ये है जम्मू-कश्मीर के अलग झंडे की कहानी

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- Author, मोहित कंधारी
- पदनाम, जम्मू से, बीबीसी हिंदी के लिए
जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद अब राज्य का झंडा चर्चा का विषय बना हुआ है.
5 अगस्त को आए इस फैसले के 20 दिन बाद रविवार के दिन श्रीनगर स्थित सिविल सेक्रेटेरियट से राज्य का झंडा हटा दिया गया.
इस कदम के बाद अब सभी सरकारी कार्यालयों और संवैधानिक संस्थानों पर केवल तिरंगा ही दिखाई देगा.
लेकिन कम ही लोगों को कश्मीर के अपने झंडे की कहानी मालूम है.
हमने इसका इतिहास जानने के लिए जम्मू यूनिवर्सिटी के लॉ डिपार्टमेंट के रिटायर्ड डीन डॉक्टर केएल भाटिया और जम्मू और कश्मीर के प्रतिष्ठित लेखक दयासागर से लंबी बात की.

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केएल भाटिया का नज़रिया
ये कहानी मुल्क के बंटवारे से पहले की है. भारत का संविधान बनने से और भारत की स्वतंत्रता से पहले पूरे भारत में 565 देसी रियासतें थीं.
हर रियासत का अपना अपना झंडा होता था. इसी प्रकार से रियासत जम्मू और कश्मीर का भी अपना झंडा था.
आगे चल कर जिस झंडे को रियासत का झंडा बनाया गया वो महाराजा के समय का झंडा नहीं था.
पूरे भारत में जितनी रियासतें थीं, सबने भारत के तिरंगे झंडे को अपनाया. ये एक संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा था.
सिर्फ़ जम्मू कश्मीर ऐसी रियासत थी जिसमे भारत के झंडे के साथ राज्य का अपना झंडा भी लगाया जाता था.
इतिहास के पन्नों में ये दर्ज है कि जिस समय महाराजा हरि सिंह जम्मू और कश्मीर रियासत का विलय भारत में कर रहे थे, उस समय उन्होंने कोई शर्त नहीं रखी थी कि उनके राज्य का अलग से संविधान होगा.

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भारत के साथ विलय
महाराजा हरि सिंह ने सिर्फ़ इतना कहा था, "मेरे राज्य पर कबायलियों ने और पाकिस्तानी फौजियों ने सादे कपड़ों में हमला किया है और भारत सरकार मुझे अपनी सेना की सहायता दे और इसके साथ मैं ये भी जानता हूँ कि जब तक मैं पूर्ण रूप से विलय नहीं करूंगा ये संभव नहीं है."
भारत के साथ विलय को लेकर महाराजा हरि सिंह की नीति को उजागर करने वाले 15 जुलाई 1946 के वक्तव्य के मुताबिक, "मेरी सरकार की ये इच्छा है कि स्वतंत्र भारत में मेरे राज्य को भी वही जगह मिले जो अन्य राज्यों की होगी. मैं भारतीय संविधान के तहत रहूंगा और उस दिन के लिए मैं आशान्वित हूं."
ये महाराजा हरि सिंह की दूरदर्शिता ही थी और उन्होंने इसे 1946 में ही स्पष्ट कर दिया था.
इस बात का ज़िक्र ऐतिहासिक दस्तावेज़ 'सरदार पटेल द्वारा किए गए पत्राचार वॉल्यूम-1' में साफ़-साफ़ मिलता है लेकिन फिर भी जितने भी बुद्धिजीवी हैं वो ना जाने किस कारण महाराजा के इस वक्तव्य का संज्ञान नहीं लेते.
जब 'कैबिनेट मिशन प्लान' भी नहीं आया था और जब 'इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट' भी नहीं आया था, ये वक्तव्य उस समय का है और हम इसका संज्ञान भी नहीं लेते हैं.

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दिल्ली समझौता, 1952
राज्य को अलग झंडा कैसे मिला, इसकी भी अपनी कहानी है.
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के बीच एक समझौता हुआ था. इसे दिल्ली एग्रीमेंट, 1952 के नाम से जाना जाता है.
इस समझौते के पैरा 4 में लिखा गया है, "केंद्र सरकार केंद्रीय झंडे के साथ राज्य सरकार के अलग झंडे को लेकर सहमति जताती है लेकिन राज्य सरकार इस पर सहमत है कि राज्य का झंडा केंद्रीय झंडे का प्रतिरोधी नहीं होगा."
इसी समझौते के तहत जम्मू और कश्मीर राज्य के लिए अलग झंडा वजूद में आया और ये समझौता कोई क़ानूनन समझौता नहीं है. ये दो प्रधानमंत्रियों, एक भारत के प्रधानमंत्री और दूसरे जम्मू और कश्मीर रियासत के प्रधानमंत्री के बीच हुआ समझौता था. जहाँ तक मेरी जानकारी है, इसे तो लोकसभा ने भी पारित नहीं किया.
अब सवाल ये उठता है कि यह झंडा आया कहाँ से? शेख मोहम्मद अब्दुद्ल्लाह ने अपनी पार्टी द्वारा कश्मीर में चलाए जा रहे स्वतंत्रता आंदोलन को मान्यता प्रदान करने के लिए ऐसा कदम उठाया था. पहले उनकी पार्टी का नाम मुस्लिम कांफ्रेंस था, जिसे बाद में बदल कर उन्होंने नेशनल कांफ्रेंस कर दिया था.

