भागलपुरी सिल्क उद्योग के बुनकर अब पापड़ बना रहे हैं

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas/BBC
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, भागलपुर से लौटकर, बीबीसी हिंदी के लिए
"भागलपुरी सिल्क उद्योग को मज़बूत करने के लिए एनडीए सरकार पूरा प्रयास कर रही है. यहां पर जो मेगा क्लस्टर बना है उससे यहां के बुनकरों और व्यापारियों की बहुत मदद होने वाली है. यहां पर जो बुनकर बहने हैं, आपको पहले धागे सुलझाने में इतनी समस्या आती थी, पैरों में घुटनों में इतना दर्द होता था, अब जो नई बुनियाद रिलिंग मशीन दी जा रही है, उससे बुनकरों को इस कष्ट से मुक्ति मिलेगी."
इसी साल अप्रैल में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भागलपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये बातें कही थीं.
सवाल ये कि इस दरम्यान बिहार के भागलपुर सिल्क का उद्योग कितना मज़बूत हुआ है. एनडीए सरकार को शासन में रहते लगभग छह साल हो गए.
बीबीसी की पड़ताल में भागलपुरी सिल्क उद्योग बुरी हालत में दिखा. सरकारी रिकॉर्ड्स में भी ये इतना कमज़ोर हो गया है कि मज़बूत बनाने की योजनाएं नाकाम साबित हो रही हैं.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले तीन दशकों के दौरान क़रीब एक लाख बुनकरों ने काम छोड़ा है.
बुनकर सेवा केंद्र भागलपुर, बरारी से मिली जानकारी के अनुसार इस वक़्त भागलपुर मेगा हैंडलूम क्लस्टर के अंतर्गत केवल 3,449 बुनकर काम कर रहे हैं और 3,333 लूम ही चालू हालत में हैं.
धीरे-धीरे काम मिलना बंद हो गया...
एक समय था जब भागलपुर देश के 48 फीसदी सिल्क परिधानों की आपूर्ति करता था. कारण कि यहां के लगभग हर निम्न मध्य वर्गीय परिवार में लूम चलता था.
आज हालात ये हैं कि भागलपुर म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के अंतर्गत केवल एक घर में हैंडलूम चल रहा है.
भागलपुर नाथनगर विधानसभा क्षेत्र के जगदीशपुर प्रखंड के पुरैनी गांव के मुश्ताक़ अंसारी कहते हैं, "90 के दशक तक हमारे गांव और इधर आस-पास के गांव के लगभग हर घर में हैंडलूम चलता था. लेकिन अब इक्के-दुक्के घर ही बचे रह गए हैं. धीरे-धीरे काम मिलना बंद हो गया. पेट पर आफ़त आ गई. तो लोग काम की तलाश में बाहर जाने लगे. जो बचे रह गए वो खेती और दिहाड़ी मज़दूरी करने लगे."
मुश्ताक़ आगे कहते हैं, "अब कोई नौजवान आपको लूम चलाते नहीं मिलेगा. जबकि इधर हम बुनकर समुदाय के लोग ही सबके अधिक हैं और ये हमारा ख़ानदानी काम है. लेकिन हम अपने बच्चों को अपनी तरह नहीं बनाना चाहते. जो हूनर और कला हासिल किए होकर भी बेरोज़गार हों."

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas/BBC
पापड़ बनाने का रोज़गार
मुश्ताक़ ने अपना हैंडलूम उखाड़ कर 2004-05 में ही घर के छज्जे पर रख दिया है. हमारे पहुँचने पर उसकी दीमक लगी लकड़ियां उतारकर दिखाने लगते हैं.
हमनें पूछा क्या इधर कोई ऐसा घर नहीं जहां अभी भी हैंडलूम चलता हो. तलाश में निकले तो कुछ ही घर छोड़कर हमें तेहारत हसन अपने घर के बाहर मिल गए.
मुश्ताक़ को पता था कि तेहारत के घर में बहुत हाल तक लूम चलता था.
उनकी बनाई साड़ियों की फिनिशिंग का काम बहुत सुंदर होता था. इसलिए मांग विदेशों तक से आती थी.
लेकिन तेहारत के जवाब ने हमें विस्मय में डाल दिया.
वे कहते हैं, "अब ताना (हैंडलूम) नहीं चलाता. सबकु़छ बांध-समेट कर रख दिया है. केरल में पापड़ बनाने का काम करता हूं. अभी घर पर आया था, फिर जाना है."

