कैसे बना जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा?

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- Author, शुजात बुखारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
कर्नाटक के मुख्यमंत्री के सिद्धारमैया ने 8 मार्च को राज्य के अलग झंडे की घोषणा की थी.
हालांकि, राज्य सरकार के पास अपना अलग झंडा अपनाने का अधिकार नहीं है. इसलिए सिद्धारमैया सरकार ने केंद्र सरकार से अपने अलग झंडे की अनुमति मांगी है.
इससे जम्मू कश्मीर के बाद कर्नाटक देश का ऐसा पहला प्रदेश बन गया है जिसने अलग झंडे की मांग की है. लेकिन, भारत के अन्य राज्यों की तुलना में जम्मू-कश्मीर की स्थिति अलग है.
जम्मू और कश्मीर के अपने झंडे की कहानी पुरानी है और राज्य का अलग संविधान इसे दूसरों से और अलग बना देता है. हालांकि, मुस्लिम बहुल इस एकमात्र राज्य को अपना झंडा और स्वायत्त दर्जा प्राप्त होना विवाद का विषय रहा है.

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हाई कोर्ट तक पहुंचा मामला
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर का झंडा भी समानांतर रूप से अस्तित्व में रहा है, इसे साल 2015 में बीजेपी सदस्य और पूर्व पुलिस अधिकारी फ़ारुख़ ख़ान ने जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. लेकिन पिछले कुछ समय से कोर्ट इस मसले पर शांत ही रहा है. फ़ारुख़ ख़ान बाद में लक्षद्वीप में प्रशासक के रूप में नियुक्त किए गए.
फ़ारुख़ खान ने ये याचिका मुफ्ती मोहम्मद सईद सरकार के उस सर्कुलर के बाद दायर की गई थी जिसमें उन्होंने सभी संवैधानिक इमारतों और सरकारी वाहनों पर जम्मू-कश्मीर के प्रांतीय झंडे को फ़हराने का आदेश दिया था.
और ये सर्कुलर तब जारी किया गया था जब अब्दुल क़य्यूम ख़ान नाम के एक शख्स ने झंडे के सम्मान के संबंध में अदालत के निर्देश मांगते हुए एक याचिका दायर की थी. यह पीडीपी-बीजेपी सरकार के बीच पहली तकरार थी. बाद में सरकारी वेबसाइट से चुपचाप ये सर्कुलर हटा दिया गया.
लेकिन, ये मामला अदालत में तब पहुंचा जब बीजेपी और पीडीपी 'गठबंधन का एजेंडा' नाम से एक समझौते के तहत जुड़ गए थे. यह एजेंडा अन्य बातों के अलावा ये भी कहता है, ''राजनीतिक और संवैधानिक वास्तविकताओं पर विचार करते हुए जम्मू-कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे को लेकर बीजेपी और पीडीपी की स्थितियों को मान्यता देते हुए और उनकी धारणाओं को सराहते हुए, भारतीय संविधान में विशेष दर्जे सहित जम्मू-कश्मीर से संबंधित सभी संवैधानिक प्रावधानों पर वर्तमान स्थति बनी रहेगी.

