अनुच्छेद 370 ख़त्म करने से नाराज़ यूपीएससी टॉपर शाह फ़ैसल क्या बोले

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- Author, स्टीफ़न सैकर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत प्रशासित कश्मीर से संबंध रखने वाले पूर्व आईएएस अधिकारी और पीपल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) के अध्यक्ष शाह फ़ैसल को गिरफ़्तार करके वापस कश्मीर भेजे जाने की ख़बरें हैं.
शाह फ़ैसल घाटी के उन चुनिंदा राजनेताओं में से थे जिन्हें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटाने और दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित करने के भारत के फ़ैसले से पहले अन्य राजनेताओं की तरह हिरासत में नहीं लिया गया था.
ख़बर के मुताबिक़, उनकी गिरफ़्तारी दिल्ली एयरपोर्ट से हुई है. इससे पहले शाह फ़ैसल ने आशंका जताई थी- 'मुझे भी बाक़ी राजनेताओं की तरह जल्द ही गिरफ़्तार कर लिया जाएगा.' उनका कहना था कि कश्मीर में ख़ौफ़ पसरा हुआ है.
बीबीसी के कार्यक्रम हार्ड टॉक के प्रस्तुतकर्ता स्टीफ़न सैकर ने जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट के नेता शाह फ़ैसल का लंबा साक्षात्कार किया.
कश्मीर से 2009 के यूपीएससी टॉपर शाह फ़ैसल ने कहा कि कश्मीर के 80 लाख लोग बीते कई दिनों से बंदी की हालत में हैं.

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युद्ध जैसी स्थिति
शाह फ़ैसल ने कहा, "जम्मू-कश्मीर में बीते कई दिनों से कर्फ़्यू लगा है. कश्मीर के 80 लाख लोग इतने दिनों से बंदी की हालत में हैं. सड़कें सूनी हैं. बाज़ार बंद हैं. एक जगह से दूसरी जगह जाना बहुत मुश्किल है. संचार सुविधाएं पूरी तरह ठप हैं. टेलीफ़ोन, मोबाइल काम नहीं कर रहे. बाहर रह रहे कश्मीरी अपने परिजनों से बातें नहीं कर पा रहे हैं. खाद्य पदार्थों की कमी हो गई है. लोगों को पता नहीं चल रहा कि क्या हो रहा है. सुरक्षाबलों की अभूतपूर्व तैनाती की गई है. वहां युद्ध की जैसी स्थिति है. लोग अपने रिश्तेदारों से मिल पाने में असमर्थ हैं. चाहे वो अलगाववादी हों या भारत समर्थक नेता सभी हिरासत में हैं."
वे कहते हैं, "4 अगस्त को हुई सर्वदलीय बैठक में शामिल नेताओं में से अकेले मैं हिरासत से बाहर हूं. मेरे वहां से बाहर निकलने के बाद से पुलिस एक से अधिक बार मेरे घर आई. पर मैं एयरपोर्ट और वहां से दिल्ली कैसे पहुंचा यह भी खुद में एक कहानी है. हो सकता है कि संचार सुविधाओं के ठप्प पड़ने की वजह से वे लोग अपने वरिष्ठों से मेरे वहां से बाहर निकलने की बातें नहीं कर सके हों. लेकिन मैं सशंकित हूं कि जब मैं यहां से जाउंगा मुझे भी अन्य लोगों की तरह हिरासत में ले लिया जाएगा."

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'कश्मीर के सभी नेता हिरासत में हैं'
यह पूछे जाने पर कि अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं और आम जनता के लिए आपका क्या संदेश है? क्या आप चाहते हैं कि लोग सड़कों पर उतरें क्योंकि आप इसे भारत का कब्जा जमाना बता रहे हैं?
शाह फ़ैसल ने कहा, "अगर आप देखें कि 5 अगस्त को क्या हुआ... मुख्यधारा के उन सभी राजनेताओं को हिरासत में ले लिया गया जो मेरी तरह चुनाव की राजनीति में विश्वास रखते हैं उन पर बिना किसी तर्क के भारत की संसद में पारित हुआ क़ानून थोप दिया गया. अभी तक दो पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत कई नेता हिरासत में हैं. तो जब आप जनता की लामबंदी की बात करते हैं तो बीते एक हफ़्ते के दौरान वहां जिस तरह सुरक्षाबलों की तैनाती हुई है उसे देखते हुए प्रदर्शन के लिए लोगों को जुटाना असंभव है."

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'इसका विरोध होगा'
"मैं लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करता हूं, लेकिन साथ ही यह भी समझता हूं कि जब सुरक्षाबलों की तैनाती में थोड़ी ढील दी जाएगी वहां लोग स्वाभाविक रूप से इसका विरोध करेंगे और मेरी और अन्य किसी कश्मीर नेताओं की कोई आवाज़ नहीं सुनी जाएगी. अभी वहां बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती है और उनके सामने कौन अपनी आवाज़ उठाएगा. हालांकि मुझे लगता कि इसका विरोध हुए बगैर नहीं रहेगा."
शाह फ़ैसल से जब यह पूछा गया कि बीते कई चुनाव से भारतीय जनता पार्टी अपने घोषणापत्र में यह कहती भी रही है कि वो 370 हटाएगी और सरकार के पास चुनावी जनादेश भी है. ऐसे में इसे हटाया जाना आपके लिए आश्चर्यजनक क्यों है?