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas/BBC
धागा सुलझाने का काम
तेहारत से बातचीत में पता चला कि पापड़ बनाने के लिए प्रतिदिन उनको 350-400 रुपये मिल जाते हैं.
लेकिन पापड़ बनाने में और क़रीने की कारीगरी वाली साड़ियां बनाने में फ़र्क़ है. ये कला बहुत कम ही लोगों के पास बची रह गई है.
हमारी बात पर तेहारत पलटकर कहते हैं, "भैया, हुनर रखने से क्या होगा जब परिवार नहीं चला सकें. बीबी, बाल-बच्चा सब है. पापड़ बनाने का ही सही, रोज़ काम तो मिल जाता है. यहां तो भूखे रहने की नौबत आ जाती है."
तेहारत अपने घर से कुछ ही दूरी पर स्थित वजाहत हसन के घर लेकर जाते हैं. मिट्टी के घर के बंगले में दो हैंडलूम चालू थे.
75 साल की उम्र में वजाहत अब भी रोज़ बेटे के साथ हैंडलूम चलाते हैं. पत्नी धागा सुलझाने का काम करती हैं.

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas/BBC
जीएसटी के बाद
वजाहत हसन के बेटे कहते हैं, "हम चार भाई हैं. सबको यह काम करने आता है. लेकिन काम है कहां? अब सबलोग बाहर रहते हैं. अब्बी-अम्मी बुजुर्ग हो चले हैं. कोई तो उनके पास रहना चाहिए. बस इसलिए हम यहां हैं. हमलोगों को काम मिले या नहीं, लेकिन ख़ाली नहीं बैठते. ख़ुद से धागा ख़रीद कर चलाते रहते हैं. जब ऑर्डर मिलता है तो माल बिक ही जाता है. इसलिए अब कपड़ा तैयार करते हैं ज्यादा, साड़ियों का काम बहुत कम हो गया है."
वजाहत 10 साल की उम्र के थे तभी से ताना (हैंडलूम) चला रहे हैं.
वे कहते हैं, "पहले सस्ती का दौर था लेकिन फिर भी इतना काम मिल जाता था कि पैसे की कोई दिक्क़त नहीं होती थी. अब महंगाई का दौर है. 10 साल पहले तक 800 रुपये का मिलने वाला धागा अब जीएसटी के बाद 4400-4500 रुपये का मिल रहा है. अगर कोई आदमी दो से तीन दिन लगाकर एक साड़ी तैयार करता है तो उसे 500-600 रुपये बचेंगे. रोज़ के हिसाब से 200 रुपया अधिक से अधिक होगा. आप बताइए, इस महंगी के ज़माने में 150- 200 रुपये में घर परिवार कैसे चलेगा? वो भी काम मिले तब."

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas/BBC
काम मिलना क्यों बंद हुआ?
वजाहत कहते हैं, "हैंडलूम को मारने वाला पावरलूम है. 1985-90 तक हमारे पास बहुत काम था. यहां भागलपुर में जेजे एक्सपोर्टर, जेनियथ एक्सपोर्टर जैसे दर्जनों बड़े एक्सपोर्टर थे. यहां से ज्यादा डिमांड विदेशों से ही आती थी. तब हमारे काम के पैसे भी ठीक मिलते थे. लेकिन तभी मशीनों का दौर आया. उसमें चीन का असर सबसे अधिक रहा. वे हमारे देश से ही कोकून और यार्न ख़रीदकर कम क़ीमत में सप्लाई देने लगे. अब तो यहां भी पावरलूम बनाने पर ज़ोर है. हमारा हाथ का काम है, उसकी क़ीमत अधिक है. उनका मशीन का है इसलिए दाम कम है. लेकिन वे हमारे जैसा काम नहीं कर पाएंगे. हमारी फर्निशिंग ओर फिनिशिंग अलग तरह की है."
ये सब बताते हुए वजाहत हसन अपनी बनाई साड़ियाँ, चादर और स्टोल दिखाने लगे. उनकी क़ीमत और कारीगरी के बारे में बताने लगे.
सामग्री् उपलब्ध नहीं है
सोशल नेटवर्क पर और देखिएबाहरी साइटों की सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.पोस्ट Facebook समाप्त

