RCEP: चीन की 'डंपिंग' से क्यों चिंतित है गुजरात का कपड़ा उद्योग?

टेक्सटाइल इंडस्ट्री

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    • Author, अर्जुन परमार
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती

चीन और अन्य देशों को अपने कपड़ा उत्पादों को भारत को निर्यात करने वाले समझौते से भारतीय वस्त्र उद्योग और ख़ास कर गुजरात की टेक्सटाइल इंडस्ट्री बेहद चिंतित हैं.

सूरत के कपड़ा उद्योग के कई लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर इस क़दम का विरोध किया है.

दरअसल भारत रीज़नल कॉम्प्रिहेंसिव इकॉनोमिक पार्टनरशिप यानी आरसीईपी के तहत मुक्त व्यापार को लेकर चीन समेत 15 देशों के साथ एक समझौता करने जा रहा है.

यह उद्योग पहले ही आर्थिक सुस्ती का सामना कर रहा है और अगर भारत आरसीईपी के तय मानदंडों के अनुसार इस पर अपने हस्ताक्षर कर देता है तो इससे गुजरात के कपड़ा उद्योग को वाकई परेशानी होगी.

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इस मुद्दे पर देश भर से कपड़ा उद्योग के दिग्गजों के केंद्रीय मंत्री से मुलाक़ात करने की उम्मीद है.

उल्लेखनीय है कि कपड़ा उद्योग देशभर में 4.5 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष रोज़गार मुहैया करता है जबकि अप्रत्यक्ष रूप से क़रीब 6 करोड़ लोगों की आजीविका इस पर निर्भर है.

देश भर में इससे 21 फ़ीसदी लोगों को रोज़गार प्राप्त है वहीं देश की जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी भी लगभग 2% है.

लाखों लोगों को रोज़गार मुहैया कराने वाला यह सेक्टर पहले ही आर्थिक सुस्ती की चपेट में है.

कंबोडियाई प्रधानमंत्री हुन सेन, न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अडर्न और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी RCEP की सिंगापुर में आयोजित बैठक में

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इमेज कैप्शन, कंबोडियाई प्रधानमंत्री हुन सेन, न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अडर्न और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी RCEP की सिंगापुर में आयोजित बैठक में

आरसीईपी क्या है?

रीज़नल कॉम्प्रिहेंसिव इकॉनोमिक पार्टनरशिप यानी आरसीईपी में 16 देश हैं. इसमें आसियान के दस देशों (ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फ़िलिपींस, सिंगापुर, थाइलैंड और वियतनाम) के साथ छह एफ़टीए भागीदार (भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड) शामिल हैं.

इस समूह की अध्यक्षता सुरजीत भल्ला कर रहे हैं जो प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य रहे हैं. उनका कहना है कि इससे रुपया स्थिर रहेगा साथ ही सीमा शुल्क और कॉर्पोरेट टैक्स में भी कमी आएगी.

एशिया-प्रशांत के इन 16 देशों के पास वैश्विक जीडीपी का एक तिहाई हिस्सा है. अगर यह सफल रहा तो आरसीईपी 3.4 अरब लोगों का मार्केट बन जाएगा.

दुनिया भर की जीडीपी में 25 फ़ीसदी का योगदान रखने वाले इन देशों के पास विश्व व्यापार की 30 फ़ीसदी हिस्सेदारी है.

आरसीईपी एक मुक्त व्यापार समझौता है और अगर यह लागू हो गया तो इसमें शामिल देश एक दूसरे के साथ बिना किसी सीमा शुल्क के व्यापार कर सकेंगे.

दुनिया भर में व्यापार बढ़ाने के उद्देश्य से आरसीईपी का गठन किया गया था लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक इसे लेकर कुछ अस्पष्टता है और यही वजह है कि कपड़ा समेत अन्य उद्योगों में घबराहट पैदा हुई है.

