दिल्ली और भोपाल के बीच फंसे शिवराज

शिवराज सिंह चौहान

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    • Author, शुरैह नियाज़ी
    • पदनाम, भोपाल से, बीबीसी हिंदी के लिए

मध्य प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके शिवराज सिंह चौहान 15 साल बाद अब विपक्ष में पहुंच चुके हैं.

लेकिन विपक्ष में पहुंच कर शिवराज सिंह चौहान कुछ अलग ही अंदाज़ में नज़र आ रहे हैं.

भोपाल में हो रहे धरना-प्रदर्शन हों या फिर किसी अन्य से संबंधित कोई मामला शिवराज सिंह उसमें ज़रूर नज़र आ जाएंगे.

जहां कुछ लोगों का मानना है कि शिवराज सिंह चौहान जनता की लड़ाई लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, वहीं कुछ लोग इसे राज्य की राजनीति अपना अस्तित्व बचाने की शिवराज की लड़ाई के तौर पर भी देख रहे हैं.

शिवराज समर्थकों का मानना है कि वो आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि वह मुख्यमंत्री रहते हुए थे.

उनके क़रीबी इसकी वजह बताते हैं, "कांग्रेस ने 114 सीटें जीत कर सरकार तो ज़रूर बना ली लेकिन शिवराज की वजह से भाजपा भी 109 सीटें जीतने में कामयाब रही."

शिवराज सिंह चौहान

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राजनीतिक सक्रियता

चंद सीटों के फासले को छोड़ दें तो शिवराज सिंह चौहान सत्ताधारी पार्टी के आकड़ों के क़रीब ही खड़े नज़र आते हैं.

सबसे बड़ी बात ये दिख रही है कि उनकी पार्टी उन्हें दिल्ली की तरफ़ बुलाती है लेकिन वो अपना संघर्ष प्रदेश में ही जारी रखना चाहते हैं.

शिवराज सिंह चौहान को पार्टी हाईकमान ने हाल ही में राष्ट्रीय सदस्यता अभियान का प्रभारी बनाया है.

ज़िम्मेदारी मिलने के साथ ही वो उस काम में लग गए हैं लेकिन इसके साथ ही मध्य प्रदेश के दूसरे मुद्दों को लेकर उनकी सक्रियता कम नहीं हुई है.

मामला चाहे प्रदेश में किसानों का हो या फिर आदिवासियों का या फिर बिजली समस्या का शिवराज सिंह चौहान हर मुद्दा उठा रहे है और सरकार के लिए दिक़्क़त भी पैदा कर रहे हैं.

बीजेपी नेता

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इमेज कैप्शन, 2005 में दिल्ली में हुई एक बैठक के दौरान मोदी, आडवाणी, शिवराज, वसुंधरा राजे और जसवंत सिंह

सड़क पर नज़र आए...

पिछले 15 दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए जब शिवराज सिंह लोगों के बीच सड़क पर नज़र आए.

वो चाहे पिछले दिनों भोपाल में एक नौ साल की लड़की की बलात्कार के बाद हत्या का मामला हो या फिर प्रदेश में महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार और अपराध का मुद्दा.

शिवराज चाहते हैं कि इसके लिए मोहल्ला समितियों को गठन किया जाए लेकिन इन मोहल्ला समितियों के गठन पर सत्ताधारी नेता ही सवाल उठा रहे हैं.

उनका कहना है कि 13 साल तक सत्ता में रहे शिवराज सिंह चौहान ने इसका गठन उस वक़्त क्यों नही किया जब वह स्वंय मुख्यमंत्री थे.

शिवराज सिंह चौहान इस अभियान के लिए अपने आप को सामाजिक कार्यकर्ता बता रहे हैं और इसमें विभिन्न धर्मो के धर्म गुरुओं को भी शामिल करने की बात कर रहे हैं.

पार्टी रोक नहीं सकती...

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि शिवराज सिंह चौहान की कोशिश ख़ुद को प्रदेश में बनाए रखने की है. इसलिए वो इस वक़्त हर आंदोलन और विरोध प्रदर्शन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश गुप्ता कहते हैं, "राजनीति में आप को लोग याद रखें इसलिए आप का सक्रिय रहना बहुत ज़रूरी है. भले पार्टी कोई काम न दे लेकिन अगर आप सरकार का विरोध कर रहे हैं तो पार्टी आप को रोक भी नही सकती है. जिसका लाभ वो उठा रहे हैं."

