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चिखलदा : आदिमानवों के इस गांव में आज सिर्फ़ भूखे कुत्ते रोते हैं
- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मध्यप्रदेश के चिखलदा की मौजूदा कहानी भले ही आज सरदार सरोवर बांध के बैकवॉटर में डूब कर ख़त्म हो गयी हो, लेकिन हज़ारों साल पहले यहां बसने वाले आदिमानवों का इतिहास अभी भी ज़िंदा है.
यूं तो नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध में 138 मीटर तक पानी भरने के बाद से मध्यप्रदेश के कुल 178 गांव बांध के बैकवॉटर्स में डूब गए हैं. लेकिन 3 सितंबर की रात जब धार जिले में बसे चिखलदा गांव में पानी भरने लगा तो सिर्फ़ एक गांव नहीं, बल्कि एक ऐसी ऐतिहासिक धरती डूब गयी जहां हज़ारों साल पहले ताम्रपाषाण युग में हमारे पूर्वजों ने खेती-किसानी के साथ-साथ सामाजिकता का ककहरा भी सीखा था.
चिखलदा की यह कहानी शुरू होती है मध्यप्रदेश को गुजरात से जोड़ने वाले राज्य के स्टेट हाईवे नम्बर 26 से. धार जिले में स्थित इस गांव के सामने से गुज़रने वाला यह हाईवे आज पूरी तरह पानी में डूबा हुआ है. साथ ही 3500 लोगों की आबादी वाला चिखलदा गांव भी जल समाधि ले चुका है.
गांव के मछुआरे एक नाव लेकर आते हैं. नाव पर बैठकर गांव में दाख़िल होते ही सबसे पहले हमें पानी में डूबे मकानों की छतों पर फँसे गांव के कुत्तों के रोने की आवाज़ें आती हैं. गाँव की गलियों में भरा पानी दोपहर की धूप में तपकर भाप उगल रहा था.
तभी कहीं से एक घबराई हुई गाय नाव की तरफ़ आती हुई नज़र आती है. गाय पूरी तरह पानी में डूब चुकी थी और बमुश्किल अपना सर पानी के ऊपर किए पानी से बाहर रास्ता खोजने की कोशिश कर रही थी. लेकिन,नथुनों तक भरे पानी का डर एक लट्टू की तरह उसे यहां वहां घुमा रहा था. बहुत बुलाने पर भी जब गाय घबराहट में गाँव के भीतर मुड़ गयी तो नाव पर बैठे एक ग्रामीण ने उदास होकर कहा, "अब गऊ का बचना मुश्किल है. आगे तो और पानी भरा है".
चिखलदा का पुरातात्विक महत्व
2017 में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के ज्वाइंट डायरेक्टर जनरल के पद से रिटायर हुए और नब्बे के दशक में लंबे समय तक चिखलदा में काम करने वाले पुरातत्व विशेषज्ञ डॉक्टर एसबी ओटा चिखलदा के डूबने को भारतीय विरासत की हानि बताते हैं.
नर्मदा घाटी के इस छोटे से गांव में आदिमानव की मौजूदगी से जुड़े पुरातात्विक साक्ष्यों के बारे में बताते हुए डॉक्टर ओटा कहते कहते हैं, "चिखलदा का पुरातात्विक महत्व को दो बातें स्थापित करती हैं. पहली बात तो यह कि हमें यहां ड्वेलिंग पिट्स मिले हैं जो 4 से 5 हज़ार साल पुराने हैं. यहां 'पिट ड्वेलेर्स' या गुफा मानवों की एक बस्ती रही है.
ताम्र-पाषाण युग के यह गुफ़ामानव ज़मीन के अंदर गड्ढे खोद कर उसमें रहते भी थे और बाहर ज़मीन पर खेती भी करते थे. इस तरह से यह साइट उन जगहों में से एक है जहां पाषाण युग के इंसानों के सबसे पहले एक साथ रहने और खेती करने के सबूत मिलते हैं. रहने वाले पिट्स ख़ास तौर पर महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह मध्यप्रदेश में चिखलदा के सिवा और कहीं नहीं मिले हैं"
बांध के पानी से डूब चुके चिखलदा को पुरातात्विक विरासत का नुक़सान बताते हुए डॉक्टर ओटा जोड़ते हैं, "एक बार ऐसी कोई पुरातात्विक साइट ख़त्म हो जाती है तो जानकारी का वह स्रोत हमेशा के लिए बंद हो जाता है. और नर्मदा घाटी में तो आर्कीआलॉजी के लिहाज़ से इतना पोटेंशियल था कि उसको सही से स्टडी करने के लिए कम से कम 100 आर्कियोलॉजिस्ट की टीम को बीस बीस साल काम करना चाहिए था".