गुजरात वीवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक जीरावाला कहते हैं, "आरसीईपी समझौता मेक इन इंडिया की अवधारणा के ठीक विपरीत है. अगर यह समझौता लागू हो जाता है तो स्थानीय कपड़ा उद्योग बर्बाद हो जाएगा."

वे कहते हैं, "आरसीईपी के बाद गुजरात कपड़ा उद्योग को सबसे बड़ा ख़तरा चीन से होगा क्योंकि वो भारत में अपने सस्ते उत्पादों को डंप करेगा जिससे यहां की स्थानीय इंडस्ट्री नष्ट हो जाएंगी."

प्रतीकात्मक तस्वीर

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गुजरात कपड़ा उद्योग क्यों चिंतित है?

जानकारों का मानना है कि गुजरात कपड़ा उद्योग पहले ही आर्थिक सुस्ती झेल रहा है और ऐसी स्थिति में अगर आरसीईपी को इसके वर्तमान स्वरूप में स्वीकार करने से इस उद्योग की कमर टूट जाएगी. चीन दुनिया भर में अपने सस्ते उत्पादों को डंप करने के लिए जाना जाता है और दुनिया को यह पता नहीं है कि चीन में इंडस्ट्री कैसे काम करती है.

यह सब जानते हैं कि चीन नई तकनीक को बहुत तेज़ी से अपनाता है और अपने उत्पादों को सस्ते बनाने के लिए बड़े स्तर पर उनका उत्पादन करता है. नई तकनीक को अपनी इंडस्ट्री के लिए तुरंत अपनाने की इसी खासियत से गुजरात के कपड़ा उद्योग में चिंता है.

अगर चीन को उसके सस्ते उत्पादों को भारत में डंप करने की इजाज़त मिल जाती है तो सुस्ती का सामना कर रही यहां कि इंडस्ट्री के लिए यह विनाशकारी परिणाम लाएगा.

आरसीईपी और चीन की डंपिंग नीति के बारे में जीरावाला कहते हैं, "चीन में, सरकार उद्योग के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद करती है. वहां उद्योगों के लिए क्लस्टर बनाए जाते हैं. भारत की तुलना में वहां सस्ते मजदूर उपलब्ध हैं और वे कम से कम लागत पर काम कर सकते हैं.

उनकी अधिकतर यूनिट फॉर्मल सेक्टर में हैं और नई तकनीक को अपनाने में वो हमसे कहीं आगे हैं."

जीरावाला कहते हैं, "इस सभी चीज़ों ने मिलकर चीन के उद्योग के लिए सस्ते उत्पाद बनाना आसान कर दिया है. इससे उन्हें बहुत प्रतिस्पर्धी कीमतों पर निर्यात करने में मदद मिलती है. सभी तरह की लागतों के बाद भी, जब चीन के उत्पादों में भारत को उतारा जाता है तो वे घरेलू सामानों की तुलना में सस्ती होती हैं."

वे कहते हैं, "हमारे यहां मज़दूरी महंगी है और अन्य खर्चे भी चीन की तुलना में यहां अधिक हैं. इसकी वजह से स्थानीय उत्पाद महंगे बनते हैं."

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जरीवाला सवाल उठाते हैं, "अब जो ख़तरे हैं उन पर विचार करें. अगर सरकार यह सोचकर आरसीईपी को स्वीकार करती है कि ग्राहकों को सस्ते उत्पाद मिलेंगे तो यह एक विडंबना है. अगर इस तरह के आयात से स्थानीय इकाइयां बंद होने के लिए मजबूर होती हैं और यहां के लोग बेरोज़गार होते हैं तो वे कैसे इन सस्ते उत्पादों को खरीदने में सक्षम होंगे."

