा वस्त्र पहनने वाले योगी आदित्यनाथ, बंगाल में भाजपा को दो लोकसभा से 18 तक के आँकड़े तक पहुँचाने का क्रेडिट लेने वाले दिलीप घोष से लेकर सासंद सनी देयोल और रवि किशन ख़ासे सक्रिय रहे हैं और दिल्ली में भी कैम्प करते रहे.

महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भाजपा ने भले ही सरकारें गँवाई हों, जानकारों को लगता है कि चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में 'धर्म और एक नए क़िस्म के राष्ट्रवाद" से लैस भाषण और सोशल मीडिया कैम्पेन ख़ासे प्रभावी होते हैं.

पिछले चुनाव में दिल्ली की 70 सीटों में से भाजपा को महज़ तीन मिली थीं जबकि इस बार उसे आठ सीटें मिलीं और उसका वोट प्रतिशत भी बढ़ा है. यह ध्रुवीकरण का सियासी फ़ायदा तो है, लेकिन ध्रुवीकरण की सीमा भी दिख रही है कि सरकार फिर भी आम आदमी पार्टी की ही बन रही है.

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