अतीत के साथ-साथ डूबता वर्तमान
अतीत के इन अवशेषों के साथ चिखलदा में बसे साड़े तीन हज़ार लोगों की जिंदगियां भी जैसे डूब चुकी हैं. इस वक़्त हम गांव के ऊपर नाव से घूम रहे हैं. कुछ दूरी पर इमली के झाड़ की टहनियाँ पानी के ऊपर झाँक रही हैं.
तभी नाव पर बैठे चिखलदा निवासी राजू कहते हैं, "अभी पानी के ऊपर जहां हम चल रहे हैं, ठीक यहीं नीचे मेरा डूबा हुआ घर है. गांव के इस हिस्से में कभी 40-45 मछुआरों की बस्ती हुआ करती थी. सभी के घर आज पानी के नीचे हैं. हमारा घर जैसा भी था, हमारा आपना था. किसी के मोहताज तो नहीं थे. मछली पकड़ते और उसी से परिवार चलाते थे. लेकिन अब हम जब भी पानी में जाल डालते हैं, वो टूटे पेड़ पौधों और लकड़ी के लट्ठों में फँस कर फट जाता है. मुआवज़े के नाम पर सरकार ने जो हमें जो पैसे दिए हैं उससे तो 40 बोरी सीमेंट भी नहीं आ सकता. घर कहाँ से खड़ा करेंगे".
जीवन के 51 साल गांव के अपने पुश्तैनी घर में बिताने वाले स्थानीय किसान गुड्डू, आज 4 कमरों वाले अपने घर के डूब जाने के बाद किराए के घर में रहने को मजबूर हैं. नाव से अपने घर के सामने से गुज़रते हुए गुड्डू फूट-फूट कर रो देते हैं. "यहीं इसी मकान में हम रहते थे. जन्म भी यहीं हुआ, खेले कूदे भी सब यहीं पर. यहां, अपने घर के दरवाज़े पर कुर्सी लगकर मैं हर शाम बैठता था...आज ये दरवाज़ा भी डूब चुका है. सरकार से क्या कहूँ..सिर्फ़ इतना ही कह सकता हूँ कि जो उचित हो वो मुआवज़ा हमें दिया जाए. घर भी मेरा डूब गया और खेती की ज़मीन तो अब पूरी टापू बन चुकी है. लेकिन न ही मुझे खेती की ज़मीन का मुआवज़ा मिला है और न ही अपने डूबे हुए घर का".
केला किसानों पर संकट
खेती और पुरातत्व के साथ-साथ चिखलदा केले और पपीते जसी फलों की उत्कृष्ट पैदावार के लिए भी मशहूर था. लेकिन बांध से आयी डूब ने गांव के बड़े केला किसानों की भी हिम्मत तोड़ दी है.
गांव के सबसे बड़े केला किसानों में से एक सक्कू दरबार की एक करोड़ की फ़सल बांध के पानी में डूब कर ख़राब हो गयी. केलों के रख-रखाव के लिए 35 लाख की लागत से बने नए कोल्ड स्टोरेज के सामने बैठे सक्कू कहते हैं, चिखलदा में जो केला उगता है वो दिल्ली से लेकर इरान और दुबई तक सब दूर जाता है. इस बार मैंने 30 हज़ार केले के पौधे लगाए थे. बाजर में 300 रुपए पौधा बिकता है. इस तरह से फ़सल डूबते ही मेरा कुल एक करोड़ का नुक़सान हो गया है. अब लगता है की चिखलदा में केले की खेती तो बंद ही हो जाएगी...बिजली पानी जब सब बंद हो ही गया है. हमारी 19 एकड़ ज़मीन है जिसका मुआवज़ा सरकार हमें मात्र 60 लाख रुपए दे रही है. इसलिए हमने नहीं मुआवज़ा लिया ही नहीं. जब मार्केट वैल्यू ज़मीन की 3 करोड़ है तो सिर्फ़ साठ लाख कैसे ले लूँ?"
