दिल्ली अग्निकांड: आग, धुंआ, झुलसे जिस्म और मौत के सवाल

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- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली के रानी झांसी रोड स्थित अनाज मंडी की उस इमारत में जब आग लगी, भीतर सौ से ज़्यादा लोग सो रहे थे.
रविवार सुबह तो हुई लेकिन तब तक ज़िंदगियां राख हो चुकी थीं. दिन चढ़ने के साथ-साथ लाशों की गिनती बढ़ती गई.
इस इमारत में सो रहे सौ लोगों में से 43 लोग अब तक मर चुके हैं. 60 से ज़्यादा अस्पताल में भर्ती हैं.

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घटना सुबह क़रीब पांच बजे की है. सबकुछ रोज़ जैसा था लेकिन वो इमारत आज रोज़ से अलग धुंआ फेंक रही थी. काला धुंआ.
वहां आग की लपटें उठ रही थीं. अंदर से चीखने-चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी. कुछ लोग बदहवास से बाहर भाग रहे थे.
और देखते-देखते उस तंग गली का नज़ारा बदल गया.
लोगों को ज़िंदा निकालने की कवायद शुरू हुई. पर अंदर कुछ ज़िंदा लोग लाश बन चुके थे. लाशों की कोई पहचान नहीं थी. उन्हें कोई जानता नहीं था. उनकी सिर्फ़ यही पहचान थी कि वो इस फैक्ट्री में काम करते थे. शायद रहते भी यहीं थे.
वो फैक्ट्री जहां बच्चों के खिलौने और बस्ते बनते थे.
घटनास्थल पर दमकल की गाड़ियां, पुलिस और एनडीआरएफ़ के जवान तैनात थे. मीडिया भी थी. दर्जनों कैमरे थे लेकिन वहां वो लोग मौजूद नहीं थे जिनके रिश्तेदारों की मौत इस हादसे में हुई.
इस फैक्ट्री में 17 साल से लेकर 30 साल तक की उम्र के लोग काम करते थे. जो बच गए हैं दिल्ली के अस्पताल में भर्ती हैं.
फैक्ट्री के मालिक रेहान और मैनेजर को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है और मामले की जांच चल रही है.
उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (लापरवाही से मौत या ग़ैरइरादतन हत्या) के तहत मामला दर्ज किया गया है.

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लेकिन यह पहला मौक़ा नहीं है जब देश की राजधानी में इंसानी जान जलकर ख़ाक़ हुई है.
उपहार कांड हो या इसी साल करोलबाग़ के एक होटल में लगी आग. बवाना औद्योगिक क्षेत्र में हुआ हादसा हो या फिर मालवीय नगर केमिकल फैक्ट्री में लगी आग.
सभी घटनाएं एक-दूसरे से मिलती-जुलती हैं. तंग गलियां, लटकते तार, बंद कोठरियों में चलती फैक्ट्री.
चूक कहां. ज़िम्मेदार कौन ?
डीडीए के पूर्व प्लानिंग कमिश्नर ए के जैन से हमने इस बारे में बात की.
डीडीए के पूर्व प्लानिंग कमिश्नर ए के जैन का मानना है कि इस अग्निकांड के लिए तीन लोग/संस्था ज़िम्मेदार हैं. पहला तो वो शख़्स जिसकी ये फैक्ट्री थी क्योंकि उसने बिना किसी एनओसी के वहां फैक्ट्री खोल रखी थी. बिना लाइसेंस के आख़िर उसने फैक्ट्री खोलने की हिम्मत कैसे की.
- नगर निगम ?
हालांकि उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है. दूसरी ज़िम्मेदारी दिल्ली नगर निगम की है. आख़िर कैसे ये बिल्डिंग उनकी आंखों से बच गई. क्यों उन्होंने इसकी पड़ताल नहीं की और तीसरी ग़लती है फ़ायर डिपार्टमेंट की.
- फ़ायर डिपार्टमेंट?
फ़ायर डिपार्टमेंट के नियमों के अनुसार अगर कोई इमारत 11 मीटर से ऊंची है तो उसे एनओसी लेना होगा और अगर कोई बिल्डिंग पंद्रह मीटर से ऊंची है तो उसे फ़ायर का एनओसी लेना होगा. और अगर उस इमारत के लिए फ़ायर एनओसी नहीं लिया गया है तो डिपार्टमेंट ख़ुद ही उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हुए इमारत को सील कर सकता था.

