मीडिया और पत्रकारों पर आंध्र सरकार का फ़ैसला कितना सही?

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- Author, दीप्ति बत्तिनी
- पदनाम, बीबीसी तेलुगू संवाददाता
आंध्र प्रदेश की कैबिनेट ने सचिव स्तर के अधिकारियों को एक नया अधिकार दिया है. राज्य में ये अधिकारी अब मीडिया संस्थानों पर प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया में की गई ग़लत, बेबुनियाद और मानहानि वाली ख़बरें छापने पर मुक़दमा कर सकते हैं.
इससे पहले तक सिर्फ़ जन संपर्क और सूचना विभाग ही ऐसा कर सकते थे. सरकार ने इस सम्बन्ध में 30 अक्तूबर को एक आदेश जारी किया है. आदेश कुछ इस तरह है:
"हमारी नज़र में ऐसी घटनाएं आई हैं जब कुछ प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया संस्थान जान-बूझकर सरकार और सरकारी अधिकारियों की छवि धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं. वो द्वेषपूर्ण इरादों से फ़र्जी, बेबुनियाद और मानहानि वाली ख़बरें चला रहे हैं."
आंध्र सरकार ने ये भी कहा है कि ऐसा प्रेस की आज़ादी पर लगाम लगाने के लिए बल्कि 'फ़ेक न्यूज़' और 'मनगढ़ंत ख़बरें' रोकने के लिए किया गया है.
पत्रकारों के हितों की रक्षा करने वाला संगठन प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया (पीसीआई) ने आंध्र प्रेदश सरकार को नोटिस जारी कर दिया है.
एक नवंबर को पीसीआई की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया है कि पीसीआई के चेयरमैन जस्टिस चंद्रमौली कुमार प्रसाद ने इस घटना पर चिंता जताते हुए कहा है कि इस क़दम से पत्रकारों का मनोबल गिरेगा और इससे प्रेस की आज़ादी पर भी बुरा असर पड़ेगा.
बयान के अनुसार पीसीआई ने आंध्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए उनसे इस बारे में जवाब मांगा है.
आंध्र प्रदेश राज्य के सूचना प्रसारण मंत्रालय में जनसंपर्क अधिकारी वेंकटरमैया ने बीबीसी से कहा कि सरकार को भरोसेमंद मीडिया संस्थानों से कोई समस्या नहीं है लेकिन आंध्र प्रदेश में ऐसे कई मीडिया संस्थान भी हैं राजनीतिक रूप से निष्पक्ष नहीं हैं.
वेंकटरमैया ने कहा, "राज्य सरकार के आदेश को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है. आदेश में कहा गया है कि सचिव स्तर के अधिकारी अब मनगढंत और फ़र्जी ख़बरों का जवाब दे सकेंगे और अगर जवाब देने के बाद भी चैनल या अख़बार झूठी ख़बरें चलाते हैं तो मीडिया संस्थान पर कार्रवाई की जाएगी. ध्यान रहे, कार्रवाई प्रबंधन पर होगी, पत्रकारों पर नहीं."
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सत्ता की आलोचना नहीं कर पाएंगे पत्रकार?
राज्य की विपक्षी पार्टियों ने वाईएस जगन मोहन रेड्डी की अगुवाई वाली सरकार के इस आदेश को 'तानाशाही' बताया है.
आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कहा, "इस आदेश का मक़सद सोशल मीडिया पर लोगों की आवाज़ दबाना है. हम इस दमनकारी आदेश के ख़िलाफ़ तब तक लड़ेंगे जब तक इसे वापस नहीं ले लिया जाता."
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जन सेना पार्टी के अध्यक्ष पवन कल्याण ने ट्विटर पर लिखा, "तो अब हमारे पत्रकार नेताओं की आलोचना करने की हिम्मत भी नहीं कर सकते."
हालांकि ऐसा नहीं है कि आंध्र सरकार ने अचानक ही ये फ़ैसला ले लिया. इसकी तैयारी काफ़ी पहले से चल रही थी.
इस साल मई में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद जगन मोहन रेड्डी ने बीबीसी तेलुगू को दिए अपने पहले इंटरव्यू में भ्रष्टाचार से जुड़े एक सवाल के जवाब में कहा था, "मैं भले ही भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए सारे क़दम उठा लूं, राज्य का मीडिया बंटा हुआ है. मैं चाहे जो भी कर लूं, कई मीडिया संस्थान ऐसे हैं जो मेरे बारे में बुरा ही लिखेंगे."
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इतना ही नहीं, शपथ ग्रहण समारोह के मौक़े पर दिए अपने भाषण में भी रेड्डी ने ऐसे संकेत दिए थे.
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था, "हम सब जानते हैं कि राज्य में मीडिया संस्थानों की स्थिति कैसी है. इनाडु, आंध्र ज्योति और टीवी5 जैसे कई मीडिया संस्थान हैं, जिनका झुकाव सिर्फ़ चंद्रबाबू नायडू की तरफ़ है. उनके लिए चंद्रबाबू नायडू के अलावा हर कोई दुश्मन है. हमारी सरकार ऐसे संस्थानों पर मानहानि का मुक़दमा करेगी और उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई के लिए हाई कोर्ट तक जाएगी."
