'सिर्फ़ आस्था के आधार पर ही कोर्ट ने नहीं दिया अयोध्या फ़ैसला': रामलला के वकील सी. एस. वैद्यनाथन

वीडियो कैप्शन, सीएस वैद्यनाथन: रामलला के प्रतिनिधि के तौर पर अदालत में पेश होने वाले वकील
    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी ज़मीन विवाद में आठ साल से रामलला के प्रतिनिधि के तौर पर अदालत में पेश होते रहे वकील सीएस. वैद्यनाथन का कहना है कि अदालत को अनुच्छेद 142 के अलावा 1992 की घटना का फ़ैसले में ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं थी. लेकिन शायद मुसलमानों को राहत देने के लिए कोर्ट ने ऐसा किया.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पांच न्यायाधीशों की बेंच ने इस मामले में अपना फ़ैसला सुना दिया है और विवादित भूमि पर हिंदुओं का हक़ माना गया है. लेकिन, क़ानून के जानकार इस फ़ैसले पर अब भी बंटे हुए हैं.बीबीसी ने सी.एस. वैद्यनाथन से बात की जो इस फ़ैसले से ख़ुश हैं. उन्होंने फ़ैसले की कई क़ानूनी पेचीदगियों के बारे में समझाया और स्पष्टीकरण दिया.

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ऐसा लगता है कि अदालत ने इस मामले का फ़ैसला तर्कों पर नहीं बल्कि, आस्था के आधार पर दिया है. आपका क्या मानना है?

इस मामले में एक याचिकाकर्ता स्वयं श्री रामलला थे. विवादित ज़मीन की तरफ़ से राम जन्मभूमि न्यास ने अदालत में पक्ष रखा. इस मामले में एक पक्षकार वैसा होना चाहिए था, जो रामलला और अदालत के बीच संवाद करा सके और ये काम न्यास ने किया. अब स्वयं भगवान तो अदालत में आकर अपने पक्ष में जिरह कर नहीं सकते थे. तो भगवान की तरफ़ से हम लोगों ने अदालत में जिरह की और फ़ैसला हमारे हक़ में आया.

आस्था एक पहलू है. लेकिन, इस ज़मीन के मालिकाना हक़ पर आए इस फ़ैसले के सबूतों पर कई क़ानूनविदों ने सवाल उठाए हैं.

अयोध्या

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ये कहना ग़लत होगा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केवल आस्था के आधार पर फ़ैसला सुनाया. जबकि ख़ुद अदालत ने साफ़ कर दिया है कि राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाया जाए. वो ट्रस्ट ही अपनी निगरानी में इस फ़ैसले को लागू कराएगा. इसमें आस्था का कोई मसला ही नहीं है.

कई क़ानूनी विशेषज्ञ ये कह रहे हैं कि आप लोगों ने आस्था के हवाले से ही तर्क दिए. कहीं इसका ये मतलब तो नहीं है कि आप के पास अपने हक़ में कहने के लिए ऐसे सबूत नहीं थे, जिन पर आप भरोसा कर सकते?

विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ का केस 1989 में दायर किया गया था. उस समय रिटायर्ड जस्टिस देवकीनंद अग्रवाल, भगवान राम की तरफ़ से पेश हुए थे. शुरुआत में अग्रवाल जी ने आस्था पर ज़ोर दिया था. लेकिन, बाद में उन्होंने ये तर्क छोड़ दिया. इसलिए इस मामले में आस्था का उतना बड़ा रोल नहीं था.

अयोध्या के बाज़ार में बिकने वाली शिशु राम की मूर्ति

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इस मामले की सुनवाई करने वाले पांच जजों में से चार ने ख़ुद को आस्था के तर्क से बिल्कुल अलग कर लिया था. नतीजा ये हुआ कि सिर्फ़ एक जज ने बिना नाम के 116 पेज का परिशिष्ट अलग से लिखा.

पांचवें जज ने अपने फ़ैसले में साफ़ लिखा है कि राम का जन्मस्थान मस्जिद के गुम्बद के ठीक नीचे था. अदालत ने ये बात पेश किए गए तथ्यों और सबूतों से संतुष्ट होने के बाद कही है. अन्य जजों को ये लगा कि उन्हें अपनी टिप्पणी करने की ज़रूरत नहीं है.

एक बात ये भी है कि आप लोगों के इस तर्क को खारिज कर दिया कि विवादित ज़मीन को भी एक पक्षकार माना जाए.

इस मामले के दो पक्षकारों की बात हमने कही थी. एक श्री रामलला विराजमान थे और दूसरा जन्मस्थान. अदालत ने पहले पक्षकार को तो माना. अदालत ने अपने फ़ैसले में इसे स्वीकार करने के लिए 15-20 तर्क दिए हैं. अदालत ने कहा है कि श्रद्धालुओं के अधिकारों के संरक्षण के लिए ही उन्होंने भगवान को एक पक्षकार माना. जब अदालत ने ये बात स्वीकार कर ली, तो ऐसे में जन्मस्थान को अलग से पक्षकार मानने की ज़रूरत रह नहीं गई थी.

