कश्मीर में दिल, लेह में दुकान: क्या सोचते हैं लेह के कश्मीरी

लद्दाख

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    • Author, कुलदीप मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लेह से

"यहां जश्न चल रहा था, लोग नाच रहे थे और कश्मीर में मेरे घर पर सब कुछ बंद पड़ा था. मेरे मां-बाप की कोई ख़बर नहीं मिल रही थी. आप बताइए कि इस जश्न से मैं ख़ुद को कैसे जोड़ लूं."

लेह की एक दुकान में काम करने वाले एक कश्मीरी नौजवान ने ये बात कही और फिर आस-पास इस तरह देखा कि कोई इस बातचीत को सुन न ले.

लेह के मुख्य बाज़ार में सड़क के दोनों ओर कम से कम सत्तर फ़ीसदी दुकानें कश्मीरियों की हैं. इनमें से इक्का-दुक्का दुकानें उन्होंने ख़रीदी हैं, बाक़ी बौद्ध मालिकों से किराए पर ली हुई हैं.

बहुत से कश्मीरी नौजवान यहां बौद्ध मालिकों की दुकानों में भी काम करते हैं.

लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्ज़ा मिलने के बाद यहां के कश्मीरी दुकानदारों और कामगारों के लिए एक अजब भावनात्मक दुविधा पैदा हो गई है.

लेह

लेह के लोगों की मांग

जो समृद्ध कश्मीरी हैं उन्होंने लेह में करोड़ों का निवेश किया है. जो कामगार हैं वे भी यहां खाना खिलाकर, कालीन, शॉल और दुपट्टे बेचकर रोज़ी चलाते हैं.

इस तरह यहां के विकास की नई उम्मीदों के भागीदार वे भी हैं. लेकिन उनका मन कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटाए जाने के ख़िलाफ़ भी बैठा जाता है.

लेह के मुख्य बाज़ार में कुछ कश्मीरी दुकानदारों और कामगारों ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर हमसे बात की.

लेह में लोग लंबे समय से केंद्रशासित प्रदेश (यूटी) की मांग कर रहे थे. इस आंदोलन में यहां के धार्मिक संगठन लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन (एलबीए) की बड़ी भूमिका रही है. इसलिए बौद्धों की अधिकांश आबादी के लिए यूटी एक भावनात्मक मसला रहा है.

लेकिन लेह के कुछ कश्मीरी दुकानदारों को लगता है कि ये फ़ैसला अपने मौजूदा स्वरूप में लेह वासियों के लिए भी फ़ायदे का सौदा नहीं है.

लेह

एक कश्मीरी दुकानदार ने कहा, "लेह के लोगों के लिए यूटी एक दूर के सपने की तरह था जो अचानक पूरा हो गया. इसलिए अब लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि इसे कैसे देखें. 370 का विशेष दर्ज़ा भी छिन गया है और लोगों में कंफ़्यूजन भी बहुत है. इसके बुरे नतीजों के बारे में बहुत लोगों को पता नहीं है."

एक अन्य कश्मीरी दुकानदार ने कहा कि लद्दाख के लोग यूटी इसलिए चाहते थे ताकि उन्हें कश्मीर जाकर किसी चीज़ की इजाज़त न लेनी पड़े और कश्मीरी नेताओं से कुछ न मांगना पड़े. इस मांग का मुख्य मक़सद केंद्र के सीधे शासन में आना था. लेकिन अनुच्छेद 370 के फ़ायदे वो भी नहीं खोना चाहते थे.

लेह

'लेह के टैक्सी वालों का क्या होगा'

लेह में टैक्सी कारोबार यहां के स्थानीय लोगों के पास ही है और वह उनकी आमदनी का बड़ा ज़रिया है.

एक कश्मीरी दुकानदार ने बताया, "टैक्सी बिज़नेस में लेह वासियों का ऐसा एकाधिकार है कि कारगिल वालों को भी लेह में टैक्सी चलाने की इजाज़त नहीं है. यहां टैक्सी के तौर पर सिर्फ़ जेके-10 की गाड़ियां ही चलती है."

उन्होंने कहा कि विशेष दर्ज़ा हटने के बाद अगर यहां ओला और उबर जैसी कंपनियां आ जाएंगी तो उनके सस्ते दामों का यहां के स्थानीय टैक्सी मालिक मुक़ाबला नहीं कर सकेंगे.

एक अन्य कश्मीरी ने यही बात होटलों के संबंध में कही.

लेह

नौकरियों में स्पर्धा कैसे करेंगे लद्दाख वाले?

यूटी की मांग के पीछे एक बड़ी दलील ये दी जाती है कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने विकास का पैसा लद्दाख में ख़र्च नहीं किया, इसलिए वह विकास में पिछड़ गया.

हालांकि स्थानीय पत्रकार सेवांग रिंगज़िन कहते हैं कि नब्बे के दशक में स्वायत्त हिल काउंसिल की व्यवस्था आ जाने के बाद लेह-लद्दाख में विकास को गति मिली है.