चीन से संभावित ख़तरों को लेकर गुजरात चेंबर ऑफ़ कॉमर्स वर्किंग कमेटी की सदस्य मीना काविया कहती हैं, "आरसीईपी के सभी सदस्य देशों के बीच आयात-निर्यात पर ड्यूटी लगभग शून्य या बहुत हद तक कम हो जाएगी. इससे चीन जैसे बड़े कपड़ा निर्यात देशों को भारतीय बाज़ार में अपने सस्ते उत्पादों को डंप करने का मौका मिल जाएगा, जो स्थानीय उत्पादों के लिए परेशानी की बात होगी. चीन का कपड़ा उद्योग बड़े पैमाने पर उत्पादन करने के साथ ही प्रतिस्पर्धी है और साथ ही चीनी सरकार उद्योगों के बढ़ावा देने में भी रुचि लेती है."

"चीन यूरोपीय देशों में रेडीमेड पॉलिएस्टर शर्ट्स को 2.5 से 3 डॉलर प्रति पीस के हिसाब से निर्यात करता है, जबकि भारत में इसकी फ़ैब्रिक की कीमत ही 2 से 2.5 डॉलर प्रति शर्ट की पड़ती है. अगर चीन को बिना किसी ड्यूटी शुल्क भारत में अपने उत्पादों को डंप करने का अवसर मिला तो यह निश्चित ही स्थानीय कपड़ा उद्योग को नुकसान पहुंचाएगा."

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क्या है गुजरात की टेक्सटाइल इंडस्ट्री का हाल?

हरिभाई कठिरिया सूरत स्थित सहजानंद टेक्सटाइल कंपनी के मालिक हैं. गुजरात के वर्तमान कपड़ा उद्योग के बारे में वे कहते हैं, "फ़िलहाल गुजरात के कपड़ा उद्योग को बिजली बिल पर लागत, अतिरिक्त मज़दूरी पर लागत, श्रमिकों की हड़ताल और इंफ्रास्ट्रक्चर के अभाव का सामना करना पड़ रहा है. अगर हम पर आरसीईपी थोपा गया, तो हम अपनी फ़ैक्ट्री बंद करने के लिए मजबूर हो जाएंगे."

वहीं अशोक जरीवाला कहते हैं कि, "एक अनुमान के मुताबिक़ गुजरात में 8.5 से 9 लाख लूम काम करते थे, लेकिन जीएसटी के बाद इनकी संख्या गिरकर 6.5 लाख हो गई. जीएसटी के लागू होने के बाद कई मालिकों ने एक लाख रुपये की लागत वाले अपने लूम को महज 15 हज़ार रुपये में बेच दिया."

वे कहते हैं, "गुजरात में उद्योग के लिए न सिंगल विंडो सिस्टम है और न ही इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस, इससे राज्य के विकास को नुकसान पहुंच रहा है. ऐसे में अगर आरसीईपी को लागू किया जाता है तो न केवल गुजरात पर बल्कि पूरे देश की टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा."

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आकाश प्रेस ऐंड प्रिंट्स के मालिक और अहमदाबाद टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन के वाइस प्रेसिडेंट नरेश शर्मा कहते हैं, "कपड़ा उद्योग में फ़िलहाल सुस्ती चल रही है, यह नोटबंदी के साथ शुरू हुआ था और अब स्थिति और बिगड़ रही है. धागे के बाज़ार की स्थिति भी अच्छी नहीं है. इस उद्योग में बैड लोन और साथ ही धोखाधड़ी के मामले भी बढ़ रहे हैं. अगर आरसीईपी को स्वीकार कर लिया गया तो यह गुजरात के इंडस्ट्री को नुकसान पहुंचाएगा. कपड़ा मिलें बंद होंगी और बेरोज़गारी बढ़ेगी."

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ गुजरात के टेक्सटाइल प्रोसेसिंग यूनिट्स ने पहले ही अपने उत्पादन में 40 फ़ीसदी तक की कटौती की है. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में मांग में कमी है, इसकी वजह से ही इन्हें अपने उत्पादन में कमी करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

राज्य के लिए बेहद अहम इस इंडस्ट्री पर पड़ी इस मार के बावजूद सरकार की तरफ से इनकी मदद के लिए कोई क़दम नहीं उठाए गए.