'संसद में संविधान की हत्या'
इस पर शाह फ़ैसल कहते हैं, "भारत को दुनिया का सबसे महान प्रजातंत्र बताया जाता है. और बावजूद इसके कि मोदी सत्ता में हैं, हमें यकीन था कि कई संवैधानिक संस्थाएं हैं जो हमारे अधिकारों की रक्षा करेंगी. यही वजह है कि हम खुद को सुरक्षित समझते थे. लिहाज़ा जिस तरह से इसे लागू किया गया उससे मुझे आश्चर्य हुआ. अगर आप राज्य के संवैधानिक इतिहास और अनुच्छेद 370 के बीते 70 सालों के इतिहास को देखेंगे तो संविधान के सभी जानकार इस पर एकमत थे कि संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करके अनुच्छेद 370 को ख़त्म करना असंभव है. इसलिए इसे निरस्त करने के लिए देश की संसद में संविधान की हत्या करके पूरी तरह से अवैध तरीके का सहारा लिया गया."

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'सांसदों को बहुमत की आवाज़ नहीं बनना चाहिए'
लेकिन यह पूछे जाने पर कि अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का प्रस्ताव और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल राज्यसभा के बाद लोकसभा में भी बहुमत से पारित किया गया है.
शाह फ़ैसल कहते हैं, "भारत में लाजवाब विविधता है. देश की संसद में 130 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व किया जाता है. सांसदों को बहुमत की आवाज़ नहीं बनना चाहिए. यही हमारी समस्या है. ऐसी स्थिति में अल्पसंख्यकों की समस्याओं को कौन सुनेगा. कल किसी अन्य राज्य के साथ भी कर सकता है. संसद ने देश के प्रजातांत्रिक ढांचे को ठेस पहुंचाई है, मेरा मानना है कि इस बात के लिए बहुमत नहीं मिला है. मूल संविधान के आदर्शों की रक्षा करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने बुनियादी संरचना सिद्धांत को निर्धारित किया है. हम इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे. कई पार्टियां सुप्रीम कोर्ट गई भी हैं."

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'बीजेपी का एजेंडा'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है केंद्र शासित प्रदेश होने की वजह से जम्मू-कश्मीर में अब कहीं अधिक विकास होगा. उन्होंने कहा है कि वहां निवेश होंगे और लोगों को इसका सीधा फ़ायदा मिलेगा.
इस सवाल के जवाब में शाह फ़ैसल कहते हैं, "मुझे लगता है कि अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के ईर्द गिर्द एक ग़लत कहानी तैयार की गई है. जम्मू-कश्मीर में विकास के सूचकांक कई अन्य राज्यों से कहीं बेहतर हैं. आज जीडीपी, प्रति व्यक्ति आय, प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या, जन्म-मृत्यु दर समेत कई मामलों में जम्मू-कश्मीर देश के कई राज्यों से कहीं आगे है."
वे कहते हैं, "अनुच्छेद 370 भूमि सुधार के मामले में सुरक्षा की गारंटी था. वहां की तरह का भूमि सुधार देश के किसी भी अन्य राज्य में नहीं देखा गया है. इस तरह की दलीलें दी जा रही हैं लेकिन ये सब बीजेपी के एक एजेंडे के तहत आता है और वो है 'एक विधान, एक प्रधान, एक संविधान, एक झंडा, एक राष्ट्रपति और एक प्रधानमंत्री.' यह विचार सभी को एक रंग में ढालने का है, जिसमें विविधता की कमी है. वो अल्पसंख्यकों, विविधता और भिन्न संस्कृतियों का सम्मान करना नहीं जानते हैं, विशेषकर मुसलमानों को लेकर ज़बरदस्त विरोध है. यहां उसी का इस्तेमाल किया गया है."

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'मैं कठपुतली नहीं बनने जा रहा'
जब उनसे पूछा गया कि आपने अलगाववाद का विरोध किया है और हमेशा समस्या को सुलझाने के लिए बातचीत का रस्ता अख्तियार करने की बात करते हैं
इस पर शाह फ़ैसल कहते हैं, "न केवल मेरे लिए बल्कि उन सभी लोगों के लिए भी वह विचार ख़त्म हो गया है जिनका यह यकीन था कि बातचीत से इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है. अब जम्मू-कश्मीर में राजनीति करने का दो ही तरीका है. या तो आप कठपुतली बन जाएं या आप अलगाववादी बन जाएं. लोगों की राजनीति का तरीका यहां से बदल जाएगा. और मैं कठपुतली बनने नहीं जा रहा. पहले हमारे दादा-परदादाओं को ठगा गया और आज हमें ठगा जा रहा है."

