दिल्ली चुनाव: नौजवानों पर कितना चलेगा राष्ट्रवाद का कार्ड?

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    • Author, नूतन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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"पहली हर चीज़ खास होती है, सिनेमा हॉल मे देखी गई पहली फ़िल्म, पहली नौकरी, पहली सेलरी, पहला प्यार या फिर पहला वोट. हर पहली चीज़ को लेकर बहुत उत्साह होता है."

कालिंदी कॉलेज में पढ़ने वाली 18 साल की संस्कृति भारद्वाज से जब मैंने पूछा कि वो पहली बार वोट डालने को लेकर कैसा महसूस कर रही हैं तो उन्होंने ये जवाब दिया.

2014 में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ विश्व के सबसे ज़्यादा युवा भारत में हैं. इनकी संख्या लगभग 3 करोड़ 56 लाख है. इसलिए देश में जो कुछ होता है उसका असर किसी न किसी तरीक़े से इस तबके पर पड़ता ही है.

और मामला देश में चुनावों का हो तो इस ख़ास वर्ग को लुभाने के लिए पार्टियां तमाम तरह के वादे करती है.

8 फरवरी को दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए मतदान होना है. दिल्ली विधानसभा चुनावों में वोट डालने वाले लोगों की संख्या लगभग 1.46 करोड़ है, जिनमें से क़रीब 2 लाख मतदाता वो हैं, जो पहली बार वोट डालेंगे.

वीडियो कैप्शन, क्या कह रहे हैं पहली बार वोट डालने जा रहे युवा?

ऐसी ही तीन नौजवानों से हमने बात की जो दिल्ली विधान सभा चुनावों में पहली बार अपना वोट डालेंगे.

दिल्ली विश्विद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए कर रही 20 साल की शिवानी कहती हैं, "सबसे बड़ी बात ये हैं कि हम उन बहसों का हिस्सा बन पाएंगे जिनसे हमें हमेशा अलग रखा जाता था. अब हम भी सरकार बनाने में मदद करेगें, लेकिन इसके साथ ही हम पर एक बेहतर नागरिक बनने की ज़िम्मेदारी भी है."

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लेकिन देश का युवा जब वोट डालने जाता है तो किन चीज़ों को ध्यान में रखता है?

शिवानी कहती हैं, "देखिए युवा समझदार हो चुका है. वो राष्ट्रवाद के मुद्दे पर वोट नहीं डालेगा. जब वोट डालने जाएगा तो वो याद रखेगा कि क्षेत्र में क्या-क्या काम हुए है. भाजपा जिस राष्ट्रवाद की बात करती है वो ख़ास उम्र के लोगों को ही प्रभावित करता है. युवा इन सब बातों पर नहीं कामों पर वोट डालेंगे."

दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे 20 साल के आशीष गुसांई इसके जवाब में कहते हैं, "मेरे लिए शिक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है. मैं 2017 में स्कूल से पास आउट हुआ, इस बीच मैंने दो तरह की स्थितियां देखीं. दिल्ली के सरकारी स्कूलों की स्थिति पिछले समय मे बहुत बेहतर हुई है. पहले टीचर स्कूलों में पढ़ाने नहीं आते थे. लेकिन बीते सालों में सभी काम तरीक़े से होने लगे हैं और शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है."

संस्कृति एक नपा तुला हुआ-सा जवाब देते हुए कहती हैं, न तो मैं किसी विचारधारा को ध्यान में रखकर वोट दूंगी, न ही किसी पार्टी को. मैं अपने क्षेत्र के नेता को देखकर वोट दूंगी कि उनकी छवि कैसी है और वो कितना काम करेंगे."

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मौजूदा सरकार के कामों पर आशीष कहते हैं, "आम आदमी पार्टी ने काम तो किए हैं लेकिन जिन वादों के साथ वो सत्ता में आई थी उन्हें अभी तक वो पूरा नहीं कर पाई है वो 500 नए स्कूल बनाने की बात हो, 20 कॉलेज या फिर ऑटो स्टैंड बनवाना हो."

वहीं शिवानी अपना वोट डालते समय जिस मुद्दे को सबसे ज़्यादा बारीकी के साथ देखेंगी वो है महिला सुऱक्षा. अपना जवाब देते हुए वो कहती हैं "अब डीटीसी की बसों में जाते हुए मैं पहले से ज़्यादा सुरक्षित महसूस करती हूं क्योंकि टिकट फ्री होने से बसों में महिलाओं की तादाद बढ़ी है और महिलाओं की संख्या बढ़ने से ज़्यादा सुरक्षित महसूस होता है."