हिंदु बिजनेसलाइन की एक ख़बर के मुताबिक़ गुजरात सरकार टेक्सटाइल के ख़ास सेक्टर को मजबूत करने के लिए एक सहायता योजना शुरू की है. इस योजना के तहत गुजरात की टेक्सटाइल यूनिट्स को बिजली की कीमतों में कुछ राहत और ब्याज के भुगतान में सब्सिडी मिलती है.

इस योजना के तहत, इस इंडस्ट्री में टेक्नोलॉजी अप्रगेड करने के लिए मदद दी जाएगी. इस सेक्टर की तरक्की के लिए टेक्सटाइल पार्क बनाने की योजना भी है.

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गुजरात बतौर टेक्सटाइल हब

देश में गुजरात की टेक्सटाइल इंडस्ट्री का एक ख़ास स्थान है. गुजरात को मैनेचेस्टर ऑफ़ ईस्ट, टेक्सटाइल स्टेट ऑफ़ इंडिया और डेनिम कैपिटल के उपनामों से जाना जाता है.

यहां के कपड़ा उद्योग राज्य ही नहीं बल्कि राष्ट्र का गौरव भी माना जाता है. यह इतना महत्वपूर्ण कैसे है इसे समझने के लिए देश की अर्थव्यवस्था में टेक्सटाइल सेक्टर के योगदान को जानना ज़रूरी है.

8वें गुजरात वाइब्रेंट समिट में आंकड़ों के मुताबिक, 2017 में गुजरात के कपड़ा उद्योग क़रीब 25 बिलियन डॉलर का था. राज्य में 1500 से अधिक लघु और मध्यम स्तर की कपड़ा इकाइयाँ हैं. देश से कपड़े के कुल निर्यात में गुजरात का हिस्सा लगभग 12% है. वहीं देश के कुल कपड़ा बाज़ार का यह 25 फ़ीसदी हिस्सा है.

देशभर में मध्यम और बड़ी कपड़ा प्रसंस्करण इकाइयों की सर्वाधिक संख्या (600 से अधिक) गुजरात में ही है. इतना ही नहीं यह पूरे देश में (33 फ़ीसदी) कपास उत्पादन के मामले में भी अव्वल है. यह सर्वाधिक कपास निर्यातक राज्य भी है. देश से 60% कपास निर्यात गुजरात से ही होता है. गुजरात सबसे बड़ा डेनिम उत्पादक राज्य भी है. दरअसल यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा डेनिम उत्पादक है.

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कॉटन टेक्सटाइल के उत्पादन में गुजरात दूसरे नंबर पर है. हर साल यहां 3.9 करोड़ मीटर सूती कपड़ों का उत्पादन होता है. यहां तक कि कपड़ा मशीनरी के मामले में भी, देश के सभी उत्पादकों में से आधे गुजरात में हैं. वहीं बुनाई मशीनरी में तो 90 फ़ीसदी के साथ यहां दूसरे किसी भी राज्य से उत्पादकों की कहीं बड़ी संख्या मौजूद है.

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल सूरत के कपड़ा उद्योग का सालाना कारोबार ही 40 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक है.

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इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में भारतीय कपड़ा बाज़ार का आकार 150 बिलियन डॉलर था, जिसके 2019 में 250 बिलियन डॉलर तक बढ़ने की उम्मीद है. 2017-18 में इंडस्ट्री आउटपुट में भारत के कपड़ा उद्योग ने अपने उत्पादन से 7 फ़ीसदी का योगदान दिया था.

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में स्पिनिंग मिल्स समेत 144 कंपोज़िट टेक्सटाइल मिलें हैं. राज्य में 897 कॉटन जिनिंग और प्रोसेसिंग यूनिट्स हैं. इसके अलावा, 22 सर्जिकल कॉटन यूनिट्स, 2362 रेडीमेड गारमेंट प्रोसेसिंग यूनिट्स, 362 टेक्निकल टेक्सटाइल यूनिट्स, 513 पावर प्रोसेसिंग यूनिट्स और 1146 हैंड प्रोसेसिंग यूनिट्स भी हैं.

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