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राजनीति?
जैन कहते हैं कि जहां तक बात है इमारत बनने के दौरान के सुरक्षा नियमों के पालन की तो ऐसा माना जा रहा है कि यह इमारत पुरानी रही होगी.
वो कहते हैं कि जब दिल्ली का मास्टर प्लान बना था तो उसी वक़्त यह तय कर लिया गया था कि स्ट्रक्चरल सेफ्टी और फ़ायर सेफ़्टी के सर्टिफिकेट हर कोई पेश करेगा ताकि उनकी इमारत रेगुलराइज़ हो सके लेकिन ज़्यादातर लोगों ने इसमें धांधली की. और जितने भी इससे जुड़े विभाग थे उन्होंने भी इसे अनदेखा किया.
जैन इन सारे मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप से भी इनक़ार नहीं करते हैं.
वो कहते हैं कि प्लानिंग के कुछ अपने कायदे हैं लेकिन उनका भी पालन नहीं हुआ. मसलन 6 मीटर चौड़ी सड़क होनी चाहिए. पार्किंग की व्यवस्था होनी चाहिए जो गलियों से बाहर हो ताकि अगर इस तरह की कोई अप्रिय घटना होती है तो सहायता जल्दी पहुंच सके और बीच सड़क खड़ी गाड़ियों की वजह से जाम ना लगे.
इसके अलावा वहां फ़ायर हाइड्रेंट की व्यवस्था होनी चाहिए. लेकिन जहां यह हादसा हुआ वहां इनमें से कोई सुविधा नहीं थी. ये सीधे तौर पर अनदेखी किये जाने का परिणाम है. सबकुछ सामने था,सबको ये भी पता था कि ग़लत हो रहा है लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया.

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अनप्लांड कंस्ट्रक्शन?
ए के जैन उपहार सिनेमा और करोल बाग़ में हुए हादसों को भी इसी अनदेखी से जोड़कर देखते हैं.
लेकिन क्या दिल्ली में अभी और भी ऐसी जगहें हैं जहां यह ख़तरा मंडरा रहा है?
इस सवाल के जवाब में जैन कहते हैं कि जो भी इलाके अनप्लांड यानी बिना किसी तय योजना के बने हैं, वहां ख़तरा हो सकता है.
अनप्लांड इलाक़े वो हैं जिनका निर्माण आमतौर पर अवैध तरीक़े से रातोंरात कर लिया जाता है. बिना किसी योजना के, बिना किसी तय स्ट्रक्चर के. कोई नक्शा नहीं होता और ये इमारतें खड़ी कर दी जाती हैं. ऐसे में ये ख़तरा तो है ही.