हालांकि ये पहली बार नहीं है जब ऐसा कोई आदेश जारी किया गया है. वाईएस जगन मोहन रेड्डी के पिता पूर्व मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने भी फ़रवरी 2007 में कुछ ऐसा ही आदेश जारी किया था. उस वक़्त पत्रकारों ने इस आदेश का ख़िलाफ़ पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन किया था.
आंध्र प्रदेश यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (APUWJ) ने मौजूदा सरकार के इस आदेश को भी प्रेस की आज़ादी पर हमला बताया है.
यूनियन के नेता और प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया के पूर्व सदस्य के. अमरनाथ ने कहा, "ये आदेश कुछ ख़ास मीडिया संस्थानों को निशाना बनाने के लिए आया है. कई बार ऐसा होता है जब पत्रकार सूत्रों के हवाले से और 'ऑफ़-रिकॉर्ड' बातचीत के आधार पर ख़बरें लिखते हैं. विभाग अब ऐसी रिपोर्ट्स को मनगढ़ंत मानते हुए उन पर कार्रवाई करेगा. मुझे डर है कि बाक़ी राज्यों के मुख्यमंत्री भी ऐसा करने लगेंगे."

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जब चैनलों पर लगी पाबंदी
अतीत में ऐसा भी हुआ है जब सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में कुछ मीडिया संस्थानों पर पाबंदी लगाने तक की कोशिश की है.
जून 2014 में एबीएन आंध्र ज्योति और टीवी9 समाचार चैनलों को तीन महीने के लिए ब्लॉक कर दिया गया था. हालांकि सरकार का कहना था कि चैनलों को बंद करने में उसकी कोई भूमिका नहीं थी.
इन चैनलों पर व्यंग्य के ज़रिए तेलंगाना के कुछ विधायकों पर कथित रूप से कुछ टिप्पणी की गई थी. बाद में टीवी 9 ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और उनके मंत्रियों से व्यंग्य के लिए माफ़ी मांगी थी.
तब चंद्रशेखर राव ने एक जनसभा में कहा था, "क्या ये न्यूज़ चैनल हैं? अगर कोई तेलंगाना का अपमान करने का दुस्साहस करेगा तो मैं उसकी गर्दन तोड़ दूंगा और ज़मीन के 10 फ़ीट अंदर दफ़ना दूंगा.''
साल 2015 में विशाखापत्तनम के एसीपी ने टीएन न्यूज़ को नोटिस भेजा था. इस चैनल ने कुछ स्टिंग ऑडियो और वीडियो टेप प्रसारित किए थे.
इस स्टिंग में एक टीडीपी विधायक को तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू की ओर से कथित तौर पर रिश्वत देते हुए दिखाया गया था.
एसीपी ने चैनल को जो नोटिस भेजा था उसमें कहा गया था कि ऐसे स्टिंग प्रसारित करने से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लोगों में तनाव पैदा हो सकता है.
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राजनीतिक पार्टियों की आपसी दुश्मनी का ख़ामियाज़ा भी कई बार मीडिया संस्थाओं को भुगतना पड़ता है और इसका नतीजा कई बार सेंसरशिप के रूप में देखने को मिलता है.
आंध्र प्रदेश के पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के वकीलों ने कई मीडिया संस्थानों पर 200 से ज़्यादा मानहानि के मुक़दमे किए हैं.
मानहानि के आरोपों का सामना करने वाले वरिष्ठ पत्रकार शब्बीर अहमद ने बीबीसी से बताया, "जयललिता के शासनकाल में पत्रकारों पर कई मामले दायर किए गए थे. ये मीडिया में डर का माहौल पैदा करने की रणनीति थी ताकि पत्रकार जयललिता की आलोचना न कर सकें. भारत में मानहानि क़ानून का इस्तेमाल कई बार पत्रकारों को डराने और उनका उत्पीड़न करे के लिए किया जाता है."
शब्बीर अहमद कहते हैं कि मानहानि के ज़्यादातर मुक़दमे ट्रायल तक नहीं पहुंचते और सत्ता बदलते ही केस वापस ले लिया जाता है. इससे पता चलता है कि इन सबका राजनीतिक मक़सद होता है.
रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्ड्स की हालिया रिपोर्ट में प्रेस की आज़ादी के मामले में 180 देशों की लिस्ट में भारत 140वें नंबर पर था.
इस रिपोर्ट में कहा गया था, "पत्रकारों के साथ होने वाली हिंसा में पुलिस की हिंसा समेत माओवादियों की हिंसा और अपराधियों और भ्रष्ट नेताओं के उत्पीड़न भी शामिल है. सोशल मीडिया पर भी खुलकर बोलने और लिखने वाले पत्रकारों को नफ़रत की मुहिम का निशाना बनाया जाता है."
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