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राज्य का संविधान
शेख अब्दुल्लाह कौन सा स्वतंत्रता का आंदोलन चला रहे थे. वो 'कश्मीर छोड़ो' आंदोलन की तुलना 'भारत छोड़ो' आंदोलन के साथ करते हैं. विडम्बना देखिए, शेख चाहते थे, कौन कश्मीर छोड़े? महाराजा हरि सिंह?
शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह को ना कभी जम्मू की याद आई, न लद्दाख की याद आई, न कारगिल की याद आई, न पाकिस्तान के कब्ज़े वाले जम्मू और कश्मीर के लोगों की याद आई. उन्हें सिर्फ़ कश्मीरी और कश्मीरी मुसलमानों की याद आई और इसके इलावा उन्होंने किसी को मान्यता नहीं प्रदान की.
यहाँ तक कि उन्हें जम्मू में रहने वाले मुसलमानों की, लद्दाख में रहने वाले मुसलमानों की, ना ही शिया समुदाय के लोगो की याद आई. उनकी सोच इतनी सीमित थी. ये समझौता करते हुए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री को दूरदर्शिता दिखानी चाहिए थी.
अब जब अनुच्छेद 370 गया, 35-A गया और जब इसमें अलग झंडे की कोई बात ही नहीं थी, न ही विलय के समझौते में झंडे का कोई जिक्र है. अगर राज्य के संविधान में राज्य के झंडे का जिक्र है तो भी इसकी तुलना भारत के संविधान के साथ नहीं की जानी चाहिए. अब ये सब निरस्त हो गया तो इसके साथ ही राज्य का झंडा भी निरस्त हो गया है.

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दयासागर का नज़रिया
''एक धारणा बन गई है जिसके मुताबिक़ राज्य के लोग ये समझते हैं कि जिस प्रकार भारत देश का एक अलग झंडा है उसी तरह जम्मू और कश्मीर राज्य का भी अपना अलग झंडा है.
जम्मू और कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 144 के मुताबिक़ राज्य के झंडे के बारे में साफ़-साफ़ व्याख्या की गई है जिसमें उसका स्टेटस परिभाषित नहीं है.
एक गलत धारणा बन गई थी कि जम्मू और कश्मीर रियासत का भी अपना झंडा है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. राज्य का झंडा केवल एक प्रतीकात्मक चिन्ह है.
जम्मू और कश्मीर रियासत का विलय 1947 में हुआ और अनुच्छेद 370 का जन्म 1950 में हुआ और स्टेट फ्लैग को 7 जून 1952 को जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा ने एक प्रस्ताव पारित करते हुए इसे राज्य का आधिकारिक झंडा बनाया था.
संविधान सभा के समक्ष ये प्रस्ताव स्वयं शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह ने पेश किया था जिस पर बाद में अन्य सदस्यों ने चर्चा कर मोहर लगा दी थी.''
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कैसा था जम्मू और कश्मीर का झंडा
जम्मू और कश्मीर के झंडे की पृष्ठभूमि लाल है जिस पर हल और तीन खड़ी लाइनें बनी हैं. ये लाइनें कश्मीर, जूम्म और लद्दाख को दर्शाती हैं.
झंडा कुल मिलाकर एक राजनीतिक आंदोलन का प्रतिनिधित्व करता था जो कि 1947 से पहले किसानों के शोषण के ख़िलाफ़ था.
ये माना जाता है कि इसके बीज 13 जुलाई, 1931 में बोए गए थे. उस समय डोगरा महाराजा की सरकार ने श्रीनगर की सेंट्रल जेल के पास एक जुलूस पर फायरिंग के आदेश दिए थे, जिसमें 21 लोग मारे गए थे.
बताया जाता है कि इसके विरोध में किसी ने एक घायल व्यक्ति की खून में सनी हुई कमीज़ निकाली और भीड़ ने उसे जम्मू और कश्मीर के झंडे के तौर पर फहराया.
11 जुलाई 1939 को डोगरा शासकों के विरुद्ध आंदोलन कर रहे राजनीतिक दल जम्मू और कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इसे अपने झंडे के तौर पर अपनाया.
इसके बाद 7 जून 1952 को एक प्रस्ताव पारित करके इसे राज्य का आधिकारिक झंडा बना दिया.
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