आगरा सेंट्रल जेल जहां 80 से ज़्यादा कश्मीरी कैद हैं

- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आगरा में शुक्रवार सुबह गर्मी थी और उमस का असर था. हालांकि कभी-कभी आ रही हवा के कारण थोड़ी राहत महसूस हो रही थी.
लेकिन कश्मीर घाटी जैसी ठंडी जगह से आए करीब दर्जन भर पुरुषों और महिलाओं के लिए शायद ऐसा नहीं था. उन्हें गर्मी से परेशानी महसूस हो रही थी.
वो आगरा सेंट्रल जेल गेट के बाहर एक बड़े से वेटिंग रूम में बैठे हुए थे और जेल में बंद अपने प्रियजनों से मिलने के लिए धीरज के साथ अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे.
वास्तव में उनका चेहरा देख कर स्पष्ट रूप से लग रहा था कि वो इस इलाके से अनजान हैं.
मीडिया की खबरों में बताया गया है कि सुरक्षा बलों ने घाटी से सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया है और उन्हें राज्य से बाहर कई जेलों में बंद रखा है.
अधिकारियों ने इस पर चुप्पी साध रखी है. आगरा के अति सुरक्षा वाले इस जेल में कश्मीर के 80 से अधिक लोगों को रखा गया है.

मुसीबत में पड़ जाएंगे...
इसी वेटिंग रूम में महिलाओं और पुरुषों के लिए बनाए गए शौचालय से आ रही दुर्गंध के कारण वहां इंतजार करना कोई आसान काम नहीं था.
अपनी कमीज़ में पसीना पोंछते हुए दाढ़ी वाले एक व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए कहा, "बहुत गर्मी है. मैं यहां मर जाऊंगा."
उन्होंने अनुरोध किया, "मेरा नाम मत पूछिए. हम मुसीबत में पड़ जाएंगे."
वो श्रीनगर से 30 किलोमीर दूर पुलवामा के रहने वाले हैं और अपने भाई से मिलने के लिए प्रतीक्षारत हैं.
उन्होंने बताया, "उसे चार अगस्त को देर रात उठा लिया गया. सुरक्षा बल दो से तीन वाहनों में आए थे. उन्होंने नहीं बताया कि उन्हें कहां ले जाया जा रहे हैं."
उन्होंने बताया, "मुझे नहीं पता उन्हें क्यों हिरासत में लिया गया. उनका पत्थरबाजों से कोई लेना देना नहीं था. वह एक ड्राइवर है."

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काफी कोशिशों के बाद
इस घटना के एक दिन बाद पांच अगस्त को जम्मू और कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा वापस लेने की घोषणा की गई.
पुलवामा के रहने वाले व्यक्ति ने बताया, "हम अधिकारियों के साथ संपर्क में रहे, जिन्होंने बताया कि उसे श्रीनगर ले जाया गया. काफी कोशिशों के बाद हमें पता चला कि उसे यहां लाया गया है."
उन्होंने बताया, "हम 28 अगस्त को आगरा आए. हमें स्थानीय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से एक 'सत्यापन पत्र' लाने के लिए कहा गया. हम पत्र लाने के लिए पुलवामा गए. इसमें हमें हजारों रुपये खर्च करने पड़े."
उन्होंने बताया, "मेरा भाई 28 साल का है. उसने आर्ट्स और एजुकेशन में बीए और एमए किया है लेकिन अब सब डिग्री बेकार है क्योंकि वह जेल में है."
जेल में बंद एक व्यापारी का परिवार श्रीनगर से आया है और एक कोने में है. उनके चेहरे के हावभाव से लग रहा है कि वो अकेले रहना चाहते हैं.