इसके साथ वो ये भी कहती हैं, "जब भी कोई बसों में महिलाओं के फ्री टिकट पर टिप्पणी करती हैं तो मैं देखती हूं कि महिलाएं कैसे अपने लिए खड़ी होती हैं, ये देखना बेहद अच्छा लगता है. इससे महिलाएं सशक्त हो रही है"

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हाल में जामिया और जेएनयू में प्रदर्शनों से एक आम स्टूडेंट का जीवन, उसकी पढ़ाई पर उसका क्या असर होता है?

शिवानी कहती हैं "ऐसे माहौल में जब कैंपस मे ये सारी चीज़ें हो रही होती है तो किसी भी दूसरी चीज़ पर ध्यान लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है. जब आप सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे तो आप पढ़ाई कैसे कर पाएंगे. ये सिर्फ उन स्टूडेंट्स की बात ही नहीं है जो प्रदर्शनों में शामिल थे. वो लोग जो अपना घर छोड़ कर यहां पढ़ने आए हैं उनके भी हालात कुछ ठीक नहीं थे"

इसी में जोड़ते हुए संस्कृति कहती हैं, "जब बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों के कैंपस में ये सब हो रहा होता है तो लगता है कि शायद हम अगले हो सकते हैं. आगे हमारे साथ भी ये हो सकता है"

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लेकिन दिल्ली सरकार इन प्रदर्शनों में कुछ ख़ास नज़र नहीं आई. ये कहना था आशीष का. इसी बात से इत्तेफाक रखती हुई शिवानी कहती हैं, "दिल्ली की मौजूदा सरकार प्रदर्शनों और धरनों से ही निकली है. फिर भी ऐसे हालातों में दिल्ली सरकार का कोई नेता स्टूडेंट से मिलने नहीं आया, उनसे बात नहीं करने नहीं आया इस बात ने स्टूडेंट्स को बहुत आहत किया. भले ही दिल्ली पुलिस उनके अंडर ना आती हो लेकिन इस राज्य में सरकार तो उन्हीं की है. इतना तो वो कर ही सकते थे"

इन सबके बाद जब उनसे पूछा गया कि आज का युवा अपने लिए कैसा नेता चाहता है तो शिवानी मौजूदा सरकार पर व्यंग्य करते हुए कहती हैं, "हम चाहते हैं कि हमारा नेता हमारे पास आए और हमारी बात पूछे. हमें ग्राउंड की सरकार चाहिए. आप सरकार ने ग्राउंड पर आकर काम किया है लेकिन उन्हें समझना होगा कि जनता अभी और नीचे है उन्हें अभी और ज़मीन पर आने की ज़रूरत है."

आशीष अपने लिए ऐसा नेता चाहते हैं जो उन्हें रोज़गार दे. वो कहते भी हैं कि देश की वर्तमान स्थिति में युवाओं के लिए रोज़गार का अकाल पड़ गया है और स्टूडेंट के लिए जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी चीज़ें हैं वो है शिक्षा और रोज़गार.

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हर पांच साल में चुनाव होते हैं और नई सरकार बनती है. हर नई सरकार नए वादों के साथ सत्ता में आती है. बदलाव का आश्वासन देती है लेकिन अगर नौजवान दिल्ली की आने वाली सरकार में किस-किस तरह के बदलाव देखते हैं?

आशीष कहते हैं कि दिल्ली की एक सबसे बड़ी समस्या है प्रदूषण. जिस पर बात सब करते हैं कि लेकिन काम नहीं होता है.

इसके आगे ही संस्कृति कहती है, "जलवायु परिवर्तन एक गंभीर मुद्दा है जिस पर कोई ध्यान ही नहीं दे रहा है. अगर पर्यावरण नहीं बचेगा तो बाकी सभी समस्याएं धरी रह जाएंगी."

शिवानी इससे अलग दिल्ली की बात करते हुए कहती हैं, "पिछले पांच सालों में दिल्ली की स्थिति बेहतर तो हुई है, लेकिन संगम विहार जैसे कुछ इलाके आज भी दिल्ली में मौजूद हैं जहां काम नहीं हुआ है. मोहल्ला क्लीनिक खुल तो गए हैं लेकिन सभी इलाकों में खोजने पर मिलते नहीं है. तो आने वाले समय में इन सभी क्षेत्र में बदलाव की उम्मीद है."

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