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas/BBC
टेक्सटाइल डिपार्टमेंट का सर्वे
ऐसा नहीं कि बुनकरी के काम में केवल मुसलमान समुदाय के लोग ही हैं. हिंदू समुदाय की तांती/ततवा जाति के लोग भी ये काम करते हैं.
भागलपुर के फतेहपुर प्रखंड के अंगारी गांव में भी पहले हर घर में ताना (हैंडलूम) था.
यहां मुख्य रूप से तांती जाती के लोग ही रहते हैं. लेकिन अब किसी के घर में लूम नहीं चल रहा है. हम जिस भी घर में जाते लोग अपने हैंडलूम के अस्थि पंजर दिखाने लगते.
मुकेश्वर तांती के घर हैंडलूम गड़ा तो दिख रहा था पर उसका ढांचा सही सलामत नहीं था.
वे बताते हैं कि टेक्सटाइल डिपार्टमेंट से लोग सर्वे करने आते रहते हैं. उन्होंने इसीलिए अपना ताना गड़ा छोड़ दिया है ताकि उन्हें यह मालूम रहे कि इस घर में हैंडलूम भी चलता है.
ताड़ के पत्तों के छत वाले फूस और बांस से घेरकर बने घर को देखकर हमें भी पहली दफ़ा यक़ीन नहीं हुआ था.

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas/BBC
भागलपुर मेगा क्लस्टर योजना
मुकेश्वर की पत्नी मनिया देवी गांधीजी के चरख़े जैसे एक मटमैले चरख़े को लेकर दिखाने आती हैं.
कहती हैं, "यही चरख़ा चलाकर जीवन बिता दिए. ये ताना चलाते थे. मैं धागा लपेटती (सुलझाती) थी. बाल-बच्चा सब बाहर चला गया. जो रहता है वो भी अलग रहता है. उनको पालने-पोसने में घर नहीं बना पाए."
भागलपुर मेगा क्लस्टर योजना वाले प्रोजेक्ट के तहत बुनकरों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, क्या इन योजनाओं में से किसी का लाभ नहीं मिल पाया उन्हें?
मुकेश्वर तांती अपना बुनकर कार्ड दिखाते हुए कहते हैं, "इसको बनवाने में 200 रुपया दिए. लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं मिल सका."
भागलपुर मेगा कल्स्टर प्रोजेक्ट के अंतर्गत 5084 हैंडलूमों और 20,000 बुनकरों पर 17.15 करोड़ रुपए ख़र्च होने हैं.
बुनकरों को लोन देने, उनके लिए व्यापार को सुगम बनाने तथा और भी तमाम वित्तीय सहायताओं से संबंधित क़रीब दर्जन भर योजनाएं चल रही हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने महिला बुनकरों को रीलिंग मशीन देने की बात कही थी. क्या इनमें से किसी भी योजना का लाभ उन्हें नहीं मिल पाया?
मनिया देवी कहती हैं, "अगर मिला होता तो वो क्यों छुपाते. सबकुछ तो दिखा ही दिया. इधर-उधर खेती-बाड़ी में मज़दूरी करके पेट चला लेते हैं. जबतक देह चल रहा है तबतक."

