दिल्ली अग्निकांड: जो लड़के मर गए उनका दोष क्या था?

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कहते हैं मौत की आवाज़ नहीं होती है. एक सन्नाटा होता है और किसी व्यक्ति के मरते ही ये सन्नाटा उस घर से होकर, गली और सड़क पर दूर-दूर तक पसर जाता है.
दूर से आते किसी भी व्यक्ति को वहां मौजूद चेहरे देखकर ही किसी की मौत होने का अंदाजा हो जाता है.
लेकिन रविवार की सुबह जब रानी झांसी रोड पर स्थित अनाज मंडी की तंग गलियों में मौजूद एक कारखाने में आग लगी, तो वहां से ये सन्नाटा गायब था. इस आग में कम से कम 43 लोगों की मौत हो गई.
किसी आम दिन की तरह सड़क पर ट्रैफिक अनवरत चल रहा था. वहां मौजूद और वहां से गुज़रने वाले किसी व्यक्ति को ये अंदाज़ा ही नहीं था कि मरने वाले कौन थे, क्या करते थे और कहां के रहने वाले थे.
क्योंकि इस हादसे में उन युवाओं की मौत हुई है जो अपने घरों से हज़ारों किलोमीटर दूर रोज़ी-रोटी कमाने के लिए दिल्ली की इन तंग गलियों में अपना जीवन गुज़ार रहे थे.
ये लड़के उस कारखाने में काम कर रहे थे जहां एक दिन पहले तक बच्चों के खिलौने और स्कूल के बैग बनाए जाते थे.
घटनास्थल पर दमकल की कई गाड़ियां, पुलिस और एनडीआरएफ़ के जवान मौजूद थे.
और साथ ही थे टीवी चैनलों के दर्जनों पत्रकार. लेकिन घटना के घट जाने के बाद भी वहां वो लोग मौजूद नहीं थे जिनके रिश्तेदारों की मौत इस अग्निकांड में हुई है.
बदहवासी और सदमा
घटनास्थल पर कुछ देर गुज़ारने के बाद मैंने लगभग 500 मीटर की दूरी पर कुछ मजदूरों को इकट्ठा होते हुए देखा...
इनमें से ज़्यादातर लोग इस अग्निकांड में मरने वाले दर्जनों लड़कों की तरह बिहार से आए थे.
यहां मेरी मुलाक़ात आरिफ़ नाम के एक शख़्स से हुई जो लगभग पचास दिन पहले तक इसी इमारत में काम किया करते थे. आरिफ़ बिहार के मोतीहारी के रहने वाले हैं.
आरिफ़ बताते हैं, "इस बिल्डिंग में मेरी जान-पहचान के कई लोग काम करते थे. कोई सीतामढ़ी का, कोई मोतीहारी का तो कोई कटिहार का रहने वाला है. ये लोग वहीं काम करते थे और वहीं रहते थे."

आरिफ़ बताते हैं, "ये लड़के जहां काम करते थे, रात होने पर वहीं थोड़ी-बहुत जगह तलाश करके वहीं सो जाते थे. प्लास्टिक से लेकर तमाम दूसरा कच्चा माल वहीं रखा रहता है. और सीढ़ियों पर सामान को पैक करने के लिए गत्ते वगैरह रखे रहते हैं."
"यहां काम करने वाले बच्चों की उम्र मात्र 17 साल से 22 साल के बीच रही होगी. ये सब मेरे दोस्त-यार थे और अब कोई नहीं दिख रहा है. हमने अंदर जाने की कोशिश की ताकि पता लगा सकें कि कौन-कौन ज़िदा बचा है लेकिन पुलिसवाले हमें अंदर नहीं जाने दे रहे हैं. हम यहीं काम करते थे लेकिन यहां शॉर्ट सर्किट जैसी दिक्कतों की वजह से हमने यहां काम करना बंद कर दिया था."
आरिफ़ इतना ही बता पाते हैं कि पीछे से एक आवाज़ उन्हें पुकारती है, और वो दौड़े चले जाते हैं.
वो दौड़कर वहां मौजूद मजदूरों से बात करके ये जानने की कोशिश करते हैं कि इस हादसे में उनके जानने वाले कितने लोग ज़िंदा बचे हैं.

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अपने जानने वालों की तलाश
यहां मौजूद कई लोग पुलिस के मना करने के बाद भी बार-बार घटनास्थल तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे ताकि उन्हें किसी तरह उन लड़कों की एक झलक मिल जाए जो यहां काम करते थे.
लगभग 18-19 साल के मजदूर ब्रजेश कुमार घटनास्थल से थोड़ी दूर पुलिस बैरिकेडिंग के उस पार बेबस खड़े थे.
ब्रजेश की आँखों में निराशा और डर है. वो बताते हैं कि मेरे जानने वाले किसी का भी फोन नंबर नहीं लग रहा है और अब तक कुछ पता नहीं चल पा रहा है कि कितने लड़के ज़िंदा बचे हैं और कितने लड़के नहीं रहे.
जिस इमारत में अग्निकांड हुआ है, ब्रजेश वहां काम करने वाले कई लड़कों को जानते थे. कई उनके गाँव से थे और कई उनके राज्य से आने वाले लड़के थे.
लेकिन फ़िलहाल उन्हें अपने किसी परिचित का कुछ पता नहीं चल रहा है.
छज्जे से कूदकर बचाई जान
थोड़ी देर बाद हमारी मुलाक़ात घटनास्थल के क़रीब खड़े दिनेश कुमार दास से हुई जिनकी आंखें लगातार उस संकरी सड़क पर भी जहां आज राहतकर्मी खड़े हैं.
दिनेश कुमार दास बिहार के मधुबनी ज़िले के रहने वाले हैं और मज़दूरी कर के गुज़ारा करते हैं.
वो बताते हैं कि सुबह उनकी मुलाक़ात उनके एक रिश्तेदार से हुई थी जिन्होंने एक छज्जे से कूदकर अपनी जान बचाई थी.
वो कहते हैं, "सुबह मैं अपने भाई के साले से मिला था जो इसी जगह काम करता था. जब आग लगी थी तो लोगों ने उससे कहा कि वो जान बचाने के लिए छज्जे से कूद जाए, तब लोगों की बात मानकर वह छज्जे से कूदा और उसने अपनी जान बचाई."

11 बजते-बजते यहां काम करने वाले सैकड़ों मज़दूर आस-पास इकट्ठा होना शुरू हो चुके थे.
सभी की आँखों में तलाश थी उन लोगों को ढूंढ़ लेने की जो इस इमारत में काम करते थे.
इनमें से ज़्यादातर लोग अपने कमरों और कारखानों से आग लगने की ख़बर मिलते ही बदहवासी में घटनास्थल पहुंचे थे.

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इमारत में लगी आग के कारण मरने वाले कई युवाओं के परिवारवालों तक अब तक ये सूचना नहीं पहुंची है कि काम की तलाश में दिल्ली पहुंचे उनके बच्चे अब इस दुनिया में नहीं रहे.
इधर घटनास्थल पर नेताओं का आना-जाना लगा था. एक पार्टी के नेता ने कहा कि एमसीडी इसके लिए ज़िम्मेदार है जबकि दूसरे ने कहा कि इसके लिए प्रदेश की सरकार ज़िम्मेदार है.
लेकिन सवाल अभी भी बरकरार है कि आख़िर दो वक़्त की रोटी की तलाश में राजधानी आए इन युवाओं का दोष क्या था, जिसकी वजह से इन्होंने आग में झुलसकर और धुएं में दम घुटने से अपनी जान दे दी.
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