सुप्रीम कोर्ट

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जहां तक इस तर्क की बात है कि विवादित ज़मीन पर केवल मुसलमानों का क़ब्ज़ा कभी नहीं रहा. तो हिंदुओं का भी उस विवादित ज़मीन पर एकाधिकार नहीं रहा. तो क्या हिंदुओं का पक्ष इससे मज़बूत हुआ?

भारत में कहीं भी, या ये कहें कि पूरी दुनिया में कहीं भी, क़ब्ज़े का लिखित प्रमाण होता है. हमने जो लिखित सबूत अदालत में पेश किए वो 12वीं सदी के थे. जिसमें विवादित जगह पर मिले उस दौर के एक पत्थर पर लिखा हुआ था. फिर, खुदाई के दौरान जो शिलालेख मिले वो भी हमने अदालत के सामने रखे. इसके अलावा अलग-अलग समय पर आए विदेशी यात्रियों के वृत्तांत को भी कोर्ट में सबूत के तौर पर रखा गया.

साथ ही हमने इतिहासकारों के वृत्तांत को अदालत के सामने पेश किया. इन सभी ने माना है कि हिंदू उसे भगवान राम का जन्मस्थान मानते थे और वहां पूजा करते थे. हमारी तरफ़ से यही सबूत कोर्ट में रखे गए थे, जिनके माध्यम से हम ने बताया था कि हिंदू वहां लगातार नियमित रूप से पूजा-पाठ करते आए थे. कोर्ट ने हमारी ओर से पेश सबूतों को तसल्लीबख़्श माना.

अगर हम ये मान भी लें कि आपकी तरफ़ से दिए गए सबूतों के आधार पर अदालत ने ये माना कि बाहरी चबूतरे पर हिंदू लगातार पूजा-पाठ करते रहे थे, तो भी अदालत ने अपने आख़िरी फ़ैसले में अंदर के अहाते पर हिंदुओं के बराबर के क़ब्ज़े के सबूत नहीं पाए. और विवादित ढांचे का वो हिस्सा तो मुस्लिम पक्षकारों के क़ब्ज़े में था.

हमारा तर्क ये था कि पूरी ज़मीन को एक साथ देखा जाना चाहिए और इसे अलग-अलग टुकड़ों में बांटकर देखना ठीक नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट ने हमारे इस तर्क को माना. सर्वोच्च अदालत ने ये भी माना कि हम अंदर के आंगन में 1855 से पहले पूजा-पाठ करते रहे थे. फिर ब्रिटिश हुकूमत ने पूरे इलाक़े को बाहरी और अंदरूनी सहन में बांट दिया. लेकिन, हमने कोर्ट के सामने सबूत रखे कि हिंदू, अंदर के आंगन में भी पूजा करते रहे थे.

अयोध्या विवाद

10 गुणा 10 के एक कमरे को भगवान राम का जन्मस्थान नहीं कहा जा सकता, जहां पर कौशल्या ने राम को जन्म दिया. ये एक विशाल महल रहा होगा और केवल एक कमरा तो नहीं रहा होगा. हमें लगता है कि किसी को इस तथ्य की अनदेखी करके अदालत की आलोचना नहीं करनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में लिखा है कि 1588 से 1857 के बीच विवादित जगह पर नमाज़ पढ़े जाने के सबूत नहीं मिले हैं.

बाबरी मस्जिद या फिर सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड की तरफ़ से पेश लोगों ने भी माना है कि वहां पर 1856 के बाद ही नमाज़ पढ़ी जाने लगी थी.

विवादित स्थल के नज़दीक हुई खुदाई का एक दृश्य

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ये बात तो सच है न कि 1528 में वहां पर एक मस्जिद बनाई गई और 1992 में उसे ढहा दिया गया. सर्वोच्च अदालत ने अपने फ़ैसले में ये भी माना है कि वहां मूर्तियां रखना और ढांचा ढहाना मस्जिद की बेहुरमती (अनादर) था और अवैध काम था.

देखिए, वहां पर हिंदू बिना मूर्तियों के भी पूजा-पाठ करते रहे थे. हिंदुओं के मुताबिक़, मूर्तियां केवल प्रतीकात्मक होती हैं. हमें अपनी आस्था और विश्वास को जताने के लिए मूर्तियों की ज़रूरत नहीं है. यदि वो जगह हमारे लिए श्रद्धा की जगह है और हम वहां जाकर पूजा करते हैं, तो हमें मूर्तियों की कोई ज़रूरत नहीं है. इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि किसने वहां मूर्तियां रखीं.