शिवराज सिंह, मोदी

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दिनेश गुप्ता इसकी एक वजह और बताते हैं, "उनके साथ उनकी पार्टी के जो नेता हैं, वो किसी तरह का संघर्ष नही कर रहे हैं. उनकी ग़ैर मौजूदगी का फायदा उठाकर शिवराज सिंह चौहान अपने आप को सामने रखना चाहते हैं. पार्टी कुछ नही कर रही है, वहीं, दूसरे नेता भी कुछ नही कर रहे हैं तो एक तरह से उनके लिये मैदान ख़ाली है."

हाल ही में भोपाल में शिवम मिश्रा नाम के एक युवक की मौत पुलिस की कथित पिटाई से हो गई.

शिवराज न सिर्फ़ परिवार के बीच पहुंचे बल्कि उन्होंने पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कारवाई की मांग को लेकर किए गए धरने में भी शिरकत की. उन्होंने कहा कि वह हर हाल में पीड़ित परिवार को इंसाफ दिलाने के लिये संघर्ष करेंगे.

मध्य प्रदेश में मौजूदगी

राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर का मानना है कि शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता बरक़रार है और वो उसी तरह लोगों के बीच पहुंच रहे है ताकि उन्हें कोई भूले न.

गिरिजा शंकर ने कहा, "यदि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा का अंतर 50-60 सीटों का होता तो शायद शिवराज सिंह चौहान इतने सक्रिय नही रह पाते."

वहीं वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई का कहते है, "शिवराज सिंह चौहान वरिष्ठ नेता हैं. वो तीन बार के मुख्यमंत्री रहे हैं लेकिन केंद्र की सरकार में उनकी कोई भूमिका नही है और न ही संगठन स्तर पर उनकी कोई भूमिका है. प्रदेश में भी अभी उनकी कोई भूमिका नही है. वो विधायक ज़रूर हैं लेकिन वो नेता प्रतिपक्ष या प्रदेश अध्यक्ष जैसी भूमिका में नही हैं."

वो आगे कहते है, "सदन के अंदर नेता प्रतिपक्ष की भूमिका होती है, वहीं, सदन के बाहर कुछ हो रहा है तो प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका रहती है लेकिन इस वक़्त शिवराज सिंह चौहान दोनों ही भूमिका में नही है. इसलिये वो थोड़े व्याकुल हो रहे हैं. और अपने आप को एक तरह से राजनीतिक रूप से बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं."

शिवराज सिंह

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दिल्ली में शिवराज के लिए भूमिका

लेकिन उनकी पार्टी में उनके विरोधी रहे कुछ नेता मानते हैं कि हाईकमान भी उन्हें न तो केंद्र में और न ही प्रदेश में कोई बड़ा पद दे रहा है.

भोपाल के सियासी गलियारों में ये सवाल उठने लगा है कि शिवराज के लिए आगे क्या रास्ते हैं?

पार्टी ने उन्हें सदस्यता अभियान चलाने की ज़िम्मेदारी दी है और बीजेपी की ये महत्वाकांक्षी योजना है. जानकारों की राय में शिवराज के पास ख़ुद को साबित करने का ये एक मौक़ा है.

लेकिन इसी के साथ शिवराज को भोपाल से दूर रखने की राजनीति को लेकर भी क़यास शुरू हो जाते हैं.

अभी इस बात के ज़्यादा समय नहीं बीता है, जब उन्हें भोपाल से दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ पार्टी उम्मीदवार बनाना चाहती थी और शिवराज ने अपनी अनिच्छा जता दी.

पार्टी हाईकमान चाहता है कि वो दिल्ली में राजनीति करें लेकिन वह प्रदेश की राजनीति में ही अपने आप को रखना चाहते है.

प्रदेश की राजनीति में उनकी भूमिका पर जब प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, "शिवराज सिंह चौहान भोपाल के निवासी है. वो पूर्व मुख्यमंत्री है और इस वक़्त विधायक है. इसके नाते वो अपनी भूमिका का पूरी तरह से निर्वहन कर रहे है."

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