डूब गया प्राचीन नीलकंटेश्वर मंदिर
चिखलदा के निवासियों के साथ-साथ न्यायोचित पुनर्वास का इंतज़ार करता, यहां बना ग्यारहवीं शताब्दी का प्राचीन नीलकंठेश्वर मंदिर भी डूब गया.
मंदिर के बारे में बताते हुए चिखलदा निवासी और नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता रहमत कहते हैं, "नीलकंठेश्वर मंदिर चिखलदा की पौराणिक पहचान था. मंदिर के उपर का जो स्ट्रक्चर है वो ग्यहरवीं शताब्दी का है लेकिन इसके शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है. इस मंदिर को पहले सरकार ने डूब में बताया, फिर इसके रीलोकेशन का एक प्लान भी जारी किया लेकिन आख़िर में फिर से काग़ज़ों पर मंदिर को डूब से बाहर बता दिया. लेकिन आज यह मंदिर डूब चुका है. यह मंदिर सिर्फ़ धार्मिक नहीं बल्कि हमारी पुरातात्विक पहचान भी है जिसे इस तरह ख़त्म किया दिया गया".
सरकार का पक्ष
मध्य प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने जवाबदेही का ठीकरा गुजरात सरकार के सर पर फोड़ते हुए एक वक्तव्य में कहा कि पुनर्वास का काम पूरा न होने की वजह से उनकी सरकार ख़ुद इस साल बांध में जलभराव का विरोध कर रही थी. इधर राज्य सरकार में नर्मदा वैली डेवलपमेंट अथॉरिटी के प्रभारी कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र सिंह बघेल प्रभावित इलाक़ों का दौरा करते हुए डूब में आने वाले सभी गाँवों का दोबारा सर्वे करवाने और उचित मुआवज़ा देने का वादा ट्विटर पर कर रहे हैं. लेकिन चिखलदा गांव की सनावर मंसूरी जैसी महिलाओं के लिए यह सरकारी आश्वासन सिर्फ़ कोर वादे हैं.
सनावर अपने डूबे हुए घर और दुकान की तस्वीर को अक्सर अपने साथ लेकर चलती हैं. नाव पर बैठे कर अपने डूबे हुए घर के टूटे हिस्सों को देखते ही, सनावर रोने चीखने लग जाती हैं. फिर अपने थैले से घर और दुकान की तस्वीर निकाल कर मुझे दिखाते हुए कहती हैं, "ये जो घर दिख रहा है न हमारा, यहीं इसी के सामने हमारी हमारी दुकान थी. मेरे पति के मरने के बाद इसी दुकान को चला कर मैंने अपने बच्चों का पालन पोषण करती थी. सरकार ने मेरा घर और दुकान तो डुबो दिया, लेकिन दुकान लगाने या घर बनाने के लिए ज़रूरी पैसा और सुविधा नहीं दिया".
घर छोड़ने का वक़्त याद करते हुए सनावर जोड़ती हैं, "4 सितंबर को जब गांव में तेज़ी से पानी भरने लगा तो मुझे मजबूरी में अपना ये पुश्तैनी घर ख़ाली करना पड़ा. उस रोज़ आमसाम से भी मुसलाधार बारिश हो रही थी और नीचे ज़मीन में भी लगातार पानी बढ़ रहा था. देखते ही देखते घर की दीवारें ढह गयीं और बच्चों ने रोना शुरू कर दिया. तब मैंने जल्दी से एक टेम्पू बुलाया और खाने पीने का जो भी थोड़ा बहुत ज़रूरी सामान मैं उठा सकती थी, वो लेकर बच्चों के साथ गांव से निकली. अब तो दुकान भी नहीं है. आगे क्या करूँगी...कुछ समझ नहीं आता. पहले हम चिखलदा ज़िंदाबाद-ज़िंदाबाद कहते नहीं थकते थे. लेकिन आज हमारा चिखलदा अमर हो गया".
आज डूब चुके चिखलदा से सिर्फ़ टूटे घरों और पानी के जाल में फँसे गांव के भूखे कुत्तों की आवज आती है. और इन कुत्तों का रोना सुनती है गांव के द्वार पर बैठी महात्मा गांधी की यह मूर्ति. यहां की भूतहा उदासी विकास की एक तस्वीर है, जिसकी क़ीमत वर्तमान के साथ साथ हमारा सामूहिक अतीत भी चुका रहा है.
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