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'5 अगस्त को हमें नीचा दिखाया गया'
शाह फ़ैसल से पूछा गया कि सिविल सर्विस की परीक्षा पास करने के बाद आप कई सालों तक प्रशासन में रहे और अलगाववाद के ख़िलाफ़ बोलते रहे हैं. आपने साफ़ पानी, बुनियादी ढांचे और विकास की बात की है. क्या आपको लगता है कि आप ग़लत थे?
"मुझे लगता है. मैं दुनिया के सामने कबूल करता हूं कि इतने दिनों हमने लोगों को ग़लत प्रॉडक्ट बेचने की कोशिश की. और किसी भी कश्मीरी साझेदारों को विश्वास में लिए बगैर संविधान में बदलाव करके हमें 5 अगस्त 2019 को नीचा दिखाया गया है. अभूतपूर्व सेना की तैनाती करके लोगों को घरों में बंद कर दिया गया और उनकी आवाज़ों को दबा दिया गया है. बिना कश्मीरियों की राय जाने मोदी ने उन पर अपना एजेंडा थोप दिया है."
अलगाववाद या चरमपंथ
जब शाह फ़ैसल से यह पूछा गया कि क्या आप चरमपंथ का साथ देंगे?
तो उन्होंने कहा, "मैं अहिंसा में विश्वास रखता हूं. कश्मीर में अहिंसक राजनीतिक विरोध प्रदर्शन शुरू किया जाएगा. इसमें काफी वक्त लगेगा लेकिन मैं मानता हूं कि दुनिया भर में अहिंसक विरोध ही सफल होते रहे हैं और मैं उसी रास्ते पर चलूंगा."
फिर उनसे पूछा गया कि अब तक जो आपकी भाषा है वो अलगाववादी जैसी दिखती है?
इस पर शाह फ़ैसल ने कहा, "यह भारत सरकार का नैरिटिव है कि कौन मुख्यधारा की राजनीति में हैं और कौन अलगाववादी. अगर आप वैधता की बात करें तो अलगावादी वो लोग हैं जो भारतीय संविधान को नहीं मानते. उनके साथ बड़ी संख्या में लोग हैं. एक तरह से देखा जाए तो वे वहां मुख्यधारा की राजनीति कर रहे हैं और हमारी तरह के लोग वहां की मुख्यधारा की राजनीति में नहीं थे. लेकिन अब कश्मीर की राजनीति में इस तरह की सभी शब्दावली बदल जाएगी. मैं समाधान का पक्षधर हूं और कश्मीर में शांति देखना चाहता हूं.
जब फ़ैसल से यह पूछ गया कि आपके पिता की मौत चरमपंथियों के हाथों से हुई थी. क्या आप मानते हैं कि कश्मीर एक बार फिर हिंसा के दौर में पहुंच जाएगा?
फ़ैसल कहते हैं, "बीते 30 सालों में चरमपंथी घटनाओं में हज़ारों लोगों की मौत हुई है. तीन पीढ़ियां चरमपंथ से तबाह हो गया है. मैं आगे की पीढ़ियों को चरमपंथ की भेंट चढ़ते नहीं देखना चाहता. मेरा मानना है कि कश्मीरियों को जापानियों की तरह खुद में लचीलापन लाना होगा. नए सिरे से अपने विचार, अपनी घरें, अपने दिमाग को तैयार करें. जो भी नुकसान हुआ है उसे दोबारा बनाएं."

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मानवाधिकार हनन पर ध्यान दे दुनिया
इमरान ख़ान इसकी तुलना नाज़ी से करते हैं, जबकि दुनिया के अन्य देश यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र भी इस पर बहुत हद तक खामोश है. क्या आप पाकिस्तान से सहायता लेना पसंद करेंगे या फिर बाकी दुनिया से मदद मांगेंगे?
यह पूछने पर शाह फ़ैसल कहते हैं, "जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस पर प्रतिक्रिया दी है उससे मैं पूरी तरह निराश हूं. कश्मीर पर तीन परमाणु शक्तियां अपना दावा कर रही हैं. यह न्यूक्लियर फ़्लैशपॉइंट है. दुनिया के बड़े देश इसको ऐसे ही नहीं छोड़ सकते. इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए. इस इलाके में ये तीन देश परमाणु युद्ध छेड़ सकते हैं. मैं उम्मीद करता हूं कि दुनियाभर के समुदाय यहां हो रहे मानवाधिकार हनन की घटनाओं पर संज्ञान लेंगे."
क्या आप इस पूरे मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ लेंगे?
इस पर शाह फ़ैसल कहते हैं, "पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असहाय दिख रहा है. 70 सालों तक भारत-पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे का समाधान नहीं किया. अब इसमें अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप का वक्त आ गया है. अंतरराष्ट्रीय समुदायों को कश्मीर में शांति बनाए रखने के लिए इन दोनों देशों की मदद करनी चाहिए. कश्मीरियों की आवाज़ सुनी जानी चाहिए."
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