क्या इस बात के कोई सबूत हैं कि हिंदू वहां 1528 से 1857 के बीच पूजा करते थे?

हां, इस बात के कई सबूत हैं. भारत आए ज़्यादातर विदेशी यात्रियों ने अपने यात्रा वृत्तांतों में लिखा है कि हिंदू उस विवादित जगह पर पूजा करते थे. यही वजह है कि अदालत ने उन यात्रा वृत्तांतों को सबूत माना और ये स्वीकार किया कि उस दौर में हिंदू लगातार विवादित जगह पर पूजा-पाठ करते रहे थे.

राम मंदिर

फिर सर्वोच्च अदालत ने अपने फ़ैसले में ये भी लिखा है कि कि 1949 में मूर्तियां रखना और 1992 में मस्जिद का ढहाना अवैध था. अब अदालत की इस बात से ग़लतफ़हमी पैदा हो रही कि अगर कोई बात अवैध पायी गई, तो उसे अंजाम देने वालों के पक्ष में मालिकाना हक़ का फ़ैसला कैसे दिया जा सकता है?

मुझे लगता है कि अनुच्छेद 142 के अलावा 1992 की घटना का फ़ैसले में ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं थी. अदालत मुसलमानों को राहत देना चाहती थी और मेरा मानना है कि शायद यही वजह थी कि उन्होंने अपने फ़ैसले में 1992 की घटना का ज़िक्र किया.

लेकिन, आप इसे इस तरह से भी देख सकते हैं कि, मालिकाना हक़ के मुक़दमे कब किए गए? 1950, 1961 और 1989 में. इसके बाद जो भी घटना हुई, उसका मालिकाना हक़ के इस विवाद से कोई ताल्लुक़ नहीं है. ऐसा लगता है कि, अनुच्छेद 142 के तहत केवल मुस्लिम पक्ष को राहत देने के लिए ही सर्वोच्च अदालत ने अपने फ़ैसले में 1992 की घटना का ज़िक्र किया.

देखिए ये एक धर्मनिरपेक्ष देश है. जहां क़ानून का राज है. किसी को भी क़ानून अपने हाथ में लेने का हक़ नहीं है. यही वजह है कि सर्वोच्च अदालत की बेंच ने एकमत से ये फ़ैसला दिया मस्जिद की बेहुरमती (अनादर) की जो दो घटनाएं हुईं वो नहीं होनी चाहिए थीं. लेकिन, ज़मीन के मालिकाना हक़ का फ़ैसला करने के लिए इन बातों के ज़िक्र की ज़रूरत ही नहीं थी. लेकिन, मेरा मानना है कि मुस्लिम पक्ष को अनुच्छेद 142 के तहत राहत देने के लिए ही इसका ज़िक्र माननीय अदालत ने अपने फ़ैसले में किया.

सुप्रीम कोर्ट ने संपूर्ण विवादित स्थल को एक ही माना है, न कि उसे विभाजित करके देखा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ज़मीन को तीन हिस्सों में बांटने का फ़ैसला ग़लत दिया था. उच्च न्यायालय की इस ग़लती को ही सुप्रीम कोर्ट ने सुधारा है. हमारा तर्क था कि पूरा विवादित इलाक़ा भगवान रामलला को मिलना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार किया है.

अयोध्या विवाद

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आप ने अपनी जिरह में एएसआई की रिपोर्ट का विस्तार से ज़िक्र किया है. जबकि इस रिपोर्ट पर बहुत से स्वतंत्र पुरातत्व विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं.

मुसलमानों ने अपनी अर्ज़ी में कहा था कि जहां पर मस्जिद बनाई गई, उसके तीन गुंबदों के नीचे किसी अन्य इमारत का कोई ढांचा नहीं था. लेकिन, वो अपनी ये बात साबित नहीं कर पाए. वहीं खुदाई में जो अवशेष मिले, उनसे साफ़ हो गया कि मस्जिद से पहले वहां पर एक विशाल इमारत थी. इसी वजह से मुस्लिम पक्षकारों का वो तर्क ख़ारिज हो गया.

कई इतिहासकारों ने सामने आकर कहा था कि मस्जिद के पास जो दीवार मिली वो एक ईदगाह की थी. वहीं, मुसलमानों का दावा था कि वो एक ख़ाली ज़मीन थी, जो कि ग़लत साबित हुआ.

लेकिन, एएसआई की रिपोर्ट ये तो नहीं कहती है कि मंदिर तोड़कर उसके ऊपर मस्जिद बनाई गई. आपका इस बारे में क्या कहना है?

हां, एएसआई की रिपोर्ट ये तो नहीं कहती है कि मंदिर को तोड़कर उसकी जगह मस्जिद बनाई गई.

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