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झंडे का लाल रंग
जम्मू और कश्मीर के झंडे में लाल बैकग्रांउड है जिस पर हल और तीन खड़ी लाइनें बनी हैं. ये लाइनें कश्मीर, जूम्म और लद्दाख को दर्शाती हैं जिनका अपना इतिहास है और जो 1931 के बाद हुए राजनीतिक आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ है.
यह माना जाता है कि इसकी शुरुआत 13 जुलाई, 1931 से जुड़ी है जब डोगरा सरकार ने श्रीनगर की सेंट्रल जेल के पास एक जुलूस पर फायरिंग के आदेश दिए थे, जिसमें 21 लोग मारे गए थे.
बताया जाता है कि इसके विरोध में किसी ने एक घायल व्यक्ति की खून में सनी हुई कमीज़ निकाली और भीड़ ने उसे जम्मू-कश्मीर के झंडे के तौर पर फहराया. 11 जुलाई 1939 को डोगरा शासकों के विरुद्ध आंदोलन कर रहे राजनीतिक दल जम्मू और कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस ने इसे अपने झंडे के तौर पर अपनाया.
इसके बाद 7 जून 1952 को जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा ने एक प्रस्ताव पारित करते हुए इसे राज्य का आधिकारिक झंडा बना दिया. हालांकि, ऐसा कहा जाता है कि झंडे को 1947 से 1952 तक जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय ध्वज माना गया था.
नेशनल कांफ्रेंस का एक तराना (गीत) भी था जिसे पार्टी के मौलाना मोहम्मद सईद मसूदी ने लिखा था. लेकिन, उसे राज्य की स्थापना में शामिल नहीं किया गया. इसे साल 2001 में उमर अब्दुल्ला के पार्टी अध्यक्ष बनने के मौके पर चलाया गया था.

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नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच समझौता
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्ला 1952 में केंद्र और राज्य की शक्तियों को परिभाषित करने वाले एक समझौते पर राज़ी हुए थे. झंडे के मसले में तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज माना गया और जम्मू-कश्मीर को झंडे को राज्य का झंडा माना गया और दोनों साथ फहराये गये.
समझौते की धारा 4 में लिखा गया था, ''केंद्र सरकार केंद्रीय झंडे के साथ राज्य सरकार के अपने झंडे को लेकर सहमति जताती है लेकिन राज्य सरकार इस पर सहमत है कि राज्य का झंडा केंद्रीय झंडे का प्रतिरोधी नहीं होगा; यह भी मान्यता दी जाती है कि केंद्रीय झंडे का जम्मू और कश्मीर में वही दर्जा और स्थिति होगी जो शेष भारत में है, लेकिन राज्य में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े ऐतिहासिक कारणों के लिए, राज्य के झंडे को जारी रखने की ज़रूरत को मान्यता दी गई है''. बाद में जम्मू और कश्मीर के संविधान में भी इसे अपनाया गया.
जम्मू और कश्मीर के झंडे का डिज़ाइन किसने बनाया था ये तो साफ़ नहीं है लेकिन इस संबंध में मोहन रैना नाम के एक व्यक्ति का नाम आता है. वह कलाकारों के परिवार से संबंध रखते थे. 21 नागरिकों के मारे जाने की कहानी के अलावा झंडा कुल मिलाकर एक राजनीतिक आंदोलन का प्रतिनिधित्व करता था जो कि 1947 से पहले किसानों के शोषण और उसके ख़िलाफ़ केंद्रित था.

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राजनीतिक विश्लेषक गुल वानी कहते हैं, ''यह बाहर से थोपा नहीं गया था. यह कोई विशिष्ट निर्माण नहीं था लेकिन यह राजनीतिक आंदोलन के चरित्र का प्रतिनिधित्व करता था.''
यह एक तथ्य है कि नेशनल कांफ्रेंस का "नया कश्मीर" (न्यू कश्मीर) एजेंडा साम्यवादी विचारधारा से प्रेरित था.
अब तक राज्य ध्वज बना हुआ है और कर्नाटक भी इसमें शामिल होने की कोशिश कर रहा है लेकिन दोनों राज्यों की अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि के चलते ऐसा नहीं हो सकता. साथ ही बीजेपी की मूल विचारधारा से पैदा हुई देश के एकीकरण की नीति को देखते हुए भी ऐसा होना मुश्किल लगता है.
जब बीजेपी सत्ता में है तब तक राज्य की शक्तियां बढ़ाने और उसे एक अलग दर्जा देने जैसे कदम स्वीकार नहीं हो सकते. लेकिन, जम्मू-कश्मीर में ये एक भावनात्मक मसला है जिससे नेशनल कांफ्रेंस व पीडीपी जैसे क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल का संरक्षण हासिल है.
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