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas/BBC
बुनकर सेवा केंद्र
भागलपुर मेगा क्लस्टर के अंतर्गत हैंडलूम के काम से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारी बुनकर सेवा केंद्र भागलपुर की है.
अंग्रेजों के समय की खंडहर हो रही एक इमारत में चल रहे बुनकर सेवा केंद्र में डिजायन, रंगाई, प्रिंटिंग, बुनाई की ट्रेनिंग होती है.
बिहार का यह इकलौता बुनकर सेवा केंद्र है. भारत में ऐसे 28 केंद्र हैं. 1974 से अबतक पिछले 45 सालों से लगातार हस्तकरघा क्षेत्र के विस्तार और तकनीकी सुधार पर काम कर रहा है. भागलपुर मेगा क्लस्टर के अंतर्गत आने वाले सभी बुनकरों की ज़िम्मेदारी इसी केंद्र की है.
केंद्र के प्रभारी रामकृष्ण से हमने सारे सवाल किए. वे अपनी योजनाओं के लिस्ट दिखाने लगे. उस जैकेट के कपड़े को भी बड़े गर्व से दिखाते हैं जिसे नरेंद्र मोदी पहनते हैं. रामकृष्ण ने बताया, "ऐसे कपड़े केवल भागलपुर में ही बनते हैं."

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas/BBC
केवल ट्रेनिंग से क्या होगा?
हमने कहा कि बुनकरों को इनका लाभ नहीं मिल पा रहा है लेकिन जवाब में वे कहते हैं, "हम अपने स्तर से हर एक प्रयास कर रहे हैं. बुनकरों को पकड़-पकड़ कर ट्रेनिंग के लिए ले आते हैं. उन्हें स्टाइपेंड भी देते हैं कि इसी लालच में कम से कम से कम आएं."
लेकिन केवल ट्रेनिंग से क्या होगा? बुनकरों को काम मिले तब तो! और हर योजना का लाभ पाने के लिए तो पहले दलाल को पैसा देना पड़ जा रहा है.
रामकृष्ण इसपर कहते हैं, "हम ऐसा नहीं करते. इसमें दोष इम्प्लीमेंटिंग एजेंसी का है. देश भर में लगने वाले हाट-बाज़ारों तक हम बुनकरों को ले जाते हैं. उन्हें एक्सपोजर भी देते हैं."
भागलपुर हैंडलूम मेगा क्लस्टर के अंतर्गत 20,000 लूम स्थापित कराने का उद्देश्य है. इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत सस्ते दर पर बुनकरों को लोन दिया जाना है.
छह साल में कितने बुनकरों को इसका लाभ मिल पाया?
रामकृष्ण कहते हैं, "अभी तक तो नहीं मिल पाया है. मगर हमलोगों ने कई आवेदन पाए हैं. उन्हें स्वीकृति के लिए संबंधित बैंक को भेजा गया है."

इमेज स्रोत, Rubaiyat Biswas/BBC
क्या इतिहास तो नहीं बन जाएगा
इस तरह बुनकर सेवा केंद्र से मिली जानकारी के अनुसार मोदी सरकार के कार्यकाल में एक भी नया हैंडलूम स्थापित नहीं हो पाया है. उल्टे तेज़ी से बुनकर ये काम छोड़ रहे हैं.
क्या इतिहास तो नहीं बन जाएगा भागलपुर का हथकरघा उद्योग?
ये सवाल इसलिए क्योंकि पुरैनी गांव के बुनकरों ने बताया था कि वे अपनी आने वाली पीढ़ी को इस काम में नहीं आने देना चाहते.
रामकृष्ण कहते हैं, "भागलपुरी सिल्क उद्योग कभी मरेगा नहीं. क्योंकि जो यहां बनता है वो कहीं नहीं बनता. बाज़ार हमारे वश में नहीं है. हम और आप उसके वश में हैं. हमने और आपने जो पहना है वो पावरलूम है. बाज़ार हमलोगों से ही बनता है."
लेकिन बुनकर रहेंगे तब तो उद्योग चलेगा? और जिस काम से पेट नहीं पल पाता हो, उसे क्योंकर कोई करेगा?
बजाहत कहते हैं, "बुनकर कार्ड तो बना ही है, हमारा सारा रिकार्ड डिपार्टमेन्ट पास है. अब हमारे लिए एक खुली मंडी बना दी जाए. हम अपना सामान बनाएंगे. और ख़ुद बेच लेंगे. किसी पर काम के लिए आश्रित नहीं रहना पड़ेगा. हमें पता है कि बाज़ार में हमारी क्या क़ीमत है."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