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प्रशासन का रवैया?
हालांकि जैन सिंगापुर का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि ये इतनी भी बड़ी समस्या नहीं है जिसका हल नहीं निकाला जा सके. वो मानते हैं कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई जाए तो क्या नहीं संभव है लेकिन यह ज़रूरी है कि सरकारें ये समझें कि अनदेखी करना कितना ख़तरनाक हो सकता है.
वो कहते हैं कि हमारे यहां अक्सर जब भी इस तरह के हादसे होते हैं तो एक जांच समिति बना दी जाती है, कुछ लोगों को गिरफ़्तार तो कुछ को सस्पेंड करके ये माना जाता है कि ज़िम्मेदारी पूरी. लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. अगर कोई यह कह रहा है कि यह हादसा है तो बिल्कुल नहीं, ये कोई हादसा नहीं है ये पूरी तरह हत्या का मामला है. प्रशासन की आंखें मूंदने का परिणाम है, जो इतने लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है.
मारे गए ज़्यादातर लोग दूसरे राज्यों के
दिल्ली हत्याकांड में मारे गए ज़्यादातर लोग बिहार, पूर्वांचल इलाक़े से है.
ए के जैन कहते हैं कि यह बेहद अमानवीय है कि दूर-दराज़ के गांवों से आकर यहां बसने वाले इन लोगों के बारे में हमें हमें पता भी तभी चलता है जब ऐसा कोई हादसा होता है. वो कहते हैं कि पैसे कमाने के लिए, अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य देने के लिए ये लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर यहां आकर रहते हैं. एक कमरे में दर्जनों लोग. ना रहने की सुविधा ना ही कोई बेसिक सहूलियत.
राजनीतिक पार्टियां गरीबों की बात तो करती हैं लेकिन आंख बंद करके. ग़रीबों की इस स्थिति का फ़ायदा छोटे मिल मालिक और कारोबारी उठाते हैं. कम मज़दूरी और बेहद मामूली ज़रूरतों के बदले ये लोग बिना छुट्टी लिए, कम मज़दूरी पर काम करते हैं. अगर इस लिहाज़ से देखें तो मज़दूर संगठनों, लेबर डिपार्टमेंट को भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की ज़रूरत है. यह हादसा उनकी ग़लती भी है.
ए के जैन की ही तरह स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में अर्बन प्लानिंग प्रोफ़ेसर संजुक्ता भादुरी भी यही मानती हैं कि नियमों की कायदे-क़ानूनी की जमकर अनदेखी की जाती है और ये एक बहुत बड़ा कारण है इन हादसों का और हादसों में होने वाली मौतों का.
वो कहती हैं, इमारतों को बनाने के लिए नेशनल बिल्डिंग कोड्स हैं लेकिन ज़्यादातर इन कोड्स का पालन ही नहीं किया जाता है.

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अवैध तरीक़े?
संजुक्ता भादुरी कहती हैं कि अमूमन माना जाता है कि गर्मियों में ही आग लगती है सर्दियों में नहीं लेकिन यह एक गलतफ़हमी है. सर्दियों में लोग अपने घरों को अलग-अलग तरह से गर्म रखने के इंतज़ाम करते हैं जिससे आग लगने का ख़तरा बढ़ जाता है.
वो एक बड़ी वजह ये भी मानती हैं कि लोग अवैध तरीक़े से बिजली के तार खींच इस्तेमाल करते हैं. लोग पोल से सीधे तार लगाकर बिजली चुराते हैं जो गैर-क़ानूनी तो है ही साथ ही ख़तरनाक भी है.
संजुक्ता भादुरी भी मानती हैं कि नियमों के अनुसार छह मीटर चौड़ी सड़क होनी चाहिए लेकिन इसकी अनदेखी होती है. ऐसे में जब भी ऐसी स्थिति होती है तो रिस्पॉन्स टाइम में वक़्त लगता है. ऐसे में हताहत होने की आशंका बढ़ जाती है.
वो कहती हैं कि दिल्ली का मास्टर प्लान देखें उसमें कई नियम हैं जो सुरक्षित निर्माण और सुरक्षित रहने के लिए तय किये गए हैं लेकिन उनका पालन नहीं होता. लोग रिहायशी घरों का नक्शा दिखाकर उसमें फैक्ट्री चलाने लगते हैं, नियमों का उल्लंघन करते हैं और ये एक बड़ी वजह है इस तरह की घटनाओं की.
लेकिन अंत में वो ये ज़रूर कहती हैं कि सबसे बड़ी समस्या ये है कि नियम हैं, क़ायदे-क़ानून हैं लेकिन मॉनिटरिंग नहीं. और अगर कोई इन नियमों का पालन कराने वाला कोई नहीं है तो अनदेखी तो होगी ही. ये नियम सख़्ती से लागू किये जाने चाहिए.
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