इमेज स्रोत, Reuters
चेहरों पर सैकड़ों सवाल
उस व्यक्ति की पत्नी ने एक सफेद दुपट्टे से अपना सिर ढंक रखा था. वह रो रहे अपने बच्चे को चुप कराने का कोशिश कर रही थी.
कुछ देर तक बहुत कोशिश करने के बाद वो वेटिंग रूम से बाहर निकली और बाहर रखे तीन मिट्टी के घड़े से बच्चे के बोतल में पानी भरा.
उनके किशोर बच्चे आसपास खड़े नजर आ रहे हैं जिनके चेहरों पर सैकड़ों सवाल तैर रहे हैं.
कुलगाम के रहने वाले एक दिहाड़ी मजदूर अब्दुल गनी ट्रेन से दिल्ली आए और उसके बाद बस से आगरा पहुंचे हैं.
उनका बेटा और भतीजा जेल में बंद है. हालांकि, वो चिंतित हैं क्योंकि वे कश्मीर में अधिकारियों के पास से ज़रूरी दस्तावेज लेकर नहीं आए हैं.
सुरक्षा बलों पर पत्थर नहीं फेंका...
यात्रा में उनका 10,000 रुपया खर्च हो गया. एक बार फिर से कुलगाम जाना और वापस आना उनके लिए महंगा पड़ेगा.
उन्होंने बताया, "मुझे नहीं पता था कि मुझे चिट्ठी ले जानी है. उन्हें देर रात दो बजे हिरासत में लिया गया. वे सो रहे थे. सुरक्षा बल तीन से चार वाहनों में आए थे."
उन्होंने बताया, "किसी ने मुझे नहीं बताया कि उन्हें क्यों हिरासत में लिया गया. उन्होंने कभी भी सुरक्षा बलों पर पत्थर नहीं फेंका."
कुछ घंटे गुजर गए और अब गेट के भीतर जाने का समय है. कश्मीर से आए लगभग सभी परिवार ताजा सेब लेकर आए हैं.
इन लोगों में से एक व्यक्ति लंबे समय तक ताजा रखने के लिए एक पेटी में सेब लेकर आए हैं.
हालांकि एक सुरक्षा कर्मचारी ने उन्हें सुरक्षा कारण से सेब एक थैले में रखने को कहा.

अंदर जाने की अनुमति
अधिकारियों ने अब्दुल ग़नी की विनती सुन ली और अपना सत्यापित दस्तावेज आधार दिखाने के बाद उन्हें अंदर जाने की अनुमति दी.
जेल के एक अधिकारी ने बताया, "हम जितना कर सकते हैं उतना अधिक से अधिक सामंजस्य बैठाने का प्रयास कर रहे हैं. अगर आप आधार दिखाते हैं तो आप जा सकते हैं और मुलाकात कर सकते हैं."
एक घंटे या उसके बाद अपने बेटे और भतीजे से आधा घंटा मुलाकात करने के बाद अब्दुल गनी मुस्कुराते हुए बाहर निकले.
उन्होंने बताया, "वह (मेरा बेटा) चिंतित था. मैंने उसे कहा कि घर पर सब कुछ ठीक है."
उन्होंने बताया, "हम उसके ठौर-ठिकाने को लेकर चिंतित थे. अल्लाह का शुक्रगुजार हूं, मैं यहां उससे मिल सका. मैं एक पखवाड़े में वापस आऊँगा."
शाम के करीब चार बज गए थे और वेटिंग रूम खाली हो गया था. तभी हमने देखा कि एक महिला और पुरुष तेजी से जेल के गेट की ओर बढ़ रहे हैं.

जेल प्रशासन
वे बारामूला के रहने वाले थे. वे श्रीनगर से हवाई जहाज से दिल्ली और वहां से कैब से आए थे.
उन्होंने जेल प्रशासन से अनुरोध किया और उन्हें मुलाकात के लिए 20 मिनट का समय दिया गया.
तारीक अहमद डार ने बताया, "जेल अधिकारियों ने हमें यहां पहले आने के लिए कहा था. हमें मुलाकात के लिए 40 मिनट का समय मिल सकता था." जेल में बंद तारीक के भाई के तीन बच्चे हैं.
जेल के एक अधिकारी ने बताया कि आगंतुकों को मंगलवार और शुक्रवार को मुलाकात की अनुमति दी गई है.
ऐसे में मौका चूक जाने पर तारीक को चार दिन आगरा में इंतजार करना पड़ता.
तारीक ने बताया, "मैंने उनसे बात की. उनकी पत्नी,उनके तीन बच्चे,उनके बुजुर्ग माता—पिता उसे याद कर रहे हैं. अब मैंने उन्हें देख लिया है, अब मैं उन लोगों को बताऊँगा कि वह ठीक है."
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