कालीन की तह लगाता हुआ वह कश्मीरी दुकानदार भी यह मानने को तैयार नहीं हुआ कि बीते एक दशक में लेह विकास से वंचित रहा है.

उन्होंने कहा, "मुख्य बात यही थी कि यहां के लोग ये चाहते हैं कि उनके ऊपर कोई न हो. ये लोग भी स्वायत्तता चाहते थे. जम्मू कश्मीर विधानसभा की ओर से फंड के भेदभाव की बात सही हो सकती है लेकिन वो एक राजनीतिक मसला है. मैं कह रहा हूं कि यहां की सरकारी नौकरियों के लिए अब बाहर के लोग आवेदन करेंगे तो ये लोग उनका मुक़ाबला नहीं कर पाएंगे क्योंकि उन्हें शिक्षा और कौशल की वैसी सुविधाएं नहीं मिली हैं."

लेह बाज़ार

बाज़ार एक, जज़्बात अलग

गृह मंत्री अमित शाह की ओर से सूचित किए गए फ़ैसले पर लेह के मुख्य बाज़ार की सड़क पर दो बिल्कुल उलट मत और भावनाएं पसरी हुई हैं.

किसी दुकान में जो विदेशियों को कालीन दिखा रहा है, वह नाराज़ है. जो बिल बना रहा है वो प्रसन्न है. लेकिन किसी ने नहीं कहा कि इस मतभेद ने अब तक किसी संघर्ष को जन्म दिया हो.

एक कश्मीरी नौजवान से पूछा तो उसने तुरंत अपना मोबाइल फोन निकालकर वे तस्वीरें दिखाईं कि कैसे इस बार वो ईद पर अपने घर नहीं जा सका तो उसके बौद्ध मालिक ने उसके साथ बैठकर ईद मनाई.

लेकिन क्या यह घटना यहां की कारोबारी ज़रूरत की उपज है या यहां के समाज का असल प्रतिबिंब है?

कुछ लोग मुस्कुराकर रह गए, कुछ ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया.

लेह बाज़ार

और कश्मीर की बात

लेह बाज़ार की एक दुकान पर बैठे आंगचुक कहते हैं कि वे कश्मीरियों के चेहरे पर उदासी साफ़ देख सकते हैं और उन्हें यह दृश्य अच्छा नहीं लगता.

उन्होंने कहा, "जो भी हो, सत्तर साल तक हमने एक प्रदेश साझा किया है. ये कश्मीरी भी लेह बाज़ार का हिस्सा हैं."

कम से कम इस सड़क पर यह दो परस्पर विरोधी विचारों के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की तरह लगता है.

एक दुकान के बौद्ध मालिक ने कहा कि वो अपने कश्मीरी कारीगरों को कभी यहां से नहीं जाने देना चाहते, भले ही वह उनके विचारों से सहमत नहीं हैं.

श्रीनगर की डल झील
इमेज कैप्शन, श्रीनगर की डल झील

एक दुकान पर दो कश्मीरी कामगारों से कश्मीर के हालात पर पूछा तो उन्होंने सबसे पहली नाराज़गी वहां लगी पाबंदियों पर जताई और दूसरी भारतीय मीडिया पर.

वे बताने लगे कि उन्हें ये दिन अपने मां-बाप और भाई-बहनों की फ़िक्र में काटने पड़े हैं.

ख़ुद को 'देशभक्त भारतीय' बताने वाले एक मुखर कश्मीरी दुकानदार ने कहा कि वह कश्मीर की आज़ादी की कोशिशों के समर्थक नहीं है लेकिन कश्मीरियों का ख़ास अधिकार छीन लिए जाने से उन्हें धक्का लगा है.

उन्होंने कहा, "हमारा एक प्रदेश था, उसे आपने यूटी बना दिया सिर्फ़ इसलिए कि इससे आप चुनाव जीतें तो यह सिर्फ़ एक राजनीतिक फ़ैसला है."

डल झील

यहां के कश्मीरी दुकानदार ये स्वीकारने में हिचकते नहीं कि बौद्ध मालिकों से अच्छे संबंध अपनी जगह हैं, लेकिन अनुच्छेद 370 पर उनकी भावनाएं कश्मीर के साथ हैं, लेह के साथ नहीं.

एक दुकानदार ने कहा, "अगर आप चाहते हैं कश्मीर आपका अपना बने तो कश्मीरियों में ये भाव पैदा करने पर ज़ोर दो कि वे भारतीय हैं और आपके भाई हैं. "

"ऐसा मत करो कि उन्हें लगे कि आप उन्हें चिढ़ा रहे हो. उनका एक विशेष दर्ज़ा था जो आपने छीन लिया. "

मुझे एक गर्म कहवा पकड़ाते हुए उसने कहा, "अगर मैं आपसे आपका घर छीन लूं तो आप मुझसे झगड़ा नहीं करोगे? "

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